सोमवार, 27 अप्रैल 2020

Impotency or नंपुसकता


परिचय :
जो  यौन संबन्ध नहीं बना पाता या जल्द ही शिथिल हो जाता है वह नपुंसकता का रोगी होता है। इसका सम्बंध सीधे जननेन्द्रिय से होता है। इस रोग में रोगी अपनी यह परेशानी किसी दूसरे को नहीं बता पाता या सही उपचार नहीं करा पाता मगर जब वह पत्नी को संभोग के दौरान पूरी सन्तुष्टि नहीं दे पाता तो रोगी की पत्नी को पता चल ही जाता है कि वह नंपुसकता के शिकार हैं। इससे पति-पत्नी के बीच में लड़ाई-झगड़े होते हैं और कई तरह के पारिवारिक मन मुटाव हो जाते हैं बात यहां तक भी बढ़ जाती है कि आखिरी में उन्हें अलग होना पड़ता है।

कुछ लोग शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं होते, लेकिन कुछ प्रचलित अंधविश्वासों के चक्कर में फसकर, सेक्स के शिकार होकर मानसिक रूप से नपुंसक हो जाते हैं मानसिक नपुंसकता के रोगी अपनी पत्नी के पास जाने से डर जाते हैं। सहवास भी नहीं कर पाते और मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है।

कारण :
नपुंसकता के दो कारण होते हैं- शारीरिक और मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने से मानसिक रोग होता है। नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को जब पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है। हस्तमैथुन, ज्यादा काम-वासना में लगे रहने वाले नवयुवक नपुंसक के शिकार होते हैं। ऐसे नवयुवकों की सहवास की इच्छा कम हो जाती है।

लक्षण :

मैथुन के योग्य न रहना, नपुंसकता का मुख्य लक्षण है। थोड़े समय के लिए कामोत्तेजना होना, या थोड़े समय के लिए ही लिंगोत्थान होना-इसका दूसरा लक्षण है। मैथुन अथवा बहुमैथुन के कारण उत्पन्न ध्वजभंग नपुंसकता में शिशन पतला, टेढ़ा और छोटा भी हो जाता है। अधिक अमचूर खाने से धातु दुर्बल होकर नपुंसकता आ जाती है।


1. हेल्थ टिप्स :

नपुंसकता से परेशान रोगी को औषधियों खाने के साथ कुछ और बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे सुबह-शाम किसी पार्क में घूमना चाहिए, खुले मैदान में, किसी नदी या झील के किनारे घूमना चाहिए, सुबह सूर्य उगने से पहले घूमना ज्यादा लाभदायक है। सुबह साफ पानी और हवा शरीर में पहुंचकर शक्ति और स्फूर्ति पैदा करती है। इससे खून भी साफ होता है।
नपुंसकता के रोगी को अपने खाने (आहार) पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक खाद्य-पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद भी जरूर खाना चाहिए। फल और फलों के रस के सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है। नपुंसकता की चिकित्सा के चलते रोगी को अश्लील वातावरण और फिल्मों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इसका मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इससे बुरे सपने भी आते हैं जिसमें वीर्यस्खलन होता है।

2. ईसबगोल :

ईसबगोल की भूसी 5 ग्राम और मिश्री 5 ग्राम दोनों को रोज सुबह के समय खायें और ऊपर से दूध पी लें। इससे शीध्रपतन की विकृति खत्म होती है।
ईसबगोल की भूसी और बड़े गोखरू का चूर्ण 20-20 ग्राम तथा छोटी इलायची के बीजों का चूर्ण 5 ग्राम इन सबका चूर्ण बनाकर रोज 2 चम्मच गाय के दूध के साथ लें।

3. सफेद प्याज :

सफेद प्याज का रस 8 मिलीलीटर, अदरक का रस 6 मिलीलीटर और शहद 4 ग्राम, घी 3 ग्राम मिलाकर 6 हफ्ते खाने से नपुंसकता खत्म हो जाती है।
सफेद प्याज को कूटकर दो लीटर रस निकाल लें। इसमें 1 किलो शुद्ध शहद मिलाकर धीमी आग पर पकायें जब सिर्फ शहद ही बच कर रह जाये तो आग से अतार लें और उसमें आधा किलो सफेद मूसली का चूर्ण मिलाकर चीनी या शीशे के बर्तन में भर दें। 10 से 20 ग्राम तक दवा सुबह-शाम खाने से नामर्दी मिट जाती है।

4. जामुन : जामुन की गुठली का चूर्ण रोज गर्म दूध के साथ खाने से धातु (वीर्य) का खत्म होना बन्द हो जाता है।

5. छुहारे :

छुहारे को दूध में देर तक उबालकर खाने से और उसी दूध को पीने से नपुंसकता खत्म होती है।
रात को पानी में दो छुहारे और 5 ग्राम किशमिश भिगो दें। सुबह को पानी से निकालकर दोनों मेवे को दूध के साथ खायें।

6. बादाम :

बादाम की गिरी, मिश्री, सौंठ और काली मिर्च कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर कुछ हफ्ते खाने से और ऊपर से दूध पीने से धातु (वीर्य) का खत्म होना बन्द होता है।
बादाम को गर्म पानी में रात में भींगने दें। सुबह थोड़ी देर तक पकाकर पेय बनाकर 20 से 40 मिलीलीटर रोज पीयें इससे मूत्रजनेन्द्रिय संस्थान के सारे रोग खत्म हो जाते हैं।

7. गाजर :

रोज गाजर का रस 200 मिलीलीटर पीने से मैथुन-शक्ति (संभोग) बढ़ती है।
गाजर का हलवा रोज 100 ग्राम खाने से सेक्स की क्षमता बढ़ती है।

8. कौंच :

कौंच के बीज के चूर्ण में तालमखाना और मिश्री का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3-3 ग्राम की मात्रा में खाने और दूध के साथ पीने से नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।
कौंच के बीजों की गिरी तथा राल ताल मखाने के बीज। दोनों को 25-25 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर छान लें, फिर इसमें 50 ग्राम मिसरी मिला लें। इसमें 2 चम्मच चूर्ण रोज दूध के साथ खाने से लाभ होता है।

9. गिलोय : गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला सभी बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें 5 ग्राम चूर्ण रोज मिसरी और घी के साथ खाने से प्रबल मैथुन शक्ति विकसित होती है।

10. जायफल :

जायफल का चूर्ण लगभग आधा ग्राम शाम को पानी के साथ खाने से 6 हफ्ते में ही धातु (वीर्य) की कमी और मैथुन में कमजोरी दूर होगी।
जायफल का चूर्ण एक चौथाई चम्मच सुबह-शाम शहद के साथ खायें। और इसका तेल सरसों के तेल के मिलाकर शिश्न (लिंग) पर मलें।

11. बेल :

बेल के पत्तों का रस 20 मिलीलीटर निकालकर उसमें सफेद जीरे का चूर्ण 5 ग्राम, मिसरी का चूर्ण 10 ग्राम के साथ खाने और दूध पीने से शरीर की कमजोरी खत्म होती है।
बेल के पत्तों का रस लेकर उसमें थोड़ा-सा शहद मिलाकर शिश्नि पर 40 दिन तक लेप करने से नपुंसकता में लाभ होगा।

12. सफेद मूसली :

सफेद मूसली और मिसरी बराबर मिलाकर पीसकर चूर्ण बना कर रखें और चूर्ण बनाकर 5 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ खाने से शरीर की शक्ति और खोई हुई मैथुन शक्ति वापस मिल जाती है।
सफेद मूसली 250 ग्राम बारीक चूर्ण बना लें, उसे 2 लीटर दूध में मिलाकर खोया बना लें। फिर 250 ग्राम घी में डालकर इस खोए को भून लें। ठंडा हो जाने पर आधा किलो पीसकर शक्कर (चीनी) मिलाकर पलेट या थाली में जमा लें। सुबह-शाम 20 ग्राम खाने से काम-शक्ति बढ़ती है।
सफेद मूसली, सतावर, असगंध 50-50 ग्राम कूट छान कर 10 ग्राम दवा सोते समय 250 मिलीलीटर कम गर्म दूध में खांड़ के संग मिलाकर लें।
सफेद मूसली 20 ग्राम, ताल मखाने के बीज 200 ग्राम और गोखरू 200 ग्राम। तीनों को पीसकर चूर्ण बनाकर रखें, फिर इसमें से 5 ग्राम चूर्ण दूध के साथ खायें।
सफेद मूसली और मिसरी बराबर मात्रा में कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर 6 ग्राम की मात्रा में खाने से और ऊपर से नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।

13. चना : भीगे चने सुबह-शाम चबाकर खाने से ऊपर से बादाम की गिरी खाने से मैथुन-शक्ति बढ़ती है और नंपुसकता खत्म होती है।

14. शतावर :

शतावर को दूध में देर तक उबालकर मिसरी मिलालें और उस दूध को पीने से ही कुछ महीनों में नपुंसकता (नामर्दी) खत्म हो जाती है।
शतावर, असगंध, एला, कुलंजन और वंशलोचन का चूर्ण बनाकर रखें। 3 ग्राम चूर्ण में 6 ग्राम शक्कर को मिलाकर खाने से और फिर ऊपर से दूध पीने से कुछ महीनों में नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।
शतावर और असगन्ध के 4 ग्राम चूर्ण को दूध में उबाल कर पीने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर होती है।
शतावर का चूर्ण 10 ग्राम से 20 ग्राम को चीनी मिले दूध में सुबह-शाम डालकर पीयें इससे नपुंसकता दूर होती है। शरीर की कमजोरी भी दूर होती है।

15. सेमल :

सेमल के पेड़ की छाल के 20 मिलीलीटर रस में मिसरी मिलाकर पीने से शरीर में वीर्य और मैथुन शक्ति बढ़ती है।
10-10 ग्राम सेमल के चूर्ण और चीनी को 100 मिलीलीटर पानी के साथ घोट कर सुबह-शाम लेने से बाजीकरण यानी संभोग शक्ति ठीक होती है और नपुंसकता भी दूर हो जाती है।

16. बड़ी गोखरू :

बड़ी गोखरू का फांट या घोल सुबह-शाम लेने से कामशक्ति यानी संभोग की वृद्धि दूर होती है। 250 मिलीलीटर को खुराक के रूप में सुबह और शाम सेवन करें।
बड़ा गोखरू और काले तिल इन दोनों को 14 ग्राम की मात्रा में कूट-पीस लें फिर इस को 1 किलो गाय के दूध में पकाकर खोआ बना लें। यह एक मात्रा है। इस खोयें को खाकर ऊपर से 250 मिलीलीटर गाय के निकाले दूध के साथ पी लें 40 दिन तक इसको खाने से नपुंसकता दूर हो जाती है।
25 ग्राम बड़ी गोखरू के फल का चूर्ण, 250 मिलीलीटर उबले पानी में डालकर रखें। इसमें से थोड़ा-थोड़ा बार-बार पिलाने से कामोत्तेजना बढ़ती है।
बड़ी गोखरू के फल का चूर्ण 2 ग्राम को चीनी और घी के साथ सेवन करें तथा ऊपर से मिश्री मिले दूध का सेवन करने से कामोत्तेजना बढ़ती है।

17. गोखरू :

हस्तमैथुन की बुरी लत से पैदा हुई नपुंसकता को दूर करने के लिए 1-1 चम्मच गोखरू के फल का चूर्ण और काले तिल को मिलाकर शहद के साथ दिन में 3 बार नियमित रूप से कुछ हफ्तों तक सेवन करें इससे नपुंसकता में लाभ होता है।
गोखरू, कौंच के बीज, सफेद मूसली, सफेद सेमर की कोमल जड़, आंवला, गिलोय का सत और मिश्री बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। 10 ग्राम से लगभग 20 ग्राम तक चूर्ण दूध के साथ खाने से नपुंसकता और वीर्य की कमजोरी दूर होती है।
गोखरू को 3 बार दूध में उबालकर तीनों बार सुखाकर चूर्ण बनाकर खाने से नपुंसकता दूर होती है।
गोखरू का चूर्ण और तिल बराबर मिलाकर बकरी के दूध में पकाकर शहद में मिला लें और खायें इससे अनेक प्रकार की नपुंसकता खत्म होती है।
देशी गोखरू 150 ग्राम पीसकर छान लें। इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम शहद में मिलाकर चाटने से नपुंसकता (नामर्दी) में लाभ मिलता है।
गोखरू, तालमखाना, शतावर, कौंच के बीजों की गिरी, बड़ी खिरेंटी तथा गंगरेन इन सबको 100 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम से 10 ग्राम तक की मात्रा में रात के समय फांककर ऊपर से गरम दूध पियें। 60 दिनों तक रोज खाने से वीर्य बढ़ता है और नपुंसकता दूर होती है।

18. विदारीकन्द :

विदारीकन्द के चूर्ण को घी, दूध और गूलर के रस के साथ खाने से प्रौढ़ पुरुष भी नवयुवकों की तरह मैथुन-शक्ति प्राप्त कर सकता है।
5 ग्राम विदारीकन्द को पीसकर लुगदी बना लें। इसे खाकर ऊपर से 5 ग्राम देशी घी और मिश्री मिलाकर दूध के साथ पियें। यह बल और वीर्य को बढ़ाता है तथा इससे नपुंसकता दूर होती है।

19. सूखे सिंघाड़े : सूखे सिंघाड़े को कूट-पीसकर घी और चीनी के साथ हलवा बनाकर खाने से कुछ ही हफ्ते में नपुंसकता खत्म हो जाती है।

20. तरबूज : तरबूज के बीजों की गिरी 6 ग्राम, मिश्री 6 ग्राम मिलाकर, चबाकर खाने से और ऊपर से दूध पीने से शरीर में शक्ति विकसित होने से नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।

21. गेंदे के बीज : गेंदे के बीज 4 ग्राम और मिश्री 4 ग्राम को पीसकर कुछ दिनों तक खाने से वीर्य स्तंभन शक्ति का विकास होता है। इससे पुरुष कुछ देर तक मैथुन कर सकता है।

22. कैथ : कैथ के सूखे पत्तों का चूर्ण 6 ग्राम रोज खाकर ऊपर से मिश्री मिलाकर दूध पीने से धातु (वीर्य) बढ़ता है।

23. उड़द :

उड़द की दाल 40 ग्राम को पीसकर शहद और घी में मिलाकर खाने से पुरुष कुछ दिनों में ही मैथुन (संभोग) करने के लायक बन जाता है।
उड़द की दाल के थोड़े-से लड्डू बना लें। उसमें से 2-2 लड्डू खायें और ऊपर से दूध पी लें। इससे नपुसकता दूर होती है।

24. इमली : इमली के बीजों को भून लें, फिर उनके छिलके अलग करके, उनका चूर्ण बनाकर रोज 3 ग्राम चूर्ण मिश्री के साथ खाने से वीर्य शक्ति बढ़ने लगती है और नपुंसकता दूर हो जाती है।

25. तुलसी :

तुलसी की जड़ और जमीकन्द को पान में रखकर खाने से शीघ्रपतन की विकृति खत्म होती है।
धातु दुर्बलता में तुलसी के बीज 1 ग्राम दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
तुलसी के बीज या तुलसी की जड़ के चूर्ण में पुराना गुड़ समान मात्रा में मिलाकर 3-3 ग्राम की गोली बना लें। इसकी 1-1 गोली सुबह-शाम गाय के ताजे दूध के साथ लेते रहें। इससे नपुंसकता (नामर्दी) दूर होती है।
तुलसी की मंजरी या जड़ के 1 से 3 ग्राम बारीक चूर्ण में गुड़ मिलाकर ताजे दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है।

26. गंधक : गंधक और शहद को पीसकर लेप बना लें। इस लेप को शिश्न (लिंग) पर लेप करें। इससे वीर्य स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है।

27. काली मूसली :

काली मूसली का पाक बनाकर खाने से नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
काली मूसली 10 ग्राम की मात्रा में लेकर दूध के साथ खाने से लाभ होता है।
काली मूसली की जड़ का चूर्ण 3 से 6 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम मिश्री मिले हल्के गर्म दूध के साथ खाने से नपुंसकता में कुछ हद तक लाभ होता है।

28. काले तिल : काले तिल, सोंठ, पीपल, मिर्च, भारंगी और गुड़ समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनायें। इस काढ़े को 21 दिनों तक पीने से शरीर की गर्मी बढ़ती है।

29. जावित्री : जावित्री डेढ़ ग्राम, जायफल 10 ग्राम, बड़ी इलायची 10 ग्राम और अफीम आधा ग्राम को मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इसके 2 ग्राम चूर्ण को शहद में मिलाकर सर्दियों में लगभग एक महीने तक खाने से नपुंसकता मिट जाती है।

30. ग्वारपाठा : ग्वारपाठे का गूदा और गेहूं का आटा बराबर मात्रा में लेकर घी मिला लें फिर इसके दुगुने वजन के बराबर शक्कर (चीनी) लेकर हलुआ बनाकर खाने से 7 दिन में नपुंसकता दूर होती है।

31. गुलाबजल : 3 बोतल गुलाबजल में 10 ग्राम सोने का बुरादा डालकर कूटकर मिला लें जब सब गुलाबजल उसमें समा जायें, तब निकालकर रख लें। लगभग आधा ग्राम मलाई में मिलाकर खाने से सहवास करने से जल्दी ही वीर्य पतन नहीं होता है।

32. अगर का चोया : अगर का चोया, पान में मिलाकर खाने से नामर्दी में लाभ होता है।

33. घी : सहवास से 1 घण्टा पहले शिश्न पर लगभग 1 ग्राम के चौथे भाग घी की मालिश करने से नपुंसकता नहीं रहती है।

34. मालकांगनी : मालकांगनी के तेल की 10 बूंदे नागबेल के पान पर लगाकर खाने से नपुंसकता दूर हो जाती है।

नोट : औषधि खाने के साथ दूध और घी का प्रयोग ज्यादा करें।

मांलकांगनी के बीजों को खीर में मिलाकर खाने से नपुंसकता मिट जाती है।
मालकांगनी के दाने 50 ग्राम और 25 ग्राम शक्कर (शुगर) को आधा किलो गाय के दूध में डालकर आग पर चढ़ा दें। जब दूध का खोया बन जायें तब उतारकर मोटी-मोटी गोली बनाकर रख लें और रोज 1-1 गोली सुबह-शाम गाय के दूध के साथ खायें। इससे नपुंसकता दूर होती है।

35. बड़ी कटेरी : बड़ी कटेरी की 25 ग्राम ताजी जड़ की छाल को गाय के दूध में उबालकर पीने से नपुंसकता मिट जाती है।

नोट : खटाई और बादीयुक्त समान न खायें।

36. कलौंजी : कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर पीने से नामर्दी मिट जाती है।

37. जदवार : जदवार 2 ग्राम खाने से काम-शक्ति (संभोग) बढ़ती है।

38. जवासीद : जवासीद की गोंद को अकरकरा के साथ पीसकर तिल के तेल में मिलाकर लिंग पर लेप करने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर होती है।

39. धतूरा : धतूरे के बीज, अकरकरा और लौंग बराबर मात्रा में पीसकर चने के बराबर गोलियां बनाकर रोज सुबह-शाम 1-1 गोली का सेवन करें।

40. बहेड़े : बहेड़े का चूर्ण 6 ग्राम, 6 ग्राम गुड़ के साथ मिलाकर रोज खाने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर हो जाती है।

41. महुआ : महुए के 25 ग्राम फूलों को 250 मिलीलीटर दूध में उबालकर पीने से कमजोरी की नपुंसकता (नामर्दी) मिट जाती है।

42. सेमर : सेमर की छोटी जड़ों को छाया में सुखाकर पका दें। पकाने के बाद इसकी जड़ों को खाने से नपुसंकता (नामर्दी) दूर होती है।

43. सुहागा : सुहागा, कूट और मैनसिल को बराबर मिलाकर चूर्ण बनाकर चमेली के रस और तिल के तेल में पकाकर लिंग पर मलें। इससे लिंग का टेढ़ापन दूर होता है।

44. गोरखमुण्डी :

गोरखमुण्डी 75 ग्राम कूट छानकर इसमें 75 ग्राम खांड़ मिला लें 10 ग्राम दवा सोते समय कर्म गर्म खांड़ मिले दूध के साथ लें।
गोरखमुण्डी के फूलों के चूर्ण को नीम के रस के साथ लेने से नपुंसकता (नामर्दी) में लाभ होता है।

45. कुलिंजन : लगभग 2 ग्राम कुलिंजन के चूर्ण को 10 ग्राम शहद में मिलाकर खाने से और ऊपर से गाय के दूध में शहद को मिलाकर पीने से काम-शक्ति बढ़ती है।

46. असगन्ध : 10 ग्राम असगन्ध नागौरी के बारीक चूर्ण को गाय के 500 मिलीलीटर दूध में उबालें। जब 400 मिलीलीटर दूध रह जाये, तब उसमें शहद मिलाकर 40 दिन तक पियें इससे काम-शक्ति बढ़ती है।

47. दालचीनी : दालचीनी 75 ग्राम कूटकर छान लें 5 ग्राम को पानी में पीसकर सोते समय लिंग पर सुपारी (लिंग का अगला हिस्से) को छोड़कर लेप करें और 2-2 ग्राम को सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से नपुंसकता (नामर्दी) में आराम मिलता है।

48. सीम्बल : सीम्बल की जड़ 100 ग्राम कूट छानकर 5-5 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम प्रयोग करने से नपुंसकता (नामर्दी) में आराम मिलता है।

49. मल्ल सिंदूर : मल्ल सिंदूर एक ग्राम का चौथा भाग, शहद और अदरक के रस को सुबह-शाम लें। इससे हस्तमैथुन से हुई नामर्दी दूर हो जाती है।

50. हल्दी : हल्दी और कपूर 10-10 ग्राम पीस लें, फिर 5 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह-शाम दूध के साथ लेना चाहिए।

51. चनसूर : चनसूर 10 ग्राम को दूध में उबालकर मिश्री के साथ सुबह-शाम खायें। इससे संभोग की शक्ति बढ़ जाती है।

52. कुलिजंन : कुलिजंन को मुंह में रखकर चूसते रहने से भी कामशक्ति में वृद्धि होती है।

53. उशवा : जंगली उशवा के चूर्ण में 10 ग्राम का काढ़ा बनाकर रोज 1 मात्रा पीते रहने से नपुंसकता दूर होती है।

54. छोटी माई : छोटी माई की दाल का चूर्ण 5 ग्राम से 10 ग्राम का काढ़ा बनाकर तैयार कर रोज 2 बार सेवन करने से लाभ होता है।

55. पटुओक (सन) : पटुओक (सन) के बीज का तेल खाने कें काम में आता है। जिससे शरीर हष्ट पुष्ट होता है, कामोत्तेजना बढ़ती है। इस तेल की मालिश से चोट मोच का दर्द भी जल्दी ठीक होता है।

56. लहसुन :

नपुंसकता और कामशक्ति में कमजोरी आने पर 60 ग्राम लहसुन की कली को घी में तलकर रोजाना खाने से नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
लहसुन की एक पुतिया घी में भूनकर शहद मे साथ खाने से कामोत्तेजना बढ़ती है।
रोज लगभग 20 दिन तक 4-5 लहसुन की कलियां दूध के साथ खाने से नपुंसकता में लाभ होता है।

57. प्याज :

प्याज के रस में घी और शहद मिला कर खाने से नपुंसकता दूर होती है। प्याज का रस 10 से 20 मिलीलीटर रोज सुबह-शाम लें।
प्याज के हिस्से का चूर्ण 10 ग्राम से 20 ग्राम मिश्री मिले दूध के साथ सुबह-शाम प्रयोग करने से कामोत्तेजना की वृद्धि होती है।

58. जबाद कस्तूरी : जबादकस्तूरी शिश्न यानी लिंग पर लेप करने से संभोग करने में ज्यादा आनन्द मिलता है। मगर इससे गर्भधारण नहीं होता है।



59. अगर : अगर का पुराना सेंट 1 से 2 बूंद को पान में डालकर खाने से बाजीकरण होता है। और नपुंसकता दूर होती है।

60. छोटी इलायची : बाजीकरण के लियें छोटी इलायची का चूर्ण लगभग आधे से दो ग्राम तक सुबह-शाम खायें या मिश्री मिले गर्म-गर्म दूध के साथ रोज रात को सोने से पहले खायें।

61. केवटी मोथा : केवटी मोथा के बीज 10 ग्राम पीसकर, मिश्री मिले गर्म गाय के दूध के साथ रोज शाम को पीने से नपुंसकता दूर हो जाती है।

62. फरहद : सफेद फूल वाले फरहद की जड़ पीसकर 5 से 10 ग्राम को ठंडे दूध के साथ सुबह शाम पिलाने से कामोत्तेजना बढ़ती है।

63. सहजना (मुनगा) : सहजना के फूलों को दूध में उबाल कर रोज रात को मिश्री मिलाकर पीने से नपुंसकता की बीमारी दूर होकर लाभ होता है।

64. गुंजा (करजनी) : गुंजा (करजनी) की जड़ 2 ग्राम दूध में पकाकर भोजन से पहले रोज रात में खाने से पूरा लाभ होता है। वीर्य सम्बन्धी समस्त दोष दूर होते हैं।

65. केवांच (कपिकच्छू) : केवांच (कपिकच्छू) के बीजों के बीच का हिस्सा का चूर्ण 2 से 6 ग्राम रोज रात को सोते समय मिश्री मिले गर्म दूध के साथ पीने से लाभदायक होता है।

66. अतिबला : अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह शाम मिश्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नपुंसकता में पूरा लाभ होता है।

67. पटेरा : पटेरा (एरफा) के फूल 3 से 6 ग्राम को घोंटकर पीसकर सुबह-शाम मिश्री मिले दूध के साथ खाने से वीर्य बढ़ता है।

68. जमालगोटा : जमालगोटा के तेल को लिंग के ऊपर लगाने से लाभ मिलता है।

69. तालमखाना : नपुंसकता को दूर करने के लियें तालमखाना के बीज का चूर्ण, 2 से 4 ग्राम केवाचं के बीज के साथ मिश्री मिले ताजे निकाले दूध के साथ सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।

70. भंगरैया : भंगरैया के बीज मिश्री मिले गर्म दूध में डालकर दूध सेवन करने से नपुंसकता दूर होती है।

71. मधुरसा : मधुरसा की जड़ का रस 5 ग्राम से 10 ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ खाने से शरीर मजबूत बनाता है और कामोत्तेजना भी बढ़ती है।

72. विष्णुकान्ता : विष्णुकान्ता का रस 20 से 40 मिलीलीटर या काढ़ा 40 से 80 मिलीलीटर तक सुबह-शाम खाने से पूयमेह, शुक्र मेह, दौर्बल्यता (कमजोरी) आदि कष्ट दूर हो जाते है।

73. वनतुलसी : वनतुलसी के बीज 3 से 7 ग्राम लेकर मिश्री मिले गाय के दूध से लेने से लाभ होता है।

74. बड़ (बरगद) :

बड़ (बरगद) का दूध 20 से 30 बूंद रोज सवेरे बताशे या चीनी पर डालकर खाने से पुरुषत्व शक्ति बढ़ती है।
नपुंसकता दूर करने के लिए बताशे में दूध की 5-10 बूंदें सुबह-शाम रोज खाने से लाभ होता हैं।
बरगद के पेड़ की कोंपले और गूलर के पेड़ की छाल 3-3 ग्राम और मिश्री 6 ग्राम इन सबको पीसकर लुगदी सी बना लें और 3 बार मुंह में रखकर खालें और ऊपर से 250 मिलीलीटर दूध पी लें। 40 दिन तक खाने से वीर्य बढ़ता है और संभोग से खत्म शक्ति बढ़ती है।

75. सिरस :

सिरिस के फूलों का रस 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम मिश्री मिले दूध के साथ खाने से लाभ होगा और इससे शीघ्रपतन में भी लाभ होगा।
सिरिस के बीज का चूर्ण 1 से 2 ग्राम को मिश्री मिले दूध के साथ सुबह-शाम लेन से वीर्य गाढ़ा होता है।
सिरिस की छाल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम घी में शक्कर मिलाकर गर्म दूध के साथ 2 बार खायें अगर फूलों का रस, बीज का चूर्ण और छाल का चूर्ण एक साथ मिश्री मिले दूध के साथ खाया जायें तो शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है।
सिरस के थोड़े से बीज सुखाकर पीस लें। इसमें 3 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम दूध के साथ खाने से लाभ होता है।

76. मुनक्का : नपुंसक व्यक्ति को मुनक्का खाने से वीर्य की वृद्धि होती है।

77. ज्वार : ज्वार को अपने खाने के रूप में लेने से नपुंसकता दूर होती है।

78. कलम्बी : कलम्बी का साग रोज खाने से वीर्य बढ़ता है।

79. चौपतिया साग : चौपतिया साग नपुंसकों के लियें फायदेमन्द है। क्योंकि इसमें वीर्य को बढ़ाने का गुण होता है।

80. भूईछत्ता : भूईछत्ता को शक्कर (शुगर) मिले दूध में बराबर रूप से उबाल कर खाने से कामशक्ति और शारीरिक शक्ति दोनों बढ़ती है।

81. रोहू मछली : रोहू मछली वीर्यवर्द्धक होता है। इसलियें नपुंसकों के लियें अनुकूल खाद्य है। हिलसा मछली भी रोहू की तरह वीर्य वर्धक होती है।

82. अंबर : नपुंसकता में अंबर आधा से एक ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले दूध के साथ खाने से लाभ होता है।

83. उटंगन : उटंगन के बीज, जो चपटे और रोमाच्छादित होते हैं, पानी में भिगोनें पर काफी लुआबदार हो जाते हैं, इनको शतावरी, कौचबीच चूर्ण आदि के साथ सुबह शाम मिश्री मिले गर्म-गर्म दूध के साथ सेवन करने से काफी लाभ होता है।

84. बहमन सफेद- बहमन सफेद या बहमन सुर्ख की जड़ का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह और शाम मिसरी को मिलाकर गर्म-गर्म दूध के खाने से कामोद्दीपन होता है।

85. ब्रहमदण्डी : ब्रहमदण्डी का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह शाम शहद के साथ सुबह-शाम खाने से पुरुषत्व शक्ति बढ़ती है।

86. सालव मिश्री : सालव मिश्री का कनद चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम खाने से नपुंसकता दूर होती है।

87. हरमल : हरमल के बीज का चूर्ण 2 से 4 ग्राम मिश्री को मिलाकर गर्म-गर्म दूध के साथ सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।

88. आम :

आम की मंजरी 5 ग्राम की मात्रा में सुखाकर दूध के साथ लेने से काम-शक्ति बढ़ती है।
2-3 महीने आम का रस पीने से ताकत आती है। शरीर की कमजोरी दूर होती है। और शरीर मोटा होता है। इससे वात संस्थान (नर्वस सिस्टम) भी ठीक हो जाता है।

89. अनार : रोज मीठे अनार के 100 ग्राम दानों को दोपहर के समय खाने से संभोग शक्ति बढ़ाती है।

90. पिप्पली : पिप्पली, उड़द, लाल-चावल, जौ, गेहूं। सब को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर आटा पीसकर फिर इसको देशी घी में पूरिया बनाकर रोज 3 पूरिया 40 दिन तक खायें। ऊपर से दूध पी लें। इससे नपुंसकता दूर हो जाती है।

91. आंवला : आंवलों का रस निकाल कर एक चम्मच आंवले के चूर्ण में मिलाकर लें। उसमें थोड़ी-सी शक्कर (चीनी) और शहद मिलाकर घी के साथ सुबह-शाम खायें।

92. अरण्ड : अरण्ड के बीज 5 ग्राम, पुराना गुड़ 10 ग्राम, तिल 5 ग्राम, बिनौले की गिरी 5 ग्राम, कूट 2 ग्राम, जायफल 2 ग्राम, जावित्री 2 ग्राम तथा अकरकरा 2 ग्राम। इन सबको कूट-पीसकर एक साफ कपड़े में रखकर पोटली बना लें और इस पोटली को बकरी के दूध में उबालें। दूध जब अच्छी तरह पक जायें, तो इसे ठंड़ा करके 5 दिन तक पियें तथा पोटली से शिश्नि की सिंकाई करें।

93. मुलेठी : मुलेठी, विदारीकन्द, तज, लौग, गोखरू, गिलोय और मूसली। सब चीजे 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण रोज 40 दिन तक सेवन करें।

94. नागौरी असगंध : नागौरी असगंध और विधारा। दोनों 250-250 ग्राम की मात्रा में लेकर इसे पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 2 चम्मच चूर्ण देसी घी या शहद के साथ लें।

95. सालम मिसरी : सालम मिसरी, तोदरी सफेद, कौंच के बीजों की मींगी, ताल मखाना, सखाली के बीज, सफेद व काली मूसली, शतावर तथा बहमन लाल। इन सबका 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीस लें और चूर्ण बना लें 2 चम्मच रोज दूध से 40 दिन तक बराबर खाने से पूरा लाभ होता है।

96. नारियल : नारियल कामोत्तेजक है। वीर्य को गाढ़ा करता है।

97. चिलगोजे : 15 चिलगोजे रोज खाने से नपुंसकता दूर होती है।

98. शहद : शहद और दूध को मिलाकर पीने से धातु (वीर्य) की कमी दूर होती है। शरीर बलवान होता है।

99. गेहूं : अंकुरित गेहूंओं को बिना पकायें ही खायें। स्वाद के लियें गुड़ या किशमिश मिलाकर खा सकते है। इन अंकुरित गेहूंओं में विटामिन ´ई` मिलता है। यह नपुंसकता और बांझपन में लाभकारी है।

100. पिस्ता : पिस्ता में विटामिन `ई´ बहुत होता है। विटामिन `ई´ से वीर्य बढ़ता है।

101. सफेद कनेर : सफेद कनेर की जड़ की छाल बारीक पीसकर भटकटैया के रस में खरल करके 21 दिन इन्द्री की सुपारी छोड़कर लेप करने से तेजी आ जाती है।

102. आक : किसी कपड़े को आक के दूध में चौबीस घंटे तक भिगोकर रखा रहने दें, उसके बाद निकालकर सुखा लें। फिर उस पर घी लपेट कर 2 बत्तियां बना लें और उसको लोहे की सलाई पर रखे नीचे एक कांसे की थाली रख दे और बत्तियां जला दें जो तेल नीचे थाली पर गिरेगा उसे लिंग पर सुपारी छोड़ कर पूरे पर मलते रह आधा घंटे तक उसके बाद एरण्ड का पत्ता लपेट कर ऊपर से कच्चा धागा बांध दें इससे हस्तमैथुन का दोष दूर हो जाता है।

103. लौंग : लौंग 8 ग्राम, जायफल 12 ग्राम, अफीम शुद्ध 16 ग्राम, कस्तूरी लगभग आधा ग्राम इनको कूट-पीसकर शहद में मिलाकर आधे-आधे ग्राम की गोलियां बनाकर रख लें। 1 गोली बंगला पान में रखकर खाने से स्तम्भन होता है। अगर स्तम्भन ज्यादा हो जाये तो खटाई खाले स्खलन हो जायेगा।

104. चमेली : चमेली के पत्तों का रस तिल के तेल की बराबर की मात्रा में मिलाकर आग पर पकाएं। जब पानी उड़ जाए और केवल तेल शेष रह जाए तो इस तेल की मालिश शिश्न पर सुबह-शाम प्रतिदिन करना चाहिए। इससे नपुंसकता और शीघ्रपतन नष्ट हो जाता है।

105. ढाक : ढाक की जड़ का काढ़ा आधा कप की मात्रा दिन में 2 बार पीने से, बीज का तेल शिश्न पर मुण्ड छोड़कर मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में लाभ मिलता है।

106. हींग : हींग को शहद के साथ पीसकर शिश्न या लिंग पर लेप करने से वीर्य ज्यादा देर तक रुकता है और संभोग करने में आंनद मिलता है।

107. मालकांगनी : मालकांगनी के तेल को पान के पत्ते पर लगा कर रात में शिशन (लिंग) पर लपेटकर सो जाऐं और 2 ग्राम बीजों को दूध की खीर के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता हैं।

108. आक :

छुआरों के अन्दर की गुठली निकाल कर उनमें आक का दूध भर दे, फिर इनके ऊपर आटा लपेट कर पकायें, ऊपर का आटा जल जाने पर छुआरों को पीसकर मटर जैसी गोलियां बना लें, रात्रि के समय 1-2 गोली खाकर तथा दूध पीने से स्तम्भन होता है।
आक की छाया में सूखी जड़ के 20 ग्राम चूर्ण को 500 मिलीलीटर दूध में उबालकर दही जमाकर घी तैयार करें, इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है।
आक का दूध असली मधु और गाय का घी, समभाग 4-5 घंटे खरल कर शीशी में भरकर रख लें, इन्द्री की सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे-धीरे मालिश करें और ऊपर से खाने का पान और एरण्ड का पत्ता बांध दें, इस प्रकार सात दिन मालिश करें। फिर 15 दिन छोड़कर पुन: मालिश करने से शिश्न के समस्त रोंगों में लाभ होता है।

109. मुलहठी : मुलहठी का पीसा हुआ चूर्ण 10 ग्राम, घी और शहद में मिलाकर चाटने से और ऊपर से मिश्री मिले गर्म-गर्म दूध पीने से नपुंसकता में लाभ होता है।

110. जटामांसी - जटामांसी, सोठ, जायफल और लौंग। सबको समान मात्रा में लेकर पीस लें 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार खायें।

111. काकड़ासिंगी : आधा चम्मच काकड़ासिंगी कोष का बारीक चूर्ण एक कप दूध के साथ सुबह-शाम सेवन कराते रहने से कुछ हफ्ते में नपुंसकता में पूरा लाभ मिलेगा।

112. कलौजी : कलौंजी के तेल को शिश्न व कमर पर नियमित रूप से सुबह-शाम कुछ हफ्तों तक मालिश करते रहने से यह रोग दूर हो जायेगा।

113. कनेर - सफेद कनेर की 10 ग्राम जड़ को पीसकर 20 ग्राम वनस्पति घी में पकायें। फिर ठंड़ा करके जमने पर इसे शिश्न पर सुबह-शाम लगाने से नपुंसकता में आराम मिलता है।

114. पान-

रोगी के लिंग पर पान के पते बांधने से और पान के पतें पर मालकांगनी का तेल 10 बूंद लगाकर दिन में 2 से 3 बार कुछ दिन खाने से नपुंसकता दूर होती है। इस प्रयोग के दौरान दूध, घी का अधिक मात्रा में सेवन जारी रखें।
ध्वज भंग रोग में पान को चबाने से और रोगी के लिंग पर बांधने से लाभ होता है।

115. कपूर - घी में कपूर को घिसकर शिशन (पेनिस) के ऊपर मालिश करें। प्रयोग रोज कुछ हफ्ते तक करें।

116. अजवाइन : तीन ग्राम अजवायन को सफेद प्याज के रस 10 मिलीलीटर में तीन बार 10-10 ग्राम शक्कर मिलाकर सेवन करें। 21 दिन में पूर्ण लाभ होता है। इस प्रयोग से नपुंसकता, शीघ्रपतन व शुक्राणु अल्पता के रोग में भी लाभ होता है।

117. अकरकरा :

अकरकरा का बारीक चूर्ण शहद में मिलाकर शिश्न पर लेप करके रोजाना पान के पत्ते से लपेट रखने से शैथिल्यता दूर होकर वीर्य बढेगा।
अकरकरा 2 ग्राम, जंगली प्याज 10 ग्राम इन दोनों को पीसकर लिंग पर मलने से इन्द्री कठोर हो जाती है। 11 या 21 दिन तक यह प्रयोग करना चाहिए।

118. सरसों का तेल- नपुंसकता दूर करने के लिए कटुपर्णी की एक ग्राम छाल तथा बरगद का दूध दोनों को गर्म कर चने के बराबर गोलियां बनाकर चौदह दिन तक पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से नपुंसकता दूर होती है।

119. कुचला –

शोधित कुचला लगभग एक चौथाई से आधे ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले गर्म-गर्म दूध के साथ पीने से हस्तमैथुन या ज्यादा मैथुन से हुई नामर्दी दूर हो जाती है।

120 कुलंजन -एक कप दूध मे एक चम्मच कुलंजन के चूर्ण को मिलाकर सुबह शाम पिया जायें तो नपुंसकता दूर होती है।

121. तिल :

तिल और गोखरू दूध में उबालकर पीने से धातु स्राव बन्द हो जाता है और नामर्दी दूर हो जाती है।
तिल और अलसी का 100 मिलीलीटर काढ़ा सुबह और शाम भोजन से पहले पिलाने से मर्दाना ताकत बढ़ती है।
तिल का चूर्ण 10 ग्राम से 20 ग्राम रोजाना 2 बार खाने से पुरुषत्व (सहवास) शक्ति की बढ़ती है।

122. अश्वगंधा :

अश्वगंधा का कपड़े से छना चूर्ण और खांड़ को बराबर मात्रा मे मिलाकर रखें, इसको एक चम्मच गाय के ताजे दूध के साथ सुबह भोजन से 3 घण्टे पहले चुटकी-चुटकी चूर्ण खायें और ऊपर से दूध पीते रहे। रात के समय इसके बारीक चूर्ण को चमेली के तेल में अच्छी तरह घोंटकर लगाने से इन्द्रिय की शिथिलता दूर होकर कठोर और दृढ़ हो जाती है।
अश्वगंधा, दालचीनी और कडुवा कूठ समभाग कूटकर छान लें और गाय के मक्खन में मिलाकर 5-10 ग्राम की मात्रा सुबह-शाम सुपारी छोड़ शेष लिंग पर मलें, इसको मलने के पहले और बाद में लिंग को गरम पानी से धो लें।
असगंध के चूर्ण में शहद, घी और मिसरी को मिलाकर सुबह के समय खाने से कुछ महीनो में ही नपुंसकता (नामर्दी) खत्म हो जाती है।

लौंग or Cloves

परिचय : लौंग का अधिक मात्रा में उत्पादन जंजीबार और मलाक्का द्वीप में होता है। लौंग के पेड़ बहुत बड़े होते हैं। इसके पेड़ को लगाने के आठ या नौ वर्ष के बाद ही फल देते है। इसका रंग काला होता है। यह एक खुशबूदार मसाला है। जिसे भोजन में स्वाद के लिए डाला जाता है। लौंग दो प्रकार की होती है। एक तेज सुगन्ध वाली दूसरी नीले रंग की जिसका तेल मशीनों के द्वारा निकाला जाता है जो लौंग सुगन्ध में तेज, स्वाद में तीखी हो और दबाने में तेल का आभास हो उसी लौंग का अच्छा मानना चाहिए। लौंग का तेल पानी की तुलना में भारी होता है। इसका रंग लाल होता है। सिगरेट की तम्बाकू को सुगन्धित बनाने के लिए लौंग के तेल का उपयोग होता है। लौंग के तेल को औषधि के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है। इसके तेल को त्वचा पर लगाने से त्वचा के कीड़े नष्ट होते हैं।
हानिकारक : ज्यादा लौंग खाने से गुर्दे और आंतों को नुकसान पहुंच सकता है। दोषों को दूर करने वाला : बबूल का गोंद, लौंग में व्याप्त दोषों को दूर करता है। मात्रा : 1 ग्राम से 3 ग्राम तक। गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार लौंग तीखा, लघु, आंखों के लिए लाभकारी, शीतल, पाचनशक्तिवर्द्धक, पाचक और रुचिकारक होता है। यह प्यास, हिचकी, खांसी, रक्तविकार, टी.बी आदि रोगों को दूर करती है। लौंग का उपयोग मुंह से लार का अधिक आना, दर्द और विभिन्न रोगों में किया जाता है। यह दांतों के दर्द में भी लाभकारी है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार : लौंग खुश्क, उत्तेजक और गर्म है। इसको खाने से सिर दर्द होता है। यह पाचनशक्ति को बढ़ाता है। दांतों और मसूढ़ों को मजबूत बनाता है। इसको पीसकर मालिश करने से जहर दूर होता है। वैज्ञानिक मतानुसार : लौंग गर्म होता है। यह पेट के दर्द को मिटाने वाला माना जाता है। गर्भवती स्त्रियों को उल्टी होने पर लौंग को गर्म पानी में भिगोकर उसका पानी पिलाने से लाभ होता है। इसके तेल की मालिश का असर सामान्य कपूर के तेल के समान होता है। इसका आसव बनाकर उसमें से सुगन्धित पदार्थ तैयार किये जाते हैं। कोको, चाकलेट, आइसक्रीम आदि खाद्य-पदार्थों में पाया जाने वाला बनावटी वेनीला एसेन्स लौंग से ही तैयार किया जाता है। लौंग की पहचान : व्यापारी लौंग में तेल निकाला हुआ लौंग मिला देते है। अगर लौंग में झुर्रिया पड़ी हो तो समझे कि यह तेल निकाली हुई लौंग है।



विभिन्न रोगों में सहायक
1. बेहोशी: लौंग घिसकर अंजन करने से बेहोशी दूर होती है। लौंग को घी या दूध में पीसकर आंखों में लगाने से हिस्टीरिया की बेहोशी दूर हो जाती है। 2. जुकाम: लौंग का काढ़ा पीने से जुकाम ठीक हो जाता है। 2 बूंद लौंग के तेल की लेकर 25-30 ग्राम शक्कर में मिलाकर सेवन करने से जुकाम समाप्त हो जाता है। लौंग के तेल को रूमाल पर डालकर सूंघने से जुकाम मिटता है। 100 मिलीलीटर पानी में 3 लौंग डालकर उबाल लें। उबलने पर जब पानी आधा बाकी रह जाये तो इसके अन्दर थोड़ा सा नमक मिलाकर पीने से जुकाम दूर हो जाता है। पान में 2 लौंग डालकर खाने से जुकाम ठीक हो जाता है। 3. रतौंधी: 1 लौंग को बकरी के दूध के साथ पीसकर सुरमे की तरह आंखों में लगाने से धीरे-धीरे लगाने से रतौंधी रोग समाप्त हो जाता है। 4. बुखार: 1 लौंग पीसकर गर्म पानी से फंकी लें। इस तरह रोज 3 बार यह प्रयोग करने से सामान्य बुखार दूर होता है। 5. आंख पर दाने का निकलना: आंखों में दाने निकल जाने पर लौंग को घिसकर लगाने से वह बैठ जाती है। 6. दांतों के रोग: दांत में कीड़े लगने पर लौंग को दांत के खोखले स्थान में रखने से या लौंग का तेल लगाने से लाभ मिलता है। रूई को लौंग के तेल में भिगोकर दर्द वाले दांत के नीचे रखें तथा लार को नीचे गिरने दें। लौंग को आग पर भूनकर दांतों के गड्ढे में रखने से दांतों का दर्द खत्म होता है। लौंग के तेल में कपूर का चूर्ण मिलाकर दर्द वाले दांतों पर लगाने से दर्द में आराम रहता है। 5 लौंग पीसकर उसमें नींबू का रस निचोड़कर दांतों पर मलने से दांतों के दर्द में लाभ होता है अथवा 5 लौंग 1 गिलास पानी में उबालकर इससे रोजाना 3 बार कुल्ला करने से लाभ होता है। 7. प्रमेह: लौंग, जायफल और पीपल को 5 ग्राम लेकर 20 ग्राम कालीमिर्च और 160 ग्राम सोंठ मिलाकर पाउडर बना लें। बाद में पाउडर में उसी के बराबर शक्कर डालकर खायें। इससे खांसी, बुखार, भूख का न लगना, प्रमेह, सांस रोग और ज्यादा दस्त का आना खत्म होता है। 8. सूखी या गीली खांसी: सुबह-शाम दो-तीन लौंग मुंह में रखकर रस चूसते रहना चाहिए। लौंग या विभीतक फल मज्जा को घी में तलकर रख लेना चाहिए। इसे खांसी आने पर चूसना चाहिए इससे सूखी खांसी में लाभ होता है। लौंग और अनार के छिलके को बराबर पीस लें, फिर इसे चौथाई चम्मच भर लेकर आधे चम्मच शहद के साथ दिन में 3 बार चाटें। इससे खांसी ठीक हो जाती है। 9. भूख न लगना: आधा ग्राम लौंग का चूर्ण 1 ग्राम शहद के साथ रोज सुबह चाटना चाहिए। थोडे़ ही दिनों में भूख अच्छी तरह लगने लगती है।

10. गर्भवती स्त्री की उल्टी: गर्भवती स्त्रियों की उल्टी पर 1 ग्राम लौंग का पाउडर अनार के रस के साथ देना चाहिए। गर्भवती की मिचली में लौंग का चूर्ण शहद के साथ बार-बार चाटने से जी मिचलाना, उल्टी आदि सभी कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। इसे प्रतिदिन 120 ग्राम से 240 ग्राम की मात्रा में दो बार चाटना चाहिए। लौंग एक ग्राम पीसकर शहद में मिलाकर दिन में 3 बार चटाने से गर्भवती की उल्टी बंद हो जाती है। 11. बुखार में खूब प्यास लगना: थोड़े से पानी में चार लौंग डालकर पानी को उबालें, जब आधा शेष बचे तो इसे बार-बार पीने से बुखार दूर होता है। 12. पेट दर्द और सफेद दस्त: लौंग के पाउडर को शहद के साथ चाटने से लाभ मिलता है। 13. जीभ कटने पर: पान खाने से अगर जीभ कट गई हो तो एक लौंग को मुंह में रखने से जीभ ठीक हो जाती है। 14. सिर दर्द: लौंग को पीसकर लेप करने से सिरदर्द तुरन्त बंद हो जाता है। इसका तेल भी लगाया जाता है या 5 लौंग पीसकर 1 कप पानी में मिलाकर गर्म करें जब आधा बच जाये तो उसे छानकर चीनी मिलाकर पिलायें। इसका सेवन शाम को और सोते समय 2 बार करते रहने से सिरदर्द ठीक हो जाता है। 6 ग्राम लौंग को पानी में पीसकर गर्मकर गाढ़ा लेप कनपटियों पर लेप करने से सिर का दर्द दूर होता है। लौंग के तेल को सिर और माथे पर लगायें या नाक के दोनों ओर के नथुनों में डालें। इससे सिर का दर्द दूर हो जाता है। 2 से 3 लौंग के साथ लगभग 480 मिलीग्राम अफीम को जल में पीसकर गर्म करके सिर पर लेप करने से हवा और सर्दी के कारण होने वाला सिर का दर्द दूर हो जाता है। 1 या 2 ग्राम लौंग और दालचीनी को मैनफल के गूदे के साथ देने से सिर का दर्द दूर हो जाता है। इसको अधिक मात्रा में सिर दर्द के रोगी को नहीं देना चाहिए क्योंकि अधिक मात्रा में लेने से रोगी को उल्टी हो सकती है। लगभग 5 लौंग लेकर उसको एक कप पानी में पीसकर गर्म करें और आधा कप पानी रहने पर छानकर चीनी मिला दें। इसे सुबह और शाम को दो-चार बार पिलाने से सिर का दर्द खत्म हो जाता है। 15. पेट की गैस: 2 लौंग पीसकर उबलते हुए आधा कप पानी में डालें। फिर कुछ ठंडा होने पर पी लें। इस प्रकार यह प्रयोग रोजाना 3 बार करने से पेट की गैस में फायदा मिलेगा। आधे कप पानी में 2 लौंग डालकर पानी में उबाल लें। फिर ठंडा करके पीने से लाभ होगा। 16. अम्लपित्त: अम्लपित्त से पाचनशक्ति खराब रहती है। बूढ़े होने से पहले दांत भी गिरने लगते हैं। आंखे दुखने लगती हैं और बार-बार जुकाम लगा रहता है। इस प्रकार अम्लपित्त से अनेक रोग पैदा होते हैं। अम्लपित्त के रोगी को चाय काफी नुकसानदायक होती है। इस अवस्था में खाना खाने के बाद 1-1 लौंग सुबह-शाम खाने से या शर्बत में लेने से अम्लपित्त से पैदा होने वाले सारे रोगों में फायदा होता है और अम्लपित्त ठीक हो जाता है अथवा 15 ग्राम हरे आंवलों का रस 5 पिसी हुई लौंग, 1-1 चम्मच शहद और चीनी मिलाकर रोगी को सेवन करायें। ऐसे रोज सुबह, दोपहर और शाम को 3 बार खाने से कुछ ही दिनों में फायदा होता है। सुबह और शाम भोजन के बाद 1-1 लौंग खाने से आराम आता है। लौंग को खाना खाने के बाद गोली के रूप में चूसने से पेट की अम्लपित्त की शिकायत समाप्त होती है। 17. नासूर: लौंग और हल्दी पीसकर लगाने से नासूर के रोगी का रोग दूर हो जाता है। 18. हैजा: लौंग का पानी बनाकर रोगी को देने से प्यास और उल्टी कम होती है और पेशाब भी खुलकर आता है। लौग के तेल की 2-3 बूंदे चीनी या बताशे में देने से हैजा की उल्टी और दस्तों में लाभ होता है। इसके तेल के सेवन करने से पेट की पीड़ा, अफरा, वायु और उल्टी दूर होती है। 19. पित्तज्वर: 4 लौंग पीसकर पानी में घोलकर रोगी को पिलाने से तेज ज्वर कम होता है।

20. आन्त्रज्वर (टायफाइड): इसमें लौंग का पानी पिलाना फायदेमंद है। 5 लौंग 2 किलो पानी में उबालकर आधा पानी शेष रहने पर छान लें। इस पानी को रोगी को रोज बार-बार पिलायें। सिर्फ पानी भी उबालकर ठंडा करके पिलाना फायदेमंद है। 22. सर्दी लगना: लौंग का काढ़ा बनाकर खाने से या लौंग के तेल की 2 बूंद चीनी में डालकर खाने से सर्दी खत्म होती है। 23. मुंह की बदबू: लौंग को मुंह में रखने से मुंह और सांस की बदबू दूर होती है। 24. दिल की जलन: 2-4 पीस लौंग को ठंडे पानी में पीसकर मिश्री मिलाकर पीने से दिल की जलन शांत होती है। 25. जी मिचलाना: 2 लौंग पीसकर आधा कप पानी में मिलाकर गर्म करके पिलाने से जी मिचलाना ठीक हो जाता है। लौंग चबाने से भी जी मिचलाना ठीक हो जाता है। 26. दांतों का दर्द: 5 ग्राम नींबू के रस में 3 लौंग को पीसकर मिला लें। इसे दांतों पर मलें और खोखल में लगायें। इससे दांतों का दर्द नष्ट होता है। लौंग के तेल में रूई भिगोकर दांतों में लगाने तथा खोखल में रखने से दांतों का दर्द ठीक होता है। 27. दमा या श्वास रोग: दो लौंग को 150 मिलीलीटर पानी में उबालें और इस पानी को थोड़ी सी मात्रा में पीने से अस्थमा और श्वास का रुकना खत्म हो जाता है। मुंह में लगातार लौंग रखकर चूसना चाहिए। इससे दमा का रोग दूर हो जाता है। लौंग तथा कालीमिर्च का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर त्रिफला तथा बबूल के रस के काढ़े में घोलकर दो चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से श्वास रोग नष्ट हो जाता है। लौंग, त्रिगुणा, नागरमोथा काकड़ासिंगी, बहेड़ा और रीगणी को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर रख लें, इसे ग्वारपाठे के रस में मिलाकर चने के बराबर आकार की गोली बना लें। इसकी एक गोली सुबह और एक गोली शाम को लेने से दमा में लाभ मिलता है। लौंग मुंह में रखने से कफ आराम से निकलता है तथा कफ की दुर्गंध दूर हो जाती है। मुंह और श्वास की दुर्गंध भी इससे मिट जाती है। 28. फेफड़ों की सूजन: लौंग का चूर्ण बनाकर 1 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद व घी को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खांसी और श्वांस सम्बंधी पीड़ा दूर हो जाती है। 29. अंजनहारी, गुहेरी: लौंग को पानी के साथ घिसकर गुहेरी पर लगाने से गुहेरी समाप्त हो जाती है। बस शुरूआत में थोड़ी जलन महसूस होती है।

30. दांत मजबूत करना: दांतों में कमजोरी के कारण दांत हिलने तथा टूटने लगते हैं। इस तरह की परेशानी में कालीमिर्च 50 ग्राम और लौंग 10 ग्राम को पीसकर मंजन बनाकर रोजाना मंजन करें। इससे दांत मजबूत होते हैं। 31. पायरिया: लौंग के तेल में खस और इलायची को मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम दांतों पर मलने से पायरिया ठीक होकर मुंह की दुर्गन्ध दूर होती है। 5 से 6 बूंद लौंग का तेल 1 गिलास गर्म पानी में मिलाकर गरारे व कुल्ले करने से पायरिया रोग नष्ट होता है। 32. दांत के कीड़े: कीड़े लगे दांतों के खोखल में लौंग के तेल को रूई में भिगोकर रखें। इससे दांत के कीड़े नष्ट होते हैं और दर्द कम होता है। 33. काली खांसी: तवे को आग पर रखकर लौंग को भून लें, फिर उस लौंग को पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से काली खांसी ठीक हो जाती है। थोड़ी सी लौंग तवे पर भूनकर कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रखें। इस लौंग के चूर्ण को शहद में मिलाकर चाटने से काली खांसी दूर हो जाती है। बच्चों की काली खांसी में 30 से 60 मिलीग्राम गोलोचन को सुबह-शाम शहद के साथ चटाने से लाभ मिलता है। सावधानी यह रहे कि गोलोचन शुद्ध होना चाहिए क्योंकि मार्केट में यह बहुत अधिक मात्रा में नकली पाये जाते हैं। 34. खांसी: 2 लौंग गर्म मसाने वाली को तवे पर भूनकर (गर्म तवे पर लौंग 1 मिनट में ही फूलकर मोटी हो जाएगी तभी उतार लेते हैं।) तथा पीसकर 1 चम्मच दूध में मिलाकर गुनगुना सा ही बच्चों को सोते समय पिला देने से खांसी से छुटकारा मिल जाता है। 10 ग्राम लौंग, 10 ग्राम जायफल, 10 ग्राम पीपल, 20 ग्राम मिर्च, 160 ग्राम सोंठ और 210 ग्राम बूरे का चूर्ण बनाकर गोली बना लें। इन गोलियों के सेवन से खांसी, बुखार, अरुचि, प्रमेह, गुल्म, श्वास, मंदाग्नि तथा ग्रहणी के रोग में तुरन्त लाभ मिलता है। लौंग, कालीमिर्च, बहेड़े की छाल और कत्था को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीस लें। इसके बाद उसे बबूल की छाल के काढ़े में डालकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इन गोलियों को मुंह में रखकर चूसने से खांसी, श्वास, बुखार तथा नजला-जुकाम का रोग भी दूर हो जाता है। 1 भाग लौंग और 2 भाग अनार के छिलके को मिलाकर पीसकर इनका चौथाई चम्मच आधे चम्मच शहद में मिलाकर रोजाना 3 बार चाटने से खांसी के रोग में लाभ मिलता है। 10-10 ग्राम लौंग, इलायची, खस, चंदन, तज, सोंठ, पीपल की जड़, जायफल, तगर, कंकोल, स्याह जीरा, शुद्ध गुग्गुल, पीपल, वंशलोचन, जटामांसी, कमलगट्टा, नागकेशर, नेत्रवाला सभी को लेकर चूर्ण बना लें। इसके बाद इसमें उड़ाया हुआ कपूर 6 ग्राम की मात्रा में मिला दें। इस मिश्रण को शहद से अथवा मिश्री से दोनों समय सेवन करने से हिचकी अरुचि, खांसी तथा अतिसार का रोग मिट जाता है। खांसी में हल्का भुना हुआ लौंग चूसने से लाभ मिलता है। 10-10 ग्राम लौंग, पीपल, जायफल, कालीमिर्च, सोंठ तथा धनिया को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में थोड़ी सी मिश्री मिलाकर शीशी में भर लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण सुबह, दोपहर और शाम को शहद के साथ सेवन करने से खांसी ठीक हो जाती है। 35. अफारा (पेट का फूलना): 3 ग्राम लौंग को 200 मिलीलीटर पानी में उबाल लें। फिर छानकर इस पानी को पीने से आध्यमान (अफारा, गैस) समाप्त होता है। 120 मिलीग्राम से 240 मिलीग्राम तक लौंग की फांट या चूर्ण को रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से अफारा में लाभ होता है। मिश्री में 1 से 3 बूंद लौंग के तेल या गोंद को मिलाकर सेवन करने से अफारा मिटता है। 36. जीभ और त्वचा की सुन्नता: पान खाने से या किसी अन्य कारण से जीभ फट गई हो तो एक लौंग मुंह में रखें। इससे रोग में आराम रहता है। 37. कब्ज: लौंग 10 ग्राम, कालीमिर्च 10 ग्राम, अजवायन 10 ग्राम, लाहौरी नमक 50 ग्राम और मिश्री 50 ग्राम को पीसकर छानकर नींबू के रस में डाल दें। सूखने पर 5-5 ग्राम गर्म पानी से खाना खाने के बाद खुराक के रूप में लाभ होता है। 38. वमन (उल्टी): 4 लौंग को पीसकर 1 कप पानी में डालकर उबालने के लिए रख दें। जब उबलता हुआ पानी आधा रह जाये तो उसे छानकर स्वाद के मुताबिक उसमें चीनी मिलाकर पी लें और सो जायें। पूरे दिन में इस तरह चार बार इस पानी को पीने से उल्टियां आना बंद हो जाती हैं। अगर उल्टियां बंद नहीं हो रही हो तो 2 लौंग और थोड़ी सी दालचीनी लेकर 1 कप पानी में डालकर उबाल लें। जब पानी आधा बाकी रह जाये तो पानी को छानकर रोगी को जब भी उल्टी आये पिलाते रहें। इससे थोड़े समय में ही उल्टियां आना बंद हो जायेंगी। यदि गर्भावस्था में उल्टी आती हो तो 2 लौंग को पीसकर शहद के साथ गर्भवती स्त्री को चटाने से उल्टी आना बंद हो जाती है। 2 लौंग को आग पर गर्म करके जब भी उल्टी हो चूसें। इससे उल्टी बंद हो जाती है। 2 लौंग को पानी में डालकर उबाल लें। फिर उस पानी को ठंडा होने पर इसमें मिश्री डालकर रोगी को पिलाकर सुला दें। इससे कुछ समय में ही उल्टी का रोग समाप्त हो जाता है। अगर जी मिचलाता (उबकाई) हो तो लौंग को मुंह में रखकर चूसते रहने से लाभ होता है। लौंग और दालचीनी का काढ़ा बनाकर पीने से उल्टी होना बंद हो जाती है। लगभग 25 ग्राम खील, 5 दाने लौंग, 5 छोटी इलायची और 25 ग्राम मिश्री को आधे लीटर पानी में डालकर उबालने के लिए आग पर रख दें। जब 10-12 बार पानी में उबाल आ जाये तो पानी को आग पर से उतारकर छान लें इस पानी को थोड़ा-थोड़ा पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है। शहद में लौंग और अजमोद का चूर्ण मिलाकर खाने से उल्टी होना बंद हो जाती है। 39. गर्भनिरोध: नियमित रूप से सुबह के समय 1 लौंग का सेवन करने वाली को स्त्री के गर्भधारण करने की संभावना समाप्त हो जाती है।

40. मुंह के छाले: लौंग अथवा लौंग और इलायची को मिलाकर चबाने से मुंह के छाले ठीक होते हैं। 41. मुंह का बिगड़ा स्वाद: मुंह का स्वाद खराब होने पर लौंग को मुंह में रखकर चबाते रहने से स्वाद ठीक हो जाता है। 42. दस्त: 7 लौंग, हींग, चना और सेंधानमक को पीसकर रख लें। इसे 2 ग्राम लेकर गर्मी के दिनों में ठंडे पानी से और सर्दी के दिनों में गर्म पानी के साथ पीने से लाभ होता है। 43. मुंह की दुर्गन्ध: लौंग को हल्का भूनकर चबाते रहने से मुंह की दुर्गन्ध दूर होती है। 44. नपुंसकता: लौंग 8 ग्राम, जायफल 12 ग्राम, अफीम शुद्ध 16 ग्राम, कस्तूरी 240 मिलीग्राम इनको कूट-पीस लें, फिर इसमें शहद मिलाकर 240 मिलीग्राम की गोलियां बनाकर रख लें। इसकी 1 गोली पान में रखकर खाने से स्तम्भन होता है। अगर स्तम्भन ज्यादा हो जाये तो खटाई खाने से स्खलन हो जायेगा। 45. हिचकी का रोग: 2 लौंग मुंह में रखकर उसे कुचलते हुए चूसने से हिचकी में लाभ होता है। 46. कमरदर्द: लौंग के तेल की मालिश करने से कमर दर्द के अलावा अन्य अंगों का दर्द भी मिट जाता है। इसके तेल की मालिश नहाने से पहले करनी चाहिए। 47. अग्निमान्द्यता: लौंग और हरड़ को एक कप पानी में उबाल लें, जब पानी आधा कप रह जाए, तो उसमें एक चुटकी सेंधानमक मिलाकर पीने से अपच, अग्निमान्द्य, पेट का भारीपन, खट्टी डकारें समाप्त होती हैं। 2 लौंग और 1 लाल इलायची को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीयें। 4 लौंग और 2 हरड़ को मिलाकर काढ़ा बनाकर सेवन करने से अग्निमान्द्यता दूर हो जाती है। 48. कफ: 3 ग्राम लौंग 100 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई रह जाये तो इसे उतारकर ठंडा करें और पी लें। इससे कफ का रोग दूर हो जाता है। लौंग के तेल की तीन चार बूंद बूरा या बताशे में गेरकर सुबह-शाम लेने से लाभ मिलता है। 49. प्यास अधिक लगना: प्यास की तीव्रता होने पर दो गिलास उबले पानी में 3 लौंग डालकर पानी को ठंडा करके पिलायें। इससे प्यास कम हो जाती है। बुखार या हैजा में प्यास अधिक लगने पर दो लौंग को 250 मिलीलीटर पानी में 10 मिनट तक उबालें। इस उबले पानी को 60 ग्राम की मात्रा में दिन में तीन बार लें या तेज प्यास में 10-15 मिनट पर घूंट-घूंट करके पानी पीने से प्यास का अधिक लगना बंद हो जाता है।

50. पाचन क्रिया का खराब होना: लौंग 10 ग्राम, सौंठ 10 ग्राम, कालीमिर्च 10 ग्राम, पीपल 10 ग्राम, अजवायन 10 ग्राम को मिलाकर अच्छी तरह पीसकर इसमें एक ग्राम सेंधानमक मिलाकर रख लें। इस मिश्रण को एक स्टील के बर्तन में रखकर ऊपर से नींबू का रस डाल दें। जब यह सख्त हो तब इसे छाया में सुखाकर 5-5 ग्राम की मात्रा में भोजन के बाद सुबह और शाम पानी के साथ लें। 51. शीतपित्त: चार लौंग पीसकर पानी में घोलकर पिलाने से तेज बुखार और पित्त के कारण उत्पन्न बुखार दूर होता है। 52. नाक के रोग: लौंग को गर्म पानी के साथ पीसकर माथे पर लगाने से सिर दर्द और जुकाम ठीक हो जाता है। 53. आधासीसी (माइग्रेन) अधकपारी: लगभग 5 ग्राम लौंग को पानी के साथ पीसकर उसको हल्का सा गर्म करके कनपटियों पर लेप करने से आधे सिर का दर्द मिट जाता है। 10 ग्राम लौंग और लगभग 10 ग्राम तम्बाकू के पत्तों को पानी के साथ पीसकर माथे पर लेप की तरह लगाने से आधासीसी का रोग दूर हो जाता है। 54. पेट में दर्द: लौंग का चूर्ण 120 मिलीग्राम से 240 मिलीग्राम सुबह और शाम सेवन करने से पेट की पीड़ा में लाभ होता है। 1 लौंग को दिन में 2 बार (सुबह-शाम) खाना खाने के बाद चूसने से अम्लपित्त (एसिडिटीज) की बीमारी और उससे होने वाली बीमारियों में लाभ होता है। लौंग के उपयोग से आमाशय शक्तिशाली होता है तथा यह, भूख न लगना, पेट के कीड़े, बलगम, श्वास (सांस) की बीमारी और वात आदि के रोगों में लाभकारी है। लौंग का तेल 1 से 3 बूंद मिश्री में डालकर या गोंद में मिलाकर सेवन करने से पेट के दर्द में आराम मिलता है। 10 लौंग, 2 चुटकी कालानमक, आधी चुटकी हींग को पीसकर सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है। 55. गठिया रोग: लौंग, भुना सुहागा, एलुवा एवं कालीमिर्च 5-5 ग्राम को कूट-पीस लें और घीग्वार के रस में मिलाकर चने के आकार के बराबर की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। उसके बाद एक-एक गोली सुबह-शाम लेने से गठिया का रोग नष्ट हो जाता है। 56. योनि रोग: लौंग को पीसकर घोड़ी के दूध में मिलाकर सुखा लें। इसके बाद इसे पीसकर योनि में रखने से योनि का आकार संकुचित होकर योनि छोटी हो जाती है। 57. चक्कर आना: सबसे पहले दो लौंग लें और इन लौंगों को दो कप पानी में डालकर उबालें फिर इस पानी को ठंडा करके चक्कर आने वाले रोगी को पिलाने से चक्कर आना बंद हो जाता है। 58. हृदय की दुर्बलता: लौंग को पीसकर मिश्री मिलाकर शर्बत बनायें। इसके पीने से हृदय की जलन मिट जाती है। चार लौग को पानी में पीसकर शक्कर मिलाकर सेवन करें। इससे हृदय की दुर्बलता दूर हो जाती है। सर्दी में हृदय रोग होने पर 21 लौंग, तुलसी के 7 पत्ते, 5 कालीमिर्च तथा 4 बादाम। इन सबको पानी में पीसकर शर्बत बना लें। फिर इसमें थोड़ा शहद डालकर पी जाएं। यह शर्बत हृदय को शक्ति प्रदान करेगा। 59. पसलियों का दर्द: लौंग को मुंह में रखकर चूसने से खांसी कम होती है तथा कफ आराम से निकल जाती है। खांसी, दमा श्वास रोगों में लौंग के सेवन से लाभ पहुंचता है।

60. खसरा: खसरा निकलने पर दो लौंग पानी में घिसकर बच्चे को चटाना चाहिए। खसरा निकलने पर 2 लौंग को घिसकर शहद के साथ प्रयोग कराने से खसरा रोग ठीक होता है। खसरे के रोग में बच्चे को बहुत ज्यादा प्यास लगती है। बार-बार पानी पीने से उसे वमन (उल्टी) होने लगती है। ऐसी हालत में पानी को उबालते समय उसमें दो-तीन लौंग डाल दें। फिर उस पानी को छानकर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में रोगी बच्चे को पिलाने से प्यास समाप्त हो जाती है। जब खसरे के दाने पूरी तरह बाहर आ जायें तो लौंग को घिसकर शहद के साथ रोजाना 2-3 बार देने पर खसरा ठीक हो जाता है। 61. डब्बा रोग: 7 लौंग को पानी में घिसकर बच्चे को देने से सर्दी के मौसम में होने वाला डब्बा रोग (पसली चलना) मिट जाता है। 62. बालाचार, बालाग्रह: 20 लौंग को एक कपडे़ में बांधकर बच्चे के गले में ताबीज की तरह बांधने से दौरा आना कुछ ही समय में बंद हो जायेगा। 63. प्रलाप बड़बड़ाना: 1-1 ग्राम लौंग, तगर, ब्राह्मी और अजवायन को लगभग 16 ग्राम पानी में उबालें। जब चौथाई पानी शेष बचे तो इसे छानकर रोजाना दो या तीन बार पिलाने से प्रलाप दूर हो जाता है। 64. साइटिका (गृध्रसी): लौंग के तेल से पैरों पर मालिश करने से साइटिका का दर्द खत्म हो जाता है। 65. कुष्ठ (कोढ़): 1.20 ग्राम अंकोल की जड़ की छाल, जायफल, जावित्री और लौंग को पीसकर पानी के साथ खाने से कोढ़ का फैलना रुक जाता है। 66. लिंग दोष: लिंग की इन्द्रियों के दोष दूर करने के लिए 20 ग्राम लौंग को 50 मिलीलीटर तिल के तेल में डालकर जलाएं। ठंडा होने पर इससे लिंग की मालिश करें। इससे लिंग की इन्द्रियों के दोष दूर हो जाते हैं। 67. नाभि रोग (नाभि का पकना): लौंग का तेल व तिल का तेल दोनों को एक साथ मिलाकर नाभि पर लगाने से बच्चे को नाभि के कारण हो रहे दर्द में आराम मिलता है। 68. लिंग वृद्धि: लौंग के तेल को शहर के ओलिव ऑयल में मिला लें। इससे सुपारी को (लिंग का अगला हिस्सा) को छोड़कर लिंग की मालिश करने से लिंग के आकार में वृद्धि हो जाती है। 69. नाड़ी का दर्द: लौंग के तेल से मालिश करने से नाड़ी, कमर, जांघ और घुटने आदि सभी दर्दों में लाभ होता है।

70. गले की सूजन: एक चम्मच गेहूं के आटे का चोकर (छानबूर), एक चम्मच सेंधानमक और दो नग लौंग को पानी में चाय की तरह उबालकर तथा छानकर पिएं। इससे गले की सूजन ठीक हो जाती है। 71. टांसिल का बढ़ना: एक पान का पत्ता, 2 लौंग, आधा चम्मच मुलेठी, 4 दाने पिपरमेन्ट को एक गिलास पानी में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीना चाहिए। 72. गलकोष की सूजन व दर्द: लगभग 120 मिलीलीटर से 300 मिलीलीटर लौंग की फांट या चूर्ण सुबह और शाम सेवन करने से गले की सूजन और दर्द में आराम आता है। 73. कंठपेशियों का पक्षाघात: ज्योतिष्मती के बीज और 2-4 फूल लौंग डालकर काढ़ा तैयार करके 20 से 40 ग्राम रोगी को पिलाने से बहुत आराम मिलता है।


रविवार, 26 अप्रैल 2020

Premature Ejaculation or शीघ्रपतन (Mens problem with unique solutions)

शीघ्रपतन

जानकारी :

बिना सन्तुष्टी के संभोग करते हुए अगर वीर्य स्खलन हो जाये तो उसे शीघ्रपतन कहा जाता है।

कारण :

अश्लील वातावरण में रहना, मस्तिष्क की कमजोरी और हर समय सहवास की कल्पना मे खोये रहना यह शीघ्रपतन का कारण बनती है।

ज्यादा गर्म मिर्च मसालों व अम्ल रसों से खाद्य-पदार्थो का सेवन करने, शराब पीने, चाय-कांफी का ज्यादा पीना और अश्लील फिल्म देखने वाले, अश्लील पुस्तकें पढ़ने वाले शीघ्रपतन से पीडित रहते हैं।

लक्षण :

वीर्य का पतलापन, सहवास के समय स्तंभन (सहवास) शक्ति का अभाव अथवा शीघ्रपतन हो जाना वीर्य का जल्दी निकल जाना।

भोजन तथा परहेज :

दिन में खाने के साथ दूध लें, मौसमी फल, बादाम, प्याज और लहसुन का प्रयोग करें।

दवा के साथ गुड़, मिर्च, तेल, खटाई, मैथुन, और कब्ज पैदा करने वाली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिएं पत्नी के साथ सहवास के साथ करते समय यह ध्यान रखें कि वाद-विवाद की उलझनों से दूर रहें।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. छोटी माई : छोटी माई का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है।

2. बरगद :

बरगद के दूध की 20 से 30 बूंदे बतासे या चीनी पर डालकर रोज सवेरे खाने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर होती है।

3 ग्राम बरगद के पेड़ की कोपलें, 3 ग्राम गूलर के पेड़ की छाल और 6 ग्राम मिश्री सिल पर पीसकर लुगदी बना लें, इसे खाकर ऊपर से 250 मिलीलीटर दूध पीयें, इसे 40 दिन तक खाने से लाभ मिलता है।

बरगद के कच्चे फलों को छाया में सुखाकर पीसकर रख लें। 10 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लेने से स्वप्नदोष और शीघ्रपतन मिट जाता है।

सूर्योदय से पहले बरगद के पत्ते तोड़कर टपकने वाले दूध को एक बताशे में 3-4 बूंद टपकाकर खा लें। एक बार में ऐसा प्रयोग 2-3 बताशे खाकर पूरा करें। हर हफ्ते 2-2 बूंद की मात्रा बढ़ाते हुए 5-6 हफ्ते तक प्रयोग जारी रखें। इसके नियमित सेवन से शीध्रपतन (वीर्य का जल्दी निकल जाना), बलवीर्य वृद्धि के लिए, वीर्य का पतलापन, स्वप्नदोष, प्रमेह (वीर्य दोष) और खूनी बवासीर आदि सभी रोग ठीक हो जाता है।

3. गिलोय : गिलोय का चूर्ण और वंशलोचन को बराबर मिला-पीसकर 2 ग्राम के रूप में खाने से शीघ्रपतन नहीं होता है।

4. कुलिंजन : लगभग डेढ़ ग्राम कुलिंजन का चूर्ण 10 ग्राम शहद में मिलाकर चाटें, ऊपर से गाय के दूध में शहद मिलाकर पी लें इससे शीघ्रपतन नहीं होता है।

5. पीपल : पीपल के पेड़ का फल, जड़, छाल और कोंपल को पीसकर दूध में अच्छी तरह उबाल कर गर्म-गर्म शहद और चीनी मिला कर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।

6. सिरस : सिरस के फूलों का रस 10 मिलीलीटर या 20 मिलीलीटर सुबह-शाम मिश्री मिले दूध के साथ लेने से वीर्य स्तंभन होता है।

7. बबूल : बबूल की फली का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम चीनी मिलाकर खाने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।

8. पिण्ड खजूर : पिण्ड खजूर के 5 फल रोज खायें और ऊपर से मिश्री मिला दूध कम से कम 250 मिलीलीटर रोज पियें तो इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।

9. कतीरा गोंद : कतीरा गोंद 1 से 2 चम्मच चूर्ण रात में सोते समय पानी में भिगो दें। सवेरे मिश्री या शक्कर को मिलाकर शर्बत की तरह रोज घोंटकर खाने से वीर्य की मात्रा, गढ़ापान और स्तम्भन शक्ति की वृद्धि होती है।

10. असगन्ध नागौरी : असगन्ध नागौरी का चूर्ण 1 चम्मच और 3 कालीमिर्च के चूर्ण को मिलाकर रोज रात को सोते समय खाने से शीघ्रपतन और वीर्य सम्बन्धी सारे रोग दूर होते हैं।

11. उड़द :

अंकुरित उड़द की दाल में मिश्री या शक्कर को डालकर कम से कम 58 ग्राम की मात्रा में रोज खाने से शीघ्रपतन दूर होता है।

उड़द के बेसन को घी में हल्का भूनकर रख लें। लगभग 50 ग्राम रोज मिश्री मिले दूध को उबालकर रोज रात में सेवन करने से वीर्य और नपुंसकता (नामर्दी) से सम्बन्धी रोग दूर हो जाते हैं।

12. शकरकन्द : सूखी शकरकन्द को कूट छानकर चूर्ण तैयार करें, फिर उसे घी और चीनी की चाशनी में डालकर हलवा तैयार करके इस हलवे को खाने से वीर्य गाढ़ा होता है।

13. कौंच :

कौंच के बीजों की गिरी का चूर्ण और खसखस के बीजों का चूर्ण 4 या 6 ग्राम लेकर चूर्ण को फांट या घोल के रूप में सेवन करने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।

कौंच के बीज का चूर्ण, तालमखाना और मिसरी, तीनों बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीस कर चूर्ण बनाकर सुबह-शाम 3-3 ग्राम चूर्ण खाकर, ऊपर से दूध पीना शीघ्रपतन में लाभदायक होता है।

कौंच की जड़ लगभग 1 अंगुल लम्बी मुंह में दबाकर सहवास करने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।

14. वंशलोचन : वंशलोचन, सतगिलोय 10-10 ग्राम पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करने से शीघ्रपतन में आराम मिलता है।

15. बहुफली : बहुफली 50 ग्राम पीसकर 5 ग्राम सुबह पानी से प्रयोग करें।

16. काले तिल : काले तिल 50 ग्राम अजवायन 25 ग्राम पीसकर इसमें 75 ग्राम खांड को मिलाकर 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है।

17. ब्रह्मदण्डी :

ब्रह्मदण्डी, बहुफली 50-50 ग्राम कूट छानकर इसमें 100 ग्राम खांड को मिलाकर 10 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह पानी के साथ सेवन करें।

ब्रह्मदण्डी, बहुफली, बीजबन्द, पलंग तोड 50-50 ग्राम कूट छान कर इस में 100 ग्राम खांड़ मिलाकर 10-10 ग्राम को दिन में सुबह-शाम दूध या पानी के साथ सेवन करने से शीघ्रपतन के रोगी को लाभ होगा।

18. बिदारीकन्द : बिदारीकन्द, गोखरूदेसी 50-50 ग्राम कूटछानकर 5-5 ग्राम खांड़ को मिलाकर दूध के साथ सुबह और शाम सेवन करें।

19. लाजवन्ती : लाजवन्ती के बीज 75 ग्राम पीस कर इसमें 75 ग्राम खांड मिलाकर 5-5 ग्राम को सुबह-शाम खांड मिले कम गर्म दूध के साथ लें।

20. मूसली सिम्बल : मूसली सिम्बल 60 ग्राम कूटी छनी में खांड 60 ग्राम मिलाकर 6-6 ग्राम पानी या दूध से सुबह-शाम लें।

21. कुस्ता कलई : कुस्ता कलई एक ग्राम का चौथा भाग, माजुन सालब 6 ग्राम के साथ सोते समय शीघ्रपतन के रोगी लें।

22. केला : सुबह-शाम 2 केले खाकर ऊपर से 250 मिलीलीटर दूध पीने से धातु (वीर्य) पुष्ट होता है।

23. ईसबगोल :

ईसबगोल की 5 ग्राम भूसी में मिसरी 3 ग्राम मिलाकर खसखस के शर्बत के साथ 3 सप्ताह तक सेवन करने से शीघ्रपतन की विकृति खत्म होती है।

ईसबगोल, खसखस, बेल का गूदा तथा मिश्री, सब 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर और सबको मिलाकर एक खुराक के रूप में दूध से लें। 15 दिन तक यह दवा लेने से वीर्य ठहरने लगता है।

ईसबगोल, शर्बत, खसखस और मिश्री को बराबर 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर पानी में मिलाकर सेवन करने से शीघ्रपतन होने का रोग दूर हो जाता है।

24. अनार : अनार के छिलकों को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रखें, फिर 3 ग्राम मात्रा में चूर्ण को पानी के साथ सेवन करने से 2-3 हफ्ते में शीघ्रपतन की विकृति खत्म होती है।

25. बड़े गोक्षुर : बड़े गोक्षुर को कूट पीसकर चूर्ण बनाकर रखें। प्रतिदिन 3 ग्राम चूर्ण में घी और शक्कर मिलाकर चाटकर खाने से शीघ्रपतन की विकृति दूर होती है।

26. छुहारा :

छुहारों को दूध में उबालकर पीने से शीघ्रपतन दूर होता है।

शीघ्रपतन और पतले वीर्य वालों को 2 छुहारे प्रतिदिन खाने से लाभ मिलता है।

27. गोखरू :

गोखरू, वंशलोचन, छोटी इलायची और सत्व गिलोय सभी चीजों 30-30 ग्राम मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर रखें। रोज 7-8 ग्राम चूर्ण मक्खन के साथ मिलाकर खाने से शीघ्रपतन की विकृति खत्म होती है।

गोखरू, सूखे आंवले तथा गिलोय के बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर कपड़े से छान लें इसमें से आधा चम्मच चूर्ण रोज 2 महीने तक शुद्ध देशी घी तथा मिश्री के साथ इस्तमाल करें।

28. प्याज : प्याज के 10 मिलीलीटर रस में शहद 7-8 ग्राम मिलाकर रोज सुबह चाटने से शीघ्रपतन दूर होता है।

29. अफीम : अफीम 1 ग्राम, 2 ग्राम जायफल, 10 ग्राम मिश्री, 2 ग्राम लौंग को पीसकर 13 गोलियां बना लें। सहवास के दो घण्टे पूर्व 1 गोली खाने से स्तम्भन होता है।

30. करेला : करेले के पत्ते और करेले को आग में हल्का सा भूनकर पीस लें और 3-3 ग्राम की गोलियां बना लें। एक गोली दूध के साथ खाकर ऊपर से थोड़ा-सा शहद चाटने से शीघ्रपतन में लाभ मिलता है।

31. करंज : करंज की जड़ को दांतों के नीचे दबाने से वीर्य ठहरता है।

32. लौंग : लौंग, दालचीनी, सोंठ, अकरकरा और सकमूनिया बराबर मात्रा में लेकर अदरख के रस में गोलियां बनाकर रख लें। फिर शहद में घिसकर एक गोली शिश्नि (लिंग) पर लगाकर सहवास करने से शीघ्रपतन नहीं होता है।

33. दालचीनी : लगभग 200 ग्राम दालचीनी और काले तिल 200 ग्राम मात्रा में लेकर पीस लें फिर शहद मिलाकर 7-7 ग्राम की गोलियां बना लें। सोते समय 1 गोली पानी के साथ खाने से शीघ्रपतन नहीं होता है।

34. ऊंटकटारा : ऊंटकटारा की जड़ शक्कर के साथ खाने से वीर्य पुष्ट होता है।

35. कसौंदी : कसौंदी की जड़ की सूखी छाल 7 ग्राम पीसकर शहद के साथ गोली बनाकर रख लें। 1 गोली 1 कप दूध के साथ सोते समय खाने से वीर्य स्तम्भन होता है।

36. तुलसी :

एक ग्राम तुलसी के बीज, 20 ग्राम अकरकरा और 30 ग्राम शक्कर पीसकर चूर्ण बना लें। रात को एक ग्राम चूर्ण दूध के साथ खाने से शीघ्रपतन दूर होता है।

तुलसी की जड़ या बीज चौथाई चम्मच भर पान में रखकर खाने से शीघ्रपतन दूर होकर वीर्य की पुष्टि होती है।

37. समुद्रफेन : समुद्रफेन को दूध चावल के साथ खाने से वीर्य स्तम्भन होता है।

38. गोरखमुण्डी: गाय के मट्ठे के साथ गोरखमुण्डी 14 दिन तक खाने से सेक्सुअल पावर बढ़ती है।

39. लज्जालू : लज्जालू के बीज, आइखरा के बीज और खुरासानी अजवायन बराबर लेकर उसमें गुड़ मिलाकर गोली बना लें। 1 गोली सुबह दही के साथ खाने से शीघ्रपतन दूर होता है।

40. भांगरा : वीर्य स्तम्भन करने के लिये भांगरा के रस के साथ नागदोन खायें।

41. पान : पान के साथ पुनर्नवा खाने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।

42. सफेद कनेर : सफेद कनेर की जड़ को गाय के दूध में डालकर उबालें। ठण्ड़ा होने पर दूध का दही जमा दें। दही को मथकर मक्खन निकाल लें। यह मक्खन पान में लगाकर खाने से वीर्य स्तम्भन होता है।

43. अकरकरा : 3 ग्राम अकरकरा, काली तुलसी के बीज 24 ग्राम, मिश्री 27 ग्राम को बारीक कूट-पीसकर चूर्ण रख लें। यह चूर्ण खाने से वीर्य स्खलित नहीं होता है।

44. इमली :

इमली के 10 ग्राम बीज लेकर 4-5 दिन तक पानी में भिगो दें। फिर उन्हें छीलकर 4 साल पुराना गुड़ दुगुने वजन के बराबर मिलाकर चने के आकार की गोलियां बनाकर रखें। इन्हें खाने से स्तम्भन-शक्ति बढ़ती है।

आधा किलो इमली के बीज 4 दिनों तक पानी में भिगोयें रखें। उसके बाद इमली का छिलका उतारकर छाया में सुखा लें। सूख जाने पर उसको पीसकर बराबर मात्रा में पिसी हुई मिश्री में मिलाकर सुरक्षित रख लें। इस चूर्ण को चौथाई चम्मच की मात्रा में दूध से प्रतिदिन सुबह-शाम दिन में 2 बार सेवन करने से 50 दिन में शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है तथा वीर्य गाढ़ा हो जाता है।

नोट : 15 दिन तक संभोग क्रिया से दूर रहें।



45. विदारीकन्द : विदारीकन्द का चूर्ण बनाकर रख लें। 20 ग्राम गूलर के रस में मिलाकर चाटें और ऊपर से दूध में घी मिलाकर पीने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।

46. राल : एक ग्राम बारीक पिसी राल को रात में सोते समय दूध के साथ खाने से शीघ्रपतन दूर होता है।

47. मुलेठी : मुलेठी 100 ग्राम की मात्रा में लेकर, कूट-पीसकर कपड़े से छान कर शीशे के बर्तन में रख लें। इसमें से रोज 3 खुराक दिन में 2 ग्राम शहद के साथ शीघ्रपतन की बीमारी में सेवन करें।

48. ढाक : ढाक के कोमल पत्तों का चूर्ण बनाकर गुड़ के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर दिन में 3 बार 1-1 गोली सेवन करने स्तम्भन होता है।

49. धतूरा : लौंग, अकरकरा और शुद्ध धतूरे के बीज को बराबर मात्रा में पीसकर रखें। फिर 1 ग्राम की मात्रा में लेकर एक कप दूध के साथ दिन में 3 बार सेवन करते रहने से कुछ ही दिनों में स्तम्भन बढ़कर शीघ्रपतन दूर हो जाता है।

50. शहद : स्त्री-संग सम्भोग से 1 घण्टा पहले पुरुष की नाभि में शहद भिगोया हुआ रूई का फोहा रखने से पुरुश का जल्दी स्खलन नहीं होता अर्थात पुरुश का लिंग शिथिल नहीं होता है।

51. अपामार्ग : अपामार्ग की जड़ को अच्छी तरह धोकर सुखा लें। इसका चूर्ण बनाकर 2 चम्मच की मात्रा में लेकर एक चम्मच ‘शहद मिला लें। इसे एक कप ठण्डे दूध के साथ नियमित रूप से कुछ हफ्तों तक सेवन करने से वीर्य बढ़ता है।

महत्वपुर्ण जानकारी जो आपकी सेक्स लाइफ को बदल कर रख देगी

1) यूं तो सेब सेहत के लिए बहुत लाभकारी होता है। इसमें मौजूद पौष्टिक तत्व शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं, लेकिन अगर इसे लौंग और नींबू के साथ इस्तेमाल किया जाए तो इसका फायदा दोगुना हो जाता है।

2) इसके सेवन के लिए एक सेब में 20 से 30 लौंग ऊपर से लगा लें और फिर निम्बू के दो टुकड़े करके इसमें भी इसी तरह निम्बू के बीचों बीच 20 से 30 लौंग लगा लें। लौंग लगाने के बाद आप इसे एक सप्ताह के लिए किसी अच्छे कटोरे या बर्तन में ढक कर रख दें।

3) ऐसा करने से सेब, लौंग और नींबू का रस अच्छे से आपस में मिल जाएंगे। अब रोजाना सेब में लगे उन 2 लौंग को गाय या बकरी के दूध के साथ पीसकर सेवन करें। ऐसा लगातार 30 दिनों तक करने से शरीर की सभी कमजोरी दूर हो जाएगी।

4) ये उपाय पुरुषों के लिए सबसे ज्यादा कारगर है। ये उनके हार्मोन्स को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने में मदद करता है। साथ ही ये उनके मूड को भी अच्छा रखने में मदद करता है।

5) अगर पुरुष अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें रोजाना रात को सोने से पहले एक गिलास दूध के साथ एक चम्मच मूसली पाउडर खाना चाहिए। ऐसा नियमित तौर पर करने से उनके मसल्स मजबूत होंगे, साथ ही बीमारियों से भी बचाव होगा।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

Prostate enlargement

पुरुष ग्रंथि का बढ़ना (Prostate enlargement)

जानकारी:-

यह रोग पुरुषों में ही होता है क्योंकि पुरुष ग्रंथि स्त्रियों में नहीं होती है केवल पुरुषों में होती है। पुरुष में यह ग्रंथि मूत्राशय की ग्रीवा तथा मूत्रमार्ग के ऊपरी भाग को चारों तरफ से घेरकर रखती है। इस ग्रंथि के द्वारा सफेद, लिसलिसा तथा गाढ़ा स्राव निकलता है। जब पुरुष उत्तेजित होता है तो उस समय शुक्राणु प्रोस्टेट में पहुंच जाते हैं। यह लिसलिसा पदार्थ इन शुक्राणुओं को जीवित रखने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह ग्रंथि अधिक बढ़ जाती है तो मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है।

पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का लक्षण:-

जब पुरुषों की पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है तो उस रोगी के पेशाब की धार पतली हो जाती है तथा पेशाब कम और रुक-रुक कर आता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में कई बार पेशाब करने के लिए उठना पड़ता है।

रोगी को एक बार में पेशाब पूरा नहीं आता इसलिए उसे पेशाब बार-बार करने जाना पड़ता है। रोगी व्यक्ति का पेशाब बूंद-बूंद करके आने लगता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी पेशाब तथा शौच को रोकने में असमर्थ होता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सिर में दर्द, घबराहट, थकान, चिड़चिड़ापन, लिंग का ढीला हो जाना तथा अधिक कमजोरी महसूस होना आदि परेशानियां होने लगती हैं।

पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने के कारण:-

गलत तरीके के खान-पान तथा दूषित भोजन का सेवन करने से पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने का रोग हो जाता है।

मानसिक तनाव अधिक होने, अधिक चिंता करने तथा क्रोध करने के कारण पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का रोग हो सकता है।

नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

पेट में कब्ज बनने के कारण भी पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है।

मूत्र तथा शौच की गति को रोकने के कारण भी पुरुष ग्रंथि अधिक बढ़ सकती है।

लगातार लम्बे समय तक बैठने का कार्य करने से व्यक्ति के बस्ति प्रदेश पर बोझ पड़ता है जिसके कारण इस ग्रंथि में सूजन हो जाती है और यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।

पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए और इसके बाद इसका उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।

पुरुष ग्रंथि के बढ़ने के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 2 दिन उपवास रखने के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों तथा सब्जियों का हल्का भोजन लेना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में पानी तथा नींबू का पानी पीना चाहिए। धनिये के पानी तथा कच्चे नारियल के पानी को भी पीना लाभदायक है।

बन्दगोभी, तरबूज, खीरा, सफेद पेठा, गाजर, अनन्नास आदि का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को दूषित भोजन, उत्तेजक खाद्य पदार्थ, मिठाई, घी, तली हुई चीजें बिल्कुल भी सेवन नहीं करनी चाहिए।

यदि रोगी व्यक्ति को कब्ज बन रही हो तो सबसे पहले कब्ज को दूर करना चाहिए तथा इसके बाद इस रोग का उपचार करना चाहिए।

पालक और कुलथी को बराबर मात्रा में लेकर पानी में डालकर अच्छी तरह से उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को सुबह-शाम सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

2 अंजीर को प्रतिदिन पानी में भिगोकर रख दें। इनको सुबह तथा शाम को खाकर इस पानी पी लें। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।

परहेज और आहार

लेने योग्य आहार

सेसिम के बीज (जिंक)

टमाटर

एवोकेडो

सब्जियाँ

अंडे

दूध

सोया

मछली

पनीर

चिकन

इनसे परहेज करे

शराब

पानी (मात्रा घटा दें)

रेड मीट

वसा युक्त आहार

चाय और कॉफ़ी

कार्बन युक्त पेय

यदि साथ में पथरी भी हो, तो इनसे परहेज करे

फल-बेरियाँ, अंजीर, आलूबुखारा

सब्जियाँ-पालक, हरी फलियाँ

मेवे और गिरी-बादाम, काजू, और मूंगफली दाने

दालें-सोयाबीन, टोफू और अन्य सोया उत्पाद

अन्य-कोको, चॉकलेट, और काली चाय।

योग और व्यायाम

केगल व्यायाम (अपने मूत्र रोकने की मांसपेशियों को सिकोड़ें, 10 सेकंड तक जोर से रोक कर रखें, फिर ढीला छोड़ें, यह 10 बार दोहराएँ) दिन में 3 से 5 बार करना लाभकारी होता है।

घरेलू उपाय (उपचार)

प्रतिदिन के तरल आहारों को 2000 मिली तक सीमित करें।

शराब और कैफीन का प्रयोग बंद करें या सीमित करें।

सायंकाल को पेय पदार्थ सीमित लें। अपने रात्रि भोजन के बाद तरल पदार्थ न लें।

प्रत्येक 3 घंटों में मूत्रत्याग करने का प्रयास करें।

दो बार मूत्रत्याग, सहायक हो सकता है-मूत्रत्याग पश्चात प्रतीक्षा करें और फिर से मूत्रत्याग का प्रयास करें।

सक्रिय रहें। ठंडा मौसम और निष्क्रियता मूत्र के अटके रहने के खतरे को बढ़ाते हैं।

गर्म रहना और व्यायाम सहायक होते हैं।

उचित वजन प्राप्त करें और उसे बनाये रखें।
Note:4 खजूर का सेवन रोज रात को सोने  से पहले करने से prostate की कोई भी प्रॉब्लम ठीक हो जाती है




गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

अण्डकोषों में पानी भर जाना (Hydrocele)

अण्डकोषों में पानी भर जाना (Hydrocele)

जानकारी:-

इस रोग में रोगी के अण्डकोषों में पानी भर जाता है जिसके कारण उसके अण्डकोष में सूजन आ जाती हैं। जब यह रोग किसी व्यक्ति को होता है तो उसके केवल एक ही तरफ के अण्डकोष में पानी भरता है। इस रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से किया जा सकता है।

अण्डकोषों में पानी भर जाने का लक्षण :-

          प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के अण्डकोषों में दर्द होने लगता है। रोगी के अण्डकोष का एक भाग सूज जाता है, कभी-कभी तो ये इतने बढ़ जाते है कि व्यक्ति को चलने फिरने में दिक्कत होने लगती है। यदि रोगी व्यक्ति के अंडकोष में सूजन के साथ तेज दर्द होने लगता है तो समझना चाहिए कि रोगी व्यक्ति को हाइड्रोसील अण्डकोषों में पानी भर जाने का रोग हो गया है। जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो इसके कारण जननेन्द्रिय की सारी नसें कमजोर और ढीली पड़ जाती हैं जिसके कारण रोगी व्यक्ति को उल्टी तथा मितली भी होने लगती है और कब्ज भी रहने लगती है।

अण्डकोषों में पानी भर जाने का कारण :-

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार यह रोग किसी व्यक्ति को यौन अंगों में विजातीय द्रव्यों (दूषित मल) के इकट्ठा हो जाने के कारण होता है।

गलत तरीके से खान-पान की आदतें तथा समय पर खाना न खाने के कारण यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।

अन्य रोग जो दवा से दबाए गए हो या फिर संभोग सबंधी उत्तेजना को एक दम से रोक देने के कारण भी यह रोग हो जाता है।

मल-मूत्र के वेग को रोकने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

भारी वजन उठाने, अधिक पैदल चलने, अंगों को तोड़ने या अंगड़ाई लेने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

संभोगक्रिया अधिक करने के कारण भी कभी-कभी अण्डकोषों में पानी भर जाता है।

अण्डकोषों में पानी भर जाने से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

1)इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कम से कम 2 सप्ताह तक प्रतिदिन संतरे का रस या अनार का रस पीना चाहिए। रोगी को कच्चे सलाद में नींबू डालकर सेवन करना चाहिए और उपवास रखना चाहिए।

2)रोगी व्यक्ति को कटिस्नान, मेहनस्नान, सूखा घर्षण, गर्म एवं नमक स्नान (नमक मिले पानी से स्नान) करना चाहिए। इससे यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खुली हवा में व्यायाम करना चाहिए तथा इसके साथ सूर्य स्नान भी करना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता है।

3)इस रोग को ठीक करने के लिए पीले रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन 4 बार सेवन करना चाहिए तथा इस जल का सेवन करने से पहले रोगी व्यक्ति को एक घण्टे तक लाल प्रकाश और उसके बाद कम से कम 2 घण्टे तक नीला प्रकाश अण्डकोष पर डालना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

4)अण्डकोष की सूजन: लगभग 1-4 ग्राम की मात्रा में फिटकरी और माजूफल को लेकर पानी के साथ बारीक पीस लें, फिर इस तैयार मिश्रण का लेप अण्डकोष पर करने से कुछ ही दिनों में अण्डकोष की सूजन दूर होती है। भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से अण्डकोष के सूजन और बढे़ हिस्से सही हो जाते हैं। फिटकरी को पानी में पीसकर अण्डकोष पर लेप करने से लाभ होता है।

5)अंडकोषों में पानी भर जाने पर रोगी 10 ग्राम काटेरी की जड़ को सुखाकर उसे पीस लें. फिर उसके पाउडर / चूर्ण में 7 ग्राम की मात्रा में पीसी हुई काली मिर्च डालें और उसे पानी के साथ ग्रहण करें. इस उपाय को नियमित रूप से 7 दिन तक अपनाएँ. ये हाइड्रोसील का रामबाण इलाज माना जाता है क्योकि इससे ये रोग जड़ से खत्म हो जाता है और दोबारा अंडकोषों में पानी नही भरता.

6)निजी अनुभव जो अब मे आपके साथ शेयर करने जा रहा हूँ ।
मुझे ये समस्या हुई थी उस समय मेने कोकवा powder जिससे केक या चॉकलेट बनती हैं उसको मेने रोज रात को सोने से पहले 1ग्राम सादे पानी के साथ लिया वो भी बस 7 दिनो तक परिणाम ये आया की मेरे अनड़कौष मे जो दर्द हो रहा था जिस कारण मुझे चलने मे भी दिक्कत हो रही थी वो बिल्कुल ठीक हो गई।और रोज सुबाह मेने एक मुद्रा की जिसे वज्रोली कहा जाता है जिस कारण मे पूरी तरह से ठीक हो चुका हूं ।

चिकित्सीय और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें वज्रोली मुद्रा द्वारा

Vajroli Mudra in Hindi: जानिए इसकी विधि और लाभ

विधि

किसी भी ध्यानात्मक आसन पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएँ |

दोनों हाथ घुटनों पर रखें और आँखे को बंद कर ले तथा नाक से साँस लेते रहे|

अन्तः कुम्भक करें अर्थात साँस अन्दर रोककर रखें, इस स्थिति में गुदाद्वार एवं अंडकोष के बीच के भाग को उपर की तरफ संकुचित करें|

इसके बाद साँस को बाहर निकालकर पेट को शिथिल करते हुए पेट के नीचे के भाग को इस तरह से खींचे जैसे मल-मूत्र के वेग को रोकते समय खींचते हैं|

जितनी देर इस स्थिति में रह सकते है रहें और फिर सामान्य स्थिति में आ जाएँ| इस क्रिया को 30-50 बार दोहराएं|

Easy words me samjhe:

Vajroli Kriya में यही करना होता है| साँस को ऊपर चढ़ाते हुए गुदा क्षेत्र की समस्त मांसपेशियों को पैर की तरफ इस प्रकार चढ़ाया जाता है कि मानो पिचकारी द्वारा पानी को ऊपर खींचा जा रहा है|

Vajroli Mudra Benefits: जानिए इसके लाभ

इस क्रिया के अभ्यास से समय से पूर्व होने वाली वीर्य स्त्राव और स्वप्नदोष की समस्या में लाभ मिलता है|

इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर की शक्ति, सुंदरता एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है|

कुंडलिनी को जागृत करने में भी इस मुद्रा का विशेष महत्त्व होता है|

यह क्रिया प्रजनन संस्थान को सबल बनाती है और यौन रोग में भी व्रजोली मुद्रा फायदेमंद है|


नोट:अंडकोष का एक शिरा फूल जाना: प्रतिदिन किशमिश खाने से अंडकोष का एक शिरा बढ़ना ठीक होता है। 2. अंडकोष में पानी भरना: किशमिश प्रतिदिन खाने से अंडकोष में पानी भरना रोग ठीक होता है।


Alum or fitkari naam chota par kaam bade bade.

परिचय : फिटकरी लाल व सफेद दो प्रकार की होती है। दोनों के गुण लगभग समान ही होते हैं। सफेद फिटकरी का ही अधिकतर प्रयोग किया जाता है। यह संकोचक अर्थात सिकुड़न पैदा करने वाली होती है। शरीर की त्वचा, नाक, आंखे, मूत्रांग और मलद्वार पर इसका स्थानिक (बाहृय) प्रयोग किया जाता है। रक्तस्राव (खून बहना), दस्त, कुकरखांसी तथा दमा में इसके आंतरिक सेवन से लाभ मिलता है। दाढ़ी बनाने, बाल काटने के बाद फिटकरी रगडे़ या पानी में गीला कर दाढ़ी पर लगायें। इससे दाढ़ी की त्वचा सुन्दर और स्वस्थ होती है। जहां पर चींटिया व दीमक हो वहां पर सरसों का तेल लगाकर फिटकरी को डालने से चींटियां व दीमक वहां नहीं आती है। फिटकरी के विभिन्न उपयोग : 1. संकोचन: फिटकरी सिकुड़न पैदा करने वाली होती है। त्वचा, नाक, आंख, मूत्रांग और मलदार पर इसका स्थानीय प्रयोग किया जाता है। रक्तस्राव (खून बहना), दस्त, कुकरखांसी तथा दमा में आंतरिक सेवन से लाभ मिलता है। 2. शराब का नशा: यदि किसी व्यक्ति ने शराब ज्यादा पी ली हो तो 6-ग्राम फिटकरी को पानी में घोलकर पिला दें। इससे शराब का नशा कम हो जाएगा। 3. बच्चों के रोग: लगभग 800 मिलीग्राम भुनी हुई फिटकरी, 800 मिलीग्राम भुना हुआ सुहागा, 800 मिलीग्राम तूतिया, 800 मिलीग्राम कचिया और 10 ग्राम मिश्री को एक साथ अच्छी तरह से पीसकर शीशी में भरकर रख लें। इस चूर्ण को थोड़ी सा लेकर सलाई से आंखों में लगाने से आंख का माड़ा-फूली और आंखों से धुंधला दिखाई देना दूर हो जाता है। लगभग 3-3 ग्राम फिटकरी, सेंधानमक और मिश्री को उबाले हुए पानी में मिलाकर शीशी में भर लें। इस रस को गर्मी की वजह से आई हुई आंख में डालने से बहुत लाभ होता है। यह रस आंखों की लाली भी दूर कर देता है। भुनी हुई फिटकरी, पापरी कत्था, इलायची के दानों को एक साथ पीसकर मुंह के छालों में लगाने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं। लगभग 240 मिलीग्राम लाल फिटकरी को प्याज के रस में गर्म करके कान में डालने से कान का दर्द बंद हो जाता है। गर्मी से आने वाली खांसी में कफ पककर सूख जाता है, कफ बाहर नहीं निकलता। ऐसी हालत में 120 मिलीग्राम भुनी हुई फिटकरी, 120 मिलीग्राम भुना सुहागा, शहद से चटायें या दूध के साथ पिलायें, इससे कफ ढीला होकर खांसी दूर हो जाएगी। अगर कान में मवाद आये तो फिटकरी और माजूफल को पीसकर शहद में मिलाकर बत्ती बना लें। इस बत्ती को कान में रखने से आराम आता है। 1 ग्राम फिटकरी और 2 ग्राम कलसी (पृष्ठपर्णी) बिना पिसी हुई पोटली में बांध कर, पानी में भिगोकर आंखों पर लगाने से आंखों का लाल होना दूर होता है। 1 ग्राम लोध्र, 1 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, आधा ग्राम अफीम और 4 ग्राम इमली की पत्तियों को लेकर और सबको पीसकर पोटली बना लें और पानी में भिगो-भिगो कर आंखों पर फेरे। इससे आंखों का दर्द कम हो जाता है। 2-2 ग्राम इमली की पत्तियां, हल्दी और फिटकरी को लेकर बारीक पीसकर, पोटली बनाकर और पानी में भिगोकर आंखों पर लगाने से और थोड़ा सा आंखों में डालने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। 4. गले के रोग: खाने का सोडा और खाने का नमक बराबर मात्रा में और थोड़ी सी पिसी हुई फिटकरी मिलाकर शीशी में रख लेते हैं। इस मिश्रण की एक चम्मच मात्रा एक गिलास गर्म पानी में घोल लेते हैं। इस पानी से सुबह उठते और रात को सोते समय अच्छी तरह गरारे करने चाहिए। इससे गले की खराश, टॉन्सिल की सूजन, मसूढ़ों की के रोग और गले में जमा कफ, गले की व्याधि व खांसी नहीं होती है। लगभग 2-2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी को 1-1 कप गर्म दूध से सुबह और शाम लें। इससे गले की गांठे दूर हो जाती हैं। 10 ग्राम फिटकरी को तवे पर भूनकर और पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 2 ग्राम फिटकरी सुबह के समय चाय या गर्म पानी के साथ लें। यह प्रयोग दिन में चार बार करें। इससे गले की सूजन दूर हो जाती है। गले के दर्द में भुनी हुई फिटकरी को ग्लिसरीन में मिलाकर गले में डालकर फुरैरी (कुल्ला) करें। इससे गले का दर्द ठीक हो जाता है। 5. जननांगों की खुजली: फिटकरी को गर्म पानी में मिलाकर जननांगों को धोने से जननांगों की खुजली में लाभ होता है। 6. टांसिल का बढ़ना: टांसिल के बढ़ने पर गर्म पानी में चुटकी भर फिटकरी और इतनी ही मात्रा में नमक डालकर गरारे करें। गर्म पानी में नमक या फिटकरी मिलाकर उस पानी को मुंह के अन्दर डालकर और सिर ऊंचा करके गरारे करने से गले की कुटकुटाहट, टान्सिल (गले में गांठ), कौआ बढ़ना, आदि रोगों में लाभ होता है। 5 ग्राम फिटकरी और 5 ग्राम नीलेथोथे को अच्छी तरह से पकाकर इसके अन्दर 25 ग्राम ग्लिसरीन मिलाकर रख लें। फिर साफ रूई और फुहेरी बनाकर इसे गले के अन्दर लगाने और लार टपकाने से टांसिलों की सूजन समाप्त हो जाती है। 7. घावों में रक्तस्राव (घाव से खून बहना): घाव ताजा हो, चोट, खरोंच लगकर घाव हो गया हो, उससे रक्तस्राव हो। ऐसे घाव को फिटकरी के पानी से धोएं तथा घाव पर फिटकरी को पीसकर इसका पावडर छिड़कने, लगाने व बुरकने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद हो जाता है। शरीर में कहीं से भी खून बह रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है। 8. खूनी बवासीर: खूनी बवासीर हो और गुदा बाहर आती हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर गुदा में पिचकारी देने से लाभ प्राप्त होता है। एक गिलास पानी में आधा चम्मच पिसी हुई फिटकरी मिलाकर प्रतिदिन गुदा को धोयें तथा साफ कपड़े को फिटकरी के पानी में भिगोकर गुदे पर रखें। 10 ग्राम फिटकरी को बारीक पीसकर इसके चूर्ण को 20 ग्राम मक्खन के साथ मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से सूखकर गिर जाते हैं। फिटकरी को पानी में घोलकर उस पानी से गुदा को धोने खूनी बवासीर में लाभ होता है। भूनी फिटकरी और नीलाथोथा 10-10 ग्राम को पीसकर 80 ग्राम गाय के घी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम बवासीर के मस्सों पर लगायें। इससे मस्से सूखकर गिर जाते हैं। सफेद फिटकरी 1 ग्राम की मात्रा में लेकर दही की मलाई के साथ 5 से 7 सप्ताह खाने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) में खून का अधिक गिरना कम हो जाता है। भूनी फिटकरी 10 ग्राम, रसोत 10 ग्राम और 20 ग्राम गेरू को पीस-कूट व छान लें। इसे लगभग 3-3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से खूनी तथा बादी बवासीर में लाभ मिलता है। 9. घाव: फिटकरी को तवे पर डालकर गर्म करके राख बना लें। इसे पीसकर घावों पर बुरकाएं इससे घाव ठीक हो जाएंगे। घावों को फिटकरी के घोल से धोएं व साफ करें। 2 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दासंग लेकर चूर्ण बना लें। 120 मिलीग्राम मोम और 30 ग्राम घी को मिलाकर धीमी आग पर पका लें। फिर नीचे उतारकर उसमें अन्य वस्तुओं का पिसा हुआ चूर्ण अच्छी तरह से मिला लें। इस तैयार मलहम को घाव पर लगाने से सभी प्रकार के घाव ठीक हो जाते हैं। फिटकरी, सज्जीक्षार और मदार का दूध इन सबको मिलाकर और पीसकर लेप बना लें। इस लेप को घाव पर लगाने से जलन और दर्द दूर होता है। भुनी हुई फिटकरी को छानकर घाव पर छिड़कने से घाव से सड़ा हुआ मांस बाहर निकल आता है और दर्द में आराम रहता है। आग से जलने के कारण उत्पन्न हुए घाव को ठीक करने के लिए पुरानी फिटकरी को पीसकर दही में मिलाकर लेप करना चाहिए। 5 ग्राम फूली फिटकिरी का चूर्ण बनाकर देशी घी में मिला दें, फिर उसे घाव पर लगायें। इससे घाव ठीक हो जाता है। 10. किसी भी अंग से खून बहना: एक ग्राम फिटकरी पीसकर 125 ग्राम दही और 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर लस्सी बनाकर पीने से कहीं से भी रक्तस्राव हो, बंद हो जाता है। 11. नकसीर (नाक से खून बहना): गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर (नाक से खून आना) ठीक हो जाती है। यदि नकसीर बंद न हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर मस्तक पर रखते हैं। 5-10 मिनट में रक्तबंद हो जाएगा। चौथाई चाय की चम्मच फिटकरी पानी में घोलकर प्रतिदिन तीन बार पीना चाहिए। अगर नाक से लगातार खून बह रहा हो तो 30 ग्राम फिटकरी को 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उस पानी में कोई कपड़ा भिगोकर माथे और नाक पर रखने से नाक से खून बहना रुक जाता है। गाय के कच्चे दूध के अन्दर फिटकरी को मिलाकर सूंघने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है। 12. मुंह का लिबलिबापन: काला नमक और फिटकरी समान मात्रा में मिलाकर पीसकर इसके पाउडर से मंजन करने से दांतों और मुंह का लिबलिबापन दूर हो जाता है। 13. आंखों में दर्द: एक ग्राम फिटकरी, 40 ग्राम गुलाब जल में भिगोकर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूंद आंखों में प्रतिदिन डालें। इससे आंखों का दर्द, कीचड़ तथा लाली आदि दूर जाएगी। रात को सोते समय आंखों में डालने से तरावट रहती है। इसे रोजाना डाल सकते हैं। 14. उंगुलियों की सूजन: पानी में ज्यादा काम करने से जाड़ों में उंगुलियों में सूजन या खाज हो जाए तो पानी में फिटकरी उबालकर इससे उंगुलियों को धोने से लाभ होता है। 15. पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन, रक्त आना: एक भाग नमक, दो भाग फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों पर प्रतिदिन तीन बार लगायें। फिर एक गिलास गर्म पानी में पांच ग्राम फिटकरी डालकर हिलाकर कुल्ले करें। इससे मसूढ़े व दांत मजबूत होंगे। इससे रक्त आना और मवाद का आना बंद हो जाएगा। 16. दांतों का दर्द: भुनी फिटकरी, सरसों का तेल, सेंधानमक, नौसादर, सांभर नमक 10-10 ग्राम तथा तूतिया 6 ग्राम को मिलाकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। इससे दांतों को मलने से दांतों का दर्द, हिलना, टीस मारना, मसूढ़ों का फूलना, मसूढ़ों से पीव का निकलना तथा पायरिया रोग ठीक होता है। फिटकरी को बारीक पीसकर पॉउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों का दर्द जल्द ठीक होता है। फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर लगातार कुल्ला करने से दांत में हो रहे तेज दर्द से जल्द आराम मिलता है। भुनी फिटकरी 1 ग्राम, कत्था 1.5 ग्राम तथा भुना तूतिया 240 मिलीग्राम इन सबको बारीक पीस छानकर मंजन की तरह बना लें। इसे प्रतिदिन सुबह-शाम इस मंजन से दांतों को मलें। इससे दांत मजबूत होते हैं। दांत में छेद हो, दर्द हो तो फिटकरी रूई में रखकर छेद में दबा दें और लार टपकाएं दांत दर्द ठीक हो जाएगा। 17. मलेरिया बुखार: एक ग्राम फिटकरी, दो ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले दो-दो घंटे से दो बार दें। मलेरिया नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे देते हैं। इस प्रयोग के दौरान रोगी को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर उसे बुखार आने से 2 घंटे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता है। लगभग 1 ग्राम फिटकरी में 2 ग्राम चीनी मिलाकर मलेरिया बुखार आने से पहले 2-2 घण्टे के अंतराल में 2-2 बार दें। इससे मलेरिया बुखार कम होकर उतर जाता है। फूली हुई फिटकरी के चूर्ण में 4 गुना पिसी हुई चीनी अच्छी तरह मिला लें। इसे 2 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ 2-2 घंटे के अंतर पर 3 बार लें। इससे मलेरिया बुखार में लाभ होता है। 18. दस्त और पेचिश: फिटकरी 20 ग्राम और अफीम 3 ग्राम को पीसकर मिला लें। सुबह-शाम इस चूर्ण को दाल के बराबर पानी के साथ रोगी को पिलाएं इससे दस्तों में लाभ होगा। फिर तीन घंटे बाद ईसबगोल की भूसी के साथ दें तो पेचिश बंद हो जाएगी और खून का आना भी बंद हो जाएगा। 120 मिलीग्राम फिटकरी को जलाकर शहद के साथ एक दिन में 4 बार पीने से खूनी दस्त और पतले दस्त का आना बंद हो जाता है। खाने में साबूदाने की खीर या जौ का दलिया लें। 1 ग्राम फिटकरी को 1 कप छाछ के साथ एक दिन में 3 बार पीने से गर्मी के कारण आने वाले खूनी दस्तों में लाभ मिलता है। 20 ग्राम फिटकरी और 3 ग्राम अफीम को मिलाकर पीसकर चूर्ण बनाकर रख दें, फिर इस बने चूर्ण को थोड़े से पानी के साथ पीने से दस्त में लाभ मिलता है। फिटकरी को भूनकर लगभग 2 ग्राम बेल के रस में मिलाकर पीने से लाभ मिलता है। भुनी हुई फिटकरी को गुलाब के जल के साथ मिलाकर पीने से खूनी दस्त आना बंद हो जाता है। 19. आंतरिक चोट: चार ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा किलो गाय के दूध में मिलाकर पिलाने से लाभ प्राप्त होता है। 20. सूजाक: सूजाक में पेशाब करते समय जलन होती है। इसमें पेशाब बूंद-बूंद करके बहुत कष्ट से आता है। इतना अधिक कष्ट होता है कि रोगी मरना पसन्द करता है। इसमें 6 ग्राम पिसी हुई फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पिलाएं। कुछ दिन पिलाने से सूजाक ठीक हो जाता है। साफ पानी में पांच प्रतिशत फिटकिरी का घोल बनाकर लिंग धोना चाहिए। फिटकरी, पीला गेरू, नीलाथोथा, हराकसीस, सेंधानमक, लोध्र, रसौत, हरताल, मैनसिल, रेणुका और इलायची इन्हें बराबर लेकर बारीक कूट पीस छान लें। इस चूर्ण को शहद में मिलाकर लेप करने से उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं। 21. हाथ-पैरों में पसीना आना: यदि पसीना आए तो फिटकरी को पानी में घोलकर इससे हाथ-पैरों को धोएं। इससे पसीना आना बंद हो जाता है। 22. सूखी खांसी: लगभग 10 ग्राम भुनी हुई हुई फिटकरी तथा 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना लेते हैं। सूखी खांसी में एक पुड़िया रोजाना 125 मिलीलीटर गर्म दूध के साथ सोते समय लेना चाहिए। इससे सूखी में बहुत लाभ मिलता है। 23. गीली खांसी: 10 ग्राम भुनी हुई फिटकरी और 100 ग्राम चीनी को बारीक पीसकर आपस में मिला लें और बराबर मात्रा में 14 पुड़िया बना लें। सूखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया प्रतिदिन सोते समय लेना चाहिए तथा गीली खांसी में 125 मिलीलीटर गर्म पानी के साथ एक पुड़िया रोजाना लेने से गीली खांसी लाभ होता है। फिटकरी को पीसकर लोहे की कड़ाही में या तवे पर रखकर भून लें। इससे फिटकरी फूलकर शुद्ध हो जाती है। इस भुनी हुई फिटकरी का कई रोगों में सफलतापूर्वक बिना किसी हानि के उपयोग किया जाता है। इससे पुरानी से पुरानी खांसी दो सप्ताह के अन्दर ही नष्ट हो जाती है। साधारण दमा भी दूर हो जाता है। गर्मियों की खांसी के लिए यह बहुत ही लाभकारी है। 24. श्वास, दमा: आधा ग्राम पिसी हुई फिटकरी शहद में मिलाकर चाटने से दमा, खांसी में आराम आता है। एक चम्मच पिसी हुई फिटकरी आधा कप गुलाब जल में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से दमा ठीक हो जाता है। एक गांठ सोंठ, सफेद फिटकरी का फूला दो ग्राम, हल्दी एक गांठ, 5 कालीमिर्च को चीनी में मिलाकर खाने से श्वास और खांसी दूर हो जाती है। बारहसिंगा की भस्म 2 ग्राम, भुनी हुई फिटकरी एक ग्राम, मिश्री 3 ग्राम मिलाकर पानी से सुबह के समय पांच दिनों तक लगातार सेवन करना चाहिए। इससे श्वास रोग नष्ट हो जाता है। आग पर फुलाई हुई फिटकरी 20 ग्राम तथा मिश्री 20 ग्राम इन दोनों को पीसकर रख लें। इस चूर्ण को 1 या 2 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह के समय सेवन करने से श्वास रोग नष्ट हो जाता है। फूली हुई फिटकरी 120 मिलीग्राम की मात्रा में मुंह में डाल लें और चूसते रहें। इससे न कफ बनता है और न ही दमा रोग होता है। फूली हुई फिटकरी और मिश्री 10-10 ग्राम पीसकर रख लेते हैं। इसे दिन में एक-दो बार डेढ़ ग्राम की फंकी ताजा पानी के साथ लेना चाहिए। इससे पुराना दमा भी ठीक हो जाता है। दूध, घी, मक्खन, तेल, खटाई, तेज मिर्च मसालों से परहेज रखना चाहिए। मक्खन निकला हुआ मट्ठा तथा सब्जियों के सूप (रस) आदि लेना चाहिए। पिसी हुई फिटकरी एक चम्मच, आधा कप गुलाबजल में मिलाकर सुबह-शाम पीने से दमा ठीक हो जाता है। 25. गर्भपात: पिसी हुई फिटकरी चौथाई चम्मच एक कप कच्चे दूध में डालकर लस्सी बनाकर पिलाने से गर्भपात रुक जाता है। गर्भपात के समय दर्द, रक्तस्राव हो रहा हो तो हर दो-दो घंटे से एक-एक खुराक दें। 26. बांझपन: मासिक-धर्म ठीक होने पर भी यदि सन्तान न होती हो तो रूई के फाये में फिटकरी लपेटकर पानी में भिगोकर रात को सोते समय योनि में रखें। सुबह निकालने पर रूई में दूध की खुर्चन सी जमा होगी। फोया तब तक रखें, जब तक खुर्चन आती रहे। जब खुर्चन आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि बांझपन रोग समाप्त हो गया है। 27. योनि संकोचन: बांझपन की तरह योनि में रूई का फाया रखें तथा फिटकरी पानी में घोलकर योनि को दिन में तीन बार धोएं। इससे योनि सिकुड़कर सख्त हो जाएगी और योनि का ढीलापन समाप्त हो जाएगा। फिटकरी 30 ग्राम और 10 ग्राम माजूफल को लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इस चूर्ण को मलमल के कपड़े में डालकर पोटली बनाकर सोने से पहले रात को योनि में रखने से योनि का ढीलापन दूर होकर सिकुड़ जाती है। 2 ग्राम फिटकरी को 80 मिलीलीटर पानी में घोलकर योनि को धोने से योनि की आकृति कम यानी योनि सिकुड़ने लगती है। 28. खांसी: आधा ग्राम पिसी हुई फिटकरी को शहद में मिलाकर चाटने से दमा और खांसी में बहुत लाभ मिलता है। लगभग 60 ग्राम लाल फिटकरी को पीसकर आक (मदार) के दूध में घोंटकर सुखा लें। इसके बाद इसकी भस्म तैयार कर लें। फिर इसे धतूरे के रस में घोंटकर सुखा लें। इसे फिर भस्म करते हैं। इसके बाद इसमें लगभग डेढ़ ग्राम अफीम मिलाकर फिर भस्म करते हैं। यह स्फटिक भस्म खांसी और श्वास (सांस के रोग) को ठीक करती है। इसे पान के रस, अदरक के रस या शहद के साथ खाना चाहिए। फिटकरी को दरादरा (मोटा-मोटा) पीसकर तवे पर भूनते समय केले के पेड़ के गूदे का पानी 100 ग्राम थोड़ा-2 कर गेरते जाएं फिर इसे उतारकर ठण्डा करके पीस लेते हैं। इसे 1 साल के बच्चे को एक 3 मिलीग्राम तथा 2 साल के बच्चे को 6 मिलीग्राम और 3 साल के बच्चे को 12 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चटाएं। इससे काली खांसी दूर हो जाती है। लगभग 120 मिलीग्राम भुनी हुई फिटकरी तथा 120 मिलीग्राम चीनी को मिलाकर सुबह-शाम रोगी को खिलाने से पांच दिनों में ही कालीखांसी दूर हो जाती है। वयस्कों (बालिग व्यक्तियों) को काली (कुकुर) खांसी होने पर उन्हें दुगुनी मात्रा में देना चाहिए। यदि बिना पानी के निगल न सके तो एक-दो घूंट गर्म पानी ऊपर से पिलाना चाहिए। 12 मिलीग्राम भुनी हुई फिटकरी लेकर इसमें 12 मिलीग्राम शक्कर मिलाकर दिन में 3 बार खाने से 5 दिन में ही खांसी ठीक हो जाती है। 120 मिलीग्राम फिटकरी की भस्म को सुबह और शाम लगभग 240 मिलीग्राम काकड़ासिंगी चूर्ण और शहद के साथ सेवन करने से खांसी में बहुत अच्छा लाभ मिलता है। चने की दाल के बराबर पिसी हुई फिटकरी को गर्म पानी से रोजाना 3 बार लेने से कुकुर खांसी ठीक हो जाती है। 29. कान में चींटी चली जाने पर: कान में चींटी चली जाने पर कान में सुरसरी हो तो फिटकरी को पानी में घोलकर पीने से लाभ मिलता है। 30. बिच्छू के काटने पर: बिच्छू के काटने पर फिटकरी को पानी में पीसकर लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है। 31. हैजा: आधा गिलास पानी में 5-ग्राम फिटकरी घोलकर सेवन करने से हैजा रोग में लाभ मिलता है। 32. मुंह के छाले: फिटकरी को पानी में घोलकर कुल्ले करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। चौथाई चम्मच फिटकरी, आधा चम्मच नमक लेकर दोनों को एक गिलास पानी में मिलाकर कुल्ले करने से छाले ठीक हो जाते हैं। सफेद फिटकरी और नीला थोथा बराबर मात्रा में लेकर पाउडर बना लें, फिर रूई का फोये में एक ग्राम पाउडर डालकर मुंह के छाले पर एक मिनट लगाएं रखें। लार थूकते रहें, निगलें नहीं। किसी भी अवस्था में यह पेट में नहीं जाना चाहिए यह मिश्रण विषमकारी होता है। अत: पेट में नहीं जाएं इसकी सावधानी रखनी चाहिए। इसके अलावा दो ग्राम पाउडर एक गिलास पानी में घोलकर कुल्ले भी कर सकते हैं। अंत में साफ पानी से कुल्ला कर लेते हैं। इससे छालों में तुरन्त ही लाभ मिलता है। 33. सर्पदंश: सर्पदंश रोगी को फिटकरी पानी में घोलकर पिलाना लाभकारी होता है। 34. घट्टा या आटण: पैरों में कही-कहीं पर पत्थर की तरह सख्त कठोर गांठ सी हो जाती हैं, चलने में दर्द होता है। फिटकरी, हल्दी और सुहागा तीनों बराबर मात्रा में पीसकर रख लेते हैं। इसका थोड़ा पाउडर लेकर पानी में गाढ़ा-गाढ़ा मिलाकर घट्टे (गांठ) पर प्रतिदिन लगाना चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में आटण ठीक हो जाएगा। नींबू के रस से आटण को तर (गीलर) रखने से भी आटण ठीक हो जाता है। यह सफल प्रयोग है। 35. शरीर के अंग-अंग में दर्द: कच्ची फिटकरी और सोडा बाई कार्ब दोनों समान मात्रा मिलाकर पीस लेते हैं। इसकी आधी चम्मच मात्रा गर्म पानी से फंकी लेने से लाभ मिलता है। 36. शारीरिक दुर्बलता: एक किलो फिटकरी अपने शयनकक्ष में रखें इससे मानसिक तनाव दूर होता है तथा दुर्बलता (कमजोरी) दूर होती है। 37. सेव लोशन: 1 चम्मच फिटकरी को 1 चम्मच पानी में मिला लें। दाढ़ी बनाने के बाद इसे लगाएं। यह सबसे अच्छा सेव लोशन सिद्ध होगा। 38. हकलाना, तुतलाना: फिटकरी को भूनकर उसका 2 ग्राम चूर्ण रोज रात को सोते समय जीभ पर रखें और 4-5 मिनट बाद कुल्ला कर लें। कुछ महीनों तक इसका प्रयोग करना लाभकारी होता है। सोते समय मूंग की दाल के बराबर फिटकरी का टुकड़ा मुंह में रखकर सोंये। ऐसा प्रतिदिन करने से तुतलाना ठीक हो जाता है। 39. चूहे: सफेद फिटकरी कूटकर चूहों के बिल, जहां चूहे रहते हैं, वहां डालने से चूहे भाग जाते हैं। 40. गले की खराश: खाने का सोडा और खाने का नमक बराबर मात्रा में लेकर उसमें थोड़ी सी फिटकरी को मिलाकर शीशी में भरकर रख लेते हैं। इस मिश्रण की एक चम्मच मात्रा एक गिलास गर्म पानी में घोल लें। इस पानी से सुबह उठते और रात को सोते समय अच्छी तरह गरारे करना चाहिए। इससे गले की खराश, टॉंसिल की सूजन, मसूढ़ों की खराबी और गले में जमा कफ नष्ट होने से गले के रोग और खांसी नहीं होती है। 41. कांच निकलना (गुदाभ्रंश): कच्ची फिटकरी आधा ग्राम को पीसकर 100 मिलीलीटर पानी में घोलकर गुदा को धोने से गुदाभ्रंश ठीक होता है। लगभग 1 ग्राम फिटकरी को 30 मिलीलीटर जल में घोल लें। शौच के बाद मलद्वार को साफ करके फिटकरी वाले जल को रूई से गुदा पर लगाएं। इससे गुदाभ्रंश ठीक होता है। 42. उर:क्षत (सीने में घाव): गुलाबी फिटकरी को महीन पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से उर:क्षत (सीने में घाव) मिट जाता है। 43. जीभ की प्रदाह और सूजन: 350 ग्राम फिटकरी को 1 लीटर पानी में घोलकर गरारे करें। इससे प्रतिदिन सुबह-शाम गरारे करने से लाभ मिलता है। 44. जुएं का पड़ना: 10 ग्राम फिटकरी के चूर्ण के साथ 1 लीटर पानी मिला लें। इस तैयार घोल से रोजाना बालों को धोने से जुएं मर जाएंगे। 45. खून में पीव आना (प्याएमिया): लगभग 240 से 480 मिलीग्राम फिटकरी मिश्री या शर्बत के साथ मिलाकर सेवन करने से यह खून में पीव की मात्रा को कम करके खून को साफ करता है। 46. कैन्सर कर्कट रोग: फिटकरी एक अच्छा रक्तशोधक माना गया है। इसलिए फिटकरी की 480 मिलीग्राम भस्म (राख) सुबह-शाम मिश्री के साथ या मिश्री मिले शर्बत के साथ रोग का सन्देह होते ही देना प्रारम्भ कर दें। सम्भवत: कुछ लाभ हो सकता है। 47. खून की उल्टी: भुनी हुई फिटकरी को सुबह और शाम 1-1 ग्राम पानी से लेने से खून की उल्टी बंद हो जाती है। 48. योनि रोग: फिटकरी अथवा त्रिफला को पानी में डालकर उबाल लें। फिर उसे छानकर गुप्तांग (योनि) में पिचकारी देने से योनि रोग मिट जाते हैं। 49. बहरापन: 5 ग्राम फिटकरी, 3 ग्राम नौसादर और 100 ग्राम कलमीशोरा को 100 मिलीलीटर सरसों के तेल में डालकर पका लें। फिर इसे छानकर किसी शीशी में भरकर शीशी का मुंह बंद करके रख लें। इस तेल की 2-3 बूंदें कान में डालने से बहरापन ठीक हो जाता है। 50. कान का दर्द: रूई की एक लम्बी सी बत्ती बनाकर उसके आगे के सिरे में शहद लगा दें और उसमें लाल फिटकरी को पीसकर उसका चूर्ण लपेट दें। इस बत्ती को कान में डालकर एक दूसरे रूई के फाये से कान को बंद कर दें। ऐसा करने से कान का जख्म, कान का दर्द और कान से मवाद बहना जैसे सभी रोग ठीक हो जाते हैं। 51. कान का कीड़ा: पानी में फिटकरी को मिलाकर कान में डालने से कान में घुसा हुआ कीड़ा बाहर आ जाता है। 52. कान का बहना: भुनी हुई फिटकरी को 2 ग्राम पिसी हुई हल्दी में मिलाकर कान को साफ करके उसके अन्दर डालने से कान से मवाद बहना दूर हो जाता है। फिटकरी के पानी से कान को धोने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है। 10 ग्राम फिटकरी और 1 ग्राम हल्दी को पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को थोड़ा-सा कान में डालने से कान में से मवाद बहना बंद हो जाता है। 53. गुर्दे के रोग: गुर्दे की सूजन में भूनी हुई फिटकरी एक ग्राम दिन में कम से कम तीन बार जरूर लें। 54. मुंह के छाले एवं रोग: आधा चम्मच फिटकरी का चूर्ण और आधा चम्मच इलायची का चूर्ण लेकर दर्द होने पर थोड़ी-थोड़ी देर बाद छालों पर बुरकने से मुंह के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। फिटकरी को फूलाकर नीलाथोथा के साथ मिलाकर कूटकर चूर्ण बना लें। इसके चूर्ण को छालों पर लगाकर लार को नीचे टपकने दें। यह मुंह की गंदगी खत्म कर छालों को नष्ट करता है। मुंह में छाले, दाने व घाव होने पर 1 ग्राम कच्ची फिटकरी पीसकर इसमें शहद मिलाकर मुंह में लगाने से लाभ मिलता है। भुनी फिटकरी 800 मिलीग्राम, कत्था पापरी 640 मिलीग्राम, इलायची के दाने 640 मिलीग्राम और शीतल चीनी 640 मिलीग्राम इन सब को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर रखें। इसके चूर्ण को छालों पर लगाने से छाले व जलन दूर होती हैं। फिटकरी को पानी में घोलकर इसके पानी से दिन में 3 से 4 बार कुल्ला करें। इससे मुंह के छाले व घाव नष्ट होते हैं। 55. मसूढ़ों के रोग: नौसादर, फिटकरी एवं संग जराहत बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को कपड़े से छानकर मसूढ़ों पर धीरे-धीरे मलने से फोड़े सूख जाते हैं। गर्म पानी में फिटकरी को घोलकर दिन में 3 से 4 बार कुल्ला करने से मसूढ़ों के फोड़े ठीक होते हैं। मसूढ़ों में फोड़ा होने पर सेलखड़ी 30 ग्राम, फिटकरी 10 ग्राम एवं नमक 5 ग्राम को मिलाकर बारीक पाउडर बनाकर रखें। इस पाउडर 2 से 3 बार मसूढ़ों पर मलने से लाभ होता है। फिटकरी और माजूफल 25-25 ग्राम मोटा-मोटा कूट लें। इसे 100 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें। जब 50 मिलीलीटर पानी बचे तो गर्म पानी से कुल्ला करें। इससे मसूढ़ों से खून आना बंद हो जाता है। फिटकरी लगभग 10 ग्राम, सेलखड़ी 30 ग्राम तथा नमक 5 ग्राम को बारीक पीसकर पाउडर (मंजन) बना लें। इस पाउडर से मसूढ़ों की मालिश करने से मसूढ़ों के छाले दूर हो जाते हैं। भूनी फिटकरी, सेंधानमक, कालीमिर्च और हरड़ का छिलका 10-10 ग्राम कूट छानकर मंजन बना लें। रोजाना सुबह-शाम इस मंजन से मसूढ़ों को मलने से मसूढ़ों का ढीलापन, सूजन एवं दर्द दूर होता है। फिटकरी, संग जराहत और सुपारी बराबर मात्रा में लेकर इन सब को बारीक पीसकर मंजन बना लें। प्रतिदिन इससे मंजन करने से मसूढ़े मजबूत होते हैं तथा मसूढ़ों से खून का आना बंद हो जाता है। 56. यकृत: एक बताशे में 1 चुटकी पिसी हुई फिटकरी डालकर सुबह-दोपहर और शाम को 1-1 बताशे 5 दिनों तक खाने से यकृत (जिगर) के रोग में लाभ मिलता है। 57. अण्डकोष की सूजन: लगभग 1-4 ग्राम की मात्रा में फिटकरी और माजूफल को लेकर पानी के साथ बारीक पीस लें, फिर इस तैयार मिश्रण का लेप अण्डकोष पर करने से कुछ ही दिनों में अण्डकोष की सूजन दूर होती है। भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से अण्डकोष के सूजन और बढे़ हिस्से सही हो जाते हैं। फिटकरी को पानी में पीसकर अण्डकोष पर लेप करने से लाभ होता है। 58. दंत मंजन: बादाम का छिलका जलाकर उसमें चौथाई हिस्सा फिटकरी मिलाकर बारीक पीस लें। इसका प्रतिदिन मंजन करना चाहिए। इससे दांतों के सभी रोग दूर हो जाते हैं तथा दांत निरोग रहता है। 5 ग्राम सेंकी हुई फिटकरी, 60 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 15 लौंग, 8 ग्राम सेंधानमक, 10 ग्राम माजूफल को एक साथ पीसकर मैदा की छलनी से छान लेते हैं। इसे प्रतिदिन भोजन करने के बाद सुबह-शाम दांतों की जड़ों व मसूढ़ों पर लेप करें और 15 मिनट तक लगा रहने दें और लार को टपकाते रहें। इससे दांतों का दर्द दूर हो जाता है तथा दांत मजबूत हो जाते हैं। लगभग 125 ग्राम लाल फिटकरी को सेंककर राख बनाकर इसमें 25-25 दाने कालीमिर्च, लौंग तथा 30 ग्राम सेंधानमक को बहुत बारीक पीसकर सुबह-शाम 2 बार रोजाना मंजन करें। मंजन दांतों के बाहर भीतर दोनों ओर करें तथा 10 मिनट बाद कुल्ला करें। इससे पायरिया, रक्तस्राव तथा दांत दर्द में लाभ मिलता है। इस मंजन को एक सप्ताह तक लगातार करने से बहुत लाभ मिलता है। 100 ग्राम भुनी हुई फिटकरी, 20 ग्राम पिसी हुई लौंग, 100 ग्राम पिसी हुई हल्दी, 100 ग्राम पिसा हुआ सेंधानमक, 100 ग्राम नीम के पिसे हुए पत्ते या छाल या बबूल की छाल इन सभी को मिलाकर बारीक पीसकर पाउडर बना लें। इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांतों के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। फिटकरी 8 ग्राम तथा सेंधानमक 4 ग्राम को बारीक पीसकर मंजन बना लें। इस मंजन को प्रतिदिन दांतों पर मलने से दांतों के दर्द में आराम मिलता है तथा दांत मजबूत होते हैं। 59. दांत घिसना या किटकिटाना: फिटकरी, सेंधानमक और नौसादर बराबर मात्रा में लें। इन सबको बारीक पीसकर पाउडर (मंजन) बना लें। इससे रोजाना 2 बार दांतों व मसूढ़ों को मलें। इससे दांतों में लगे कीड़े नष्ट हो जाते हैं और दांत का किट-किटाना बंद हो जाता है। 60. दांत मजबूत करना: भुनी फिटकरी 20-ग्राम तथा नमक 10-ग्राम को बारीक पीसकर पॉउडर (मंजन) बना लें। इसे रोजाना दांत एवं मसूढ़ों पर मलने से दांत मजबूत होते हैं। 61. दांतों में कीड़े लगना: रोजाना दोनों समय फिटकरी को गर्म पानी में घोलकर कुल्ला करें। फिटकरी के पानी से कुल्ला करने से दांतों के कीड़े तथा बदबू खत्म हो जाती है। 62. पायरिया: 1 ग्राम नमक और 2 ग्राम फिटकरी बारीक पीसकर मसूढ़ों व दांतों पर मलें तथा 1 गिलास गर्म पानी में 5 ग्राम फिटकरी मिलाकर कुल्ला करें। इससे पायरिया, मसूढ़ों में दर्द, सूजन और खून का आना बंद होता है। 63. पसीना: फिटकरी को पानी में घोलकर शरीर को धोने से पसीना आना कम हो जाता है। 64. पित्ती, जलन और खुजली: पिसी हुई फिटकरी को आधा कप गर्म पानी में घोलकर पित्ती निकली हुई जगह पर लगाने और धोने से पित्ती के रोग में लाभ मिलता है। इससे खुजली, जलन तथा चकत्ते दूर हो जाते हैं। 65. सन्निपात ज्वर: 1 ग्राम भूनी फिटकरी को 2 ग्राम चीनी में मिलाकर सुबह और शाम पानी के साथ पीने से बुखार ठीक हो जाता है। 66. मोच, चोट: मोच आ जाने पर, कचूर को फिटकरी के साथ पीसकर लेप करने से लाभ होता है। फिटकरी के 3 ग्राम चूर्ण को आधा किलो दूध के साथ लेने से मोच और भीतरी चोट ठीक होती है। फिटकरी भूनी आधा ग्राम गर्म दूध से सुबह-शाम लें। यह गुम चोट में बहुत लाभकारी होता है। 67. चोट से खून जमना: 10 ग्राम फिटकरी को 40 ग्राम घी में भूनकर रख लें। जब घी जम जाये, तब घी में चीनी और मैदा मिलाकर हलुवा बना लें। फिर इसमें फिटकरी मिलाकर 3 दिनों तक खाने से खून की गांठें बिखर जाती हैं। डेढ़ ग्राम फिटकरी फांककर ऊपर से दूध सुबह-शाम पीने से चोट लगने के कारण खून जमने और इससे होने वाले दर्द दूर होते हैं। 68. कनफेड: फिटकरी, माजूफल, पलाश, पापड़ी और मुर्दासंग को एक साथ लेकर खिरनी के पेड़ के रस में मिलाकर कनफेड पर लगाने से आराम आता है। 69. एड्स: फिटकरी का भस्म बनाकर, 20 ग्राम भस्म में 1 ग्राम मिश्री 70. भगन्दर: भुनी फिटकरी 1-1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पानी के साथ पीयें तथा कच्ची फिटकरी को पानी में पीसकर इसे रूई की बत्ती में लगाकर भगन्दर के छेद में भर दें। इससे भगन्दर में अधिक लाभ होता है। 71. श्वेतप्रदर व रक्त प्रदर: चौथाई चम्मच पिसी हुई फिटकरी को पानी से रोजाना 3 बार फंकी लेने से दोनों प्रदर ठीक हो जाते हैं। इसके साथ ही फिटकरी पानी में मिलाकर योनि को गहराई तक सुबह-शाम धोएं और पिचकारी दें। 72. रक्तप्रदर: लगभग 240-480 मिलीग्राम फिटकरी को कूट-पीसकर बनाई गई भस्म (राख) मिश्री या मिश्री के शर्बत के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर मिट जाता है। 73. प्रदर रोग: 1-1 चुटकी पिसी हुई फिटकरी सुबह-दोपहर-शाम को पानी के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ मिलता है। फिटकरी के पानी से नियमित रूप से योनि को अच्छी तरह से धोयें। अगर पिचकारी से योनि के अन्दर धोने की सुविधा हो तो धोयें। इसके बाद 2 चुटकी फिटकरी, 1 चम्मच पिसी हुई हल्दी और 2 चम्मच चीनी मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ करीब 20 दिनों तक इसका सेवन करने से ‘वेत प्रदर मिट जाता है। फिटकरी के पानी से गुप्तांग (योनि) को धोने, सफाई करने और पिचकारी देने से प्रदर में लाभ होता है। 74. गुम चोट (अन्दरूनी चोट): गुम चोट लगने पर 4 ग्राम फिटकरी को पीसकर आधा गिलास दूध में मिलकार पीने से लाभ होता है। किसी भी तरह की अन्दरूनी चोट हो, कारण कुछ भी हो एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच फिटकरी घोलकर पी लें इससे खून का अन्दर ही अन्दर थक्का नहीं बनेगा और दर्द भी कम हो जायेगा। भूनी फिटकरी आधा ग्राम गर्म दूध से सुबह-शाम लें। गुम चोट में लाभदायक है। 75. पथरी: फिटकरी का फूला 4 ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम छाछ के साथ पीने से पथरी ठीक होती है। 76. गर्भाशय से रक्तस्राव: फिटकरी का चूर्ण आधा चम्मच लेकर 1 लीटर पानी में घोल बना लें। इस घोल में रूई की फूरेरी भिगोकर गर्भाशय के मुख पर रखने से रक्तस्राव बंद हो जाता है। 77. पित्ती निकलना: पिसी हुई फिटकरी आधा चम्मच, आधे कप गर्म पानी में घोलकर पित्ती निकलने वाली जगह पर लगायें और धोयें। 78. शीतपित्त: फिटकरी को तवे पर भूनकर कूटकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की लगभग 480 मिलीग्राम मात्रा को मक्खन मिलाकर खाने से जल्द लाभ मिलता है। 79. संतति निरोध (गर्भनिरोध): फिटकरी और नौसादर को बराबर मात्रा में अच्छी तरह पीसकर पानी में रूई के साथ डालकर रख दें, फिर इसी रूई को सहवास करने से पहले स्त्री की योनि में रखते हैं। थोड़ी देर बाद रूई हटाकर सहवास (संभोग) करने से गर्भाधान यानी गर्भधारण नहीं होता है। फिटकरी, नौसादर और सुहागे को पीसकर चूर्ण बनाकर बैसलीन में मिलाकर लेप बनाकर योनि के भीतर रखकर निकाल दें, इसके थोड़ी देर बाद सहवास (संभोग) करने से गर्भ नहीं ठहरता है। 80. रक्तपित्त (पित्त के कारण रक्तविकार): लाल फिटकरी पीसकर इसका बारीक चूर्ण 10 ग्राम शीशी में रख लें। यह स्फटिक चूर्ण बहुत से रोगों में फायदा करता है। एक ग्राम चूर्ण 3 ग्राम शक्कर में मिलाकर फांक लें और तुरन्त दूध पी लें। यह रक्तपित्त में खून चाहे कहीं से भी गिर रहा हो तो बंद कर देगा। लगभग 120 मिलीग्राम फिटकरी को एक चम्मच चीनी में मिलाकर या दोनों को एक साथ पानी में घोलकर रोज दो तीन बार पिलाने से रक्तपित्त की शिकायतें दूर हो जाती हैं। 81. पेट के सभी प्रकार के रोग: भुनी हुई फिटकरी 10 ग्राम, भूना सुहागा 10 ग्राम, नौसादर ठीकरी 10 ग्राम, काला नमक 10 ग्राम, भूनी हींग 5 ग्राम को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इसी चूर्ण में से 2-2 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम भोजन के साथ प्रयोग करने से लाभ होता है। 82. नाक के कीड़े: लगभग 240 मिलीग्राम फिटकरी के चूर्ण को 100 मिलीलीटर पानी में डालकर रख लें। इस पानी की 3-4 बूंदें रोजाना 3 से 4 बार सिर को पीछे की ओर झुकाकर नाक के नथुनों (छेदों) में डालने से नाक के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। 83. प्लेग रोग: फिटकरी की भस्म 360 मिलीग्राम और मिश्री 1 ग्राम मिलाकर प्रतिदिन 2 बार लेने से प्लेग की बीमारी दूर हो जाती है। 2 ग्राम फिटकरी भून लें। 2-2 ग्राम फिटकरी का चूर्ण गर्म पानी से दिन में 4 बार लें। इससे प्लेग के बीमारी के कारण आने वाली खून की उल्टी बंद हो जाती है। 84. वीर्य रोग में: फिटकरी भूनी 30-ग्राम खांड 60-ग्राम मिला लें। 3-3 ग्राम सुबह-शाम पानी से लें। 85. पेट में दर्द: पिसी हुई फिटकरी को चूर्ण के रूप में खाने के बाद ऊपर से दही को पीयें। 86. स्त्री को सन्तुष्ट करना: फिटकरी को पुरुश अपनी कमर पर बांधकर सहवास (संभोग) करें तो वीर्य जल्दी नहीं निकलता है। 87. पेशाब में खून आना: 1 ग्राम भुनी हुई फिटकरी को सुबह और शाम पानी के साथ लेने से पेशाब में खून आना बंद हो जाता है। 88. अपरस: भूनी फिटकरी, आमलासार, गंधक, भुना हुआ सुहागा और शक्कर को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह से पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सफेद वैसलीन में मिलाकर रोजाना 2-3 बार त्वचा पर लगाने से लाभ होता है। 89. गठिया रोग: 5 ग्राम फिटकिरी, 15 ग्राम मीठी सुरंजन, 5 ग्राम बबूल की गोंद और 10 पीस कालीमिर्च सबको सूखाकर भूनकर एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें। उसमें से 2 चुटकी चूर्ण रोजाना दो बार लेने से गठिया रोग जल्द ठीक होता है.90. खाज-खुजली: गर्म पानी में फिटकरी मिलाकर उससे जननेन्द्रिय को धोने से जननेन्द्रिय की खुजली दूर हो जाती है। 91. हाथ-पैरों की ऐंठन: 10 ग्राम भुनी हुई सफेद फिटकरी, 30 ग्राम सुरज्जन मीठी और 2 ग्राम कीकर के गोंद को पीसकर थोड़ा पानी मिलाकर गोलियां बना लें। एक-एक गोली दिन में तीन बार लेने से हाथ-पैरों की ऐंठन दूर हो जाती है। यह दवा खूनी बवासीर के लिए भी लाभकारी है। 92. हाथ-पैरों की जलन: पानी में फिटकरी घोलकर हथेली और तलुवे धोने से अधिक पसीना आना बंद हो जाता है और जलन भी दूर हो जाती है। 93. पीलिया रोग: सफेद फिटकरी को भूनकर पीस लें। पहले दिन आधा ग्राम दवा दही में मिलाकर खाएं, दूसरे दिन एक ग्राम और तीसरे दिन डेढ़ ग्राम........इसी प्रकार बढ़ाते हुए सातवें दिन साढे़ तीन ग्राम दवा दही में डालकर खायें। इससे एक सप्ताह में पीलिया रोग मिट जाता है। फिटकरी 18 ग्राम को बारीक पीसकर 21 पुड़िया बना लें। प्रात:काल बिना कुछ खाए एक पुड़िया गाय के 20 ग्राम मक्खन में मिलाकर खाने से पाण्डु (पीलिया) रोग में लाभ होता है। फूली हुई फिटकिरी एक चुटकी, मिश्री में मिलाकर दिन में तीन बार पानी से सेवन करें। 200 ग्राम दही में चुटकी भर फिटकरी घोल कर पिलायें। बच्चों के अनुपान में मात्रा कम लें। दिन भर केवल दही ही सेवन करें। इससे पीलिया शीघ्र ठीक होगा। यदि उल्टी हो तो घबरायें नहीं। 94. मिर्गी (अपस्मार): लगभग 1-1 ग्राम भुनी हुई फिटकरी को सुबह और शाम गर्म दूध के साथ लेने से मिर्गी के दौरे बंद हो जाते हैं। 95. मानसिक उन्माद (पागलपन): लगभग 1-1 ग्राम भुनी हुई फिटकरी को दूध के साथ सुबह और शाम को देने से पागलपन या उन्माद खत्म हो जाता है। 3 ग्राम फिटकरी में 250 ग्राम मक्खन मिलाकर रोगी को खिलाने से उन्माद या पागलपन खत्म हो जाता है। ऐसा लगातार एक हफ्ते तक करना चाहिए। 96. सिर का दर्द: कपूर और फिटकरी को बारीक पीसकर सिर दर्द के रोगी को सुंघाने से रक्तचाप के कारण होने वाला सिर दर्द खत्म हो जाता है। नकसीर के लिए भी इसका प्रयोग कर सकते!


Saffron health benefits

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