शुक्रवार, 19 मार्च 2021

Pomegranate/Anar health benefits


 

सामान्य परिचय: हमारे देश में अनार का पेड़ सभी जगह उगाया जाता है। अफगानिस्तान और भारत के उत्तरी भाग में पैदा होने वाले अनार बहुत रसीले और अच्छी किस्म के होते हैं। अनार के पेड़ कई शाखाओं से युक्त लगभग 6 मीटर ऊंचे होते हैं। इसकी छाल चिकनी, पतली, पीली या गहरे भूरे रंग की होती है। इसके पत्ते कुछ लंबे व कम चौड़े होते हैं तथा फूल नारंगी व लाल रंग के, कभी-कभी पीले 5-7 पंखुड़ियों से युक्त एकल या 3-4 के गुच्छों में होते हैं। अनार के फल गोलाकार, लगभग 2 इंच व्यास का होता है। इसके फल का छिलका हटाने के बाद सफेद, लाल या गुलाबी रंग के रसीले दाने होते हैं। रस की दृष्टि से यह फल मीठा, खट्टा-मीठा और खट्टा तीन प्रकार का होता है। अनार का केवल फल ही नहीं बल्कि इसका पेड़ भी औषधीय गुणों से भरपूर होता है। फल की अपेक्षा कली व छिलके में अधिक गुण पाये जाते हैं। विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत दाड़िम, लोहित पुष्पक, दंत बीज। हिंदी. अनार । मराठी डालिंब । गुजराती दाड़म। बंगाली दालिम। तैलगू दानिम्मा। तमिल मदुलाई। फारसी अनार, शीरी अनार। अरबी रूमान, हामिज। अंग्रेजी पोमेग्रेनेट लैटिन प्युनिका ग्रेनेटम रंग : अनार का छिलका लाल, हरा और इसका दाना लाल और सफेद होता है। स्वाद : अनार का फल खट्टा, मीठा और फीका होता है। स्वरूप : यह एक मध्यम आकार का पेड़ है जो भारत के प्रत्येक स्थान में मिलता है। पंजाब और अफगानिस्तान की तरफ का अनार अधिक मीठा होता है। स्वभाव : इसकी प्रकृति शीतल होती है। मात्रा (खुराक) : अनार के फल का रस 20 से 25 मिलीलीटर, बीजों का चूर्ण 6 से 9 ग्राम, छाल का चूर्ण तीन से पांच ग्राम, पुष्प कलिका चार से पांच ग्राम। हानिकारक : सभी प्रकार के अनार शीत प्रकृति वालों के लिए हानिकारक होते हैं। मीठा अनार बुखार वालों को, खट्टा और फीका अनार सर्द मिजाज वालों के लिए हानिकारक हो सकता है। गुण : अनार के सेवन से शरीर में खून की कमी दूर हो जाती है, यह पेट को नरम करता है, मूत्र लाता है, हृदय के लिए लाभदायक होता है। प्यास को खत्म करता है। धातु को पुष्ट करता है, शरीर के प्रत्येक अंग का पोषण करता है। यह विभिन्न रोगों में उपयोगी होता है। अनारदाना का बारीक चूर्ण स्वादिष्ट, भोजन पचाने वाला और भूख बढ़ाने वाला होता है तथा यह मंदाग्नि, वायुगोला, अपच, अतिसार, गले के रोग, कमजोरी और खांसी में लाभकारी होता है। वैज्ञानिक मतानुसार अनारदाने में आद्रता 78 प्रतिशत, कार्बोहाईट्रेट 14.5 प्रतिशत, प्रोटीन 1.6 प्रतिशत, वसा 0.1 प्रतिशत होती है। इसके अलावा फास्फोरस, कैल्शियम, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आक्जैलिक अम्ल, तांबा, लोहा, गंधक, टेनिन, शर्करा, विटामिन्स होते हैं। फल की छाल में 25 प्रतिशत, तने के गूदे में 25 प्रतिशत तक, पत्तियों में 11 प्रतिशत और जड़ की छाल में 28 प्रतिशत टैनिन होता है। विभिन्न रोगों में उपयोग : 1. नाक से खून आना या नकसीर : अनार के रस को नाक में डालने से नाक से खून आना बंद हो जाता है। अनार के फूल और दूर्वा (दूब नामक घास) के मूल रस को निकालकर नाक में डालने और तालु पर लगाने से गर्मी के कारण नाक से निकलने वाले खून का बहाव तत्काल बंद हो जाता है। 100 ग्राम अनार की हरी पत्तियां, 50 ग्राम गेंदे की पत्तियां, 100 ग्राम हरा धनिया और 100 ग्राम हरी दूब (घास) को एक साथ पीसकर पानी में मिलाकर शर्बत बना लें। इस शर्बत को दिन में 4 बार पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) ठीक हो जाती है। 100 मिलीलीटर अनार का रस नकसीर (नाक से खून बहना) के रोगी को कुछ दिनों तक लगातार पिलाने से लाभ होता है। आधे कप खट्टे-मीठे अनार के रस में 2 चम्मच मिश्री मिलाकर रोजाना दोपहर के समय पीने से गर्मी के मौसम की नकसीर (नाक से खून बहना) ठीक हो जाती है। नथुनों में अनार का रस डालने से नाक से खून आना बंद हो जाता है। 7 दिन से अधिक रहने वाला बुखार, एपेन्डीसाइटिस में अनार लाभदायक है। अनार की कली जो निकलते ही हवा के झोंकों से नीचे गिर पड़ती है, अतिसंकोचन और गीलेपन को दूर करने वाली होती है। इनका रस 1-2 बूंद नाक में टपकाने से या सुंघाने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है। यह नकसीर के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि है। अनार के छिलके को छुहारे के पानी के साथ पीसकर लेप करने से सूजन में तथा इसके सूखे महीन चूर्ण को नाक में टपकाने से नकसीर में लाभ होता है। अनार के पत्तों के काढ़े को या 10 ग्राम रस पिलाने से तथा मस्तक पर लेप करने से नकसीर में लाभ होता है। 2. गर्मी के कारण नाक से खून आना : अनार के फूल और दूब की जड़ का रस निकालकर नाक में डालना चाहिए अथवा केवल अनार के फूल का रस नाक में डालना और मस्तिष्क पर लगाना चाहिए। इससे नाक से खून आना बंद हो जाता है। 3. पेशाब का अधिक मात्रा में आना (बहुमूत्र) : 1 चम्मच अनार के छिलकों का चूर्ण एक कप पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करें। इससे बहुमूत्र का रोग नष्ट हो जाता है। अनार के छिलकों को छाया में सुखाकर बारीक चूर्ण बना लें। 3 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ लेने से बार-बार पेशाब जाने से छुटकारा मिलता है। 4. चेहरे का सौंदर्य : गुलाब जल में अनार के छिलकों के बारीक चूर्ण को मिलाकर अच्छी तरह लेप बनाएं। इस लेप को सोते समय नियमित रूप से लगाकर सुबह चेहरा धो लें। इससे दाग के निशान, झांइयों के धब्बे दूर हो जाएंगे और चेहरे में चमक आ जायेगी। अनार के ताजे हरे 100 मिलीलीटर पत्तों के रस को 1 किलो सरसों में मिला लेते हैं। चेहरे पर इस तेल की मालिश करने से चेहरे की कील, झांईयां और काले धब्बे नष्ट हो जाते हैं। 5. शरीर की गर्मी : अनार का रस पानी में मिलाकर पीने से गर्मी के दिनों में बढ़ी शरीर की गर्मी दूर होती है। 6. अजीर्ण : 3 चम्मच अनार के रस में 1 चम्मच जीरा और इतना ही गुड़ मिलाकर भोजन के बाद सेवन करने से अजीर्ण का रोग नष्ट हो जाता है। छाया में सुखाया हुआ अनार के पत्ते का चूर्ण 40 ग्राम और सेंधानमक 10 ग्राम दोनों को महीन पीसकर चूर्ण बनाकर रखें। 4-4 ग्राम सुबह-शाम भोजन से पहले पानी के साथ सेवन करने से अजीर्ण दूर होता है। अनार का रस, शहद और तिल का तेल समान मात्रा में लेकर, कुल मिश्रण 50 ग्राम की मात्रा में तैयार करते हैं। इसमें 6 ग्राम जीरा और 6 ग्राम खांड मिलाकर मुंह में भरे और थोड़ी देर तक मुंह को चलाते रहे। जब आंख नाक से पानी निकलने लगे तो कुल्ला कर दें और फिर दुबारा नया रस मुंह में भरें। दिन में 8-10 बार ऐसा करें। इसके अलावा जब बिल्कुल भूख न हो तथा यकृत में विकार हो तब उस अवस्था में भी लाभ होता है। खट्टे मीठे अनार का रस 1 ग्राम मुंह में भरकर धीरे-धीरे चलाकर पीयें। इस प्रकार 8 या 10 बार करने से मुंह का स्वाद सुधरकर आंत्रदोषों (आंतों के विकारों) का पाचन होता है तथा बुखार के कारण से हुई अरुचि भी दूर होती है। मीठे अनार के रस में शहद मिलाकर पिलाने से अरुचि में लाभ होता है। 7. दांत से खून आना : अनार के फूल छाया में सुखाकर बारीक पीस लेते हैं। इसे मंजन की तरह दिन में 2 या 3 बार दांतों में मलने से दांतों से खून आना बंद होकर दांत मजबूत हो जाते हैं। 8. उल्टी : अनार के बीज को पीसकर उसमें थोड़ी-सी कालीमिर्च और नमक मिलाकर खाने से पित्त की वमन और घबराहट में आराम मिलता है। अनार का रस पीने से गर्भवती स्त्रियों की वमन विकृति (उल्टी) नष्ट होती है। अनार के रस में शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आना बंद हो जाता है। सूखे अनारदाने को पानी में भिगो दें। थोड़ी देर के बाद इस पानी को पीने से उल्टी आने के रोग मे लाभ होता है। खट्टे-मीठे अनार के 200 मिलीलीटर रस में 25 ग्राम मुरमुरे का आटा और 25 ग्राम शर्करा मिलाकर सेवन करने से मस्तिष्क की गर्मी शांत होती है। इसके प्रयोग से शारीरिक गर्मी भी दूर होती है और पित्तज्वर को शांत करने हेतु भी यह प्रयोग गुणकारी है। लू लगने से आए हुए बुखार की जलन, व्याकुलता, उल्टी और प्यास भी इसके सेवन से मिट जाता है। 9. बच्चों की खांसी : बच्चों को खांसी होने पर अनार की छाल खाने के लिए देनी चाहिए अथवा अनार के रस में घी, शक्कर, इलायची और बादाम मिलाकर देना चाहिए। 10. बच्चों की दस्त एवं पेचिश : बच्चों को दस्त या पेचिश की शिकायत होने पर अनार की छाल को घिसकर पिलाने से लाभ मिलता है। 11. पेट के कीड़े : अनार की जड़ और तने की छाल का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए अथवा अनार की छाल के काढ़े में तिल का तेल मिलाकर 3 दिन तक पिलाना चाहिए। इससे पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं। यदि कद्दू दाना कृमि ही हो तो 50 ग्राम अनार के जड़ की छाल दरदरा कूटकर 2 लीटर पानी में उबालते हैं जब आधा पानी शेष बचे तो इसे उतार लें। इसके बाद 50 ग्राम सुबह खाली पेट, आधा-आधा घंटे के अंतर से 4 बार सेवन करें। फिर एक बार एरंड तेल का सेवन करें। बालकों को काढे़ की 10 मिलीलीटर तक की मात्रा देनी चाहिए। छाया में सुखाये हुए अनार के पत्तों को बारीक पीस छानकर 6 ग्राम की मात्रा में सुबह गाय की छाछ के साथ या ताजे पानी के साथ प्रयोग करें। इससे पेट के सभी कीड़े दूर हो जाते हैं। अनार की जड़ की छाल 10 ग्राम, वायबिडंग और इन्द्रजौ 6-6 ग्राम कूटकर काढ़ा तैयार कर लेते हैं। इसके बाद काढ़े का सेवन करने से पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। खट्टे अनार के छिलके और शहतूत की 20-20 ग्राम मात्रा को 200 मिलीलीटर पानी में उबालकर पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। अनार के पेड़ की जड़ की तरोताजा छाल 50 ग्राम लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर लें। इसमें पलास बीज का चूर्ण 5 ग्राम, बायविडंग 10 ग्राम को एक लीटर पानी में उबालें। आधा पानी शेष रहने तक उसे उबालते रहें। उसके बाद नीचे उतारकर ठंडा होने पर छान लें। यह जल दिन में चार बार आधा-आधा घंटे के अन्तराल पर 50-50 ग्राम की मात्रा में पिलाने से और बाद में एरंड तेल का जुलाब देने से सभी प्रकार के पेट के कीड़े निकल जाते हैं। अनार के सूखे छिलकों का चूर्ण 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार नियमित रूप से कुछ दिनों तक सेवन करें। इससे पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। यही प्रयोग खूनी दस्त, खूनी बवासीर, स्वप्नदोष, अत्यधिक मासिकस्राव में भी लाभकारी होता है। अनार के फल की छाल को उतार लें, फिर इससे काढ़ा बनाकर उसमें 1 ग्राम तिल का तेल मिलाकर पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। अनार की जड़ की छाल, पलास बीज और वायविंडग को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढे़ को शहद के साथ पीने से पेट के अंदर के सूती, चपटे और गोल आदि कीड़े मरकर मल के द्वारा बाहर निकाल जाते हैं। अनार की जड़ के काढ़े में मीठे तेल को मिलाकर 3 दिन तक सेवन करने से आंतों के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। 50 ग्राम अनार की जड़ की छाल को 250 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, जब पानी 100 ग्राम की मात्रा में बचे, तब इस बने काढे़ को दिन में 3-4 दिन बार पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। 3 ग्राम अनार के छिलकों का चूर्ण दही या छाछ (मट्ठे) के साथ सेवन करें। अनार की छाल को 24 घंटे पानी में भिगोकर रख दें, फिर उसी पानी को उबालकर खाली पेट सुबह पीने से पेट की फीताकृमि (कीड़) मर जाते हैं। 12. उष्णपित्त : शक्कर की चाशनी में अनार-दानों का रस डालकर कपडे़ से छान लें। आवश्यकता होने पर 20 ग्राम शर्बत, 20 मिलीलीटर पानी के साथ पी लें। इससे उष्णपित्त नष्ट हो जाता है। 13. नेत्र की गर्मी : अनार के दानों का रस आंख में डालना चाहिए। इससे आंखों की गर्मी नष्ट हो जाती है। 14. छाती का दर्द : अनार के दानों के रस में एक ग्राम सोनामक्खी का चूर्ण मिलाकर पिलाना चाहिए। इससे छाती का दर्द नष्ट हो जाता है। अनार के दानों का रस 10 मिलीलीटर में इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर पीने से हृदय को लाभ होता है तथा छाती का दर्द भी दूर होता है। छाती के दर्द में अनार के दानों के रस में 1 ग्राम सोनामुखी का चूर्ण डालकर पीना भी छाती के दर्द में लाभकारी होता है। 15. पित्त-रोग : पके हुए अनार के रस में शक्कर मिलाकर पीना चाहिए। इससे पित्त का रोग नष्ट हो जाता है। 16. रक्तातिसार (दस्त में खून का आना) : अनार की छाल और कुरैया (इन्द्रजव) की छाल का काढ़ा शहद के साथ पीने से रक्तातिसार नष्ट हो जाता है। 17. अनार पाक : धनिया, सोंठ, नागरमोथा, खस, बेल का गूदा, आंवले, कुरैया की छाल, जायफल, अतिविषा, खैर की छाल, अजमोदा, एरंड की जड़, जीरा, लौंग, पीपल, कर्कटश्रृंगी, खुरासानी अजवाइन, धाय के फूल और लोघ्रा सभी को लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण कर लेते हैं और अनार में भरकर आटे से बंद कर दे और चूल्हे में सेंककर आटा निकाल दें। इसके बाद सभी को मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर खाने से अतिसार (दस्त), संग्रहणी (ऑव रक्त) का आना, मंदाग्नि (अपच), अरुचि (भोजन का अच्छा न लगना) और दर्द का नाश होता है। 18. अरुचि (भोजन का अच्छा न लगना) : अनार के दाने चबाकर उनका रस निगलने से अरुचि नष्ट हो जाती है। कालीमिर्च आधा चम्मच, सेंका हुआ जीरा 1 चम्मच, सेंकी हुई हींग चने की दाल के बराबर, सेंधानमक स्वादानुसार, अनारदाना 70 ग्राम इन सबको पीस लें। यह स्वादिष्ट अनारदाने का चूर्ण बन जाएगा। इसके खाने से अरुचि नष्ट हो जाती है और मन प्रसन्न हो जाता है। 14 मिलीलीटर अनार के रस में 1 ग्राम कालानमक मिलाकर अथवा भुना जीरा मिलाकर शहद या चीनी के साथ सेवन करें। इससे अजीर्ण और अरुचि नष्ट हो जाती है। 19. प्यास : अधिक प्यास की शिकायत होने पर अनारदाने खाने चाहिए अथवा उनका रस निकालकर तुरन्त ही थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिए। 60 ग्राम अनारदाने को 2 लीटर पानी में डालकर मिट्टी के बर्तन में भिगो दें। 2 से 3 घंटे बाद थोड़े-थोड़े पानी में मिश्री मिलाकर पिलाने से प्यास और गले की जलन मिट जाती है। 20. बुखार से या किसी भी कारण से मुख की अरुचि : पके हुए अनार के 10 ग्राम रस में 7 ग्राम शहद और 4 ग्राम गाय का घी मिलाकर सुबह-शाम देना चाहिए। दूसरी किसी औषधि का बार-बार सेवन करने से जी घबड़ा जाता है, पर इस औषधि से ऐसा नहीं होता, बल्कि इसे बार-बार खाने की इच्छा होती है। 21. अतिसार : 10 ग्राम अनार की छाल, 10 ग्राम पुराना गुड़ और 5 ग्राम जीरा मिलाकर देना चाहिए। इससे 1-2 दिन में ही अतिसार में लाभ होता है। 3-6 ग्राम अनार के जड़ की छाल या अनार के छिलके का चूर्ण शहद के साथ दिन में 3 बार देना चाहिए। इससे अतिसार नष्ट हो जाता है। लगभग 14-28 मिलीलीटर अनार के छिलके तथा कोरैया की छाल का काढ़ा दिन में 2 बार सेवन करने से अतिसार नष्ट हो जाता है। अनार फल के छिलके के 2-3 ग्राम चूर्ण का सुबह-शाम ताजे पानी के साथ प्रयोग करने से अतिसार तथा आमातिसार में लाभ होता है। अनार की ताजी कलियों के साथ छोटी इलायची के बीज और मस्तंगी को पीसकर शक्कर मिलाकर अवलेह तैयार कर लें, इसे चटाने से बालकों के पुराने अतिसार और प्रवाहिका में विशेष लाभ होता है। अनार को छिलके सहित कूटकर रस निचोड़कर 30-50 मिलीलीटर तक पिलायें। इसमें शक्कर मिलाकर पिलाने से पित्त के कारण होने वाली उल्टी, खुजली और थकान में लाभ होता है। अनार का छिलका 20 ग्राम को 1 लीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर रख लें, फिर इसी बने काढ़े को छानकर पीने से अतिसार (दस्त, पतली ट्टटी लगना) में खून का आना बंद हो जाता है। अनार के पत्तों को पानी में पीसकर लेने से अतिसार में लाभ मिलता है। अनार की कली 1 ग्राम, बबूल की हरी पत्ती 1 ग्राम, देशी घी में भुनी हुई सौंफ 1 ग्राम, खसखस या पोस्त के दानों की राख आदि 3 ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें, फिर इसी चूर्ण को लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में 1 दिन में सुबह, दोपहर और शाम को मां के दूध के साथ पीने से बच्चों का दस्त आना बंद हो जाता है। अनार के छिलके 50 ग्राम को लगभग 1.2 मिलीलीटर दूध की मात्रा में डालकर धीमी आग पर रख दें, जब दूध 800 मिलीलीटर बच जाये इसे एक दिन में 3 से 4 बार खुराक के रूप में पीने से अतिसार यानी दस्त समाप्त हो जाते हैं। अनार की छाल का काढ़ा बनाकर 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में सेवन करने से लाभ मिलता है। अनार के फल, सौंफ, सोंठ, आम की गुठली यानी गिरी, खसखस की डोडी और भुना हुआ सफेद जीरा को बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बनाकर रख लें, इस बने चूर्ण को लगभग 5 ग्राम की मात्रा में लेकर 10 ग्राम मिश्री के साथ हर 2 घंटे के बाद खाकर ताजा पानी को पीने से अतिसार यानी दस्त की बीमारी से रोगी को छुटकारा मिलता है। अनार की छाल का 100 ग्राम चूर्ण, 50 ग्राम जीरा, 3 ग्राम सेंधानमक को बारीक पीसकर 1 चम्मच की मात्रा में चूर्ण को लेकर 1 दिन में सुबह, दोपहर और शाम को पीने से पतले दस्तों का आना बंद हो जाता है। अनार के फल के छिलकों को उतारकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, इसी बने चूर्ण को 20 ग्राम की मात्रा में लगभग 400 मिलीलीटर पानी में, 2 लौंग को डालकर अच्छी तरह से उबालकर काढ़ा बनाकर पीने से पेट में होने वाली मरोड़ या ऐंठन और दस्त बंद हो जाते हैं। अनार के रस को लगभग 2 से 3 ग्राम की मात्रा में 4 या कुछ दिनों तक पीने से अतिसार का आना रुक जाता है। अनार के छिलकों को सुखाकर 15 ग्राम की मात्रा में लेकर 2 लौंग को डालकर पीसकर 1 गिलास पानी में डालकर उबाल लें, जब पानी आधा रह जाये तब इसका सेवन 1 दिन में लगभग 3-3 घंटे के बाद पिलाने से दस्त, पेचिश और पेट में से मल के द्वारा आने वाली आंव समाप्त हो जाती है। 22. अजीर्ण से उत्पन्न अतिसार : आधा ग्राम अनार की छाल का चूर्ण, आधा ग्राम जायफल और 1 ग्राम का चौथा भाग केसर को मिलाकर उसका चूर्ण बनाकर शहद के साथ देना चाहिए। इससे एक ही बार में लाभ होगा। यदि न हो, तो दुबारा देना चाहिए। 23. पाण्डुरोग (पीलिया) : अच्छे अनार के 20 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह-शाम देना चाहिए। इससे थोड़े दिनों में ही पीलिया ठीक हो जाता है। अनार खाने और रस पीने से शारीरिक कमजोरी नष्ट होती है और खून की कमी (एनीमिया) के रोग से मुक्ति मिलती है। 50 मिलीलीटर अनार के रस में रात को साफ लोहे का टुकड़ा डुबो दें। सुबह लोहे का टुकड़ा निकालकर, छानकर स्वादानुसार मिश्री और 25 मिलीलीटर पानी मिलाकर पी जायें। इससे पीलिया में लाभ होगा। लगभग 250 मिलीलीटर उत्तम अनार के रस में 750 ग्राम चीनी मिलाकर चाशनी बना लें। इसका सेवन दिन में 3 या 4 बार करने से पीलिया रोग दूर हो जाता है। छाया में सुखाए हुए अनार के पत्ते के महीन चूर्ण की 6 ग्राम मात्रा को सुबह गाय की छाछ तथा शाम को उसी छाछ के पनीर के साथ सेवन कराने से पीलिया रोग में लाभ मिलता है। अनार का रस मल बंध की शिकायत दूर करता है और पीलिया रोग में फायदा करता है। 24. क्षय (टी.बी) के रोग : पके हुए स्वादिष्ट अनार के 200 मिलीलीटर रस में 40 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण, 40 ग्राम जीरे का चूर्ण, 40 ग्राम सोंठ का चूर्ण, 40 ग्राम दालचीनी का चूर्ण और 10 ग्राम शुद्ध केसर डालकर 200 ग्राम उत्तम पुराना गुड़ मिलाएं, फिर सबको एकत्र करके जलाकर उसमें 10 ग्राम इलायची का चूर्ण डालें और 5-5 ग्राम वजन की गोलियां बनाएं फिर रोज सुबह-शाम 250 मिलीलीटर दूध के साथ अपनी पाचन शक्ति के अनुसार लेना चाहिए। इससे टी.बी का रोग नष्ट हो जाता है। अनार के 200 मिलीलीटर स्वादिष्ट रस में पीपल, सफेद जीरा, सोंठ और दालचीनी का चूर्ण 40-40 ग्राम, उत्तम केशर 10 ग्राम, पुराना गुड़ 200 ग्राम, हल्की आंच पर पकायें, जब गोली बनने योग्य गाढ़ा हो जाये, तो नीचे उतारकर 10 ग्राम छोटी इलायची का चूर्ण डालकर 6-6 ग्राम की गोलियां बनाकर, सुबह-शाम 1-1 गोली बकरी के दूध के साथ सेवन करें। यदि कमजोरी अधिक हो, परन्तु दस्त और खांसी न हो तो, ताजे अनार का रस जितना पी सकें पिलायें। इससे टी.बी का रोग नष्ट हो जाता है। यदि खांसी हो तो अनार का रस 2-2 चम्मच दिन में 3-4 बार पिलायें। 25. अधिक बोलने से स्वर बिगड़ने पर : अच्छा पका हुआ एक अनार रोज खाना चाहिए। इससे गले की बिगड़ी हुई आवाज कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है। 26. आंख की फूली (गुहेरी) : अनार का फल जो अच्छी तरह पका हो, उसकी छाल को पके हुए अनार फल के रस में घिसे। फिर इसे लाल घोंगची के ऊपर के छिलके निकालकर घिसना चाहिए और आंख की फूली पर अंजन करना चाहिए। अनार का फल जो अच्छी तरह पका हो, उसकी छाल को पके हुए अनार फल के रस में घिसे। फिर इसमें एक या दो लाल गुंजा का छिलका निकालकर घिसें। इसे फूली पर दिन में तीन बार लगावें। 27. कोढ़ के घाव, : अनार के पत्तों को पीसकर लगाने से कोढ़ के जख्म, दाद और बर्र या बिच्छू दंश आदि में लाभ होता है। अनार के पत्तों को छाया में सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर 6 ग्राम से 10 ग्राम तक रोजाना पानी के साथ खाने से सफेद कोढ़ ठीक हो जाता है। 28. हिस्टीरिया, पागलपन : 15 अनार के पत्ते, 15 ग्राम गुलाब के ताजे फूल 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। चौथाई पानी शेष रहने पर छानकर 20 ग्राम देशी घी मिलाकर रोजाना पीने से हिस्टीरिया और पागलपन के दौरों में लाभ होता है। 29. गर्भस्राव : लगभग 100 ग्राम अनार के ताजा पत्तों को पीसकर पानी में छानकर पिलाने से और पत्तों का रस पेडू पर लेप करने से गर्भस्राव रुक जाता है। 30. अत्यधिक मासिक स्राव (अत्यार्तव) : अनार के सूखे छिलके पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच भर की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करने से रक्तस्राव बंद हो जाता है। नोट : शरीर के किसी भी भाग से खून निकल रहा हो, उसे रोकने में भी इस विधि का उपयोग किया जा सकता है। 31. मुंह की दुर्गन्ध : मुंह से दुर्गन्ध आती हो अथवा मुंह से पानी आता हो तो 4 ग्राम अनार के पिसे हुए छिलकों को सुबह-शाम ताजा पानी से लेने तथा छिलका उबालकर कुल्ले करने से लाभ होता है। 32. खांसीनाशक गोलियां : 80 ग्राम अनार का छिलका 10 ग्राम सेंधानमक में थोड़ा पानी डालकर गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली दिन में 3 बार चूसने से खांसी ठीक हो जाती है। 33. खूनी बवासीर : खूनी बवासीर में सुबह-शाम अनार के पिसे छिलके के चूर्ण को 8 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी से फंकी लेना चाहिए। इससे खूनी बवासीर नष्ट हो जाता है। 12 ग्राम अनार के फल के छिलके का चूर्ण समान मात्रा में चीनी के साथ दिन में 2 बार दें। इससे खूनी बवासीर में लाभ मिलता है। 10 मिलीलीटर अनार के रस को मिसरी के साथ दिन में सुबह-शाम 2 बार लेना चाहिए। इससे खूनी बवासीर नष्ट हो जाती है। 10 ग्राम अनार के सूखे छिलकों के चूर्ण को बराबर मात्रा में बूरा मिलाकर दिन में 2 बार लेना चाहिए। इससे खूनी बवासीर नष्ट हो जाती है। मीठे अनार का छिलका शीतल तथा खट्टे फल का छिलका शीतल रूक्ष होता है इसलिए यह अर्श (बवासीर) के लिए विशेष उपयोगी होता है। अनार की जड़ के 100 मिलीलीटर काढे़ में 5 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर दिन में 2-3 बार पीने से रक्तार्श यानी खूनी बवासीर में लाभ होता है। अनार के पत्तों का लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग रस सुबह-शाम पीने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। अनार के 8-10 पत्तों को पीसकर टिकिया बनाकर गर्म घी में भूनकर बांधने से अर्श (बवासीर) के मस्सों में लाभ होता है। 34. कामशक्तिवर्धक : प्रतिदिन मीठा अनार खाने से पेट मुलायम रहता है तथा कामेन्द्रियों को बल मिलता है। 35. यकृत के रोग : यकृत रोगों में अनार का रस सेवन करना लाभकारी होता है। 36. क्षुधावर्द्धक (भूख बढ़ाने वाली) : कालीमिर्च आधा चम्मच, सिंका हुआ जीरा 1 चम्मच, सेंकी हुई हींग चने की दाल के बराबर, सेंधानमक स्वादानुसार, अनारदाना 70 ग्राम लें। इन सबको पीस लें। यह स्वादिष्ट अनारदाने का चूर्ण बन जाएगा। इसको खाने से अरुचि नष्ट हो जाती है तथा मन प्रसन्न रहता है। 37. गर्मी के मौसम में सिर दर्द होना : गर्मियों में सिर दर्द हो, लू लग जाए और आंखें लाल-लाल हो जाए तो अच्छे, पके अनार के दानों का रस निकालें। रस में डेढ़ गुनी शर्करा डालकर रस को उबालें और चासनी बनाकर शर्बत तैयार करें। उसमें 5 ग्राम केसर और 10 ग्राम इलायची दोनों का कपड़छन चूर्ण मिला लें। 20 से 25 मिलीलीटर शर्बत में उतना ही पानी मिलाकर पीने से उष्णपित्त में शीघ्र ही लाभ होता है। गर्मी के मौसम में मस्तिष्क को शांत रखने, आंखों की जलन मिटाने और धूप में घूमने के कारण आई हुई बेचैनी को दूर करने हेतु प्रयोग करें। यह शर्बत रुचिकर एवं पित्तशामक होता है। 38. पित्तप्रकोप : ताजे अनार के दानों का रस निकालकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से हर प्रकार का पित्तप्रकोप शांत हो जाता है। 39. दबी हुई आवाज के लिए : पका अनार खाने से दबी हुई गले की आवाज खुल जाती है। 40. हठीली खांसी : अनार की सूखी छाल पांच ग्राम बारीक पीसकर कपड़े से छानकर उसमें 0.10 ग्राम कपूर भी मिला लें। यह चूर्ण दिन में 2 बार पानी में मिलाकर पीने से भयंकर बिगड़ी हुई हठीली खांसी भी दूर हो जाती है। 41. गर्भवती स्त्री की शारीरिक शक्ति की वृद्धि हेतु : अनार के पत्तों की चटनी, घिसा हुआ चंदन, थोड़ा-सा दही और शहद मिलाकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से गर्भस्थ शिशु व गर्भवती स्त्री की बल वृद्धि होती है। खट्टे-मीठे अनार के रस या शर्बत के सेवन से गर्भावस्था की उल्टी शांत हो जाती है तथा मीठे अनार के दाने खाने से गर्भवती स्त्री के कमजोर रहने वाले हृदय और शरीर में सुधार होता है तथा गर्भवती महिला की दुर्बलता भी दूर होती है। 42. नई पेचिश : अनार का छिलका 5 ग्राम, लौंग का अधकुटा चूर्ण लगभग 8 ग्राम और 500 मिलीलीटर पानी को ढंककर उबालें। 15 मिनट बाद इसे नीचे उतारकर ठंडा होने पर कपड़े से छान लें। यह जल दिन में 25 से 50 मिलीलीटर तक की मात्रा में सेवन कराने से नया अतिसार, नई पेचिश और आमातिसार की शिकायत दूर हो जाती है तथा आंते बलवान बनती हैं। 43. पेचिश : अनार का छिलका और इन्द्रजौ प्रत्येक 20-20 ग्राम लेकर उन्हें चार गुने पानी में मिलाकर चतुर्थांश काढ़ा तैयार कर लेते हैं। उसकी 3 खुराक बनाकर 1-1 मात्रा सुबह, दोपहर शाम दिन में 3 बार प्रयोग करने से 1-2 दिन में ही रक्तातिसार (पेचिश में खून गिरना) बंद होता है। यदि पेचिश के कष्ट के साथ पेट में दर्द भी हो तो काढे में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में अफीम भी मिला लें। 44. संग्रहणी : कच्चे अनार के रस में माजूफल, लौंग और सोंठ को घिसकर शहद के साथ पीना चाहिए। यदि अनार न मिले तो अनार की छाल को घिसकर पिलाना चाहिए। इससे संग्रहणी नष्ट हो जाती है। अनार के 50 मिलीलीटर रस में लौंग, सोंठ और जायफल का 3 ग्राम चूर्ण मिलाकर, शहद डालकर सेवन करने से संग्रहणी रोग नष्ट हो जाता है। अनार के दानों को कूटकर रस निकाल लेते हैं। इसके बाद उसमें जायफल, लौंग और सोंठ का थोड़ा-सा चूर्ण और शहद मिलाकर पीने से संग्रहणी रोग मिटता है। सूखे अनार के छिलकों को पीसकर उसमें पानी मिलाकर पीने से भी संग्रहणी का रोग दूर हो जाता है। 10 ग्राम अनारदाना, 2 ग्राम सोंठ, 2 ग्राम कालीमिर्च, 5 ग्राम मिश्री आदि सभी को कूट-पीसकर कपड़छन कर लें। इस प्राप्त चूर्ण का सेवन करने से संग्रहणी अतिसार के रोगी का रोग दूर हो जाता है। 20 से 40 मिलीलीटर अनार की छाल का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करने से संग्रहणी अतिसार ठीक हो जाते हैं। 45. आंखों की थकावट : अनार के वृक्ष के पत्तों को पीसकर आंखें बंद करके उन पर यह लुग्दी बनाकर रखने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। 46. आंखों की चिरमाहट : अनार के दानों का रस आंखों में डालने से आंखों की गर्मी दूर होती है। 47. स्त्रियों के स्तन को सुडौल, सख्त और आकर्षक करना : एक तरोताजा अनार को पीस लें। इसे 200 या 250 मिलीलीटर सरसों के तेल में डालकर गर्म कर लें। इस तेल की मालिश नियमित रूप से स्तनों पर करते रहने से स्त्रियों के स्तन उन्नत, सुडौल, सख्त और सौंदर्ययुक्त बन जाता है। अनार की छाल लगभग एक किलो और माजूफल 125 ग्राम को 2 लीटर पानी में डालकर पकायें जब पानी आधा बच जाये तब इसे छानकर रख लें, फिर इसी में 125 मिलीलीटर तिल्ली का तेल डालकर पकाकर स्तनों पर लेप करने से स्तन कठोर होते हैं। 48. हृदय के रोग : अनार के ताजे पत्तों का रस 10 मिलीलीटर, 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर पीने से हृदय की तेज धड़कन में बहुत लाभ होता है। इसे सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। अनार का शर्बत 20-25 मिलीलीटर का नित्य सेवन करें। इससे हृदय के रोग नष्ट हो जाते हैं। छाया में सुखाये हुए अनार के महीन पत्तों के चूर्ण को ताजे पानी के साथ सेवन करने से दाद, रक्तविकार (खून के रोग), कुष्ठ, प्रमेह (वीर्य विकार), दिल की धड़कन, नासूर, घाव, पित्तज्वर, वातकफज्वर में लाभ होता है। 49. मूत्राघात (पेशाब के साथ धातु का जाना) : लगभग 50 ग्राम अनार के रस में छोटी इलायची के बीजों का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण आधा-आधा ग्राम मिलाकर पीने से मूत्राघात में बहुत लाभ होता है। अनार के रस में छोटी इलायची के बीज और सोंठ का चूर्ण मिलाकर पिलाने से मूत्राघात में बहुत लाभ मिलता है। अनार के पत्ते 10 ग्राम और हरा गोखरू 10 ग्राम दोनों को 150 मिलीलीटर पानी में पीस-छानकर सेवन करने से मूत्राघात की शिकायत दूर हो जाती है। 50. गर्भधारण की क्षमता में वृद्धि : अनार की ताजी, कोमल कलियां पीसकर पानी में मिलाकर, छानकर पीने से गर्भधारण की क्षमता में वृद्धि होती है। 51. अम्लता (एसीडिटी) : 10 मिलीलीटर अनार का रस दिन में 2 बार पीने से भी लाभ होता है। 52. मुंहासे : अनार के बीजों का लेप बनाकर मुंहासों पर लगाना चाहिए। इससे मुंहासे नष्ट हो जाते हैं। 53. हृदयरोग, उच्चरक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) : अनार का रस उच्च रक्तचाप कम करता है। यह धमनियों के सिकुड़ने को कम करता है। रोज अनार का रस पीने से बाईपास सर्जरी से बचा जा सकता है। 54. रक्तपित्त : लगभग 7-14 मिलीलीटर अनार के फलों का रस दिन में 2 बार देना चाहिए। इससे रक्तपित्त में लाभ मिलता है। 55. कब्ज : अनार में शर्करा (शुगर) और सिट्रिक अम्ल काफी मात्रा में होता है। यह अत्यंत पौष्टिक, स्वादिष्ट और लौह-तत्व से भरपूर होता है। कब्ज से पीड़ित व्यक्तियों के लिए बीज समेत अनार का सेवन करना अच्छा रहता है और इसके रस के सेवन से उल्टी आना बंद हो जाती है। अनारदाना 100 ग्राम, दालचीनी 20 ग्राम, इलायची 20 ग्राम, तेजपत्ता 20 ग्राम, सोंठ 40 ग्राम, कालीमिर्च 40 गाम, पीपल 40 ग्राम को मिलाकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें 250 ग्राम पुराना गुड़ मिला दें। इसे 4 ग्राम रोजाना सुबह लें। इससे कब्ज दूर हो जाती है। 56. दांतों के रोग : अनार तथा गुलाब के सूखे फूल, दोनों को पीसकर मंजन करने से मसूढ़ों से पानी आना बंद हो जाता है। केवल अनार की कलियों के चूर्ण का मंजन करने से मसूढ़ों से खून आना बंद हो जाता है। मुख और मसूढ़ों के विकार में अनार के जड़ के काढ़े से कुल्ले कराने से लाभ होता है। मीठे अनार के छाया में सूखे 8-10 पत्तों के चूर्ण के मंजन से दांतों का हिलना, मसूढ़ों से खून और पीव का आना या सूजन होना आदि दांतों के विकार नष्ट हो जाते हैं। 57. अनिद्रा या नींद न आना : अनार के ताजे पत्ते 20 ग्राम की मात्रा में लेकर 400 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह 100 मिलीलीटर शेष रह जाये तो इसमें गर्म दूध मिलाकर पीयें। इससे शारीरिक व मानसिक थकावट मिटती है और अनिद्रा रोग भी मिटता है। 58. मुंह के छाले : अनार के 25 ग्राम पत्तों को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई भाग शेष बचे तो उस पानी से कुल्ले करने से मुंह के छाले तथा मुंह के अन्य रोग नष्ट हो जाते हैं। 59. आंखों के रोग : अनार के 5-6 पत्तों को पानी में पीसकर दिन में दो बार लेप करने तथा पत्तों को पानी में भिगोकर पोटली बनाकर आंखों पर फेरने से आंखों के दर्द में लाभ होता है। अनार के 8-10 ताजे पत्तों का रस किसी चीनी मिट्टी के बर्तन में कपड़े से छानकर रख दें और सूख जाने पर इसे सुबह-शाम किसी तिल्ली या सलाई द्वारा आंखों में लगायें, इससे खुजली, आंखों से पानी बहना, पलकों की खराबी, आदि रोग दूर होते हैं। अनार के पत्तों को पीसकर आंखों के ऊपर लेप करना चाहिए। इससे आंखों का दर्द नष्ट हो जाता है। 60. कर्ण विकार (कानों के रोग) : अनार के ताजे पत्तों का रस 100 मिलीलीटर, गौमूत्र (गाय का पेशाब) 400 मिलीलीटर और तिल का तेल 100 मिलीलीटर, तीनों को धीमी आंच पर उबालते हैं जब केवल तेल शेष ही रह जाए तो इसे छानकर रख लें। इसकी कुछ बूंदें थोड़ा गर्म कर सुबह-शाम कान में डालने से कान की पीड़ा, कर्णनाद और बहरेपन में लाभ होता है। अनार के पत्तों के रस में बराबर मात्रा में बेल के पत्तों का रस और गाय का घी मिलाकर गर्म कर लेते हैं। इसे लगभग 20 मिलीलीटर की मात्रा में लेकर उसमें 250 मिलीलीटर मिश्री मिले दूध के साथ सुबह-शाम लेने से बहरापन में लाभ होता है। खट्टे अनार के रस में शहद मिलाकर कान में डालने से कान का पैत्तिक दर्द दूर हो जाता है। थोड़े से अनार के छिलके और 2 लौंग को लेकर सरसों के तेल में डालकर अच्छी तरह से पका लें। पकने के बाद इस तेल को छानकर एक शीशी में भर लें। इस तेल को कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है। 61. गले के रोग : अनार के ताजे पत्तों के 1 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर, शर्बत बना लें, 20-20 मिलीलीटर दिन में 2-3 बार चाटने से आवाज का भारीपन, खांसी, नजला तथा जुकाम दूर होता है। अनार के छाया में सूखे पत्तों के महीन चूर्ण में शहद या गुड़ मिलाकर झरबेरी जैसी गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। इन गोलियों को मुंह में रखकर चूसना चाहिए। इससे गले के रोग नष्ट हो जाते हैं। एक लीटर अनार के पत्तों का रस, 1 लीटर सत्यानाशी (पीला धतूरा) का रस, 1 लीटर गोमूत्र (गाय का पेशाब), 2 लीटर किलो काले तिलों का तेल, 500 मिलीलीटर अनार के पत्तों की लुगदी (चटनी) को मिलाकर आग पर पकाने के लिये रख दें, जब पकते-पकते केवल तेल रह जाय, तब इसे उतारकर ठंडा कर लें और छान लें। यह तेल लगाने से कण्ठमाला (गले की गांठे), भगन्दर, कोढ़ के दाग (निशान), दाद और चेहरे के काले निशान मिट जाते हैं। अनार के छिलकों को 10 गुना पानी में मिलाकर काढ़ा बना लें। और इसमें लौंग और फिटकरी को पीसकर मिला लें। इसके गरारे करने से गले की खरास (गले का सूखना) और स्वर-भंग (आवाज का बैठना) रोग ठीक हो जाता है। 62. बालों का झड़ना : अनार के ताजे हरे पत्तों के 100 मिलीलीटर काढे़ में आधा किलो सरसों का तेल मिलाकर गर्म कर लेते हैं। इस तेल को सिर में लगाने से सिर का गंजापन दूर होता है तथा बालों का झड़ना रुकता है। 63. सिर का दर्द : अनार के छाया में सुखाये हुए आधा किलो पत्तों में आधा किलो सूखा धनिया मिलाकर महीन चूर्ण कर लें, इसमें 1 किलो गेहूं का आटा मिलाकर, 2 किलो गाय के घी में भून लें, ठंडा होने पर 4 किलो चीनी मिला लें। सुबह-शाम गर्म दूध के साथ 50 ग्राम तक सेवन करने से सिर दर्द और सिर चकराना दूर होता है। अनार की छाल को घिसकर सिर पर लेप करें, इससे सिर का दर्द तथा आधाशीशी (माइग्रेन) में भी लाभ होता है। लगभग 20 ग्राम अनार की कली और 10 ग्राम शर्करा को मिलाकर बारीक पीस लें। इस चूर्ण को सूंघने से सिर दर्द ठीक हो जाता है। अनार के फूलों के रस और आम के बौर के रस को मिलाकर सूंघने से रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) के कारण होने वाला सिर का दर्द ठीक हो जाता है। अनार के पत्तों और सफेद चंदन को पानी में घिसकर माथे पर लगाने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है। 63. उन्माद (पागलपन या मिर्गी) : अनार के पत्ते और गुलाब के ताजे फूल 10-10 ग्राम (ताजे फूलों के अभाव में सूखे फूल 5 ग्राम) लें। इसे 500 मिलीलीटर पानी में पकायें, जब यह 250 मिलीलीटर शेष बचे तो इसमें 10 ग्राम गाय का घी मिलाकर गर्म ही गर्म सुबह-शाम पिलाने से उन्माद और मिर्गी में लाभ होता है। अनार के 20 मिलीलीटर पत्तों के काढे़ में 10-10 ग्राम गाय का घी और चीनी मिलाकर पिलाने से मिर्गी या अपस्मार में लाभ होता है। 64. उर:क्षत (सीने में घाव) : दिन में 2-3 बार अनार के पत्तों का काढ़ा 10-20 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से उर:क्षत में लाभ होता है। 65. हिक्का (हिचकी) : 20 ग्राम अनार के शर्बत में छोटी इलायची के बीज, वंशलोचन, सूखा पोदीना, जहरमोहरा खताई और अगुरू 1-1 ग्राम तथा पीपल लगभग आधा ग्राम का बारीक चूर्ण मिलाकर चटनी बना लेते हैं। आवश्यकतानुसार थोड़ी-थोड़ी चटनी चाटने से हिचकी शीघ्र दूर होती है। 66. शरीर में झुर्रियां या मांस का ढीलापन : अनार के पत्ते, छिलका, फूल, कच्चे फल और जड़ की छाल सबको एक समान मात्रा में लेकर, मोटा, पीसकर, दुगना सिरका, तथा 4 गुना गुलाबजल में भिगायें। 4 दिन बाद इसमें सरसों का तेल मिलाकर धीमी आंच पर पकायें। तेल मात्र शेष रहने पर छानकर बोतल में भरकर रख लें। इस तेल को रोज स्तनों पर मालिश करें तो स्तनों की शिथिलता में इससे लाभ होता है। इसके साथ ही जिनके शरीर में झुर्रियां पड़ गई हों, मांसपेशियां ढीली पड़ गई हो उन्हें भी इस तेल की मालिश से निश्चित लाभ होता है। अनार के पत्तों को कुचलकर 1 लीटर रस निकाल लें, इसमें 500 मिलीलीटर मीठा तेल (तिल का तेल) मिलाकर धीमी आंच पर पकायें। केवल तेल शेष बचने पर तेल को छानकर बोतलों में भर कर रख लें। दिन में 2-3 बार मालिश करने से मांसपेशियों के ढीलेपन में लाभ होता है। अनार के फल के 1 किलो छिलके को 4 लीटर पानी में डालकर उबाल लें, जब पानी 1 लीटर शेष रह जाये तो उसमें 250 मिलीलीटर सरसों का तेल डालकर तेल गर्म कर लें। इस तेल की मालिश करने से कुछ ही दिनों में शरीर की मांसपेशियों का ढीलापन दूर हो जाता है और चेहरे की झुर्रियां मिटती हैं तथा त्वचा में निखार आ जाता है। 67. खांसी : अनारदाना सूखा 100 ग्राम, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, इलायची 50-50 ग्राम को चूर्ण कर उसमें बराबर मात्रा में चीनी मिला लें। इसे दिन में दो बार शहद के साथ 2-3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से खांसी, श्वास, हृदय तथा पीनस आदि रोग दूर होते हैं। यह पाचनशक्तिवर्द्धक और रुचिकाकर होता है। अनार के छिलकों को पीसकर 3-4 दिन तक 1-1 चम्मच बच्चों को सुबह-शाम देने से खांसी ठीक हो जाती है। 10-10 ग्राम अनार की छाल, काकड़ासिंगी, सोंठ, कालीमिर्च पीपल और 50 ग्राम पुराना गुड़ लेते हैं। इन सभी को एक साथ पीसकर और छानकर 1-1 ग्राम की छोटी-छोटी गोलियां बना लेते हैं। इस गोली को मुंह में रखकर चूसने से खांसी के रोग मे लाभ मिलता है। 80 ग्राम अनार के छिलके और 10 ग्राम सेंधानमक में पानी डालकर गोलियां बना लेते हैं। इस 1-1 गोली को दिन में 3 बार चूसने से खांसी ठीक हो जाती है। अनार के फल के छिलके को मुंह में रखकर नमक या केवल चूसने से भी खांसी में लाभ होता है। अनार का छिलका चूसने से, या पानी में भिगोकर बच्चों को पिलाने से खांसी में लाभ होता है। अनार का छिलका 40 ग्राम, पीपल और जवाखार 6-6 ग्राम तथा गुड़ 80 ग्राम की चाशनी बनाकर उसमें सभी का महीन चूर्ण मिलाकर लगभग आधा ग्राम की गोली बनाकर 2-2 गोली दिन में 3 बार गर्म पानी से सेवन करें। इसमें कालीमिर्च 10 ग्राम मिला लेने से और भी उत्तम लाभ होता है। 68. खूनी दस्त : अनार की छाल और कड़वे इन्द्रजौ 20-20 ग्राम को यवकूट कर 640 मिलीलीटर पानी मिलाकर उबाल लें चौथाई शेष रहने पर इसे उतार लें और दिन में 3 बार पिलायें। यदि पेट में ऐंठन हो तो 30 मिलीग्राम अफीम मिलाकर लेने से तुरन्त लाभ होगा। कुड़ाछाल 80 ग्राम को कूटकर 640 मिलीलीटर पानी में पकायें। चौथाई शेष रहने पर उतारकर छान लें। अब इसमें 160 मिलीलीटर अनार का रस मिलाकर पुन: पकावें। पानी राब के समान गाढ़ा हो जाये तो उतारकर रख लें। 20 मिलीलीटर तक्र (मट्ठे) के साथ सेवन करने से तेज खूनी दस्त (रक्तातिसार) में लाभ होता है। सौंफ, अनारदाना और धनिये का चूर्ण मिश्री में मिलाकर 3-3 ग्राम दिन में 3 से 4 बार लेने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) के रोगी का रोग दूर हो जाता है। 69. रक्तवमन (खूनी की उल्टी) : अनार के पत्तों के लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग रस को दिन में 2 बार पिलाने से, रक्तवमन, रक्तातिसार, रक्तप्रमेह, सोमरोग, बेहोशी और लू लगने में लाभ होता है। 70. हैजा : अनार के 6 ग्राम हरे पत्तों को 20 मिलीलीटर पानी के साथ पीस छानकर उसमें 20 ग्राम चीनी का शर्बत मिलाकर 1-1 घंटे बाद तब तक पिलायें जब तक हैजा पूर्णरूप से ठीक न हो जाए। खट्टे अनार का रस 10-15 मिलीलीटर नियमित रूप से सेवन करना हैजे में गुणकारी है। रोग शांत होने पर अनार, नींबू या मिश्री का शर्बत, फलों का रस, बर्फ डालकर दही की पतली लस्सी, साबूदाना, अनन्नास का जूस आदि देना चाहिए। 71. गर्भाशय भ्रंश (गर्भाशय का बाहर आना) : गर्भाशय के बाहर निकल आने पर भी अनार गुणकारी है। छाया में सुखाये अनार के पत्तों का चूर्ण 6-6 ग्राम सुबह-शाम ताजे पानी के साथ सेवन कराने से स्त्रियों को लाभ होता है। 72. गर्भपात : अनार के ताजे 20 ग्राम पत्तों को 100 मिलीलीटर पानी में पीस-छानकर पिलाते रहने से तथा पत्तों को पीसकर पेडू (नाभि) पर लेप करते रहने से गर्भस्राव या गर्भपात का खतरा नहीं रहता है। अनार की 1-2 ताजी कली पानी में पीसकर पिलाने से, गर्भधारण शक्ति बढ़ती है तथा प्रदर रोग दूर होता है। यदि गर्भवती का हृदय कमजोर हो तो उसे मीठे अनार के दाने खिलाएं। इससे गर्भपात की आशंका नहीं रहती है। यदि 5 वें या 6 मास में गर्भ अस्थिर हो तो ताजे अनार के पत्ते को पीसकर उसमें थोड़ा सा घिसा हुआ चंदन, दही और शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। 73. व्रण (घाव) : अनार के फूलों की कलियां, जो निकलते ही हवा के झोकों से नीचे गिर पड़ती हैं, इन्हें जलाकर क्षतों (जख्मों, घावों) पर बुरकने से वे शीघ्र ही सूख जाते हैं। अनार के 50 ग्राम पत्तों को 1 लीटर पानी में उबालकर चौथाई शेष रहने पर व्रणों (घावों) को धोने से विशेष लाभ होता है। अनार के 8-10 पत्तों के पेस्ट का लेप उपदंश के घावों पर करने से बहुत लाभ होता है। साथ ही साथ इसके पत्तों का चूर्ण 10 से 20 ग्राम का सेवन भी करना चाहिए। यदि नाक, कान में घाव हो या पीड़ा हो तो अनार की जड़ का काढ़ा 2-2 बूंद डालने से या पिचकारी देने से लाभ होता है। अनार के जड़ की छाल का 5-10 ग्राम सूखा चूर्ण बुरकने से उपदंश के घावों में लाभ होता है। अगर फोड़े में जलन हो रही हो तो उसे दूर करने के लिए अनार की पत्तियों को पीसकर लगाने से भी जलने से बना घाव सही हो जाता है। 74. दाह (जलन) : अनार के 10-12 ताजे पत्तों को पीसकर हथेली और पांव के तलुवों पर लेप करने से हाथ-पैरों की जलन में आराम मिलता है। 250 ग्राम अनार के ताजे पत्तों को पांच लीटर पानी में उबालें तथा 4 लीटर पानी शेष रहने पर नहाने के लिए प्रयोग करने से गर्मी के सीजन की पित्ती शांत होती है। अनार और इमली को एक साथ पीसकर शरीर पर लगाने से जलन समाप्त हो जाती है। 75. कंडूरोग (खुजली) : मीठे अनार के 8-10 ताजे पत्तों को पीसकर, थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर मालिश करने से कंडू रोग में आराम हो जाता है। 76. आंत्रिक ज्वर (टायफाइड) : अनार के पत्तों के काढे़ में 500 मिलीग्राम सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से आंत्रिक ज्वर में लाभ होता है। 77. मुंह के छाले (खुनाक) : लगभग 10 ग्राम अनार के पत्तों को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई शेष बचे तो इस काढे़ से कुल्ले करने से खुनाक रोग और मुंह के छालों में लाभ होता है। अनार फल के छिलके को पीसकर छालों पर लगाने से कुछ ही दिन में छाले सूख जाते हैं। इस पिसी हुई मलहम को रोजाना 2 बार लगाएं। 78. नाखून पीड़ा : अनार के फूलों के साथ धमासा और हरड़ को बराबर मात्रा में पीसकर नख में भरने से, नाखून के भीतर की सूजन और पीड़ा में लाभ होता है। नाखून के जख्म को ठीक करने के लिए अनार के पत्तों को पीसकर नाखून पर बांधें। अनार के पत्ते पीसकर बांधने से नाखून टूटने पर हुआ दर्द ठीक हो जाता है। 79. पेट के विभिन्न रोग : आमाशय, तिल्ली और यकृत की कमजोरी, संग्रहणी, दस्त और उल्टी तथा पेट दर्द आदि रोग अनार खाने से ठीक हो जाते हैं। अनार खट्टी मीठी होने से पाचनशक्ति बढ़ाती है तथा मूत्र लाती है। 80. आंव (एक तरह का सफेद चिकना पदार्थ जो मल के द्वारा बाहर निकलता है) : लगभग 15 ग्राम अनार के सूखे छिलके और दो लौंग, दोनों को पीसकर 1 गिलास पानी में दस मिनट तक उबालें, फिर छान कर आधा-आधा कप प्रतिदिन तीन बार पीयें। दस्त और पेचिश में लाभ होगा। जिन व्यक्तियों के पेट में आंव की शिकायत बनी रहती है, उन्हें इसका नियमित सेवन विशेष रूप से लाभकारी होता है। 81. मोटापा : अनार रक्तवर्धक होता है। इसके सेवन से त्वचा चिकनी बनती है। रक्त का संचार बढ़ता है। शरीर को मोटा करती है। अनार मूर्च्छा में लाभदायक, हृदय बल-कारक और खांसी नष्ट करने वाली होती है। इसका शर्बत हृदय की जलन और बेचैनी, आमाशय की जलन, मूत्र की जलन, उल्टी, जी मिचलाना, खट्टी डकारें, हिचकी, घबराहट, प्यास आदि शिकायतों को दूर करता है। अनार का रस निकालकर पीने से शरीर की शक्ति बढ़ती है। और रक्त की वृद्धि होती है। अनार को खाने से खून साफ होता है, खून का संचार बढ़ता और शरीर मोटा हो जाता है। 82. गंजापन : अनार के पत्ते पानी में पीसकर सिर पर लेप करने से गंजापन दूर हो जाता है। प्रतिदिन मीठा अनार खाने से पेट मुलायम रहता है तथा कामेन्द्रियों को बल मिलता है। 83. श्वास या दमा रोग : अनार के दानों को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें और 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 बार खाने से अस्थमा रोग ठीक हो जाता है। अनार के फूल 10 ग्राम, कत्था 10 ग्राम, कपूर 2 ग्राम और लौंग के 4 पीस आदि सभी को पान के रस में घोंटकर चने के बराबर आकार की गोलियां बना लेते हैं। 2-2 गोली सुबह-शाम को चाटनी चाहिए। अनार पकी हुई लेकर उसमें सात जगह चाकू से गहरे चीरे (1 इंच लम्बे) लगाकर प्रत्येक चीरे में एक बादाम अंदर दबा देते हैं। उस अनार को फिर मलमल के कपड़े से बांधकर गर्म राख में दबा देते हैं। इसे पूरी रात राख में ही दबा रहने देते हैं। सुबह अनार को वापस निकालकर 2 ग्राम मिश्री के साथ सातों बादामों को पीसकर 7 दिनों तक खाने से दमा के रोगी को राहत मिलती है। 84. बुखार : अनार का शर्बत पीने से प्यास, बेचैनी, जी मिचलाना, वमन (उल्टी) और दस्त के रोगों में देने से लाभ होता हैं। 85. पोथकी, रोहे : 100 मिलीलीटर अनार के हरे पत्तों के रस को खरल करके पीसकर शुष्क कर लें। इस शुष्क चूर्ण को आंखों में सूरमे की तरह दिन में 2-3 बार लगाने से पोथकी की बीमारी समाप्त हो जाती है। 86. रतौंधी (रात में न दिखाई देना) : अनार का रस निकालकर किसी साफ कपड़े में छानकर 2-2 बूंदे आंखों में डालने से 2 से 3 हफ्तों में ही रतौंधी रोग कम होने लगता है। 87. कांच निकलना (गुदाभ्रंश) : अनार के 100 ग्राम पत्तों को 1 लीटर जल के साथ मिलाकर उबाल लें। उबले पानी को छानकर रोजाना 3 से 4 बार गुदा को धोने से गुदाभ्रश (कांच निकलना) का निकलना बंद हो जाता है। अनार के छिलके 5 ग्राम, हब्ब अलायस 5 ग्राम और माजूफल 5 ग्राम को मिलाकर कूट लें। इस कूट को 150 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उबालें, एक चौथाई पानी रह जाने पर छानकर गुदा को धोएं। इससे गुदाभ्रश (कांच निकलना) बंद हो जाता है। 88. कैन्सर या कर्कट के रोग में : अनार दाना और इमली को रोजाना सेवन करते रहने से कैंसर के रोगी को आराम मिलता है और उसकी उम्र 10 वर्ष के लिए और बढ़ सकती है। 89. जुकाम : जुकाम के साथ अगर नाक से खून भी आता हो तो घी में अनार के फूल मिलाकर उपलों की आग पर रखकर नाक से उसका धुंआ लेने से लाभ होता है। 90. नामर्दी (नपुंसकता) : मीठे अनार के 100 ग्राम दाने दोपहर के समय नित्य खायें। यह शक्ति को बढ़ाता है। 91. पेशाब की बीमारी में (मूत्ररोग) में : सूखे अनार के छिलकों को सुखाकर पीस लें। उसमें से 1 चम्मच चूर्ण ताजे पानी के साथ खाने से लाभ होता है। अनार की कली, सफेद चंदन की भूसी, वंशलोचन, बबूल का गोंद सभी 10-10 ग्राम, धनिया और मेथी 10-10 ग्राम, कपूर 5 ग्राम। सबको आंवले के थोड़े-से रस में घोट लें। फिर बड़े चने के बराबर की गोलियां बना लें। 2-2 गोली रोज सुबह-शाम पानी से लेने से मूत्ररोग ठीक हो जाता है। 92. बहरापन : आधा लीटर अनार के पत्तों का रस, आधा लीटर बेल के पत्तों का रस और 1 किलो देशी घी को एक साथ मिलाकर आग पर पकने के लिये रख दें। पकने के बाद जब केवल घी ही बाकी रह जायें तो इसमें से 2 चम्मच घी रोजाना दूध के साथ रोगी को खिलाने से बहरेपन का रोग दूर हो जाता है। 20-20 मिलीलीटर अनार और बेल के पत्तों के रस को 50 ग्राम घी में डालकर बहुत देर तक गर्म कर लें। फिर इसे छानकर लगभग 10 ग्राम घी या 200 मिलीलीटर दूध के साथ सुबह और शाम को पीने से बहरापन दूर हो जाता है। 93. आमातिसार : आमातिसार के रोगी को 20 से 40 मिलीलीटर अनार की छाल का काढ़ा सुबह-शाम पीने से लाभ होता है। अनार के पके फल को (हल्का भूनकर) कूटकर रस निकालकर सेवन करने से आमातिसार के रोगी को रोग दूर हो जाता है। 94. बवासीर (अर्श) : अनार के छिलके का चूर्ण बनाकर इसमें 100 ग्राम दही मिलाकर खाने से बवासीर ठीक हो जाती है या अनार के छिलकों का चूर्ण 8 ग्राम, ताजे पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम प्रयोग करें। अनार का रस, गूलर के पके फलों का रस तथा बाकस के ताजे पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर पीने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) ठीक होती है। अनार के छालों का काढ़ा बनाकर उसमें सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से बवासीर रोग ठीक होता है तथा खून का गिरना बंद होता है। अनार के पत्ते पीसकर टिकिया बना लें और इसे घी में भूनकर गुदा पर बांधें। इससे मस्सों के जलन, दर्द तथा सूजन मिट जाती है। अनार के छिलकों का चूर्ण नागकेशर के साथ मिलाकर सेवन करने से बवासीर में खून का बहना बंद होता है। अनार का रस पीने से भी बवासीर में लाभ होता है। 95. मासिक-धर्म सम्बन्धी परेशानियां : अनार के थोड़े से छिलकों को सुखा लेते हैं। फिर उसका चूर्ण बनाकर शीशी में भरकर रखें, फिर इसमें से एक चम्मच चूर्ण खाकर ऊपर से पानी पीने से बार-बार खून आने की शिकायत दूर हो जाती है। 96. आंवयुक्त पेचिश : अनार का जूस पेचिश के रोगी को पिलाने से पेचिश में आंव, खून आदि आना बंद हो जाता है। रोगी को अगर पेचिश हो तो उसे अनार के जूस में गन्ने का जूस मिलाकर पिलाने से रोगी को लाभ मिलता है। अनार के पेड़ की छाल के काढ़े में सोंठ और चंदनचूरा डालकर पीने से खूनी पेचिश के रोगी का रोग दूर हो जाता है। 97. भगन्दर : अनार के पेड़ की छाल 10 ग्राम लेकर उसे 200 मिलीलीटर जल के साथ आग पर उबाल लें। उबले हुए जल को किसी वस्त्र से छानकर भगन्दर को धोने से जख्म नष्ट होते हैं। मुट्ठी भर अनार के ताजे पत्ते को दो गिलास पानी में मिलाकर गर्म करें। आधा पानी शेष रहने पर इसे छान लें। इस उबले मिश्रण को पानी में हल्का गर्म करके सुबह-शाम गुदा को सेंकने और धोने से भगन्दर ठीक होता जाता है। 98. स्त्रियों का प्रदर रोग : 20 ग्राम अनार के पत्ते, 5 पीस कालीमिर्च, 1 ग्राम सौंफ को एक साथ लेकर पानी के साथ सेवन करने से प्रदर, गर्भाशय की बीमारी की सूजन ठीक हो जाती है। 20 ग्राम अनार के पत्ते, 3 ग्राम कालीमिर्च, 2 कली नीम की पत्तियां तीनों को पीसकर इसका 2 खुराक बनाकर सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है। अनार के फूलों को मिश्री के साथ पीसकर प्रदर रोग में सेवन करने से लाभ होता है। अनार के ताजे हरे पत्ते 30 पीस तथा 10 पीस कालीमिर्च पीसकर आधा गिलास पानी में घोल-छानकर रोजाना सुबह-शाम पीने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है। 10 ग्राम अनार के कोमल पत्ते और 7-8 दाने कालीमिर्च को लेकर 200 मिलीलीटर पानी में देर तक उबालें। फिर पानी को छानकर पी लें। इसे कुछ सप्ताह तक सेवन करने से श्वेतप्रदर मिट जाता है। अनार के छिलके के चूर्ण को चावल के धोवन में मिलाकर सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है। 99. अम्लपित्त : 100 ग्राम अनारदाना, 50 ग्राम दालचीनी, 2 लाल इलायची, 50 ग्राम तेजपत्ता, 100 ग्राम मिश्री, 10 ग्राम जीरा और 10 ग्राम धनिया के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें, इस मिश्रण को 5-5 ग्राम की मात्रा में दिन में सुबह, दोपहर और शाम (3 बार) ठंडे पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है। 100. लू का लगना : लगभग 30 से 50 मिलीलीटर पानी के साथ अनार का रस 3 से 4 घंटे के अंतर पर पिलाने से लू से छुटकारा पाया जा सकता है। रोगी के ठीक होने पर भी अनार का रस दिन में 3 बार देना चाहिए। 101. रक्तप्रदर : 10-10 ग्राम अनार के फूल, गोखरू और शीतलचीनी लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर 3 ग्राम चूर्ण रोजाना पानी के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर में बहुत फायदा होता है। 3 ग्राम अनार को शहद में मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से रक्तप्रदर मिट जाता है। 102. पक्वाशय का जख्म : अनार का रस और आंवले का मुरब्बा पीने से लाभ होता है। 103. पेट के अंदर की सूजन और जलन : अनार के दाने 60 ग्राम को 1 लीटर पानी में डालकर मिट्टी के बर्तन में रख लें, फिर 2 से 3 घंटे के बाद मिश्री मिलाकर पानी में मिलाकर पीने से पेट की जलन कम हो जाती है। 104. स्वप्नदोष : अनार के सूखे पीसे हुए छिलके के बारीक चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में रात को सोने से पहले ठंडे पानी के साथ फंकी के रूप में लेने से सोते समय पुरुष के शिश्न से धातु का आना (स्वप्नदोष) बंद हो जाता है। अनार का पिसा हुआ छिलका 5-5 ग्राम सुबह-शाम पानी से लें। अनार के छिलके का रस शहद के साथ रोजाना सुबह-शाम लेने से स्वप्नदोष दूर हो जाता है। 105. पेट के सभी प्रकार के रोग : अनार के खट्टे और मीठे फल का सेवन करने से आमाशय, तिल्ली, यकृत (जिगर) की कमजोरी, संग्रहणी (पेचिश), दस्त, उल्टी और पेट के दर्द में लाभ होता है। यह पाचन-शक्ति को बल देती है और पेशाब खुलकर लाती है। 106. पेट में दर्द : अनार के दानों पर कालीमिर्च और नमक डालकर चूसें। इससे पेट दर्द बंद हो जाता है। सुबह लेने से भूख लगती है और पाचनशक्ति बढ़ती है। नमक और कालीमिर्च का पाउडर अनार के दानों में मिलाकर सेवन करने से पेट का दर्द नष्ट हो जाता है। अनार के 30 मिलीलीटर रस में थोड़ी-सी भुनी हुई हींग और कालानमक डालकर सेवन करने से पेट के दर्द की बीमारी में आराम मिलता है। आधा चम्मच अनार के छिलकों के बारीक चूर्ण को शहद के साथ चाटने से लाभ होता है। पके अनार के दानों पर नमक और कालीमिर्च डालकर चाटने से पेट के दर्द में लाभ होगा। 107. सभी प्रकार के दर्द : एक अनार को निचोड़कर प्राप्त हुए रस में त्रिकुटा और सेंधानमक का चूर्ण मिलाकर पीने से `त्रिदोषज शूल´ यानी वात, कफ और पित्त के कारण होने वाली पीड़ा समाप्त हो जाती है। 108. उपदंश (सिफिलिस) : अनार के 100 ग्राम ताजे पत्ते कुचलकर 1 लीटर पानी में उबालें, जब आधा लीटर रह जाये तो छानकर 2 से 3 बार उपदंश के घाव पर लगायें। इससे उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं। अनार के पत्ते छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें। 10-10 ग्राम चूर्ण को सुबह-शाम पानी के साथ खाने से उपदंश में लाभ होता है। 109. मूर्च्छा (बेहोशी) : अनार, दही का पानी, राख, धान की खीलें, चीनी और श्वेत कमल इन सबका ठंडा काढ़ा पिलाने से बेहोशी खत्म हो जाती है। 110. योनि का संकोचन : अनार की छाल, कूठ, धाय के फूल, फिटकरी का फूला, माजूफल, हाऊबेर, और लोधा को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर बने चूर्ण को शराब में मिलाकर योनि पर लेप करने से योनि सिकुड़ जाती है। 111. दिल की धड़कन : अनार के ताजे पत्तों को 10 ग्राम में पीसकर 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर, उस पानी को छानकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से तेज धड़कन की समस्या समाप्त होती है। अनार के ताजे 50 पत्ते पीस कर आधा कप पानी में घोल कर छान लें। इस तरह तैयार किया अनार के पत्ते का घोल सुबह-शाम पीने से हृदय की धड़कन में लाभ होता है। 112. हृदय की निर्बलता : अनार का रस पीने से हृदय की निर्बलता नष्ट होती है। 113. सिर चकराना : गर्मी के दिनों में अनार खाने और इसका रस (जूस) पीने से गर्मी से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। 114. हृदय की दुर्बलता (कमजोरी) : अनार के ताजे पत्ते 150 मिलीलीटर पानी में घोटकर छान लें। इस रस को सुबह-शाम नियमित सेवन करने से दिल की धड़कन शांत हो जाती है। छाया में सुखाये हुए अनार के छिलके, दही, नीम के पत्ते, छोटी इलायची और गेरू इन सबका चूर्ण बना लें। इसे पानी के साथ 50 ग्राम की मात्रा में लेने से हृदय की धकड़न तथा धूप की जलन में लाभ होता है। चीनी के शर्बत में अनारदाने के रस को मिलाकर सेवन करें। यह शर्बत हृदय की जलन, आमाशय की जलन, घबराहट, मूर्च्छा आदि को दूर करता है। 115. गुल्यवायु हिस्टीरिया : लगभग 10 ग्राम अनार के पत्ते और 10 गुलाब के फूलों को 400 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनायें और 100 मिलीलीटर शेष रह जाने पर छानकर, उसमें 10 ग्राम घी मिलाकर सुबह और शाम को लेने से हिस्टीरिया का रोग खत्म हो जाता है। 116. मिरगी (अपस्मार) : लगभग 100 ग्राम अनार के हरे पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब चौथाई पानी रह जाये, तो इसे छानकर 60 ग्राम घी और 60 ग्राम चीनी मिलायें। इसे सुबह-शाम पीने से मिरगी का रोग ठीक हो जाता है। अनार के पत्तों का गुलाब के फूलों के साथ मिलाकर बनाया गया काढ़ा 14-28 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में दो बार मिर्गी के रोगी को देना चाहिए। इससे मिर्गी ठीक हो जाती है। 117. दाद : अनार के पत्तों को पीसकर दिन में 2 बार दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाता है। अनार के पत्तों को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर रोजाना 6 ग्राम ताजे पानी के साथ पीने से दाद और खून के रोग ठीक हो जाते हैं। 118. सफेद दाग : अनार का सेवन इस रोग में बहुत ही लाभदायक है। अनार के पत्तों के रस को शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता है। 10 ग्राम लाल चंदन और 10 ग्राम अनारदाना को पीसकर सहदेवी के रस में मिलाकर गोलियां बना लें। इन गोलियों को घिसकर पानी के साथ लेप करने से बहुत लाभ होता है। अनार के पत्तों को छाया में सुखाकर बारीक पीस लें और कपड़े में छान लें। इस चूर्ण की 8-8 ग्राम सुबह और शाम ताजे पानी से फंकी लें। 119. आग से जल जाना : अनार के पत्तों को पीसकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से दर्द समाप्त हो जाता है। 120. गर्भपात करना : अनार के सूखे छिलके की योनि में धूनी देने से गर्भपात हो जाता है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

Anjeer (Fig)health benefits

 


परिचय : अफगानिस्तान के काबुल में अंजीर की अधिक पैदावार होती है। हमारे देश में बंगलूर, सूरत, कश्मीर, उत्तर-प्रदेश, नासिक तथा मैसूर में यह ज्यादा पैदा होता है। अंजीर का पेड़ लगभग 4.5 से 5.5 मीटर ऊंचा होता है। इसके पत्ते और शाखाओं पर रोएं होते हैं तथा कच्चे फल हरे और पकने पर लाल-आसमानी रंग के हो जाते हैं। सूखे अंजीर हमेशा उपलब्ध होते हैं। कच्चे फल की सब्जी बनती है। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है। विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत काकोदुम्बरिका। हिंदी अंजीर। मराठी अंजीर। गुजराती पेपरी। बंगाली पेयारा। अंग्रेजी फिग। लैटिन फिकस कैरिका। रंग : अंजीर रंग सुर्ख और स्याह मिश्रित होता है। स्वाद : यह खाने में मीठा होता है। स्वरूप : अंजीर एक बिलायती (विदेशी) पेड़ का फल है जो गूलर के समान होता है। यह जंगलों में अक्सर पाया जाता है। आमतौर पर लोग इसे बनगूलर के नाम से भी पुकारते हैं। स्वभाव : यह गर्म प्रकृति का होता है। हानिकारक : अंजीर का अधिक सेवन यकृत (जिगर) और आमाशय के लिए हानिकारक हो सकता है। दोषों को दूर करने वाला : अंजीर के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए बादाम का उपयोग किया जाता है। मात्रा (खुराक) : अंजीर के पांच दाने तक ले सकते हैं। गुण : अंजीर के सेवन से मन प्रसन्न रहता है। यह स्वभाव को कोमल बनाता है। यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के लिए लाभकारी होता है, कमजोरी को दूर करता है तथा खांसी को नाश करता है। वैज्ञानिक मतानुसार अंजीर के रासायनिक गुणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसके सूखे फल में कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) 63 प्रतिशत, प्रोटीन 5.5 प्रतिशत, सेल्यूलोज 7.3 प्रतिशत, चिकनाई एक प्रतिशत, खनिज लवण 3 प्रतिशत, अम्ल 1.2 प्रतिशत, राख 2.3 प्रतिशत और जल 20.8 प्रतिशत होता है। इसके अलावा प्रति 100 ग्राम अंजीर में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लोहा, विटामिन `ए´ 270 आई.यू., थोड़ी मात्रा में चूना, पोटैशियम, सोडियम, गंधक, फास्फोरिक एसिड और गोंद भी पाया जाता है।

 विभिन्न रोगों में उपयोगी :

 1. कब्ज 3 से 4 पके अंजीर दूध में उबालकर रात्रि में सोने से पूर्व खाएं और ऊपर से उसी दूध का सेवन करें। इससे कब्ज और बवासीर में लाभ होता है। माजून अंजीर 10 ग्राम को सोने से पहले लेने से कब्ज़ में लाभ होता है। अंजीर 5 से 6 पीस को 250 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, पानी को छानकर पीने से कब्ज (कोष्ठबद्धता) में राहत मिलती है। 2 अंजीर को रात को पानी में भिगोकर सुबह चबाकर खाकर ऊपर से पानी पीने पेट साफ हो जाता है। अंजीर के 4 दाने रात को सोते समय पानी में डालकर रख दें। सुबह उन दानों को थोड़ा सा मसलकर जल पीने से अस्थमा में बहुत लाभ मिलता है तथा इससे कब्ज भी नष्ट हो जाती है। स्थायी रूप से रहने वाली कब्ज अंजीर खाते रहने से दूर हो जाती है। अंजीर के 2 से 4 फल खाने से दस्त आते हैं। खाते समय ध्यान रहे कि इसमें से निकलने वाला दूध त्वचा पर न लगने पाये क्योंकि यह दूध जलन और चेचक पैदा कर सकता है। खाना खाते समय अंजीर के साथ शहद का प्रयोग करने से कब्ज की शिकायत नहीं रहती है। 

2. दमा : दमा जिसमें कफ (बलगम) निकलता हो उसमें अंजीर खाना लाभकारी है। इससे कफ बाहर आ जाता है तथा रोगी को शीघ्र ही आराम भी मिलता है। प्रतिदिन थोड़े-थोड़े अंजीर खाने से पुरानी कब्जियत में मल साफ और नियमित आता है। 2 से 4 सूखे अंजीर सुबह-शाम दूध में गर्म करके खाने से कफ की मात्रा घटती है, शरीर में नई शक्ति आती है और दमा (अस्थमा) रोग मिटता है। 

3. प्यास की अधिकता : बार-बार प्यास लगने पर अंजीर का सेवन करें। 4. मुंह के छाले : अंजीर का रस मुंह के छालों पर लगाने से आराम मिलता है।

 5. प्रदर रोग : अंजीर का रस 2 चम्मच शहद के साथ प्रतिदिन सेवन करने से दोनों प्रकार के प्रदर रोग नष्ट हो जाते हैं। 

6. दांतों का दर्द : अंजीर का दूध रुई में भिगोकर दुखते दांत पर रखकर दबाएं। अंजीर के पौधे से दूध निकालकर उस दूध में रुई भिगोकर सड़ने वाले दांतों के नीचे रखने से दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं तथा दांतों का दर्द मिट जाता है। 

7. पेशाब का अधिक आना : 3-4 अंजीर खाकर, 10 ग्राम काले तिल चबाने से यह कष्ट दूर होता है।

 8. मुंहासे : कच्चे अंजीर का दूध मुंहासों पर 3 बार लगाएं। 

9. त्वचा के विभिन्न रोग : कच्चे अंजीर का दूध समस्त त्वचा सम्बंधी रोगों में लगाना लाभदायक होता है। अंजीर का दूध लगाने से दिनाय (खुजली युक्त फुंसी) और दाद मिट जाते हैं। बादाम और छुहारे के साथ अंजीर को खाने से दाद, दिनाय (खुजली युक्त फुंसी) और चमड़ी के सारे रोग ठीक हो जाते है।

 10. दुर्बलता (कमजोरी) : पके अंजीर को बराबर की मात्रा में सौंफ के साथ चबा-चबाकर सेवन करें। इसका सेवन 40 दिनों तक नियमित करने से शारीरिक दुर्बलता दूर हो जाती है। अंजीर को दूध में उबालकर-उबाला हुआ अंजीर खाकर वही दूध पीने से शक्ति में वृद्धि होती है तथा खून भी बढ़ता है।

 11. रक्तवृद्धि और शुद्धि हेतु : 10 मुनक्के और 5 अंजीर 200 मिलीलीटर दूध में उबालकर खा लें। फिर ऊपर से उसी दूध का सेवन करें। इससे रक्तविकार दूर हो जाता है।

 12. पेचिश और दस्त : अंजीर का काढ़ा 3 बार पिलाएं। 13. ताकत को बढ़ाने वाला : सूखे अंजीर के टुकड़े और छिली हुई बादाम गर्म पानी में उबालें। इसे सुखाकर इसमें दानेदार शक्कर, पिसी इलायची, केसर, चिरौंजी, पिस्ता और बादाम बराबर मात्रा में मिलाकर 8 दिन तक गाय के घी में पड़ा रहने दें। बाद में रोजाना सुबह 20 ग्राम तक सेवन करें। छोटे बालकों की शक्तिक्षीण के लिए यह औषधि बड़ी हितकारी है।

 14. जीभ की सूजन : सूखे अंजीर का काढ़ा बनाकर उसका लेप करने से गले और जीभ की सूजन पर लाभ होता है।

 15. पुल्टिश : ताजे अंजीर कूटकर, फोड़े आदि पर बांधने से शीघ्र आराम होता है। 

16. दस्त साफ लाने के लिए : दो सूखे अंजीर सोने से पहले खाकर ऊपर से पानी पीना चाहिए। इससे सुबह साफ दस्त होता है।

 17. क्षय यानी टी.बी के रोग : इस रोग में अंजीर खाना चाहिए। अंजीर से शरीर में खून बढ़ता है। अंजीर की जड़ और डालियों की छाल का उपयोग औषधि के रूप में होता है। खाने के लिए 2 से 4 अंजीर का प्रयोग कर सकते हैं। 

18. फोड़े-फुंसी : अंजीर की पुल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से यह फोड़ों को पकाती है। 

19. गिल्टी : अंजीर को चटनी की तरह पीसकर गर्म करके पुल्टिस बनाएं। 2-2 घंटे के अन्तराल से इस प्रकार नई पुल्टिश बनाकर बांधने से `बद´ की वेदना भी शांत होती है एवं गिल्टी जल्दी पक जाती है।

 20. सफेद कुष्ठ (सफेद दाग) : अंजीर के पेड़ की छाल को पानी के साथ पीस लें, फिर उसमें 4 गुना घी डालकर गर्म करें। इसे हरताल की भस्म के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ मिटता है। अंजीर के कच्चे फलों से दूध निकालकर सफेद दागों पर लगातार 4 महीने तक लगाने से यह दाग मिट जाते हैं। अंजीर के पत्तों का रस श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) पर सुबह और शाम को लगाने से लाभ होता है। अंजीर को घिसकर नींबू के रस में मिलाकर सफेद दाग पर लगाने से लाभ होता है।

 21. गले के भीतर की सूजन : सूखे अंजीर को पानी में उबालकर लेप करने से गले के भीतर की सूजन मिटती है। 

22. श्वासरोग : अंजीर और गोरख इमली (जंगल जलेबी) 5-5 ग्राम एकत्रकर प्रतिदिन सुबह को सेवन करने से हृदयावरोध (दिल की धड़कन का अवरोध) तथा श्वासरोग का कष्ट दूर होता है।

 23. खून और वीर्यवद्धक : सूखे अंजीर के टुकड़ों एवं बादाम के गर्भ को गर्म पानी में भिगोकर रख दें फिर ऊपर से छिलके निकालकर सुखा दें। उसमें मिश्री, इलायची के दानों की बुकनी, केसर, चिरौंजी, पिस्ते और बलदाने कूटकर डालें और गाय के घी में 8 दिन तक भिगोकर रखें। यह मिश्रण प्रतिदिन लगभग 20 ग्राम की मात्रा में खाने से कमजोर शक्ति वालों के खून और वीर्य में वृद्धि होती है। एक सूखा अंजीर और 5-10 बादाम को दूध में डालकर उबालें। इसमें थोड़ी चीनी डालकर प्रतिदिन सुबह पीने से खून साफ होता है, गर्मी शांत होती है, पेट साफ होता है, कब्ज मिटती है और शरीर बलवान बनता है। अंजीर को अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर शक्तिशाली होता है, और मनुष्य के संभोग करने की क्षमता भी बढ़ती है। 

24. शरीर की गर्मी : पका हुआ अंजीर लेकर, छीलकर उसके आमने-सामने दो चीरे लगाएं। इन चीरों में शक्कर भरकर रात को ओस में रख दें। इस प्रकार के अंजीर को 15 दिनों तक रोज सुबह खाने से शरीर की गर्मी निकल जाती है और रक्तवृद्धि होती है।

 25. जुकाम : पानी में 5 अंजीर को डालकर उबाल लें और इसे छानकर इस पानी को गर्म-गर्म सुबह और शाम को पीने से जुकाम में लाभ होता है। 

26. फेफड़ों के रोग : फेफड़ों के रोगों में पांच अंजीर एक गिलास पानी में उबालकर छानकर सुबह-शाम पीना चाहिए। 

27. मसूढ़ों से खून का आना : अंजीर को पानी में उबालकर इस पानी से रोजाना दो बार कुल्ला करें। इससे मसूढ़ों से आने वाला खून बंद हो जाता है तथा मुंह से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है।

 28. तिल्ली (प्लीहा) के रोग में : अंजीर 20 ग्राम को सिरके में डुबोकर सुबह और शाम रोजाना खाने से तिल्ली ठीक हो जाती है।

 29. खांसी : अंजीर का सेवन करने से सूखी खांसी दूर हो जाती है। अंजीर पुरानी खांसी वाले रोगी को लाभ पहुंचाता है क्योंकि यह बलगम को पतला करके बाहर निकालता रहता है। 2 अंजीर के फलों को पुदीने के साथ खाने से सीने पर जमा हुआ कफ धीरे-धीरे निकल जाएगा। पके अंजीर का काढ़ा पीने से खांसी दूर हो जाती है। 

30. गुदा चिरना : सूखा अंजीर 350 ग्राम, पीपल का फल 170 ग्राम, निशोथ 87.5 ग्राम, सौंफ 87.5 ग्राम, कुटकी 87.5 ग्राम और पुनर्नवा 87.5 ग्राम। इन सब को मिलाकर कूट लें और कूटे हुए मिश्रण के कुल वजन का 3 गुने पानी के साथ उबालें। एक चौथाई पानी बच जाने पर इसमें 720 ग्राम चीनी डालकर शर्बत बना लें। यह शर्बत 1 से 2 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम पीयें।

 31. बवासीर (अर्श) : सूखे अंजीर के 3-4 दाने को शाम के समय जल में डालकर रख दें। सुबह उन अंजीरों को मसलकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट खाने से अर्श (बवासीर) रोग दूर होता है। अंजीर को गुलकन्द के साथ रोज सुबह खाली पेट खाने से शौच के समय पैखाना (मल) आसानी से होता है। 

32. कमर दर्द : अंजीर की छाल, सोंठ, धनियां सब बराबर लें और कूटकर रात को पानी में भिगो दें। सुबह इसके बचे रस को छानकर पिला दें। इससे कमर दर्द में लाभ होता है। 

33. आंवयुक्त पेचिश : पेचिश तथा आवंयुक्त दस्तों में अंजीर का काढ़ा बनाकर पीने से रोगी को लाभ होता है।

 34. अग्निमान्द्य (अपच) होने पर : अंजीर को सिरके में भिगोकर खाने से भूख न लगना और अफारा दूर हो जाता है। 

35. प्रसव के समय की पीड़ा : प्रसव के समय में 15-20 दिन तक रोज दो अंजीर दूध के साथ खाने से लाभ होता है। 

36. बच्चों का यकृत (जिगर) बढ़ना : 4-5 अंजीर, गन्ने के रस के सिरके में गलने के लिए डाल दें। 4-5 दिन बाद उनको निकालकर 1 अंजीर सुबह-शाम बच्चे को देने से यकृत रोग की बीमारी से आराम मिलता है।

 37. फोड़ा (सिर का फोड़ा) : फोड़ों और उसकी गांठों पर सूखे अंजीर या हरे अंजीर को पीसकर पानी में औटाकर गुनगुना करके लगाने से फोड़ों की सूजन और फोड़े ठीक हो जाते हैं। 

38. दाद : अंजीर का दूध लगाने से दाद ठीक हो जाता है। 

39. सिर का दर्द : सिरके या पानी में अंजीर के पेड़ की छाल की भस्म मिलाकर सिर पर लेप करने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है। 40. सर्दी (जाड़ा) अधिक लगना : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में अंजीर को खिलाने से सर्दी या शीत के कारण होने वाले हृदय और दिमाग के रोगों में बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

Singhada/ Water cashew nut

                      Singhada/ Water cashew nut 


परिचय : सिंघाड़े की बेल होती है और इसे तालाबों में लगाई जाती है। इसके बेल में ही सिंघाड़े लगते हैं जो पानी के अन्दर होती है। सिंघाड़े में आयोडीन अधिक होता है। गले के रोग व टांसिल में इसका उपयोग लाभदायक होता है। सिंघाडे़ की बेल जलकुम्भी की तरह तालाबों के मीठे पानी में तैरती रहती है। इसकी बेल लम्बी होती है, इसके पत्ते करेले के पत्तों के समान तीन कोनों वाले होते हैं। सिंघाड़ा तिकोनेकार होता है और इस पर कांटे होते हैं। सिंघाड़े के छिलके मजबूत व कठोर होते हैं। दूध की अपेक्षा सिंघाड़े में 22 प्रतिशत खनिज क्षार अधिक होता है। सिंघाडे अत्यंत ही पौष्टिक होता है। इसके सेवन से शरीर को शक्ति मिलती है और खून बढ़ता है। सिंघाड़ा लाल व हल्का कालेपन लिए होता है और इसका गूदा सफेद रंग का होता है। इसको सुखाकर आटा भी बनाया जाता है। सिंघाड़े की साग-सब्जी भी बनाई जाती है। इसका उपयोग पौष्टिक पदार्थों में डालने के लिए भी किया जाता है। इसका ज्यादा मात्रा में सेवन करने से शरीर को पर्याप्त पोषण मिलता है और शरीर को सभी तत्व प्राप्त होते हैं। सिंघाड़े का सेवन करने से शरीर में मांस बढ़ता है। गुण : सिंघाड़ा ठंडा, मीठा, भारी व कषैला होता है। यह मल को साफ करता है, पित्त के दोष व खून की खराबी को दूर करता है। यह वीर्य बढ़ाता है, वायु (गैस) बनाता है तथा कफ पैदा करता है। सिंघाड़े में गर्भ को पुष्ट करने की शक्ति होती है। सिंघाड़े का रस ठंडा, भारी, वीर्य बढ़ाने वाला, पौष्टिक तथा पाचन होता है। यह वात, पित्त, बलगम, जलन, रक्तपित्त बुखार और सन्ताप आदि को दूर करता है। सिंघाड़े के सेवन से लिंग मजबूत होता है। सिंघाड़े की बेल का रस जलन को मिटाता है और आंखों के रोगों को दूर करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार : वैज्ञानिकों के विश्लेषण से पता चला है कि सिंघाड़े में प्रोटीन, चर्बी, कार्बोहाईड्रेट, चूना, फास्फोरस, लोहा, खनिज तत्व, विटामिन `ए´ स्टार्च और मैंग्नीज ज्यादा मात्रा में होता है। सिंघाड़े में चर्बी 5 प्रतिशत, प्रोटीन 3 प्रतिशत, क्षार 7 प्रतिशत और कार्बोहाईड्रेट 4 प्रतिशत होता है। विभिन्न रोगों को उपचार :


1. दाद, खाज, खुजली : नीबू के रस में सूखे सिंघाड़े को घिसकर दाद पर प्रतिदिन लगाएं। इससे पहले तो जलन उत्पन्न होती है और फिर ठंडक महसूस होती है। इसका उपयोग कुछ दिनों तक लगातार करने से दाद ठीक हो जाता है। सिंघाड़ा, सिंगी की जड़, हाऊबेर और भारंगी की जड़ को पीसकर पानी में मिलाकर पीने से दाद, खाज, खुजली दूर होती है। सिंघाड़ा, भिंगी की जड़, झाऊबेर और भारंगी की जड़ 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें और फिर इसमें 10 ग्राम मिश्रण मिलाकर एक कप पानी के साथ उबाल लें। जब पानी उबलकर आधा रह जाए तो इसे छानकर पीएं। इसका सेवन प्रतिदिन 7-8 दिन तक करने से त्वचा की खाज-खुजली दूर होती है।

 2. प्रदर : सिंघाड़े के आटे का हलवा बनाकर खाने से श्वेत प्रदर ठीक होता है और सिंघाड़े के आटे की रोटी खाने से रक्तप्रदर ठीक होता है। सूखे सिंघाडा का चूर्ण बनाकर 3-3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से सभी प्रकार के प्रदर रोग ठीक होते हैं। 25 ग्राम सिंघाड़ा, 10 ग्राम सोना गेरू और 25 ग्राम मिश्री को एक साथ पीसकर 5 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करें। इससे प्रदर में लाभ मिलता है। सिंघाड़ा का रस निकालकर सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर ठीक होता है।

 3. गर्भाशय की कमजोरी : गर्भाशय की कमजोरी के कारण यदि गर्भ न ठहरता हो तो गर्भधारण के बाद प्रतिदिन कुछ सप्ताहों तक ताजा सिंघाड़ा खाना चाहिए। गर्भावती स्त्री को सिंघाड़े की लपसी दिन में 2-3 बार दूध के साथ लेना चाहिए। इससे रक्तस्राव बंद होता है और गर्भपात नहीं होता। 4. मूत्रकृच्छ : सिंघाड़े का काढ़ा बनाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी) दूर होता है।

 5. सूजन : सिंघाड़े की छाल को घिसकर लगाने से दर्द व सूजन खत्म होती है।

 6. नपुंसकता : सूखे सिंघाड़े को पीसकर घी और चीनी के साथ हलवा बनाकर खाने से कुछ ही सप्ताहों में नपुंसकता दूर होती है। 

7. पेशाब का रुक जाना : 20 ग्राम ताल मिश्री, 15 ग्राम घी और 30 ग्राम सिंघाड़े को मिलाकर ठण्डे पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से पेशाब की रुकावट दूर होती है।

 8. सातवें महीने के गर्भ की रक्षा : सिंघाड़ा, कमलनाल, मुनक्का, मुलहठी, कसेरू और चीनी को मिलाकर पीस लें और इसे दूध के साथ घोलकर सेवन करें। इससे सातवें महीने के गर्भ की रक्षा होती है। इससे योनि का दर्द दूर होता है।

 9. सोते समय पेशाब निकल जाना : पिसा हुआ सूखा सिंघाड़ा और खांड लगभग 25-25 ग्राम की मात्रा में मिलाकर रख लें। फिर 1-2 ग्राम मिश्रण पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रात में सोते समय पेशाब का निकल जाना ठीक होता है।

 10. वीर्य की कमी : सिघाडे़ के आटे में बबूल का गोंद, देशी घी और मिश्री मिलाकर लगभग 30 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ लेने से धातु की कमी दूर होती है।

 11. नकसीर : जिन लोगों को नकसीर (नाक से खून बहना) का रोग हो उन्हें बरसात के मौसम के बाद कच्चे सिंघाड़े खाना चाहिए। 

12. कुष्ठ (कोढ़) : सिंघाड़ा, काकड़सिंगी की जड़, हाऊबेर और भारंगी की जड को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक होता है।

 13. फीलपांव (गजचर्म) : सिंघाड़े का काढ़ा बनाकर गाय के पेशाब में मिलाकर पीने से फीलपांव की सूजन दूर होती है। 

14. कमजोरी : कमजोर व्यक्ति को प्रतिदिन सिंघाड़े के आटे का हलवा बनाकर खाना चाहिए। इससे शारीरिक शक्ति बढ़ती है। 

15. टांसिल का बढ़ना : गले में टांसिल होने पर सिंघाड़े को पानी में उबालकर इस पानी से प्रतिदिन कुल्ला करें। इससे टांसिल की सूजन दूर होती है। 

16. गले की गांठ : सिंघाड़े में बहुत ज्यादा आयोडीन होता है जिसको खाने से गले की गांठ ठीक होती है और साथ ही गले के दूसरे रोग जैसे- घेंघा, तालुमूल प्रदाह, तुतलाहट आदि ठीक होता है।

17,सिंघड़े का सेवन रोज करने से मर्दना ताक़त मे कई गुना शक्ति बढ़ जाती हैं । आप इसका सेवन फ्रूट या आटे के रूप मे भी कर सकते है।

नोट: 3 महीने लगातार सेवन के बाद 15 दिन के लिये इसे बन्द कर दे ।15 दिनो के बाद फिर से 3 महीने के लिये शुरु कर दे।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

Aloe -vera health benefits

 परिचय ग्वारपाठा में कई प्रकार के औषधीय गुण पायें जाते हैं जिसके कारण से इसे बगीचों में तथा घरों के आस-पास लगाया जाता है। ग्वारपाठा के पौधे की ऊंचाई 60 से 90 सेमी तक होती है। ग्वारपाठा में जड़ के ऊपर जो तना होता है उसके ऊपर से पत्ते निकलते हैं। जब पत्ते शुरुआत में निकलते हैं तो वे सफेद रंग के होते हैं तथा बाद में बड़े होकर हरे रंग के हो जाते हैं। इसके पत्तों की लंबाई लगभग 30 से 45 सेंटीमीटर तथा चौड़ाई 2.5 से 7.5 सेंटीमीटर होती है और मोटाई में आधा इंच मोटे होते हैं। इन पत्तों को छीलने से घी जैसा गूदा निकलता है जिसे सुखाकर मसब्बर नामक पदार्थ बनाया जाता है। ग्वारपाठा के पत्ते आगे से नोकदार तथा किनारों पर कांटेदार होते हैं। पुराने पौधों में बीचों-बीच एक दण्ड पर लाल फूल लगते हैं। ग्वारपाठा के फल 1 से डेढ़ इंच लम्बे फलियों के रूप में लगते हैं जिनका उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है। भारत में के कई स्थानों पर ग्वारपाठा की अलग-अलग जातियां पाई जाती है। इसका उपयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जा सकता है। गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार ग्वारपाठा स्वाद में मीठा, तीखा, कड़वा, भारी तथा चिकना होता है। ग्वारपाठा की प्रकृति ठंडी होती है। यह वात तथा कफ को नष्ट करने वाला होता है। यह जहर को भी नष्ट करता है। यह शरीर में शक्ति की वृद्धि करने वाला, वीर्य की मात्रा को बढ़ाने वाला, खून को साफ करने वाला तथा आंखों के रोगों को ठीक करने वाला होता है। यह बुखार, यकृत, प्लीहा, त्वचा, खून में उत्पन्न होने वाली खराबी को दूर करने वाला, कब्ज, खांसी, दमा, मासिकधर्म के विकार, पेट की गैस, सूजन को नष्ट करने वाला तथा अंडवृद्धि रोग में लाभदायक होता है। आग से जलने इसे उपचार करना अधिक लाभकारी है। विभिन्न भाषाओं में नाम: वैज्ञानिक नाम एलावेरा कुलनाम ललाईसिस हिन्दी घीग्वार, ग्वारपाठा अंग्रेजी इण्डियन अलोए लैटिन एलोवेरा संस्कृत घृतकुमारी मराठी कोरफल, कोरकाण्ड गुजराती कंवार पाठु पंजाबी कुंवार गंदल तेलगू कलबंद द्राविड़ी कतालै कन्नड़ तौलसरै, लोलिसार बंगाली घृतकोमारी यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार ग्वारपाठा दूसरे दर्जे का गर्म और खुश्क होता है। यह कब्ज दूर करने वाला, खून को साफ करने वाला, आमाशय को बल देने वाला, मूत्र और मासिकधर्म को ठीक समय पर लाने वाला, यकृत (जिगर), प्लीहा (तिल्ली) की वृद्धि को कम करने वाला होता है। यह आंखों के लिए गुणकारी तथा हाजमा को बढ़ाने वाला, पेट के कीड़ों को खत्म करने वाला होता है। बवासीर तथा हडि्डयों के जोड़ों के रोगों को ठीक करने में यह बहुत लाभकारी है। वैज्ञानिक मतानुसार ग्वारपाठा का रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसमें एलोइन नामक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। इसके अलावा इसमें क्राइसोफेनिक अम्ल, एन्जाइम, राल, आइसोबारबेलिन, एलोइमोडिन, गैलिक एसिड तथा सुगंधित तेल भी होता है। ग्वारपाठा यकृत (जिगर) की सूजन हृदय रोग से उत्पन्न गुर्दे की सूजन को दूर करने के लिए अधिक लाभकारी औषधि है। गुदा जख्मों को भरने की यह सर्वोत्तम औषधि हैं। यह खून में हीमीग्लोबिन की मात्रा बढ़ाकर खून की कमी को दूर करता है और पित्ताशय की क्रिया ठीक रूप से चलाने में मदद करता है। हानिकारक प्रभाव : प्रसूता स्त्रियों को स्तनपान के दौरान ग्वारपाठा का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनके लिए हानिकारक हो सकता है। यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो इस अवस्था में इसका सेवन हानिकारक हो सकता है। ग्वारपाठा का अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट में मरोड़ के साथ दस्त आना शुरू हो सकता है। मात्रा : ग्वारपाठे के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर तथा ग्वारपाठे का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम की मात्रा में सेवन किया जा सकता है। विभिन्न रोगों में उपयोग :



 1. जलना: शरीर के जले हुए स्थान पर ग्वारपाठे का गूदा बांधने से फफोले नहीं उठते तथा तुरन्त ठंडक पहुंचती है। ग्वारपाठे के पत्तों के ताजे रस का लेप करने से जले हुए घाव भर जाते हैं। घी ग्वार के पत्ते को चीरकर इसके गूदे को निकालकर त्वचा पर दिन में 2-3 बार लगाने से जलन दूर होकर ठंडक मिलती है और घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है। ग्वारपाठा के छिलके को उतारकर इसे पीस लें फिर शरीर के जले हुए भाग पर लेप करें इससे जलन मिट जाती है और जख्म भी भर जाता है। ग्वारपाठे के गूदे के चार भाग में दो भाग शहद मिलाकर जले हुए भाग पर लगाने से आराम मिलता है। आग से जले हुए भाग पर ग्वारपाठे का गूदा लगाने से जलन शांत हो जाती है और फफोले भी नहीं उठते हैं।

3. सिर दर्द: ग्वारपाठे का रस निकालकर उसमें गेहूं का आटा मिलाकर उसकी 2 रोटी बनाकर सेंक लें। इसके बाद रोटी को हाथ से दबाकर देशी घी में डाल दें। इसे सुबह सूरज उगने से पहले इसे खाकर सो जाएं। इस प्रकार 5-7 दिनों तक लगतार इसका सेवन करने से किसी भी प्रकार का सिर दर्द हो वह ठीक हो जाता है। सिर में दर्द होने पर ग्वारपाठे के गूदे में थोड़ी मात्रा में दारुहरिद्रा का चूर्ण मिलाकर गर्म करें और दर्द वालें स्थान पर इसे लगाकर पट्टी कर लें इससे दर्द ठीक हो जाएगा।

 4. गंजापन: लाल रंग का ग्वारपाठा (जिसमें नारंगी और कुछ लाल रंग के फूल लगते हैं) के गूदे को स्प्रिट में गलाकर सिर पर लेप करने से बाल काले हो जाते हैं तथा गंजे सिर पर बाल उगने लगते हैं। 

5. कुत्ते के काटने पर: ग्वारपाठे को एक ओर से छीलकर इसके गूदे पर पिसा हुआ सेंधानमक डालें, फिर इसे कुत्ते के काटे हुए स्थान पर लगा दें। इस प्रयोग को लगातार दिन में 4 बार करने से लाभ मिलता है।

 6. पेट के रोग: 5 चम्मच ग्वारपाठे का ताजा रस, 2 चम्मच शहद और आधे नींबू का रस मिलाकर सुबह-शाम दिन में पीने से सभी प्रकार के पेट के रोग ठीक हो जाते हैं। 25 ग्राम ग्वारपाठे के ताजे रस, 12 ग्राम शहद और आधे नींबू का रस मिलाकर दिन में 2 बार सुबह और शाम पीने से पेट के हर प्रकार के रोग ठीक हो जाते है। ग्वारपाठा के गूदे को गर्म करके सेवन करने से पेट में गैस बनने की शिकायत दूर हो जाती है। 6 ग्राम ग्वारपाठा का गूदा, 6 ग्राम गाय का घी, 1 ग्राम हरीतकी का चूर्ण और 1 ग्राम सेंधानमक को एक साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से पेट में गैस बनने की शिकायत दूर हो जाती है। ग्वारपाठा के पत्तों के दोनों ओर के जो कांटे लगे होते हैं उसे अच्छी प्रकार साफ कर लें, फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े काटकर एक बर्तन में डाल दें और इसमें आधा किलो नमक डालकर मुंह बंद कर दें। इसके बाद इसे 2-3 दिन तक धूप में रखें, बीच-बीच में इसे हिलाते रहें। तीन दिन बाद इसमें 100 ग्राम हल्दी, 60 ग्राम भुनी हींग, 300 ग्राम अजवायन, 100 ग्राम शूंठी, 60 ग्राम कालीमिर्च, 100 ग्राम धनिया, 100 गाम सफेद जीरा, 50 ग्राम लालमिर्च, 60 ग्राम पीपल, 50 ग्राम लौंग, 50 ग्राम अकरकरा, 100 ग्राम कालाजीरा, 50 ग्राम बड़ी इलायची, 50 ग्राम दालचीनी, 50 ग्राम सुहागा,300 ग्राम राई को बारीक पीसकर डाल दें। रोगी के शरीर की ताकत के अनुसार इसमें से 3 ग्राम से 6 ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से पेट के वात-कफ संबन्धी सभी रोग ठीक हो जाते हैं। ग्वारपाठा के 10-20 जड़ों को कुचलकर उबालकर छान लें फिर इस पर भूनी हुई हींग छिड़ककर सेवन करें इससे पेट का दर्द ठीक हो जाता है। 10 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे का ताजा रस में 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से पेट के रोगों में लाभ मिलता है। ग्वारपाठा के गूदे से पेट पर लेप करें इससे आंतों में जमा मल गुदा से निकल जाएगा और पेट के अन्दर की गांठे गल जाएंगी जिसके फलस्वरूप पेट में कब्ज बनने की समस्या दूर हो जाएगी तथा पेट में दर्द होना भी बंद हो जाएगा। ग्वारपाठे की जड़ और थोड़ी-हींग को भूनकर पीस लें और इसे पानी में मिलाकर पीने से पेट का दर्द समाप्त हो जाता है। 

7. अम्लपित्त: ग्वारपाठे के 14 से 28 मिलीमीटर पत्तों का रस दिन में 2 बार पीने से अम्लपित्त में लाभ मिलता है तथा इसके कारण से होने वाला सिर दर्द ठीक हो जाता है। 

8. प्लीहोदर (तिल्ली के कारण होने वाला पेट का दर्द): ग्वारपाठे के पत्तों के रस 14 से 28 मिलीलीटर की मात्रा को 1 से 3 ग्राम सरफोंका के पंचांग (जड़, पत्ता, तना, फल और फूल) के चूर्ण के साथ दिन में सुबह और शाम सेवन करने से प्लीहोदर के रोग में लाभ मिलता है।

 9. स्त्री रोग: स्त्री रोग को ठीक करने के लिए ग्वारपाठे के 14-28 मिलीलीटर पत्तों के रस को आधा ग्राम भुनी हींग के साथ दिन में दो बार सेवन करना चाहिए। 

10. सूजन: ग्वारपाठा के पत्तों का रस में सफेद जीरा और हल्दी को पीसकर मिला दें, इससे लेप बन जाएगा। इस लेप को दिन में 2-3 बार सूजन पर लगाने से लाभ मिलता है। लगभग 10-10 ग्राम ग्वारपाठे के पत्ते और सफेद जीरा को पीसकर सूजन वाले अंग पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। 

11. फोड़े-फुंसियां: ग्वारपाठा का गूदा गर्म करके फोड़े-फुंसियों पर बांधे इससे या तो वह बैठ जाएगी या फिर पककर फूट जाएगी। जब फोड़े-फुन्सी फूट जाएं तो इस पर ग्वारपाठा के गूदे में हल्दी मिलाकर लगाए इसे घाव जल्दी ठीक हो जाएगा। ग्वारपाठे का गूदा निकालकर गर्म करके उसमें 2 चुटकी हल्दी मिला लें, फिर इसकों फोड़े पर लगाकर ऊपर से पट्टी बांध दें। थोड़े ही समय में फोड़ा पककर फूट जायेगा और उसका मवाद बाहर निकल जायेगा। मवाद निकलने के बाद फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जायेगा।

 12. बवासीर: ग्वारपाठा के गूदे में थोड़ा पिसा हुआ गेरू मिलाकर मस्सों पर बांधने से जलन, पीड़ा, दूर होकर बवासीर के मस्सों से खून बहना बंद हो जाता है और आराम मिलता है। खूनी बवासीर में 50 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में 2 ग्राम पिसा हुआ गेरू मिलाकर इसकी टिकिया बना लें। इस टिकिया को रुई के फोहे पर फैलाकर बवासीर के स्थान पर लंगोटी की तरह पट्टी बांध दें। इससे मस्सों में होने वाली जलन तथा दर्द ठीक हो जाता है और मस्से सिकुड़कर दब जाते हैं। यह प्रयोग खूनी बवासीर में लाभकारी होता है। 

13. हिचकी: 2 चम्मच ग्वारपाठा का रस आधे चम्मच सोंठ के चूर्ण के साथ सेवन करने से हिचकी में आराम मिलता है। 6 मिलीलीटर ग्वारपाठे के रस में 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से हिचकी जल्द बंद हो जाती है। 

14. मासिकधर्म ठीक प्रकार से न आना: ग्वारपाठा के 20 गूदे में 10 ग्राम पुराना गुड़ मिलाकर सेवन करें। ऐसी मात्रा दिन में दो बार 3-4 दिनों तक सेवन करने से महिलाओं का मासिकधर्म ठीक समय पर आने लगता है। 10 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे पर 500 मिलीग्राम पलाश का क्षार छिडककर दिन में दो बार सेवन करने से मासिकधर्म सही समय पर आने लगता है। 

15. पौष्टिक, बलवर्द्धक योग: ग्वारपाठा के 2 पत्तों को चीरकर उसका सारा गूदा निकाल लें। उसमें नीम गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण मिलाकर रोजाना 1 बार सेवन करते रहने से शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। 

16. कमर दर्द: 20-25 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम कुछ दिन तक सेवन करने से कमर का दर्द ठीक हो जाता है। 10 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा, 50 ग्राम सोंठ, 4 लौंग, 50 ग्राम नागौरी असगंध इन सबको पीसकर चटनी बना लें। 4 ग्राम चटनी रोजाना सुबह सेवन करें। इससे कमर दर्द में आराम मिलेगा। 20 ग्राम ग्वारपाठा के गूदे में 2 ग्राम शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से शीत लहर के कारण उत्पन्न कमर दर्द से राहत मिलता है। गेहूं के आटे में ग्वारपाठा का गूदा इतना मिलाए जितना आटे को गूंथने के लिए काफी हो, इसके बाद आटे को गूंथकर रोटी बना लें। इस रोटी का चूर्ण बनाकर इसमें चीनी और घी मिला दें और लड्डू बना लें। इस लड्डू का सेवन करने से कमर का दर्द ठीक हो जाता है।

 17. कान दर्द: ग्वारपाठे के रस को गर्म करके जिस कान में दर्द हो, उससे दूसरी तरफ के कान में 2-2 बूंद डालने से कानों का दर्द दूर हो जाता है। ग्वारपाठे के रस को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है। 

18. मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन): 50 ग्राम ग्वारपाठे के गूदे में चीनी मिलाकर खाने से पेशाब करने में जलन और दर्द की समस्यां दूर हो जाती है। 

19. बच्चों की कब्ज: छोटे बच्चों की नाभि पर साबुन के साथ ग्वारपाठे के गूदे का लेप करने से दस्त साफ होते हैं और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है।

 20. उपदंश (फिरंग): उपदंश के कारण से उत्पन्न घावों पर ग्वारपाठा के गूदे का लेप लगाने से लाभ मिलता है। ग्वारपाठे के 5 मिलीलीटर रस में 5 ग्राम जीरे को पीसकर लेप करने से उपदंश की बीमारी दूर होती है। 

21. मधुमेह: मधुमेह रोग में ग्वारपाठा का 5 ग्राम गूदा 250 से 500 मिलीलीटर गूडूची के रस के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।

 22. कामला (पीलिया): कामला (पीलिया) के रोग में ग्वारपाठा का 10-20 मिलीलीटर रस दिन में 2 से 3 बार पीने से पित्त नलिका का अवरोध दूर होकर लाभ मिलता है। इस प्रयोग से आंखों का पीलापन और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। इसके रस को रोगी की नाक में बूंद-बूंद करके डालने से नाक से निकलने वाले पीले रंग का स्राव होना बंद हो जाता है। लगभग 3 से 6 ग्राम ग्वारपाठा गूदे को मट्ठा के साथ सेवन करने से प्लीहावृद्धि (तिल्ली का बढ़ना), यकृतवृद्धि (जिगर का बढ़ना), आध्यमानशूल (पेट में गैस बनने के कारण दर्द), तथा अन्य पाचन संस्थान के रोगों के कारण होने वाला पीलिया रोग ठीक हो जाता है तथा ये रोग भी ठीक हो जाते हैं। ग्वारपाठा के पत्तों का गूदा निकाल दें और इसके बाद जो छिलका बचे उसे मटकी में भर दें तथा फिर इसमें बराबर मात्रा में नमक मिलाकर मटकी का मुंह बंद करके कंडों की आग में रख दें। जब मटकी के अन्दर का द्रव्य जलकर काला हो जाए तो उसे बारीक पीसकर शीशी में भरकर रख दें। इसमें में कुछ मात्रा में सुबह तथा शाम को सेवन करने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।

 23. जिगर की कमजोरी : 20 ग्राम ग्वारपाठा के पत्तों का रस तथा 10 ग्राम शहद दोनों द्रव्यों को चीनी मिट्टी के बर्तन में मुंह बंद करके 1 सप्ताह तक धूप में रखें, इसके बाद इसे छान लें। इसमें से 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से यकृत विकारों (जिगर के रोगों) को दूर करने में लाभ मिलता है। इसकी अधिक मात्रा विरेचक होती है परन्तु उचित मात्रा में सेवन करने से मल एवं वात की प्रवृत्ति, ठीक होने लगती है। इसमें सेवन से यकृत (जिगर) मजबूत हो जाता है और उसकी क्रिया सामान्य हो जाती है। 

24. तिल्ली: ग्वारपाठा के गूदे पर सुहागा को छिड़ककर सेवन करने से तिल्ली कट जाती है। 

25. जोड़ों के (गठिया) दर्द: 10 ग्वारपाठा के गूदा का सेवन रोजाना सुबह-शाम करने से गठिया रोग दूर हो जाता है। 

26. ज्वर: 10 से 20 मिलीलीटर ग्वारपाठा की जड़ का काढ़ा दिन में 3 बार पीने से ज्वर कम हो जाता है।

 27. व्रण (घाव), चोट और गांठ: यदि घाव पका न हो तो ग्वारपाठे के गूदे में थोड़ी सज्जीक्षार तथा हरिद्रा चूर्ण मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को घाव पर लगा दें इससे घाव पककर फूट जाएगा और यह जल्दी ही ठीक हो जाएगा। शरीर की किसी ग्रंथि में गांठ पड़ जाए तो वहां पर ग्वारपाठा का गूदा में लहसुन और हल्दी मिलाकर इसे हल्का गर्म करके गांठ पर लगाए इससे आराम मिलता है। गांठों की सूजन पर ग्वारपाठे के पत्ते को एक ओर से छीलकर तथा उस पर थोड़ा सा हरिद्रा चूर्ण छिड़ककर इसे हल्का गर्म करके गांठों की सूजन पर लगाएं इससे आराम मिलेगा। चोट, मोच तथा कुचले जाने पर दर्द या सूजन हो रहा हो तो ग्वारपाठे के गूदें में अफीम तथा हल्दी का चूर्ण मिलाकर इसे सूजन तथा दर्द वाले भाग पर लगा लें इससे लाभ मिलेगा। औरतों के स्तन पर चोट लगने के कारण या किसी अन्य कारण से गांठ या सूजन हो गया हो तो ग्वारपाठे की जड़ का चूर्ण बनाकर उसमें थोड़ा सा हरिद्रा चूर्ण मिलाकर इसे हलक गर्म करें और गांठ या सूजन वाले भाग पर लगाकर पट्टी बांध लें इससे सूजन कम हो जाती है और दर्द भी ठीक हो जाता है। इस तरह से उपचार दिन में 2-3 बार करते रहना चाहिए। ग्वारपाठे की जड़ को घाव पर लगाने से हड्डी के घाव और पुराने घाव ठीक हो जाते हैं। ग्वारपाठे के पत्ते का टुकड़ा करके इसके एक ओर का छिल्का हटा दें और छिल्के हटे हुए भाग पर रसोत और हल्दी छिड़ककर हल्का गर्म करें फिर इसे गांठ वाले भाग पर बांध दें इससे लाभ मिलेगा।

 28. पेट की गांठ: ग्वारपाठे के गूदे को पेट के ऊपर बांधने से पेट की गांठ बैठ जाती है। कठोर पेट मुलायम हो जाता है और आंतों में जमा हुआ मल बाहर निकल जाता है। 60 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा और 60 ग्राम घी को एक साथ मिलाकर उसमें 10 ग्राम हरीतकी चूर्ण तथा 10 ग्राम सेंधा नमक मिलाकर अच्छी तरह घोंट लें, फिर इसमें से 10-15 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से पेट की गांठे बैठ जाती है। वातज गुल्म और वातजन्य रोगों की अवस्था में गुनगुने पानी के साथ प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

 29. नासूर: ग्वारपाठे के गूदे को आग में पकाकर नासूर पर बांधने से नासूर या उसका फोड़ा पककर फूट जाता है और रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

 30. दमा: ग्वारपाठा के 250 ग्राम पत्तों और 25 ग्राम सेंधानमक के चूर्ण को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर, बर्तन को आग पर रखें जब ये पदार्थ जलकर राख बन जाएं तब इसे आग से उतार दें। इस राख को 2 ग्राम की मात्रा में 10 ग्राम मुनक्का के साथ सेवन करने से दमा (श्वास रोग) में अधिक लाभ मिलता है। ग्वारपाठे का 1 किलो गूदा लेकर किसी साफ कपड़े से छान लें फिर इसे किसी कलईदार बर्तन में डालकर धीमी आंच पर पकाएं, जब यह अधपका हो जाए तब इसमें 36 ग्राम लाहौरी नमक का बारीक चूर्ण मिला दें तथा स्टील के चम्मच से अच्छी तरह से घोट दें। जब सब पानी जलकर चूर्ण शेष रह जाये तो बर्तन को आग पर से उतारकर ठंडा करें और इसका बारीक चूर्ण बना लें तथा साफ बोतल में भर दें। इसमें से 250 मिलीग्राम से 480 मिलीग्राम की मात्रा को शहद के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पुरानी से पुरानी खांसी, काली खांसी और दमा ठीक हो जाता है।

 31. खांसी: आधा चम्मच ग्वारपाठे का रस में चुटकी भर पिसी हुई सोंठ मिलाकर शहद के साथ चाटे इससे खांसी ठीक हो जाती है। ग्वारपाठा का गूदा और सेंधा नमक दोनों को जलाकर राख बना लें और इसमें से 12 ग्राम की मात्रा में मुनक्का के साथ सुबह-शाम सेवन करने से खांसी तथा पुरानी खांसी ठीक हो जाती है तथा कफ की समस्या भी दूर होती है। 

32. आंखों के दर्द: सोते समय ग्वारपाठे के गूदे का रस आंखों मे डालने से आंखों का दर्द दूर होता है। ग्वारपाठे के गूदे में हल्दी का चूर्ण मिलाकर गर्म करें और सहनीय अवस्था में पैरों के तलुवों में इसे लगाकर पट्टी बांध दें इससे आंखों दर्द ठीक हो जाता है। ग्वारपाठे का गूदा आंखों के ऊपर लगाने से आंखों की लाली मिट जाती है, गर्मी दूर होती है। वायरल कंजक्टीवाइटिस में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है। ग्वारपाठे के 1 ग्राम गूदे में 375 मिलीग्राम अफीम मिलाकर पोटली बना लें और इसे पानी में भिगोकर आंखों पर रखने से और इसमें से 1-2 बूंद आंखों के अन्दर डालने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। ग्वारपाठे के गूदे पर हल्दी डालकर थोड़ा गर्म करके आंखों में लगाने से आंखों का दर्द चला जाता है।

 33. कब्ज: ग्वारपाठे का गूदा 10 ग्राम में 4 पत्तियां तुलसी और थोड़ी-सी सनाय की पत्तियां पीसकर मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट का सेवन खाना खाने के बाद करने से कब्ज की शिकायत खत्म हो जाती है। 20 ग्राम ग्वारपाठा में थोड़ी-सी मात्रा में काला नमक मिलाकर सुबह और शाम खाली पेट खाने से कब्ज दूर होती है। ग्वारपाठा का रस 10 से 20 ग्राम की मात्रा में हरड़ के साथ सेवन करने से मलअवरोध की परेशानी दूर होती है जिसके फलस्वरूप कब्ज की समस्या दूर होती है।

 34. नंपुसकता (नामर्दी): ग्वारपाठे का गूदा और गेहूं का आटा बराबर मात्रा में लेकर इसमें घी मिला लें फिर इसके 2 गुने की मात्रा में चीनी इसमें मिलाकर हलुआ बना लें और इसका सेवन 7 दिनों तक करने से नपुंसकता दूर होती है।

 35. अग्निमान्द्यता (अपच): ग्वारपाठा को पीसकर रस निकाल लें और इसमें नौसादा को मिलाकर रख लें, फिर इसके इसमें से आधा-आधा चम्मच रस को खुराक के रूप में सुबह और शाम सेवन करें इससे अपच की शिकायत दूर हो जाती है। ग्वारपाठे का गूदा सेंधा नमक के साथ सेवन करने से आराम मिलेगा।

 36. जिगर का रोग: 3 ग्राम ग्वारपाठे के रस में सेंधा नमक व समुंद्री नमक मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से यकृत के बीमारी ठीक हो जाती है। 10-20 ग्राम ग्वारपाठे का रस को सेंधा और हरिद्रा के साथ सेवन करने से यकृत के बीमारी ठीक हो जाती है तथा इससे यकृत का बढ़ना, दर्द होना, और पीलिया का होना आदि रोग भी ठीक हो जाते हैं। 480 मिलीलीटर ग्वारपाठे का रस में 240 मिलीग्राम हल्दी के चूर्ण और 240 मिलीग्राम सेंधा नमक का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बढ़ा हुआ यकृत ठीक हो जाता है। ग्वारपाठे के पत्ते का रस आधा चम्मच, हल्दी का चूर्ण एक चुटकी तथा पिसा हुआ सेंधा नमक 1 चुटकी तीनों को मिलाकर पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें इससे यकृत रोग में लाभ मिलेगा। 

37. जलोदर (पेट में पानी भर जाना): ग्वारपाठे के रस में हल्दी का चूर्ण मिलाकर पीने से प्लीहा और भोजन के न पचने वाली बीमारी में लाभ मिलता है।

 38. स्तनों की जलन और सूजन: ग्वारपाठे के रस में हरिद्रा के चूर्ण को मिलाकर इससे स्तनों पर लेप करें। इससे स्तनों पर होने वाली सूजन और जलन दूर हो जाती है।

 39. हाथ-पैर का फटना: भोजन में ग्वारपाठे की सब्जी खाने से हाथ-पैर नहीं फटते हैं।

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

Castor tree health benefits

 परिचय : एरंड का पौधा प्राय: सारे भारत में पाया जाता है। एरंड की खेती भी की जाती है और इसे खेतों के किनारे-किनारे लगाया जाता है। ऊंचाई में यह 2.4 से 4.5 मीटर होता है। एरंड का तना हरा और चिकना तथा छोटी-छोटी शाखाओं से युक्त होता है। एरंड के पत्ते हरे, खंडित, अंगुलियों के समान 5 से 11 खंडों में विभाजित होते हैं। इसके फूल लाल व बैंगनी रंग के 30 से 60 सेमी. लंबे पुष्पदंड पर लगते हैं। फल बैंगनी और लाल मिश्रित रंग के गुच्छे के रूप में लगते हैं। प्रत्येक फल में 3 बीज होते हैं, जो कड़े आवरण से ढके होते हैं। एरंड के पौधे के तने, पत्तों और टहनियों के ऊपर धूल जैसा आवरण रहता है, जो हाथ लगाने पर चिपक जाता है। ये दो प्रकार का होते हैं लाल रंग के तने और पत्ते वाले एरंड को लाल और सफेद रंग के होने पर सफेद एरंड कहते हैं। अंग्रेजी कैस्टर प्लांट लैटिन स्वाद : एरंड खाने में तीखा, बेस्वाद होता है। स्वरूप : एरंड दो प्रकार का होता है पहला सफेद और दूसरा लाल। इसकी दो जातियां और भी होती हैं। एक मल एरंड और दूसरी वर्षा एरंड। वर्षा एरंड, बरसात के सीजन में उगता है। मल एरंड 15 वर्ष तक रह सकता है। वर्षा एरंड के बीज छोटे होते हैं, परन्तु उनमें मल एरंड से अधिक तेल निकलता है। एरंड का तेल पेट साफ करने वाला होता है, परन्तु अधिक तीव्र न होने के कारण बालकों को देने से कोई हानि नहीं होती है। पेड़ : एरंड का पेड़ 2.4 से 4.5 मीटर, पतला, लम्बा और चिकना होता है। फूल : इसका फूल एक लिंगी, लाल बैंगनी रंग के होते हैं। फल : एरंड के फल के ऊपर हरे रंग का आवरण होता है। प्रत्येक फल में तीन बीज होते हैं। बीज : इसके बीज सफेद चिकने होते हैं। स्वभाव : एरंड गर्म प्रकृति का होता है। हानिकारक : एरंड आमाशय को शिथिल करता है, गर्मी उत्पन्न करता है और उल्टी लाता है। इसके सेवन से जी घबराने लगता है। लाल एरंड के 20 बीजों की गिरी नशा पैदा करती है और ज्यादा खाने से बहुत उल्टी होता है एवं घबराहट या बेहोशी तक भी हो सकती है। यह आमाशय के लिए अहितकर होता है। तुलना : इसकी तुलना जमालघोटा से की जा सकती है। दोषों को दूर करने वाला : कतीरा और मस्तगी एरंड के गुणों को सुरक्षित रखकर इसके दोषों को दूर करता है। नोट : लाल एरंड का तेल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ लेने से योनिदर्द, वायुगोला, वातरक्त, हृदय रोग, जीर्णज्वर (पुराना बुखार), कमर के दर्द, पीठ और कब्ज के दर्द को मिटाता है। यह दिमाग, रुचि, आरोग्यता, स्मृति (याददास्त), बल और आयु को बढ़ाता है और हृदय को बलवान करता है। गुण : एरंड पुराने मल को निकालकर पेट को हल्का करती है। यह ठंडी प्रकृति वालों के लिए अच्छा है, अर्द्धांग वात, गृध्रसी झानक बाई (साइटिका के कारण उत्पन्न बाय का दर्द), जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) तथा समस्त वायुरोगों की नाशक है इसके पत्ते, जड़, बीज और तेल सभी औषधि के रूप में इस्तेमाल किए जाते है। यहां तक कि ज्योतिषी और तांत्रिक भी ग्रहों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए एरंड का प्रयोग करते हैं। सफेद एरंड : सफेद एरंड, बुखार, कफ, पेट दर्द, सूजन, बदन दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, मोटापा, प्रमेह और अंडवृद्धि का नाश करता है। लाल एरंड : पेट के कीड़े, बवासीर, रक्तदोष (रक्तविकार), भूख कम लगना, और पीलिया रोग का नाश करता है। इसके अन्य गुण सफेद एरंड के जैसे हैं। एरंड के पत्ते : एरंड के पत्ते वात पित्त को बढ़ाते हैं और मूत्रकृच्छ्र (पेशाब करने में कठिनाई होना), वायु, कफ और कीड़ों का नाश करते हैं। एरंड के अंकुर : एरंड के अंकुर फोड़े, पेट के दर्द, खांसी, पेट के कीड़े आदि रोगों का नाश करते हैं। एरंड के फूल : एरंड के फूल ठंड से उत्पन्न रोग जैसे खांसी, जुकाम और बलगम तथा पेट दर्द संबधी बीमारी का नाश करता है। एरंड के बीजों का गूदा : एरंड के बीजों का गूदा बदन दर्द, पेट दर्द, फोड़े-फुंसी, भूख कम लगना तथा यकृत सम्बंधी बीमारी का नाश करता है। एरंड का तेल : पेट की बीमारी, फोड़े-फुन्सी, सर्दी से होने वाले रोग, सूजन, कमर, पीठ, पेट और गुदा के दर्द का नाश करता है। हानिकारक प्रभाव : राइसिन नामक विषैला तत्त्व होने के कारण एरंड के 40-50 दाने खाने से या 10 ग्राम बीजों के छिलकों का चूर्ण खाने से उल्टी होकर व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। मात्रा : बीज 2 से 6 दाने। तेल 5 से 15 मिलीलीटर। पत्तों का चूर्ण 3 से 4 ग्राम। जड़ की पिसी लुगदी 10 से 20 ग्राम । जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम। विभिन्न रोगों में उपयोगी :

1. चर्म (त्वचा) के रोग : एरंण्ड की जड़ 20 ग्राम को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह 100 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे पिलाने से चर्म रोगों में लाभ होता है। एरंड के तेल की मालिश करते रहने से शरीर के किसी भी अंग की त्वचा फटने का कष्ट दूर होता है। 

2. सिर पर बाल उगाने के लिए : ऐसे शिशु जिनके सिर पर बाल नहीं उगते हो या बहुत कम हो या ऐसे पुरुष-स्त्री जिनकी पलकों व भौंहों पर बहुत कम बाल हों तो उन्हें एरंड के तेल की मालिश नियमित रूप से सोते समय करना चाहिए। इससे कुछ ही हफ्तों में सुंदर, घने, लंबे, काले बाल पैदा हो जाएंगे।
3. सिर दर्द : एरंड के तेल की मालिश सिर में करने से सिर दर्द की पीड़ा दूर होती है। एरंड की जड़ को पानी में पीसकर माथे पर लगाने से भी सिर दर्द में राहत मिलती है।
4. जलने पर : एरंड का तेल थोड़े-से चूने में फेंटकर आग से जले घावों पर लगाने से वे शीघ्र भर जाते हैं। एरंड के पत्तों के रस में बराबर की मात्रा में सरसों का तेल फेंटकर लगाने से भी यही लाभ मिलता है।
5. पायरिया : एरंड के तेल में कपूर का चूर्ण मिलाकर दिन में 2 बार नियमित रूप से मसूढ़ों की मालिश करते रहने से पायरिया रोग में आराम मिलता है।
6. शिश्न (लिंग) की शक्ति बढ़ाने के लिए : मीठे तेल में एरंड के पीसे बीजों का चूर्ण औटाकर शिश्न (लिंग) पर नियमित रूप से मालिश करते रहने से उसकी शक्ति बढ़ती है।
7. मोटापा दूर करना : एरंड की जड़ का काढ़ा छानकर एक-एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करें। एरंड के पत्ते, लाल चंदन, सहजन के पत्ते, निर्गुण्डी को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, बाद में 2 कलियां लहसुन की डालकर पकाकर काढ़ा बनाकर रखा रहने दें इसमें से जो भाप निकले उसकी उस भाप से गला सेंकने और काढ़े से कुल्ला करना चाहिए। एरंड के पत्तों का खार (क्षार) को हींग डालकर पीये और ऊपर से भात (चावल) खायें। इससे लाभ हो जाता है। अरण्ड के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से मोटापा दूर हो जाता है।
8. स्तनों में दूध वृद्धि हेतु : एरंड के पत्तों का रस दो चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार कुछ दिनों तक नियमित पिलाएं। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है। अरण्ड (एरंड) पाक को 10 से लेकर 20 ग्राम की मात्रा में गुनगुने दूध के साथ प्रतिदिन सुबह और शाम को पिलाने से प्रसूता यानी बच्चे को जन्म देने वाली माता के स्तनों में दूध में वृद्धि होती है। मां के स्तनों पर एरंड के तेल की मालिश दिन में 2-3 बार करने से स्तनों में पर्याप्त मात्रा में दूध की वृद्धि होती है।
9. बालकों के पेट के कृमि (कीड़े) : एरंड का तेल गर्म पानी के साथ देना चाहिए अथवा एरंड का रस शहद में मिलाकर बच्चों को पिलाना चाहिए। इससे बच्चों के पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं। एरंड के पत्तों का रस नित्य 2-3 बार बच्चे की गुदा में लगाने से बच्चों के चुनने (पेट के कीड़े) मर जाते हैं।
10. बिच्छू के विष पर : एरंड के पत्तों का रस, शरीर के जिस भाग की ओर दंश न हुआ हो, उस ओर के कान में डालें और बहुत देर तक कान को ज्यों का त्यों रहने दें। इस प्रकार दो-तीन बार डालने से बिच्छू का विष उतर जाता है। 11. नींद कम आना : एरंड के अंकुर बारीक पीसकर उसमें थोड़ा सा दूध मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को कपाल (सिर) तथा कान के पास लेप करने से नींद का कम आना दूर हो जाता है। 12. पीनस रोग- एरण्ड के तेल को तपाकर रख लें और जिस ओर नाक में पीनस हो गया हो उस ओर के नथुने से एरण्ड के तेल को दिन में कई बार सूंघने से पीनस नष्ट हो जाती है। एरंड की जड़ और सोंठ को घिसकर योनि पर लेप करें। इससे योनि दर्द ठीक हो जाता है। एरंड तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में धारण करने से योनि का दर्द मिट जाता है। 13. पीठ के दर्द में : एरंड के तेल को गाय के पेशाब में मिलाकर देना चाहिए। इससे पीठ, कमर, कन्धे, पेट और पैरों का शूल (दर्द) नष्ट हो जाता है। 14. बच्चों के दस्त : एरंड और चूहे की लेण्डी का चूर्ण नींबू के रस में मिलाकर बच्चों की नाभि और गुदा पर लेप करना चाहिए। इससे बच्चों का दस्त आना बंद हो जाता है। 15. पिसा हुआ कांच खा लेने पर : पिसा हुआ कांच खा लेने पर 30 ग्राम एरंड का तेल पिलाने से लाभ मिलता है। 16. माथे (मस्तक) के दर्द में : एरंड की जड़ को भांगरे के रस में घिसकर नाक में लगाकर सूंघे, इससे छींक आकर मस्तक शूल नष्ट हो जाता है। 17. होंठों का फटना : होंठों के फटने पर रात्रि को एरंड तेल होठ पर लगाने से लाभ मिलता है। 18. हृदय रोग : एरंड की जड़ का काढ़ा जवाखार के साथ देने से हृदय रोग और कमर के दर्द का नाश हो जाता है। 19. स्तनों की सूजन (स्त्रियों के स्तन में दूध के कारण आयी हुई सूजन और दर्द) : स्तनों के सूजन से पीड़ित महिला के स्तनों में एरंड के पत्तों की पुल्टिस बांधनी चाहिए। इससे स्तनों की सूजन और दर्द में बहुत अधिक लाभ मिलता है। 20. पेट में दर्द या बार-बार दस्त होना : एरंड के तेल का जुलाब देना चाहिए। इसका जुलाब बहुत ही उत्तम होता है। इससे पेट में दर्द नहीं होता और पानी की तरह पतले दस्त भी नहीं होते, केवल मल-शुद्धि होती है। यदि इसका जुलाब फायदा नहीं पहुंचाता तो यह कोई हानि नहीं पहुंचाता। छोटे बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिए यह समान उपयोगी है। सोंठ के काढ़े के साथ पीने से एरंड के तेल की दुर्गन्ध कम हो जाती है अथवा मट्ठे से कुल्ला करके एरंड का तेल पीने से उससे अरुचि नहीं होती । 21. अंडकोष वृद्धि : 2 चम्मच एरंड तेल सुबह-शाम दूध में मिलाकार सेवन करने से अंडकोष के बढे़ हिस्से से आराम मिलता है। साथ ही इस तेल की मालिश भी करनी चाहिए। 10 ग्राम एरंड तेल को 3 ग्राम गुग्गुलु और 10 ग्राम गाय के पेशाब के साथ सुबह-शाम पीने से एवं अंडकोष पर एरंड पत्ते गर्म करके बांधने से अंडकोष वृद्धि ठीक हो जाती है। 22. आंखों के रोग में : एरंड के तेल के अंजन से आंखों से पानी बहता है, इसलिए इसे नेत्र विरेचन कहते हैं। एरंड तेल दो बूंद आंखों में डालने से, इनके भीतर का कचरा निकल जाता है और आंखों की किरकरी बंद हो जाती है। एरंड के पत्तों की जौ के आटे के साथ पुल्टिस बनाकर आंखों पर बांधने से आंखों पर आई पित्त की सूजन नष्ट हो जाती है। 23. स्त्री के स्तन संबधी रोग : जब किसी स्त्री के स्तनों में दूध आना बंद हो जाता है और स्तनों में गांठें पड़ जाती हैं, तब एरंड के 500 ग्राम पत्तों को 20 लीटर पानी में घंटे भर उबालें, तथा गर्म पानी की धार 15-20 मिनट स्त्री के स्तनों पर डाले, एरंड तेल की मालिश करें, उबले हुए पत्तों की महीन पुल्टिस स्तनों पर बांधे। इससे गांठें बिखर जायेगी और दूध का प्रवाह पुन: प्रारम्भ हो जायेगा। स्तन के चारों ओर की त्वचा फट जाने पर एंरड तेल लगाने से तुरन्त लाभ होता है। एरंड के पत्तों को सिरके में पीसकर स्तनों पर प्रतिदिन मलने से कुछ ही दिनों में स्तन कठोर हो जाते हैं। इसके अलावा गांठें पिघलकर दूध उतरने लगता है तथा सूजन की तकलीफ दूर हो जाती हैं। 24. पीलिया : गर्भवती महिला को यदि पीलिया हो जाये और गर्भ शुरुआती अवस्था में हो तो, एरंड के पत्तों का 10 मिलीलीटर रस सुबह-सुबह 5 दिन पिलाने से पीलिया दूर हो जाता है और सूजन भी दूर हो जाती है। एरंड के पत्तों के 5 मिलीलीटर रस में पीपल का चूर्ण मिलाकर नाक में डालकर सूंघने से या आंखों में अंजन करने से पीलिया रोग मिटता है और सूजन भी दूर हो जाती है। एरंड की जड़ का रस 6 मिलीलीटर, दूध 250 मिलीलीटर में मिलाकर पिलाने से कामला रोग मिटता है। एरंड की जड़ के 80 मिलीलीटर काढे़ में दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से खांसी दूर हो जाती है। एरंड के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर तक गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से 3 से 7 दिन में पीलिया नष्ट हो जाता है। रोगी को दही-चावल ही खिलायें और यदि कब्ज हो तो दूध अधिक पिलाएं। 10 ग्राम एरंड के पत्ते लेकर, उन्हें 100 मिलीलीटर दूध में पीसकर छान लें और उसमें 5 ग्राम शक्कर मिलाकर दिन में 3 बार पीने से कामला रोग शांत हो जाता है। एरंड का रस डाभ (कच्चे नारियल के पानी) में मिलाकर खाली पेट पीएं। इससे पीलिया का रोग ठीक हो जाता है। 25. खांसी : एरंड के पत्तों का क्षार 3 ग्राम, तेल एवं गुड़ आदि को बराबर मात्रा में मिलाकर चाटने से खांसी दूर हो जाती है। 26. पेट के रोग : एरंड के बीजों के बीच के भाग को पीसकर, गाय के चौगुने दूध में पकायें जब यह खोवा की तरह हो जाय तो उसमें दो भाग चीनी मिला लें। इसे प्रतिदिन 15 ग्राम खाने से पेट की गैस मिटती है। पुराने पेट के दर्द में रोज रात को सोने के समय 125 मिलीलीटर गर्म पानी में एक नींबू का रस निचोडकऱ, एरंड का तेल डालकर पीने से कुछ समय में ही दर्द दूर हो जाता है। 27. प्रवाहिका (संग्रहणी) : यदि मल के साथ आंव और खून निकलता हो तो आरम्भ में ही 10 मिलीलीटर एरंड तेल देने से आंव आना कम हो जाता है और खून का गिरना भी कम हो जाता है। 28. एपैन्डिक्स : इस रोग के प्रारम्भ में ही एरंड तेल 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन देने से आपरेशन करने की आवश्यकता नहीं रहती। और एपैन्डिक्स रोग ठीक हो जाता है। 29. वादी की पीड़ा : एरंड और मेंहदी के पत्तों को पीसकर लेप करने से वादी की पीड़ा मिट जाती है। 30. प्लीहोदर (तिल्ली का बढ़ जाना) : एरंड के पंचाग की 10 ग्राम राख को 40 मिलीलीटर गौमूत्र में मिलाकर पिलाने से प्लीहोदर मिट जाता है। 31. अर्श (बवासीर) : एरंड के पत्तों के 100 मिलीलीटर काढ़े में घृतकुमारी का रस 50 मिलीलीटर मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। एरंड तेल और घृत कुमारी का स्वरस मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से जलन शांत हो जाती है। मस्से और गुदा की त्वचा फट जाने पर प्रतिदिन रात्रि को एरंड तेल देने से बहुत लाभ होता है। एरंड के तेल की मालिश नियमित रूप से करते रहने से बवासीर के मस्से, पैरों की कील (कार्नस), मुहासें, मस्से, बिवाई, धब्बे, गठानों पर की सारी तकलीफें धीरे-धीरे दूर हो जाएंगी। नीम और एरंडी के तेल को गर्म करें तथा उसमें 1 ग्राम अफीम व 2 ग्राम कपूर का चूर्ण डालकर मलहम (गाढ़ा पेस्ट) बना लें। इस पेस्ट को मस्सों पर लगाने से मस्से सूखकर झड़ जाते हैं। एरंड का तेल लेकर प्रतिदिन मस्सों पर लगाने से कुछ ही दिनों में बादी बवासीर ठीक हो जाती है। 32. पेट की चर्बी : पेट पर चढ़ी हुई चर्बी को उतारने के लिए हरे एरंड की 20 से 50 ग्राम जड़ को धोकर कूटकर 200 मिलीलीटर पानी में पकाकर 50 मिलीलीटर शेष रहने पर पानी को प्रतिदिन पीने से पेट की चर्बी उतरती है। 33. प्रसव कष्ट (डिलीवरी के दौरान स्त्री को होने वाली पीड़ा) : प्रसवकाल में कष्ट कम हो सके इसके लिए गर्भवती स्त्री को 5 महीने बाद, एरंड तेल का 15-15 दिन के अन्तर से हलका जुलाब देते रहें। प्रसव के समय 25 ग्राम एरंड तेल को चाय या दूध में मिलाकर देने से प्रसव शीघ्र होता है। 34. मासिक-धर्म : एरंड के पत्तों को गर्मकर पेट पर बांधने से मासिक-धर्म नियमित रूप से होने लगता है। 35. गुर्दे (वृक्कशूल) के दर्द में : एरंड की मींगी को पीसकर, गर्म लेप करने से गुर्दे की वात पीड़ा व सूजन में लाभ होता है। 36. वातरक्त : वातरक्त में एरंड का 10 मिलीलीटर तेल एक गिलास दूध के साथ सेवन करना चाहिए। 37. रक्त विकार : एरंड की गिरी एक, दूध 125 मिलीलीटर, जल 250 मिलीलीटर मिलाकर उबालते हैं जब केवल दूध मात्र शेष रह जाए तो इसमें 10 ग्राम चीनी या मिश्री डालकर पिला दें, इस प्रकार एक गिरी से शुरू करके, 7 दिन तक 1-1 गिरी बढ़ाकर घटायें। एक गिरी पर लाने से रक्त के रोग मिटते हैं। यह प्रयोग अत्यंत वात शामक भी है। 38. विषनाशक : एरंड के पत्तों का 100 मिलीलीटर रस पिलाकर वमन (उल्टी) कराने से सांप तथा बिच्छू के विष में लाभ होता है। इसी प्रकार अफीम तथा दूसरी तरह के जहर में भी इससे लाभ होता है। एरंड के 20 ग्राम फलों को पीस-छानकर पिलाने से अफीम का विष उतरता है। 39. नहरूआ : एरंड के पत्तों को गर्म कर बांधने से नहरूआ की सूजन मिट जाती है। एरंड की जड़ को गाय के घी में मिलाकर पीने से नहरूआ रोग नष्ट हो जाता है। नहरूआ के रोगी को 20 मिलीलीटर एरंडी के पत्तों का रस और 60 ग्राम घी मिलाकर 3 दिन तक पीने से नहरूआ रोग में आराम मिलता है। 40. नाड़ी घाव (व्रण) : एरंड की कोमल कोपलों को पीसकर लेप करने से नाड़ी का घाव मिटता है। 41. शय्याक्षत (बिस्तर पर पडे़ रहने से होने वाले घाव) : एरंड तेल लगाने से शय्याक्षत बड़ी जल्दी मिटते हैं। बच्चों के उल्टी, दस्त और बुखार में एरंड तेल से लाभदायक कोई और वस्तु नहीं है। 42. दुष्ट व्रण (घाव) : बिगड़े हुए घाव और फोड़ों पर एरंड के पत्तों को पीसकर लगाने लाभ मिलता है। 43. वात प्रकोप और वात शूल : एरंड के बीजों को पीसकर लेप करने से छोटी संधियों और गठिया की सूजन मिटती है। वात रोग में एरंड तेल उत्तम गुणकारी है। कमर व जोड़ों का दर्द, हृदय दर्द, कफ और जोड़ों की सूजन, इन सब रोगों में एरंड की जड़ 10 ग्राम और सोंठ का चूर्ण 5 ग्राम का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए तथा दर्द पर एरंड तेल की मालिश करनी चाहिए। 45. विद्रधि (फोड़ा) होने पर : एरंड की जड़ को पीसकर घी या तेल में मिलाकर कुछ गर्म कर गाढ़ा लेप करने से फोड़ा मिट जाता है। 46. किसी भी प्रकार की सूजन : किसी भी प्रकार की सूजन, आमवात इत्यादि में एरंड के पत्तों को गर्म कर तेल चुपड़कर बांधने से लाभ होता है। 47. बुखार की जलन : बुखार में होने वाली जलन में एरंड के पत्ते धोकर साफकर शरीर पर धारण करने से जलन नष्ट हो जाती है। 48. तिल मस्से : पत्ते के वृन्त पर थोड़ा चूना लगाकर तिल पर बार-बार घिसने से तिल निकल जाता है। एरंड के तेल में कपड़ा भिगोकर मस्से पर बांधने से मस्से मिट जाते हैं। चेहरे या पूरे शरीर पर तिल, धब्बे या भूरे-भूरे दाग (लीवर स्पोंटस) हो या गाल या त्वचा पर छोटी-छोटी गिल्टियां (गांठे), सख्त गुठलियां निकलने पर रोजाना दिन में 2 से 3 बार लगातार एरंड के तेल की मालिश करने से धीरे-धीरे सब समाप्त हो जाते हैं। एरंड का तेल लगाने से जख्म भी भर जाते हैं और इसकों मस्सों पर लगाने से मस्सा ढीला होकर गिर जाता है। एरंड के तेल को सुबह और शाम 1-2 बूंद हल्के हाथ से मस्से पर मलने से 1 से 2 महीनों में मस्से गिर जाते हैं। 49. पित्तजगुल्म : पित्तजगुल्म एवं पैत्तिक शूल में यष्टिमधु के 50 मिलीलीटर काढे़ में एरंड तेल 5-10 मिलीलीटर मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। 50. सौंदर्यवर्धक : एरंड के तेल में चने का आटा मिलाकर चेहरे पर रगड़ने से झांई आदि मिटकर चेहरा सुंदर हो जाता है। 51. नाखून : एरंड के गुनगुने (हल्के गर्म) तेल में नाखूनों को कुछ मिनट डुबोये रखें, फिर उसी तेल की मालिश करें। यदि डूबोना सम्भव नहीं हो तो गर्म तेल में रुई डुबोकर नाखूनों पर रखें। इससे नाखून चमकने लगेंगे। 52. सांप के काटे जाने पर : एरंड की कोपलें दस ग्राम, पांच कालीमिर्च, दोनों को पीसकर पानी में मिलाकर पिला दें। इससे उल्टी होगी, कफ निकलेगा। थोड़ी देर बाद पुन: इसी तरह पिलायें। इससे जहर बाहर निकलेगा। 53. घाव : यदि कहीं चोट लगकर खून आने लगे, घाव हो जाए तो एरंड का तेल लगाकर पट्टी बांधने से लाभ होता है। एरंडी के तेल को घाव पर लगायें। एरंडी के तेल में नीम का तेल मिलाकर घाव पर लगायें। 54. दाग-धब्बे : तिल, मस्से, चेहरे पर धब्बे, घट्टा-आटन, कील-मुंहासे हो तो एक दो महीने तक सुबह-शाम एरंड के तेल की मालिश करें। इससे उपर्युक्त विकार ठीक हो जाते हैं। मस्से, औटन पर तेल में गाज (कपड़ा) भिगोकर पट्टी बांधकर रखना चाहिए। एरंड के तेल में चने का आटा मिलाकर चेहरे पर रगड़ने से झांई आदि दूर होकर चेहरा साफ हो जाता है। 55. बिवाइयां (एड़ी का फटना) : पैरों को गर्म पानी से धोकर उनमें एरंड का तेल लगाने से बिवाइयां (फटी एड़ियां) ठीक हो जाती हैं। 56. आंख में कुछ गिर जाना : आंख में मिट्टी, कंकरी गिर जाये, धुआं, तीव्र गंध से दर्द हो तो एरंड के तेल की एक बूंद आंख में डालने से लाभ होता है। तेल डालने के बाद हर 25 मिनट में सेंक करें। 56. वायु गोला और गुल्म : पेट में गांठ की तरह उभार को वायुगोला कहते हैं। यह घटता बढ़ता है। एरंड का तेल 2 चम्मच, गर्म दूध में मिलाकर पीने से इसमें लाभ होता है। 57. गठिया (जोड़ का दर्द) : पेट में आंव दब जाने से गठिया हो जाती है। गठिया में एरंड का तेल कब्ज दूर करने हेतु सेवन करें। इससे आंव बाहर निकलेगी और गठिया में आराम होगा। घुटने के दर्द को दूर करने के लिए 1 ग्राम हरड़ और एरंड का तेल साथ सेवन करने से रोगी के घुटनों का दर्द दूर होता है। 25 मिलीलीटर एरंड का तेल रोजाना सुबह-शाम खाली पेट पीये इससे गठिया के रोग में लाभ होता है। एरंड के बीजों को पानी में पीसकर गर्म कर सूजन व दर्द के स्थानों पर बांधने से राहत मिलती है। 58. आंत्रवृद्धि : एक कप दूध में 2 चम्मच एरंड का तेल डालकर 1 महीने तक पीने से आंत्रवृद्धि ठीक हो जाती है। खरैटी के मिश्रण के साथ अरंडी का तेल गर्मकर पीने से पेट का फूलना, दर्द, आंत्रवृद्धि व गुल्म खत्म होती है। इन्द्रायण की जड़ का पाउडर, अरंडी के तेल या दूध में मिलाकर पीने से निश्चित रूप से अंत्रवृद्धि खत्म हो जायेगी। 250 मिलीलीटर गर्म दूध में 20 मिलीलीटर एरंड का तेल मिलाकर 1 महीने तक पीयें इससे वातज अंत्रवृद्धि ठीक हो जाती है। 2 चम्मच एरंड का तेल और बच का काढ़ा बनाकर उसमें 2 चम्मच एरंड का तेल मिलाकर खाने से लाभ होता है। 59. दांत घिसना या किटकिटाना : कई बच्चे रात को सोने के बाद भी दांत घिसते (किट-किटाते) रहते हैं। इस प्रकार के रोग में बच्चे के गुदा में एरंड का रस डाल लें। इससे सभी कीड़े नष्ट हो जाते हैं और दांत का घिसना बंद हो जाता है। 60. आंखों का फूला, जाला : 30 मिलीलीटर एरंड के तेल में 25 बूंद कार्बोलिक एसिड मिलाकर सुबह और शाम 2-2 बूंद आंख में डालने से आंखों के फूले और जाले से छुटकारा मिलता है। 61. पेट का साफ होना : यदि मल त्यागने में कठिनाई का अनुभव हो तो एरंड के तेल को दूध के साथ देने से लाभ होता है। 62. बिलनी : एरंड के बीज, स्फटिका और टंकण का आंखों पर लेप लगाना चाहिए। 63. वायु का विकार : एरंड के तेल की 2 चम्मच मात्रा को गर्म दूध में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। 64. कांच निकलना (गुदाभ्रंश) : एरंडी के तेल को हरे कांच की शीशी में भरकर 1 सप्ताह तक धूप में सुखाये। इस तेल को गुदाभ्रंश पर रूई से लगाएं। इससे गुदाभ्रंश निकलना बंद होता है। एरंडी का तेल आधे से एक चम्मच की मात्रा में उम्र के अनुसार हल्के गर्म दूध में मिलाकर रोज रात को सोते समय दें। यह कब्ज और आमाशय दोनों शिकायतें को खत्म कर गुदा रोग को ठीक करता है। 65. बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग) : अरंडी (एरंड) या सरसों के तेल में हल्दी जलाकर छान लें और इसमें थोड़ा सा कपूर मिलाकर सिर के गंजे जगह पर मालिश करें। इससे सिर पर बाल उगना शुरू हो जाते हैं। एरंड के गूदे को पीसकर बाल गिर जाने के बाद लगाने से बाल फिर से उग आते हैं। 66. पलकें और भौहें : एरंड (अरंडी) के तेल की मालिश 1-1 दिन के अन्तराल पर करने से पलकों और भौहें के बाल उग आते हैं। 67. स्तनों से दूध का टपकना : अरण्ड के पत्तों को पानी में पीसकर छाती (सीने) पर सुबह-शाम के समय लेप करने से छाती से दूध का टपकना बंद हो जाता है। 68. कब्ज (कोष्ठबद्धता) : एरंड के तेल की 10 बूंदों को रात को सोते समय पानी में मिलाकर सेवन करने से कब्ज (कोष्ठबद्धता) की बीमारी में लाभ होता है। एरंड का तेल 30 मिलीलीटर को गर्म दूध में मिश्री के साथ पीने से कब्ज दूर हो जाता है। 1 कप दूध में 2 चम्मच एरंड का तेल मिलाकर सोते समय पिलाएं। इससे पेट की कब्ज नष्ट हो जाती है। एरंडी के तेल की 2 से 4 बूंद को माता के दूध में मिलाकर दें। अरंडी के तेल की पेट पर मालिश करने से पेट साफ हो जाता हैं। 6 मिलीलीटर अरंडी के तेल में 6 मिलीलीटर दही मिलाकर आधे-आधे घंटे के अन्तर के बाद पिलाने से वायुगोला हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। अरंडी का तेल 20 मिलीलीटर और अदरक का रस 20 मिलीलीटर मिलाकर पी लें, फिर ऊपर से थोड़ा-सा गर्म पानी पीने से वायु गोला में तुरन्त होता है। अरण्ड का तेल और उसकी 2 से 3 कलियां खाने से पेट साफ हो जाता है। अरंडी का तेल 3 चम्मच, बादाम रोगन 1 चम्मच को 250 मिलीलीटर दूध में गर्म कर सोने से पहले लें। 1 चम्मच एरंड का तेल दूध में मिलाकर सोने से पहले पीने से लाभ होता है। एरंड के तेल की 30 बूंदों तक की मात्रा को 250 मिलीलीटर तक दूध में मिलाकर सेवन करने से सामान्य पेट की गैस दूर हो जाती है। नवजात शिशुओं को छोटी चम्मच में दी जा सकती है। कोष्ठबद्धता (कब्ज) को नष्ट करने के लिए रात को सोते समय एरंड के 5 मिलीलीटर तेल को हल्के गर्म पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है। सोते समय 2 चम्मच एरंड का तेल पीने से कब्ज दूर होती है, दस्त साफ आता है। इसे गर्म दूध या गर्म पानी में मिलाकर पी सकते हैं। 69. उल्टी और दस्त : 10 ग्राम एरंड की जड़ को छाछ के साथ पीसकर पिलाने से उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं। 70. गर्भनिरोध : मासिक-धर्म के बाद तीन दिन तक एरंड की मींगी खाने से एक वर्ष तक गर्भ नहीं ठहरता है। एरंड का एक बीज छीलकर माहवारी खत्म होने के दो दिन बाद सुबह के समय खाली पेट बिना चबाएं पानी से निगल लेते हैं। इससे एक वर्ष तक गर्भ नहीं ठहरता है। 71. बुखार : एरंड की जड़, गिलोय, मजीठ, लाल चंदन, देवदारू तथा पद्याख का काढ़ा पिलाने से गर्भवती स्त्री का ज्वर (बुखार) दूर हो जाता है। 72. गर्भाशय की सूजन : एरंड के पत्तों का रस छानकर रूई भिगोकर गर्भाशय के मुंह पर 3-4 दिनों तक रखने से गर्भाशय की सूजन मिट जाती है। गर्भाशय की सूजन प्राय: प्रसव के बाद होती है। इसमें महिला को बहुत तेज बुखार होता है। ऐसी अवस्था में एरंड के पत्तों के रस में शुद्ध रूई का फोहा भिगोकर योनि में रखने से आराम होता है। 73. नपुंसकता (नामर्दी) : अरण्ड के बीज 5 ग्राम, पुराना गुड़ 10 ग्राम, तिल 5 ग्राम, बिनौले की गिरी 5 ग्राम, कूट 2 ग्राम, जायफल 2 ग्राम, जावित्री 2 ग्राम, अकरकरा 2 ग्राम। इन सबको कूट-पीसकर एक साफ कपड़े में रखकर पोटली बना लें और इस पोटली को बकरी के दूध में उबालें। दूध जब अच्छी तरह पक जाये, तो इसे ठंडा करके 5 दिन तक पियें तथा पोटली से शिश्न (लिंग) की सिंकाई करें। 74. आमातिसार : 1 चम्मच एरंड तेल को गर्म-गर्म दूध में मिलाकर पिलाने से आमातिसार रोग में लाभ मिलता है। 75. बहरापन : असगंध, दूध, अरण्ड की जड़, शतावर और काले तिल के तेल को बराबर मात्रा में लेकर 200 मिलीलीटर सरसों के तेल में डालकर पका लें। इस तेल को कान में डालने से कान के सारे रोग ठीक हो जाते हैं। 76. कमर का दर्द : एरंड के बीज के अंदर का गूदा, दूध में पीसकर पिलाने से कमर दर्द में लाभ होता है। कमर दर्द होने पर एरंड के बीज की 5 मींगी दूध में पीसकर पिलाने से लाभ होता है। एरंड के पत्तों पर तेल लगाकर कमर में बांधकर हल्का-सा सेंकने से शीत ऋतु में उत्पन्न कमर का दर्द शांत हो जाता है। एरंड की जड़ और सोंठ को जल में उबालकर काढ़ा बनायें। काढ़े को छानकर उसमें भुनी हींग और काला नमक मिलाकर पीने से शीत लहर के कारण उत्पन्न कमर के दर्द से राहत मिलती है। 35 ग्राम अरंडी के बीजों की गिरी पीसकर 250 मिलीलीटर दूध में पकायें। जब इसका खोया बन जाये तो इसे 70 ग्राम घी में भून लें। इसमें 70 ग्राम चीनी मिलाकर सुबह 3 चम्मच लगातार खायें, इससे कमर दर्द मिट जाता है। 77. चोट लगने पर : चोट लगकर खून आने लगे, घाव हो तो एरंड का तेल लगाकर पट्टी बांधने से लाभ होता है। एरंड के पत्ते पर तिल का तेल लगाकर गर्म करके बांधने से चोट से सूजन एवं दर्द में लाभ होता है। 78. आंवरक्त : पेचिश के रोगी को एरंड का तेल हल्के गुनगुने दूध में मिलाकर रात को सोते समय सेवन करने से रोग पेचिश ठीक हो जाता है। 79. अग्निमान्द्यता (अपच) : अरनी की जड़ का चूर्ण खाने से भूख बढ़ती है। 2 चम्मच अरंडी का तेल गौमूत्र (गाय का पेशाब) या दूध में मिलाकर सेवन करने से आंतें स्वस्थ होती हैं। 80. प्रदर रोग : अरण्ड (एरंडी) की जड़ की राख दूध के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।
81. मोच : एरंड के पत्ते पर सरसों और हल्दी गर्म करके मोच वाले स्थान पर लगायें और पत्ते को उस पर रखकर पट्टी बांध दें। अरण्ड के बीज की गिरी 10 ग्राम काले तिल 10 मिलीलीटर दूध में पीसकर हल्का गर्म करके मोच पर बांध दें।
82. जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) : अरंडी के तेल के साथ गोरखमुण्डी मिलाकर खाने से जलोदर में लाभ होगा।
83. शीतपित्त : कूठ का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से 1.80 ग्राम में एरंड का तेल मिलाकर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आमवात में लाभ होता है। इसका बाहरी प्रयोग भी किया जाता है। एरंड के तेल में तारपीन का तेल बराबर मिलाकर मालिश करने से पित्ती में लाभ होता है। पित्ती उछलने पर सबसे पहले चार चम्मच एरंड का तेल पीकर पेट साफ कर लें। इसके बाद 5 ग्राम छोटी इलायची के दाने, 10 ग्राम दालचीनी, पीपर 10 ग्राम सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण मक्खन के साथ खायें।
84. स्तनों का सुडौल और पुष्ट होना : एरंड के तेल से स्तनों की मालिश करने से स्तन सुडौल, पुष्ट और बढ़ते हैं।
85. पेट के कीड़ों के लिए : एरंड के पत्तों के रस में हींग डालकर पीने से पेट की आंतों में फंसे कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं।
86. वात रोग : अरण्ड के तेल में गाय का मूत्र मिलाकर 1 महीने तक रोज खाने से हर तरह के वात रोग खत्म हो जाते हैं। अरण्ड की लकड़ी जलाकर उसकी 10 ग्राम राख को पानी के साथ खाने से वात रोग में लाभ होता है। एरंड की जड़ को घी या तेल में पीसकर गर्म करके लगाने से वात विद्रधि (फोड़ा) रोग खत्म होते हैं।
87. स्तनों के आकार में वृद्धि : एरंड के तेल की मालिश करने से स्तनों का आकार बढ़ने लगता है।
88. स्तनों की घुंडी का फटना : एरंड के तेल से स्तन या स्तनों की चूंची विदार (घुंडी फटने) में मालिश करने से लाभ मिलता है।
89. शिरास्फीति : हाथ की शिराओं के रोग में 2 चम्मच एरंड का तेल दूध में मिलाकर रात में सेवन करें एवं एरंड तेल से मालिश करें। इससे रोगी शीघ्र ही ठीक हो जाता है। 90. नाक के रोग : एरंड के नये मुलायम पत्तों को पीसकर चूने में अच्छी तरह मिलाकर नाक की बवासीर पर लगाने से कुछ ही समय में यह रोग ठीक हो जाता है। (चूना घोंघे वाला या सीप वाला ही होना चाहिए)। अरंडी (एरंड) के छिलकों की राख बनाकर नाक के नथुनों (छेदों) से सूंघने से नकसीर (नाक से खून बहना) रुक जाती है।
91. सभी प्रकार के दर्द : एरंड के पेड़ की जड़, सोंठ, कंटकारी, कटेरी, बिजौरा नींबू की जड़, पाषाणभेद और त्रिकुटा की जड़ों को अच्छी तरह पीसकर बारीक चूर्ण को 20 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें, इस बने काढ़े में जवाखार, हींग, सेंधानमक और अरंडी का तेल मिलाकर सेवन करने से आमजशूल, दिल का दर्द (हृदय शूल), स्तनशूल, लिंग शूल यानी लिंग (शिश्न) का दर्द और अनेक प्रकार के दर्द समाप्त हो जाते हैं।
92. स्तनों की रसौली (गांठे) : एरंड के तेल से स्त्री के स्तनों की मालिश करें और एरंड के पत्तों को स्तन पर बाँधे। इससे स्तन में होने रसूली (गांठें, गिल्टी) धीरे-धीरे कम होकर समाप्त हो जाती हैं। इसके साथ ही साथ स्तनों के आकार में बढ़ोत्तरी होती जाती है।
93. पेट में दर्द होने पर : एरंड का तेल 10 मिलीलीटर दूध में मिलाकर पीने से कब्ज के कारण होने वाला पेट का दर्द समाप्त हो जाता है। एरंड के तेल में हींग को बारीक पीसकर मिलाकर पेट के ऊपर लेप करने से पेट के दर्द में आराम मिलता है। एरंड के पत्तों को निचोड़कर प्राप्त हुए रस में थोड़ी-सी मात्रा में सेंधानमक मिलाकर प्रयोग करें। एरंडी के तेल में जवाखार मिलाकर सेवन करने से `कफोदर´ को समाप्त होता है।
94. आसान प्रसव (बच्चे का जन्म आसानी से होना) : एरंड का तेल नाभि पर मलने से बच्चा आसानीपूर्वक हो जाता है। लगभग 20 से 25 मिलीलीटर एरंड का तेल गर्म दूध के साथ प्रसव (डिलीवरी) के पूर्व पिलाने से प्रसव (डिलीवरी) आसानी से होता है। अरण्ड का तेल 50 मिलीलीटर गर्म दूध में मिलाकर पिला दें। अगर प्रसव में दर्द हो तो दर्द तेज होकर बंद हो जायेगा। 95. बंद पेशाब खुल जायें : 1 छोटा चम्मच अरंडी का तेल बच्चे को पिलाने से बंद पेशाब खुल जाता है।
96. योनि की जलन और खुजली : एरंड का तेल लगभग 7 मिलीलीटर से लेकर 14 मिलीलीटर को 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ 1 दिन में सुबह और शाम पीने से योनि की खुजली मिटती है।
97. चेहरे की झांई के लिए : अरंडी के तेल में बेसन मिलाकर लगाने से चेहरा साफ होकर खूबसूरत बनता है।
98. घट्टा रोग : सुबह-शाम एरंड का तेल मलते रहने से घट्टे ठीक हो जाते हैं। तेल में कपड़ा भिगोकर पट्टी बांधे। इसका प्रयोग 2 महीनों तक करने से घट्टे ठीक हो जाते हैं।
99. हाथ-पैरों की अकड़न : एरंडी के तेल से हाथ व पैरों पर 2 से 3 मिनट तक धीरे-धीरे मालिश करने से ठंड के कारण उत्पन्न अकड़न खत्म हो जाती है। 25 ग्राम एरंड की जड़ का छिलका (छाल) को कूटकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। पानी आधा रह जाने पर उसको छानकर इसमें 125 मिलीलीटर तिल का तेल डालकर फिर गर्म करें। पानी जल जाने पर ठंडाकर कम गर्म तेल से पैरों के जोड़ों पर मालिश करने से लाभ मिलता है।
100. हाथ-पैरों की जलन : 30 ग्राम शुद्ध एरंडी के तेल को 100 मिलीलीटर गाय के पेशाब में मिलाकर पीने से हाथ-पैरों की ऐंठन दूर हो जाती है। एरंड के तेल को बकरी के दूध में मिलाकर हाथ-पैरों पर मालिश करने से लाभ मिलता है। पैरों के तलवों की जलन दूर करने के लिए अरण्ड के बीज और गिलोय को पीसकर लगाने से लाभ होता है।
101. दिल की बीमारी के लिए : एरंड तेल में भुना हुआ हरीतकी फल मज्जाचूर्ण 1 से 3 ग्राम, अंगूर, शर्करा, परूषक फल व शहद बराबर मात्रा में लेकर, दिन में 2 बार सेवन करना चाहिए। एरंड तेल में भुनी हुई हरीतकी फल मज्जा 20 ग्राम, सेंधानमक 10 ग्राम, श्वेत जीरा का बारीक पिसा हुआ चूर्ण एक भाग मिलायें। इसे 2 से 6 ग्राम की मात्रा में 5 से 10 ग्राम शर्करा के साथ दिन में 2 बार सेवन करना चाहिए।
102. चेहरे के लकवा के रोग में : 10 से 20 मिलीलीटर एरंड के तेल को पकाकर गर्म दूध में मिलाकर सुबह और शाम रोगी को दें अगर रोगी को पैखाना (टट्टी) साफ आने लगे तो सिर्फ एक बार दें। इसके सेवन करने से पक्षाघात, चेहरे का लकवा ठीक हो जाता है। यह शरीर में शक्ति पैदा करता है।
103. नासूर (पुराने घाव) : एरंड के पौधे के नये पत्तों को पानी में पीसकर नासूर पर लगाने से रोगी को लाभ मिलता है।
104. फीलपांव (गजचर्म) : 20 मिलीलीटर एरंडी का तेल और 20 ग्राम हरड़ का चूर्ण को 250 मिलीलीटर गाय के पेशाब में मिलाकर 7 दिन तक सेवन करने से फीलपांव का रोग ठीक होता है। एरंडी के तेल में छोटी हरड़ भूनकर चूर्ण बना लें। 6 ग्राम दवा को 100 मिलीलीटर गाय के पेशाब के साथ पीने से फीलपांव का रोगी ठीक हो जाता है।
105. तुंडिका शोथ (टांसिल) : 10-10 ग्राम एरंड, शहतूत की पत्तियां और निर्गुण्डी तीनों को लेकर 400 मिलीलीटर पानी में उबालकर उसकी भाप लेने से गले की सूजन समाप्त होती है।
106. फोड़े-फुंसियां : अरण्ड, मालकांगनी और सज्जीक्षार के बीज को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसमें पानी डालकर गर्म-गर्म लेप कर फोड़े-फुंसियों पर लगाने से लाभ होता है।
107. कुष्ठ (कोढ़) : एरंड के पत्तों को मट्ठे (लस्सी) में पीसकर मालिश करने से हर प्रकार का `कोढ़´ दूर हो जाता है। सफेद फूलों वाली अरंडी की जड़ को रविवार के दिन लाकर पीसकर रोजाना 10 ग्राम पीने से सफेद कोढ़ ठीक हो जाता है।
108. शरीर की जलन : एरंड के बीज के भीतर के भाग को पीसकर बकरी के दूध में मिलाकर पैरों के तलवों में मालिश करने से रोगी के शरीर की जलन दूर हो जाती है। एरंडी के तेल से भी मालिश करने से रोगी को लाभ मिलता है। 

Saffron health benefits

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