शुक्रवार, 11 जून 2021

Corn health benefits

 


परिचय : मक्के को उगाना अत्यन्त सरल है और इसकी देखभाल भी कम करनी पड़ती है, फिर भी उत्त्पादन अच्छा होता है। मक्के के टिक्कड़ बनते हैं। मक्के के टिक्कड़ और उड़द के आटे की भुजिया का भोजन में प्रयोग आदिवासी वाले लोग करते हैं। मक्के से पकौडे़ तथा पकवान बनते हैं। मक्के के नर्म हरे भुट्टे सेंककर खाने से उसके दाने बड़े स्वादिष्ट लगते हैं और पौष्टिक भी होते हैं। मक्के के सूखे दाने की खील खाने में अच्छी होती है। रंग : यह हल्के पीले रंग का होता है। स्वाद : यह खाने में मीठा, कडुवा और कषैला होता है। स्वभाव : मक्का खाने में ठंडा होता है। हानिकारक : यह पचने में भारी है। अत: जिसका शरीर बलवान हो और जिसकी जठराग्नि (पाचन शक्ति) तेज हो, उसी को यह पचता है। कमजोर पाचन-शक्ति वालों के लिए मक्का हानिकारक है। यह शरीर की नसों को शिथिल करता है। गुण : मक्का अत्यन्त रूक्षा (रूखा), कफ और पित्तनाशक, रुचि को बढ़ाने वाला, दस्तों को रोकने वाला होता है। मक्के के टिक्कड़ मुश्किल से पचने वाले और वायु पैदा करने वाले (बढ़ाने वाले) होते हैं। विभिन्न रोगों में सहायक : 1. शक्तिवर्धक: मक्का खाने से शरीर को काफी लाभ मिलता है। इसे मक्का आमाशय को मजबूत बनता है। मक्का खून को बढ़ाने वाला (रक्त-वर्धक) होता है। 2. मक्का के तेल को निकालने की विधि: ताजी दूधिया मक्का के दाने पीसकर कांच की शीशी में भरकर खुली हुई शीशी धूप में रखें। इससे दूध सूखकर उड़ जाएगा और तेल शीशी में रह जाएगा। इस तेल को छानकर दूसरी साफ शीशी में भरकर सुरक्षित रख लें और इस तेल से मालिश किया करें। इस तेल की कमजोर बच्चों के पैरों पर मालिश करने से बच्चे के पैरों में शक्ति आती है और बच्चा जल्दी चलने लगता है। 1 चम्मच तेल में शर्बत मिलाकर पीने से बल भी बढ़ता है। 3. खांसी, कुकर-खांसी और जुकाम: मक्का के भुट्टे को जलाकर उसकी राख पीस लें, इसमें स्वादानुसार सेंधानमक मिला लें, फिर रोजाना 4 बार चौथाई चम्मच लेकर गर्म पानी से फंकी लें। इसके सेवन से लाभ मिलता है। 4. पेशाब में जलन होना: ताजा मक्का के भुट्टे को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन और गुर्दों की कमजोरी दूर होती है। 5. यक्ष्मा (टी.बी.): टी.बी. के रोग से पीड़ित व्यक्ति को मक्का की रोटी खिलाने से लाभ होता है। 6. पथरी: मक्का के भुट्टे और जौ को जलाकर राख कर लें। दोनों को अलग-अलग पीसकर अलग-अलग शीशियों में भरकर रख लें। उन शीशियों में से दो चम्मच मक्का की राख और दो चम्मच जौ की राख को एक कप पानी में घोल लें, फिर छानकर इस पानी को पी लें। ऐसा करने से पथरी गल जाती है और पेशाब खुलकर आता है। मक्के को तथा जौ को अलग-अलग जलाकर भस्म (राख) बनाकर पीस लें तथा अलग-अलग बर्तन में रखें। रोजाना सुबह मक्के का 2 चम्मच भस्म (राख) 1 कप पानी में मिलाकर पीयें तथा शाम को जौ का भस्म (राख) 2 चम्मच एक कप पानी में मिलाकर पीने से पथरी ठीक हो जाती है। 7. उल्टी: मक्का के भुट्टे में से दाने निकालकर उन्हें जलाकर राख कर लें, फिर इस राख को आधा ग्राम लेकर शहद के साथ चाटें। इससे कै (उल्टी) आना तुंरत ही बन्द होती है। 8. काली खांसी: मक्का के बीज निकाले हुए भुट्टे को जलाकर राख कर लें। इसके 1-2 ग्राम राख को शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से काली खांसी दूर हो जाती है। 9. खांसी: मक्का को जलाकर उसकी राख को इकट्ठा कर लें फिर इसमें लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में पिसा हुआ कोयला और कालानमक मिलाकर रख दें। इसे शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से कालीखांसी और कुकुर खांसी भी दूर हो जाती है। मक्का के भुट्टे को जलाकर उसकी राख को पीस लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधानमक मिला दें। इसके आधा-आधा चम्मच चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से खांसी में लाभ मिलता है। 10. जुकाम: मक्के के भुट्टे को पूरी तरह से जलाकर उसकी राख बना लें, फिर इसमें स्वाद के अनुसार सेंधानमक मिलाकर रोजाना 4 बार फंकी लें। इससे जुकाम ठीक हो जाता है। 11. मूत्ररोग: लगभग 30 ग्राम मक्का के सुनहरी बालों को 250 ग्राम पानी में उबालें और जब 60 ग्राम रह जाये तो छानकर ठंडा करके पी लें इससे पेशाब खुलकर आता है। 12. गुर्दे के रोग: मक्के के भुट्टे के 20 ग्राम बालों को 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें। जब 100 मिलीलीटर पानी ही शेष बचे तब छानकर पीने से गुर्दे के रोग ठीक हो जाते हैं। 13. प्रदर रोग: मक्का की छूंछ की राख शहद के साथ सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है। 14. दिल की कमजोरी: मक्का के दाने निकली हुई भुट्टे की डण्डी को जलाकर इसकी राख को पीसकर रख लें। इसके आधा ग्राम चूर्ण को ताजा मक्खन के साथ खाने से दिल की कमजोरी दूर होती है।

बुधवार, 9 जून 2021

Apple health benefits

 

परिचय : सेब एक फल है जिसकी गणना उत्तम कोटि के फलों में की जाती है। इसका मूल देश यूरोप और एशिया के ठंडे पहाड़ी प्रदेश है। सेब के गुणों की प्रशंसा में अनेक लोकोक्तियां प्रसिद्ध है जैसे सोते समय रोजाना एक सेब खाते रहे तो डाक्टर छाती पीट कर रह जायें। सेब के पेड़ की ऊंचाई ज्यादा बड़ी नही होती है। सेब की अनेक किस्में होती है। इनमें गोल्डन डिलीशन, प्रिन्स आल्बर्ट, चार्ल्स रोस, न्यूटन वन्डर, बेमले सीडलिग, लेकस्टन सुपर्व, ब्लेनहीम आरेन्ज, आरेन्ज पिपिन, रेड सोल्जर और अमेरिकन मदुर ये दस किस्में खास और प्रसिद्ध है। सेब का अचार, मुरब्बा, चटनी और शर्बत भी बनाया जाता है। स्वरूप : सेब काफी पुराना फल है। इसकी प्राचीनता का प्रमाण यही से मिलता है कि चीन, बेबीलोन और मिस्र के साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है। इसकी बहुत सी प्रजातियां है और हर प्रजाति के स्वाद, आकार और रंगत में भिन्नता होती है। इस समय विश्व में सेब की लगभग 7,000 किस्में पाई जाती है। भारत के पर्वतीय क्षेत्र में सेब का उत्पादन ज्यादा होता है। नैनीताल में इसकी सबसे ज्यादा पैदावार होती है। उत्पादन के मामले मे दूसरे नंबर पर अल्मोड़ा है। हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और गढ़वाल में भी इसका अच्छा उत्पादन होता है। हमारे देश मे कश्मीर का सेब काफी प्रसिद्ध है। भारत में सेब को एक व्यावसायिक फसल माना गया है। इसका उत्पादन क्षेत्र 6,000 से 8,000 फीट ऊंची पहाडियां है। सेब की विशेषता यह है कि यह ऊपर से देखने में ठोस लगता है, परंतु इसका छिलका मुलायम और भीतरी भाग गूदेदार होता है। इसकी गोलाई 5 से 8 सेंटीमीटर तक होती है। तासीर : सेब का स्वाद खट्टा-मीठा होता है। खट्टे-मीठे स्वाद वाला सेब ही उत्तम माना जाता है। सेब पित्त-वायु को शांत करता है। तृषा (प्यास) मिटाता है और आंतों को मजबूत करता है। आमयुक्त पेचिश मिटाने का गुण भी सेब में है। सेब का ऊपर वाला छिलका निकालकर खाने से मीठे लगते है। सेब को छील कर नही खाना चाहियें क्योंकि इसके छिलके में कई महत्वपूर्ण क्षार होते है। सेब के टुकड़ों को शक्कर में रखने के बाद खाने से वे बहुत मीठे लगते है। सुबह खाली पेट खाने पर सेब ज्यादा फायदेमंद साबित होता है। रक्तचाप को कम करने में यह उत्तम माना जाता है। यह शरीर में स्थित विषाक्त तत्व को दूर करता है। सेब का सेवन करने से दांत और मसूढ़ें मजबूत बनते है। सेब के छोटे-छोटे टुकड़े करके कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में चांदनी रात में बाहर रखकर रोज सुबह-शाम 1 महीने तक सेवन करने से शरीर तन्दुरुस्त बनता है। वैज्ञानिक मतानुसार : सेब में, ग्लूकोज, कार्बोहाइड्रेट, पोटेशियम, फास्फारस, लौह, ईथर, मैलिक एसिड, लिसिथिन, खनिज आदि क्षार है। इसमें विटामिन ‘बी और ‘सी भी है। सेब में टार्टरिक एसिड होने के कारण आमाशय में सेब मात्र एक घंटा में ही पच जाता है और साथ ही खाए हुए अन्नाहार को भी पचा देता है। यूनानियों के अनुसार : सेब हृदय (दिल), मस्तिष्क (दिमाग), यकृत (जिगर) और जठर को बल देता है। भूख को बढ़ाता है और शरीर की कान्ति (चमक) में वृद्धि करता है। सेब में पाये जाने वाले तत्त्व : तत्त्व मात्रा प्रोटीन 0.3 प्रतिशत वसा 0.1 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट 9.5 प्रतिशत पानी 85.9 प्रतिशत विटामिन-बी 40 प्रतिशत कैल्शियम 0.01 प्रतिशत फांस्फोरस 0.02 प्रतिशत लौह लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, 100 ग्राम तांबा थोड़ी मात्रा में विटामिन–सी थोड़ी मात्रा में हानिकारक : सेब के सेवन की मात्रा 1 बार में 1 से 3 सेब तक है। गला बैठने की दशा में तथा गायक कलाकारों को सेब का सेवन नही करना चाहियें। गुण : सेब में फास्फोरस होता है। अर्थात जलन करने वाला पदार्थ होता है। जिसे खाने से पेट साफ होता है और आमाशय की पुष्टि होती है। 2 सेब के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर उस पर आधा लीटर उबलता हुआ पानी डालकर रख दें। जब वह पानी ठंडा हो जायें तो उसे छानकर पी लें। अगर उसमें मिठास की आवश्यकता हो तो उसमें मिश्री मिला लें। यह सेब का पौष्टिक और स्वादिष्ट शर्बत है। यह शर्बत जल्दी ही खून में मिलकर हृदय (दिल), मस्तिष्क (दिमाग), यकृत (जिगर) और शरीर के प्रत्येक कोष में शक्ति एवं स्फूर्ति पहुंचाती है। दांत गलते हो, दांतो में छेद हो, मसूढ़े फूलते हों तो ऐसी दशा में भोजन के बाद रोज सेब खाने से फायदा होता है। इसके प्रयोग से दांत और मसूढ़े ठीक हो जाते हैं विभिन्न रोगों में उपयोग : 1. जुकाम : कमजोर दिमाग के कारण भी सर्दी-जुकाम बना रहता है। ऐसे रोगियों को जुकाम की दवाओं के सेवन से लाभ नही होता इसलियें ऐसे रोगियों का जुकाम ठीक करने के लिये भोजन से पहले छिलके सहित सेब खाने से दिमाग की कमजोरी दूर होकर जुकाम ठीक हो जाता है। 2. खांसी : पके हुए सेब का रस 1 गिलास निकालकर मिश्री मिलाकर सुबह के समय पीते रहने से पुरानी खांसी में लाभ होता है। 3. सूखी खांसी : रोजाना पके हुए मीठे सेब खाने से सूखी खांसी में लाभ होता है। मानसिक रोग, कफ (बलगम), खांसी, टी.बी रोग में सेब का रस व मुरब्बा खाने से फायदा होता है। 4. आंत्रज्वर (टायफायड) : सेब का मुरब्बा 15-20 दिन लगातार खाते रहने से दिल की कमजोरी और दिल का बैठना ठीक हो जाता है। 5. हाई बल्डप्रैशर : हाई बल्डप्रैशर होने पर 2 सेब रोज खाने से लाभ होता है। 6. याददाश्तवर्धक : जिन लोगों के मस्तिष्क (दिमाग) और स्नायु दुर्बल हो गए हों, याददाश्त की कमी हो, उन लोगों को सेब के सेवन करने से याददाश्त बढ़ जाती है, इस हेतु 1 या 2 सेब बिना छीले खूब चबा-चबाकर भोजन से 15 मिनट पहले खायें। 7. पथरी : गुर्दे और मूत्राशय में पथरियां बनती रहती हो या आपरेशन कराके पथरी निकाल देने के बाद भी पथरी रह जाती हो तो ऐसे में सेब का रस पीते रहने से पथरी बनना बंद हो जाती है तथा बनी हुई पथरी घिस-घिस कर पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती है। यह गुर्दो को शुद्ध करता है, गुर्दे का दर्द दूर होता है। यदि कुछ दिन रोगी केवल सेब खाकर ही रहें तो पथरी निकल जाती है। ज्यादा भूख लगे तो और दूसरी साग-सब्जी या फल खायें। 8. पेशाब ज्यादा आने पर : सेब खाने से रात को बार-बार पेशाब जाना कम हो जाता है। 9. नींद न आने पर : सेब का मुरब्बा खाने से नींद आने लगती है। सेब खाकर सोना भी नींद लाने में सहायक है। 10. शराब पीने की आदत पर : सेब का रस बार-बार सेवन करने से अथवा अच्छी तरह पका हुआ 1-1 सेब रोजाना 3 बार खाते रहने से शराब पीने की आदत छूट जाती है। नशे के समय सेब खाने से शराब का नशा उतर जाता है। सेब का रस भी पीया जा सकता है। भोजन के साथ सेब खाने से भी शराब की आदत छूट जाती है। 11. भूख न लगने पर : 1 गिलास सेब के रस में स्वाद के अनुसार मिश्री मिलाकर रोजाना कुछ दिनों तक पीते रहने से भूख अच्छी तरह लगने लग जाती है। खट्टे सेब के रस में आटा गूंदकर रोटी बनाकर रोजाना खाना भी फायदेमंद है। 12. मलेरिया ज्वर : मलेरिया के ज्वर (बुखार) में सेब खाने से बुखार जल्दी ठीक होता है। 13. बच्चों के पेट के रोगों में : बच्चों को रोजाना सेब खिलाने से बच्चों के पेट के सभी रोग ठीक हो जाते हैं। 14. बच्चों के दस्त पर : जब बच्चों को दूध नही पचता हो, दूध पिलाते ही उल्टी और दस्त आते हों तो ऐसी दशा में उनका दूध बंद करके थोड़े-थोड़े समय बाद सेब का रस पिलाने से उल्टी और दस्तों में आराम आ जाता है। पुराने दस्तों में भी सेब का रस लाभकारी है। मरोड़ लगकर होने वाली बड़ों के दस्तों में भी यह फायदेमंद है। सेब खून के दस्तों को भी बंद करता है। दस्तों में सेब बिना छिलके वाली होनी चाहियें। दस्तों में सेब का मुरब्बा भी फायदेमंद है। सेब के छिलके उतारकर छोटे-छोटे टुकड़े करके दूध में उबालें। इस दूध का आधा कप हर घण्टे के बीच रोगी को पिलाने से दस्त बंद हो जाते है। 15. लीवर को मजबूत करना : लीवर (जिगर) के रोगों में सेब का सेवन फायदेमंद है। इससे लीवर (जिगर) को शक्ति मिलती है। 16. आंतों में घाव व सूजन पर : सेब का रस पीते रहने से आंतों के घाव और सूजन में आराम मिलता है। 17. कब्ज : खाली पेट सेब खाने से कब्ज (पेट की गैस) दूर होती है। खाना खाने के बाद सेब खाने से कब्ज होती है। सेब का छिलका दस्तावर होता है। कब्ज वाले रोगियों को सेब छिलके सहित ही खाना चाहियें। सेब, अंगूर या पपीता खाने से कब्ज (पेट की गैस) में राहत मिलती है। सेब छिलके सहित सुबह खाली पेट खाने से कब्ज (पेट की गैस) ठीक हो जाती है। 18. पेट के कीड़ों पर : 2 सेब रात को सोते समय कुछ दिन यानी कम से कम 7 दिन तक खाने से कीड़े मरकर गुदामार्ग से मल के साथ बाहर आ जाते हैं। सेब खाने के बाद रात भर पानी न पीएं। 19. मस्सा और तिल : खट्टी सेब का रस मस्सों पर लगने से मस्सों के छोटे-छोटे टुकड़े होकर मस्से जड़ से गिर जाते हैं। 20. बुखार : सेब के पेड़ की 4 ग्राम छाल और 200 ग्राम पत्ते उबलते हुए पानी में डालकर 10-15 मिनट तक ढंक कर रखें। उसके बाद उसे छान लें। उसमें 1 टुकड़ा नीबू का रस और 10 ग्राम या 20 ग्राम चीनी मिलाकर खाने से बुखार की घबराहट, प्यास, थकान और जलन दूर होती है यह यकृत के विकार (जिगर के होने वाले रोग) से आने वाले बुखार में भी लाभदाक है। इस प्रयोग से बुखार उतरता है और मन खुश रहता है। 21. पाचनक्रिया खराब होने पर : सेब को अंगारों पर सेंक कर खाने से बिगड़ी हुई पाचनक्रिया (भोजन पचाने की क्रिया) में भी सुधार होता है। 22. मल में रूकावट होने पर : रात में सेब खाने से जीर्ण मलावरोधक और जरावस्था का मलावरोध मिटता है और उदर (पेट) साफ होता है। 23. दांत साफ करने के लिए : सेब का रस सोड़े के साथ मिलाकर दांतों पर मलने से दांतो से निकलने वाला खून बंद होता है और दांतों पर जमी हुई पपड़ी दूर होती है और दांत साफ बनते हैं। 24. स्वास्थ सुधारने के लिए: सेब का ताजे रस में शहद मिलाकर पीने से कुछ ही दिनों में सेहत मे सुधार दिखाई पड़ता है। 25. दांतों की बीमारी : जिन लोगो के दांतों से खून निकलता हो और दांतों पर मैल जमी हो उन्हें सेब के रस में खाने वाला सोडा मिलाकर दांतों पर रोजाना 2 से 3 बार मलना चाहिए। 26. खांसी : पके हुई सेब का रस निकालकर उसमें मिश्री मिलाकर रोजाना सुबह पीने से खांसी बंद हो जाती है। 27. आमाशय (पेट) का जख्म : 1 सेब में लौंग को अच्छी तरह चारों तरफ से चुभों दें कि कोई भाग खाली न रह जायें। फिर 40 दिन बाद लौंगों को निकाल कर शीशी में रख दें। खाना खाने के बाद एक लौंग को चूसने से पेट का घाव भरने लगता है। 250 मिलीलीटर गर्म पानी में 1 सेब के टुकड़े-टुकड़े कर डाल दें और उसे ढक दें। 15 मिनट के बाद उसे निचोड़कर छान लें। इसमें 2 चम्मच शहद डालकर पीने से अल्सर (पेट के जख्म) मे लाभ होता है। सेब का रस पीने से शरीर के पाचन अंगो पर एक पतली तह चढ़ जाती हैं जिसकी मदद से संक्रमण और बदबू से रक्षा होती है और पेट में गैस नहीं बनती है। मलाशय (वह स्थान जहां भोजन पचकर मल एकत्रित होता है) और निचली आंतों में दुर्गन्ध को होने नहीं देता है। साथ-ही साथ सेब के रस के बाद गुनगुना पानी पीने से आंतों में होने वाले घाव (जख्म) और सूजन में लाभ मिलता है। 28. मसूढ़ों का रोग : मसूढ़े फूलते हों तो खाना खाने के बाद रोजाना 1 सेब खायें। इससे दांत व मसूढ़ों के रोग ठीक हो जाते है। 29. वमन (उल्टी) : कच्चे सेब के रस में सेंधा नमक मिलाकर पीने से उल्टी होना बंद हो जाती है। 30. दस्त के लिए : सेब का रस पिलाने से छोटे बच्चों को दूध के पीने से होने वाली उल्टी और दस्त में लाभ मिलता हैं। सेब को छोटे-छोटे टुकड़े में काटकर गर्म पानी में डालकर निचोड़कर रख लें, फिर इसी पानी युक्त रस में शहद को मिलाकर रोगी को देने से दस्त और उल्टी में लाभ पहुंचता हैं। रोजाना सेब का मुरब्बा खाने से दस्त बंद हो जाते है। 31. मूत्ररोग : रोजाना सेब का रस पीने से बहुमूत्रता (बार-बार पेशाब आना), गुर्दे का दर्द एवं मूत्राशय की पथरी दूर होती है। 32. कमजोरी : सेब का रोजाना सेवन करने से हृदय (दिल), मस्तिष्क (दिमाग) और आमाशय को समान रूप से शक्ति मिलती है। इससे कमजोरी भी मिट जाती है। सुबह 2-3 सेब खाकर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से कमजोरी दूर हो जाती है। 33. जिगर का रोग : सेब के सेवन से यकृत (जिगर) को शक्ति मिलती है। 34. प्यास अधिक लगना : सेब का रस पानी में मिलाकर पीने से प्यास कम लगती है। जिन्हें वायु विकार हो उन्हें सेब का रस नहीं पीना चाहिए। 35. मोटापा का रोग : सेब और गाजर को बराबर मात्रा में कद्दूकस करके रख लें, सुबह खाली पेट जितना खा सकें उतना या 200 ग्राम की मात्रा में खाने के बाद लगभग 2 घण्टे तक कुछ न खाने से वजन कम होता है शरीर में स्फूर्ति आती है और सुन्दरता में लाभ होता है। 36. मोटापे की बढ़ोत्तरी के लिए : सेब और गाजर को बराबर मात्रा में छिलके सहित घिसकर दोपहर के भोजन के बाद खाने से मोटापा बढ़ता और कमजोरी मिटती है। 37. पेट के सभी प्रकार के रोग : रोजाना दिन में 1 से 3 बार सेब खाने से बच्चों के पेट के रोगों में लाभ होता है। 38. पेट के कीड़ों के लिए : रात को सोने से पहले कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेब खाकर ऊपर से पानी पीने से कीड़े मरकर सुबह मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। 39. नींद ना आना (अनिंद्रा) : लगभग 10 से 20 ग्राम सेब की जड़ का चूर्ण सुबह और शाम रोगी को खिलाने से नींद अच्छी आती है। 40. आधासीसी (माइग्रेन) अधकपारी : रोजाना सुबह खाली पेट आधा सेब खाने से आधे सिर का दर्द हमेशा के लिए चला जाता है। 41. मुर्च्छा (बेहोशी) : पके हुए सेब के रस को मिश्री मिलाकर बेहोश रोगी को पिलाने से बेहोशी दूर हो जाती है। 42. दिल की तेज धड़कन : 100 मिलीलीटर सेब के रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर पीने से दिल की तेज धड़कन सामान्य हो जाती है। 43. चेहरे की झाई के लिए : सेब का थोड़ा सा गूदा लेकर उसमें बेसन, चंदन का पाउडर और हल्दी मिलाकर लेप बनाकर चेहरे पर हल्कें-हल्के हाथों से लगाकर मालिश करनी चाहिए। चेहरे की झुर्रियां, मुहांसे और दाग-धब्बे दूर करने में यह बहुत ही लाभकरी है। 44. चर्म रोग के लिए : सेब को पीसकर उसका रस चमड़ी के रोगों पर लगाने से चमड़ी के रोगों मे लाभ होता है। 45. दिल की कमजोरी : रोजाना सेब या सेब का मुरब्बा खाने से शारीरिक शक्ति बढ़ने से दिल की कमजोरी दूर होती है। 46. त्वचा के रोग के लिए : सेब रोजाना खाने से चमड़ी के रोगों ठीक हो जाते हैं। 1 सेब को अच्छी तरह से पीसकर लेप बना लें। इस लेप को हल्के हाथ से चेहरे पर लगा लें। 10 से 15 मिनट के बाद चेहरे को गर्म पानी से धो ले। इससे जिनकी तेलीय त्वचा होती है वो ठीक हो जाती है। 47. दिल की कमजोरी : दिल की कमजोरी दूर करने के लिए सेब खाना लाभदायक है। 48. मानसिक उन्माद (पागलपन) : सेब के शर्बत में ब्राह्मी के चूर्ण को मिलाकर पागलपन के रोगी को पिलाने से गर्मी के कारण हुआ पागलपन ठीक हो जाता है। 49. सिर का दाद : सेब को काटकर उस पर सेंधा नमक डालकर खाने से कुछ दिनों में ही होने वाला सिर दर्द हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। 50. याददाश्त कमजोर होना : भोजन करने से 15 मिनट पहले 1-2 सेब बगैर छीले खाने से विद्यार्थियों की याददाश्त मजबूत हो जाती है।

Dates health benefits

 



परिचय : खजूर के पेड़ पतले व बहुत ऊंचे होते हैं। खजूर के पेड़ नारियल के पेड़ के समान होते हैं। यह 30 से 50 फुट ऊंचे होते हैं और इसके तने तंतुओं से बने 3 फुट लम्बे मटमैले होते हैं। खजूर के पत्ते नोकदार कटे-कटे से 10 से 15 फुट तक लम्बे होते हैं। इसके फूल खुशबूदार और छोटे होते हैं। फल छोटे-छोटे गुच्छों में होते हैं और इसके अन्दर बीज सख्त व दोनों सिरों से गोल होते हैं। खजूर 2 प्रकार के होते हैं- खजूर और पिण्ड खजूर। पिण्ड खजूर का फल खजूर के फल से अधिक गूदेदार व काफी बड़ा होता है। यही फल सूखने पर छुहारा कहलाता है। खजूर एक पौष्टिक मेवा भी है। खजूर के पेड़ के ताजे रस को नीरा और बासी को ताड़ी कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार : खजूर स्वादिष्ट, पौष्टिक, मीठा, शीतल, तृप्तिकारक (इच्छा को शांत करने वाला), स्निग्ध, वात, पित्त और कफ को दूर करने वाला होता है। यह टी.बी, रक्त पित्त, सूजन एवं फेफड़ों की सूजन के लिए लाभकारी होता है। यह शरीर एवं नाड़ी को शक्तिशाली बनाता है। सिर दर्द, बेहोशी, कमजोरी, भ्रम, पेट दर्द, शराब के दोषों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है। यह दमा, खांसी, बुखार, मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी है। यूनानी चिकित्सकों के अनुसार : खजूर गर्म व तर होता है। यह कमजोर जिगर को मजबूत बनाने वाला, थकावट को दूर करने वाला, शरीर को मोटा बनाने वाला, धातुदोष को दूर करने वाला, लकवा और कमर के दर्द को समाप्त करने वाला होता है। यह कामोत्तेजक होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार : खजूर का रसायनिक अध्ययन करने पर पता चला है कि इसमें विभिन्न तत्त्व होते हैं- तत्त्व मात्रा चीनी 67.3 प्रतिशत प्रोटीन 5.0 वसा 2.0 खनिज प्रदार्थ 1.3 कैल्शियम थोड़ी मात्रा लौहा थोड़ी मात्रा फास्फोरस थोड़ी मात्रा विटामिन ए, बी थोड़ी मात्रा पानी 21.1 प्रतिशत विभिन्न भाषाओं में खजूर के नाम : संस्कृत खर्जूर। हिन्दी खजूर, छुहारा, पिडं खजूर। अंग्रेजी डेट। लैटिन फिनिक्स डेक्टीलीफेरा। मराठी खारिक। गुजराती खोरेक। बंगाली खेजूर। रंग : खजूर का रंग काला व लाल होता है। स्वाद : इसका स्वाद मीठा और वाकस होता है। स्वरूप : खजूर दो प्रकार के होते हैं- खजूर और पिण्ड खजूर। खजूर का पेड़ बड़ा होता है व नारियल के पेड़ के समान होता है। इसमें पीले व हल्के लाल रंग के फल लगते हैं। पत्ते नोकदार होते हैं जो पहले हरे, फिर पीले व पकने के बाद लाल हो जाते हैं। mai labhag प्रकृति : खजूर शीतल और ठंडा होता है। हानिकारक : खजूर का अधिक उपयोग करना खून को जला देता है। दोषों को दूर करने वाला : खजूर के साथ बादाम खाने से खजूर में मौजूद दोष दूर होते हैं। तुलना : खजूर की तुलना किशमिश से की जा सकती है। मात्रा : 50 से 70 ग्राम। विभिन्न रोगों में सहायक : 1. सर्दी-जुकाम: खजूर को एक गिलास दूध में अच्छी तरह उबालें और फिर दूध से खूजर निकालकर खाएं और ऊपर से वही दूध पीने से सर्दी-जुकाम में जल्दी लाभ मिलता है। 2. सिर दर्द: खजूर की गुठली को पानी में घिसकर सिर पर लेप करने से सिर दर्द ठीक होता है। 3. शरीर को मोटा करने के लिए: एक कप दूध में 2 खजूर उबालकर खाएं और ऊपर से वही दूध पीएं। इस तरह प्रतिदिन सुबह-शाम कुछ महीनों तक खजूर खाने व दूध पीने से शरीर मोटा होता है। इसे सर्दी के महीने में खाना ज्यादा फायदेमन्द और गुणकारी होता है। 4. बार-बार पेशाब आना: 2-2 छुहारे (खजूर) दिन में 2 बार खाने और रात को सोते समय 2 छुहारे खाकर दूध पीने से बार-बार पेशाब आना बंद होता है। इससे बिस्तर पर पेशाब करने की आदत भी दूर जाती है। 5. गुहेरी (आंख की फुंसी या बिलनी): खजूर की गुठली को घिसकर आंखों की पलकों पर लेप करने से गुहेरी नष्ट होती है। 6. श्वास, दमा: खजूर और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में पान में रखकर दिन में 3 बार खाने से दमा रोग ठीक होता है। खजूर की गुठली का चूर्ण और 3 ग्राम सौंफ का चूर्ण मिलाकर पान के साथ प्रयोग करने से अस्थमा के कारण होने वाली सांस की रुकावट दूर होती है। दमा में खजूर का सेवन करना लाभकारी होता है। 4 खजूर, 2 इलायची एवं 2 चम्मच शहद को खरल में घोटकर सेवन करने से दमा रोग नष्ट होता है। 7. बच्चों का सूखा रोग: खजूर और शहद को बराबर की मात्रा में मिलाकर दिन में 2 बार कुछ हफ्ते तक खाने से सूखा रोग ठीक होता है। 8. घाव: खजूर की गुठली को जलाकर चूर्ण बना लें और इस चूर्ण को घाव पर छिड़कें। इससे घाव सूख जाता है। 9. अरुचि: खजूर की चटनी में नींबू का रस मिलाकर खाने से अरुचि दूर होती है। 10. दस्त का बार-बार आना: खजूर की गुठली का चूर्ण बनाकर दही के साथ खाने से अतिसार रोग ठीक होता है। 11. दस्त का बंद होना: खजूर की गुठली को जलाकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण 2-2 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार ठंडे पानी के साथ सेवन करें। इससे दस्त आने का रोग ठीक होता है। खजूर को पानी में रात को भिगोकर रखें दें और सुबह उसी पानी में उसे मसलकर पीएं। इससे मल साफ होता है और मल की रुकावट दूर होती है। 12. रक्तपित्त: खजूर का चूर्ण बनाकर शहद के साथ खाने से रक्तपित्त (खून की उल्टी) का रोग ठीक होता है। 13. कब्ज़: खजूर को गर्म पानी के साथ रात को सोते समय सेवन करने से कब्ज दूर होती है। इससे बवासीर की परेशानी भी दूर होती है। 50 ग्राम खजूर प्रतिदिन खाने से कब्ज समाप्त होती है। कब्ज दूर करने के लिए बच्चों को यह केवल 25 ग्राम ही दें। खजूर को पानी में डालकर रात को रख दें और सुबह मसलकर खाली पेट खाने से पेट साफ होता है। 14. शराब का नशा: खजूर को पानी में भिगोकर मसलकर पीने से शराब का नशा उतर जाता है। 15. खुजली: खजूर की गुठली को जलाकर उसकी राख में कपूर और घी मिलाकर खुजली पर लगाने से खुजली ठीक होती है। 16. धातु की कमजोरी: सर्दी के मौसम में सुबह खजूर को घी में सेंककर खाने और इलायची, चीनी तथा कौंच डालकर उबाला हुआ दूध पीने से वीर्य बढ़ता है। छुहारा से बीज हटाकर इसके गूदे को कूट लें और फिर इसमें बादाम, बलदाने, पिस्ता, चिरौंजी, चीनी मिला लें। अब इसे 8 दिन तक घी में मिलाकर रखें। यह 20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन खाने से धातुपुष्टि होती है और पित्त शांत होता है। 17. कमर दर्द: 5 खजूर को उबालें और इसमें 5 ग्राम मेथी डालकर पीने से कमर दर्द ठीक होता है। 18. गठिया (आमवात): 100 ग्राम खजूर भिगोकर मसलकर पीने से आमवात का दर्द ठीक होता है। 19. हिस्टीरिया: खजूर को कुछ महीनों तक नियमित आहार के तौर पर सेवन करने से स्त्रियों का हिस्टीरिया रोग दूर होता है। 20. लीवर रोग: 4 से 5 खजूर पानी में भिगोकर रात को रखे दें और सुबह उसे मसलकर शहद में मिलाकर लगभग 7 दिन तक पीएं। इससे लीवर का बढ़ना रुक जाता है और जलन शांत होती है। 21. पेट की गैस: खजूर 50 ग्राम, जीरा 10 ग्राम, सेंधानमक 10 ग्राम, कालीमिर्च, सोंठ 10 ग्राम, पीपरामूल 5 ग्राम और नीबू का रस 80 मिलीलीटर इन सभी को मिलाकर बारीक पीस लें और इसका सेवन करें। इससे पेट की गैस खत्म होती है। 22. टी.बी रोग: क्षय (टी.बी.) के रोगियों के लिए खजूर का सेवन करना फायदेमंद होता है। खजूर, मुनक्का, चीनी, घी, शहद और पीपर बराबर-बराबर लेकर 30 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन खाने से टी.बी रोग ठीक होता है। इससे खांसी एवं सांस भी ठीक होता है। 23. कफ: प्रतिदिन खाना खाने के बाद 4 या 5 घूंट गर्म पानी के साथ खजूर खाना लाभकारी होता है। इससे कफ पतला होकर खखारने या खांसी के रूप में बाहर निकल जाता है। इससे फेफडे़ साफ होते हैं। इससे सर्दी, जुखाम, खांसी और दमा रोग भी ठीक होता है। 24. दांतों का दर्द: दांतों में किसी प्रकार का दर्द होने पर खजूर की जड़ का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन 2 से 3 बार कुल्ला करने से दर्द खत्म होता है। 25. सूखी खांसी: खजूर का सेवन करने से सूखी खांसी ठीक होती है। 26. गैस्ट्रिक (अल्सर): पिण्ड खजूर खाना से गैस्ट्रिक (अल्सर) में लाभ मिलता है। 27. हिचकी का रोग: खजूर की गुठली का चूर्ण 3 ग्राम और 3 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से हिचकी दूर होती है। 1 ग्राम खजूर का चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से हिचकी नहीं आती है। 28. बवासीर (अर्श): खजूर के बीजों को जलाकर मलद्वार में धूंआ लेने से अर्श (बवासीर) के मस्से सूखकर झड़े जाते हैं। खजूर के पत्तों को जलाकर राख बना लें और यह 2 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार पानी के साथ खाने से खूनी बवासीर ठीक होता है। खजूर के पत्ते को जलाकर राख बना लें और यह 2 ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार खाएं। इससे बवासीर से खून गिरना बंद होता है। 29. मासिकधर्म संबंधी परेशानी: पिण्ड खजूर प्रतिदिन 100 ग्राम की मात्रा में 2 महीने तक लगातार सेवन करने से मासिकधर्म नियमित होता है। 30. दस्त में आंव रक्त आना (पेचिश): 6 ग्राम खजूर के फल को 20 ग्राम गाय के दूध से बनी दही में मिलाकर खाने से पेचिश का रोग ठीक होता है। दस्त में आंव व खून आने पर खजूर को दही के साथ खाने से लाभ होता है। 31. मधुमेह का रोग: मधुमेह या ऐसे रोग जिसमें मीठा खाना हानिकारक होता है। ऐसे रोगों को ठीक करने के लिए थोड़ी मात्रा में खजूर का सेवन करना लाभकारी होता है। 32. पेट के कीड़े: खजूर के पत्तों का काढ़ा रात को बनाकर सुबह शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीड़े नश्ट होते हैं। खजूर की पत्तियों का रस 40 मिलीलीटर और शहद 40 ग्राम मिलाकर खाने से पेट के सभी कीड़े खत्म होते हैं। पेट के कीड़े को समाप्त करने के लिए खजूर के पत्तों के बारीक चूर्ण को खजूर के पत्तों के काढ़े में डालकर रात को रख दें और सुबह इसे छानकर 14 से 28 मिलीलीटर की मात्रा में शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करें। इससे पेट के कीड़े समाप्त होते हैं। 33. भ्रम एवं रोग भ्रम: सुलेमानी खज़ूर को प्रतिदिन खाने से भ्रम रोग दूर होता है। 34. हृदय रोग: हृदय कमजोर होने पर प्रतिदिन खजूर खाना चाहिए। इससे हृदय को शक्ति मिलती है। 35. निम्नरक्तचाप: 50 ग्राम खजूर को दूध में उबालकर प्रतिदिन पीने से निम्न रक्तचाप की परेशानी दूर होती है और रक्तचाप सामान्य बना रहता है। गुठली रहित खजूर को पानी से साफ करके 250 मिलीलीटर की मात्रा में दूध के साथ उबाल लें। जब दूध के ऊपर भूरे रंग का घी तैरने लगे तब इसे उतारकर पीएं। इसका सेवन प्रतिदिन करने से नम्न रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर) की शिकायत दूर होती है। 36. मस्तिष्क से रक्तस्राव: मस्तिष्क से खून स्राव होने पर बार-बार बेहोशी आती रहती है। ऐसे रोग में सुलेमानी खजूर पीसकर शर्बत की तरह बनाकर रोगी को पिलाने से बेहोशी दूर होती है। 37. शरीर की जलन: शरीर की जलन दूर करने के लिए सुलेमानी खजूर का सेवन करना लाभकारी होता है। 38. थकावट: शारीरिक थकावट को दूर करने के लिए सुलेमानी खजूर का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। इससे शरीर की थकावट दूर होती है। 39. शरीर की सूजन: किसी भी कारण से शरीर में आई सूजन को दूर करने के लिए प्रतिदिन खजूर खाना लाभकारी होता है। इससे शरीर की सूजन दूर होती है। 40. शारीरिक शक्ति का कम होना या खून का कम होना: नियमित 10 से 15 खजूर खाकर ऊपर से एक कप दूध पीने से कुछ दिनों में ही शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। इसे बल बढ़ता है, खून बनता है और वीर्य बढ़ता है। खजूर 100 ग्राम और किशमिश व द्राक्ष 50-50 ग्राम प्रतिदिन खाने से कमजोरी दूर होती है और शरीर में नया खून बनता है। यह वीर्य की कमजोरी को भी दूर करता है। भैंस के घी में खजूर के बीज को 5 मिनट तक सेंककर दोपहर को चावल के साथ खाकर एक घंटा आराम करें। इससे कमजोरी दूर होती है और शारीरिक वजन बढ़ता है। देशी खजूर खाने से शरीर की कमजोरी दूर होती है। खजूर से बीज को निकालकर गूदे में मक्खन भरकर सेवन करने से कमजोरी दूर होती है। खजूर का चूर्ण और असगंध 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर दूध के साथ सेवन करने से कमजोरी दूर होती है। 7 या 8 पिण्ड खजूर को 500 मिलीलीटर दूध में डालकर हल्की आंच पर दूध के साथ पकाएं और लगभग 400 मिलीलीटर की मात्रा में दूध बचा रह जाने पर दूध को आंच से उतार लें। अब इसमें से खजूर निकालकर खा लें और ऊपर से दूध को पीएं। इससे शरीर में भरपूर ताकत और मजबूती आती है। 5-7 खजूर लेकर इनकी गुठली को निकालकर फेंक दें और गूदे को पानी से धोएं। अब लगभग 300 मिलीलीटर की मात्रा में दूध लेकर इसमें खजूर के गूदे मिलाकर हल्की आग पर 8 से 10 मिनट तक पकाएं। पक जाने पर दूध में से खजूर को निकालकर चबा-चबाकर खा लें और ऊपर से दूध पीएं। इससे शरीर को जबरदस्त ताकत और मजबूती मिलती है। इससे वजन बढ़ता है, कब्ज, क्षय रोग दूर होता है, शरीर में खून बनता है, खांसी, दमा, पेट और छाती से सम्बंधित सभी रोगों से छुटकारा मिलता है। इसका सेवन लगातार 40 दिनों तक सुबह-शाम करना चाहिए।

Rose Health benefits


परिचय : गुलाब की खुबसूरती के कारण से गुलाब को फूलों का राजा कहा जाता है। गुलाब एक ऐसा फूल है जिसके बारे में सब जानते हैं। पूरे भारत में गुलाब के पौधे लगाए जाते हैं। देशी गुलाब लाल रंग का होता है। गुलाब के द्वारा बनाएं जाने वाले दो पदार्थ अधिक प्रसिद्ध हैं एक तो गुलकंद और दूसरा गुलाबजल। गुलाब की अनेक किस्में पाई जाती हैं जिन पर कई रंगों के फूल खिलते हैं। लगभग गुलाब के पौधे की ऊंचाई 120-180 सेंटीमीटर तक होता है। इसके तने में कुछ असमान कांटे लगे होते हैं। गुलाब के तनों में 5 पत्तियां मिली हुई लगी होती है। गुलाबी रंग का गुलाब का फूल अधिक मात्रा में होता है तथा इसके अलावा गुलाब के फूल सफेद तथा पीले रंग के भी होते हैं। गुलाब का फल अंडाकार होता है। मार्च-अप्रैल के महीने में इसके फूल खिलते हैं। इसके फूलों से इत्र व गुलकंद बनाया जाता है। गुलाब के विभिन्न रूपों में कई प्रकार के अर्थ मिलते हैं- लाल गुलाब- मैं तुमसे प्यार करता हूं। लाल और सफेद गुलाब एक साथ रखना- यह एकता को दर्शाता है। सफेद गुलाब- हमारा प्यार पवित्र है। पूरी तरह खिला, भरा-भरा लाल गुलाब- आप बहुत खूबसूरत हैं। गुलाब की जुडी हुई चार पत्तियां- बेस्ट आफ लक। एक पूरे खिले हुए गुलाब के साथ दो कलियां रखना- यह सुरक्षा को दर्शाता है। बंद कली युक्त सफेद गुलाब- इससे यह पता चलता है कि अभी आप बहुत छोटे हैं प्यार करने के लिए। गुलाब की टहनी पर लगी एक बंद कली- यहां किसी का डर नहीं हैं। पीला गुलाब- मै तुमसे प्यार करता हूं पर तुम्हारे दिल में क्या है, मैं नहीं जानता। गुलाब की टहनी पर कांटों के अलावां एक पत्ती भी न हो- इसका मतलब यह होता है कि यहां कुछ नहीं हैं, न डर न आशा। नारंगी गुलाब - मेरा प्यार तुम्हारे लिए अन्नत है जो खत्म नहीं हो सकता। विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत तरुणी, कर्णिका, शतपत्री, चारुकेशर हिन्दी गुलाब मराठी गुलाब गुजराती गुलाब बंगाली गोलाप तेलगू गुलाबा पुवु फारसी गुलसुर्ख अरबी जरंजवीन अंग्रेजी रोज लैटिन रोजासेंटीफोलिया रंग : गुलाब का फूल लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है। स्वाद : इसके फूल का स्वाद हल्का तीखा और खुशबूदार होता है। स्वरूप : गुलाब के पेड़ फुलवाड़ियों तथा बगिचों में लगाये जाते हैं। यह 2 प्रकार का होता है। एक मौसमी और एक बारहमासी। मौसमी गुलाब का फूल मार्च-अप्रैल में खिलता है और इसमें खुशबू अधिक होती है। बारह महीने गुलाब का फूल बारहों महीने तक खिलता है। प्रकृति : इसकी प्रकृति ठंडी होती है। हानिकारक : गुलाब का अधिक मात्रा में सुघंने से जुकाम हो सकता है। गुलाब के फूल का ज्यादा मात्रा मे सेवन करने से संभोग करने की शक्ति में कमजोरी आती है। जिन रोगियों का पेशाब करने की नली कमजोर हो उन्हें गुलकंद का सेवन नहीं करना चाहिये क्योंकि इससे उन्हें अधिक हानि हो सकती है। दोषों को दूर करने वाला : मिश्री गुलाब के गुणों को सुरक्षित रखता है तथा इसके दोषों को दूर करता है। तुलना : गुलाब की तुलना आक, सौंफ तथा वनफ्सा से की जा सकती है। गुलाब की मात्रा का उपयोग: गुलाब के ताजे फूल 10 ग्राम से 30 ग्राम तक। शुष्क फूलों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम। फूल का काढ़ा 25 से 50 मिलीलीटर। गुलकंद 10-30 ग्राम। गुलाब के फूलों का रस 20-40 ग्राम। गुण : गुलाब का उपयोग करने से दिल, दिमाग और आमाशय की शक्ति में वृद्धि होती है जिसके फलस्वरूप इनकी क्रिया भी ठीक प्रकार से होने लगती है। गर्मी से होने वाले उन्माद रोग को ठीक करने के लिए गुलाब का उपयोग करना लाभदायक होता है। यह मन के प्रसन्न करता है तथा पाचन शक्ति की क्रिया को ठीक करता है। आयुर्वेद मतानुसार- आयुर्वेद में गुलाब के गुणों की चर्चा अधिक इसलिए होती है क्योंकि इसके उपयोग से कई प्रकार के रोग ठीक हो सकते हैं। यह वात-पित्त को नष्ट करता है। यह शरीर की जलन, अधिक प्यास तथा कब्ज को भी नष्ट कर सकता है। गुलाब में विटामिन सी की बहुत अधिक मात्रा पाई जाती है। गर्मी के मौसम में इसके फूलों को पीसकर शर्बत में मिलाकर पीना लाभकारी होता है तथा इसको पीने से हृदय व मस्तिष्क को शक्ति मिलती है। गुलाब का सेवन करने से चेहरे पर चमक आ जाती है तथा शरीर का खून साफ हो जाता है। गुलाब का फूल जितना दिखने में सुन्दर होता है उसमें उतना ही औषधीय गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेदिक मतानुसार गुलाब के रस का स्वाद तीखा, चिकना, कषैला और मीठा होता है। इसकी प्रकृति ठंडी होती है। यह वात-पित्त को नष्ट करने वाला होता है। शरीर में जलन, बदबूदार पसीने आना, खून में खराबी, पाचन शक्ति कमजोर होना, हृदय रोग, वीर्य में शुक्राणु की कमी, भूख न लगना, यकृत तथा मानसिक कष्ट आदि रोग को यह ठीक करता है। यूनानी चिकित्सानुसारः गुलाब की प्रकृति ठंडी और खुश्क होती है। गर्मी के कारण पैदा होने वाले रोग जैसे बुखार, सिर दर्द, बेहोशी तथा दिल की धड़कन बढ़ाने पर यह उपचार करने के लिए लाभकारी होता है। गुलाब के ताजे फूल का सेवन करने से जहां दस्त लगते हैं, वहीं सूखे फूलों के सेवन करने से कब्ज पैदा होती है। गुर्दे, गुदा, गर्भाशय (जरायु), आमाशय, दिल, फेफड़ों व आंतों को इसके सेवन से काफी बल मिलता है। क्षय रोग तथा उससे जुडे़ सभी प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए इसका सेवन करना लाभदायक होता है। वैज्ञानिक मतानुसारः गुलाब में गैलिक, टैनिक, ओलियम रोजी, एसिड्स, विटामिन सी तथा तेल पाया जाता है। नजला, सर्दी-जुकाम को ठीक करने के लिए इसका सेवन अधिक लाभकारी है। इसके सेवन से शरीर में हडि्डयों के रोग ठीक हो जाते हैं। गुलाब में विटामिन सी की बहुत अधिक मात्रा पाई जाती है और विटामिन सी शरीर में कई रोगों को ठीक करने में अधिक लाभकारी है क्योंकि विटामिन सी रोग के संक्रमण को खत्म करने में उपयोगी है। विभिन्न रोगों में प्रयोग: 1. होंठों का कालापन: गुलाब की पंखुड़ियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा ग्लिसरीन अच्छी तरह से मिला लें और इसे दिन में 3-4 बार होठों पर लगाएं इससे होंठों का कालापन दूर होता है। गुलाब के एक फूल को पीसकर उसमें थोड़ी सी मलाई मिला लें, फिर इसे 10 मिनट तक होंठों पर लगायें इसके बाद होंठों को धो दें। कुछ दिनों तक इस प्रकार से उपचार करने पर होंठों का कालापन दूर हो जाएगा। गुलाब की पंखुड़ियों को पीसकर उसमें थोड़ी सी ग्लिसरीन मिला लें। इस मिश्रण को रोजाना होठों पर लगाने से होठ सुन्दर बनते हैं और होंठों का कालापन भी दूर हो जाता है। 2. मुंह के छाले: गुलाब के फूलों का काढ़ा बनाकर उससे कई बार गरारा करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। गुलाब के 2 फूलों को पानी में उबालें और इस पानी से कुल्ला करें। इस प्रकार से उपचार कुछ दिनों तक करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। गुलाब के पत्तों को चबाने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। मुंह में छाले हो तो गुलाबजल से कुल्ला करें अथवा गुलाब के 2 फूल को 1 गिलास पानी में उबालें और इस पानी को ठण्डा करके इससे कुल्ला करें इससे लाभ मिलेगा। पेट की गर्मी के कारण से मुंह में छाले हो जाए तो गुलाब के सूखे फूलों को रात के समय में 1 गिलास पानी में भिगने के लिए रख दें और सुबह इसे मसलकर छान लें, फिर इस पानी में 2 चम्मच चीनी मिलाकर पीयें। इस प्रकार से उपचार करने से पेट की गर्मी दूर होती है जिसके फलस्वरूप मुंह के छाले भी ठीक हो जाते हैं। गुलाब की 10 पंखुड़ी, 3 इलायची, 5 कालीमिर्च तथा 10 ग्राम मिश्री को एक साथ पीसकर एक कप पानी में मिलाकर रखें और 4-4 घंटों के बाद इस पानी को पीएं इससे मुंह के छाले ठीक हो जाएंगे। 3. कान का दर्द: गुलाब के फूलों का निकाला हुआ ताजा रस कानों में डालने से कान का दर्द ठीक होता है। 4. होंठों का फटना: गुलाब के एक फूल को पीसकर उसमें थोड़ी सी मलाई मिलाकर इससे होठों पर लेप करें। आधे घंटे के बाद इसे धो लें। कुछ ही दिनों तक यह लगाने से होंठ फटेंगे नहीं और होंठों का रंग बिल्कुल गुलाब जैसा लाल हो जायेगा। 5. दाद: नींबू का रस तथा गुलाब का रस बराबर मात्रा में लेकर मिला लें। इस रस को प्रतिदिन दाद पर लगाएं इससे लाभ मिलेगा। 50 ग्राम गुलाबजल में 1 नींबू का रस मिलाकर रोजाना 3 बार दाद पर लगाऐं इससे दाद ठीक हो जाता है। दाद और मुंहासों पर गुलाब का रस लगाएं तथा 1-1 चम्मच दिन 3 बार इसे पीएं इससे दाद ठीक हो जाता है। 6. आंखों के रोग: गुलाब का रस 2-2 बूंद सुबह-शाम आंखों में डालने से आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं। गुलाबजल आंखों में डालने से आंखों की जलन और किरकिरापन दूर हो जाता है। 50 ग्राम गुलाब जल में 1 ग्राम फिटकरी डालकर 1 से 2 बून्दे रोजाना 2 से 3 बार आंखों में डालने से आंखों के कई प्रकार के रोग जैसे- आंखें लाल होना, आंखों में कीचड़ जमना, आंखों में जलन होना आदि रोग ठीक हो जाते हैं। 7. अतिसार (दस्त): 10 ग्राम गुलाब के फूल और 5 ग्राम मिश्री को मिलाकर दिन में 3 बार खाएं इससे लाभ मिलेगा। अतिसार (दस्त) होने की स्थिति में गुलाब के फूलों के बीच लगने वाले छोटे-छोटे दाने जिसे जीरा कहते हैं उसे दिन में 3 बार 1 ग्राम की मात्रा में सेवन करें। 8. श्वेतप्रदर: 2 चम्मच शुष्क गुलाब के फूलों का चूर्ण और 1 चम्मच मिश्री को एक साथ मिलाकर दूध के साथ रोजाना सुबह-शाम सेवन करें तथा गुलाब के ताजे पिसे हुए फूल को सोते समय योनि में रखें इससे श्वेत प्रदर में जल्दी लाभ मिलेगा। गुलाब के फूलों को छाया में अच्छी तरह से सुखाकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें फिर इसमें से लगभग 3 से 5 ग्राम की मात्रा में एक दिन में सुबह और शाम (दो बार) दूध के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर ठीक हो जाता है। श्वेत प्रदर रोग होने के साथ ही पेशाब में जलन हो तो ऐसी स्थिति में उपचार करने के लिए गुलाब के ताजा फूल और 50 ग्राम मिश्री दोनों को पीसकर, आधा गिलास पानी में मिलाकर रोजाना 10 दिनों तक सेवन करें इससे लाभ मिलेगा। श्वेत प्रदर रोग में गुलाब के 10 ग्राम पत्तों को पीसकर मिश्री में मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करें। 50 ग्राम गुलाब के फूलों की कोमल पंखुड़ियों में मिश्री मिलाकर खाने तथा इसके बाद दूध पीने से श्वेत प्रदर रोग में फायदा मिलता है। 9. प्रदर रोग: गुलाब के ताजे फल में 50 ग्राम मिश्री पीसकर इसे आधा गिलास पानी में मिला लें और फिर इसे पी लें। इस प्रकार से सुबह और शाम रोजाना 10 दिनों तक इस प्रकार से उपचार करने पर प्रदर रोग ठीक हो जाता है। 10. पेट के रोग: भोजन करने के बाद 2 चम्मच गुलकंद को रोजाना 2 बार खोन से पेट के सभी रोग ठीक हो जाते हैं। गुलाब 5 ग्राम की मात्रा में तथा मुलहठी 5 ग्राम की मात्रा में लेकर, इसे 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें फिर इसमें से 100 मिलीलीटर काढ़ा पीएं। सुबह-शाम इसका सेवन करें इससे कब्ज तथा पेट के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। सौंफ का रस, पुदीने के रस तथा गुलाब के रस को मिला लें और इसमें से 4-4 बूंदों को पानी में मिलाकर सेवन करें इससे पेट के कई रोग ठीक हो जाएंगे। 11. खुजली: चमेली का तेल, नींबू का रस और गुलाब का रस बराबर मात्रा में मिलाकर जहां पर खुजली हो वहां पर इसे लगाएं इससे खुजली दूर हो जाती है। 12. शीतपित्त: चंदन के तेल तथा गुलाब के रस को बराबर मात्रा में मिलाकर शीतपित्त पर लगाएं इससे लाभ मिलेगा। गुलाब के रस में थोड़ा सा चंदन का तेल मिलाकर इससे शीतपित्त पर मालिश करें इससे शीतपित्त ठीक होती है। 25 ग्राम गुलाब के जल में 25 ग्राम सिरका मिलाकर शरीर पर लगायें इससे शीत पित्त में बहुत अधिक लाभ मिलता है। चौथाई कप गुलाबजल में एक बूंद चंदन का तेल मिलाकर इससे शरीर की मालिश करें इससे शीतपित्त ठीक हो जाती है। पित्ती उछलने पर गुलाबजल में चंदन का पाऊडर मिलाकर लेप करने से आराम मिलता है। 13. सिर दर्द: 10 ग्राम गुलाब की पंखुड़ियों को 2 इलायची के साथ चबाकर खाने से सिर दर्द ठीक होता है। गर्मी के कारण से सिर दर्द हो तथा जी मिचलाएं तो सफेद चंदन को गुलाबजल में पीसकर माथे लेप करें इससे लाभ मिलेगा। गुलाब का इत्र माथे पर लगाने से सिर दर्द में लाभ मिलता है। गुलाबजल की 2-3 बूंद दोनों नथुने (नाक के छेद) में डालने से सिर दर्द कम होता है। बुखार होने के साथ ही सिर दर्द हो तो 2 चम्मच गुलाबजल को इतने ही पानी मिलाकर हर 3 घंटे में 3 बार पीएं इससे सिर दर्द ठीक हो जाता है। 14. आधासीसी (माइग्रेन): आधासीसी (आधे सिर का दर्द) के दर्द की अवस्था में उपचार के लिए 2 दाने इलायची, 1 चम्मच मिश्री और 10 ग्राम गुलाब की पत्तियों को पीसकर सुबह खाली पेट सेवन करें इससे लाभ मिलेगा। आधासीसी के दर्द में 1 ग्राम नौसादर को 12 ग्राम गुलाबजल में मिला लें। इस जल को रोगी के नाक में 4-5 बूंद की मात्रा में डालकर, रोगी नाक से इस दवा को अन्दर की ओर खींचने के लिए कहें इससे फायदा मिलेगा। 15. हैजा: हैजे की अवस्था में आधा कप गुलाबजल में एक नींबू निचोड़कर थोड़ी सी इसमें मिश्री मिला लें और 3-3 घंटे इसे रोगी को पिलाएं इससे हैजा ठीक हो जाएगा। 16. सीने की जलन व जी मिचलाना: 1 कप गुलाबजल को चौथाई कप पानी में मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करें इससे सीने की जलन तथा जी मिचलाने की अवस्था में आराम मिलेगा। 17. अम्लपित्त: गुलाबजल में गुलाब का फूल, 1 इलायची और 1 चम्मच धनिये के चूर्ण को मिलाकर पीस लें। भोजन करने के बाद इसे सेवन करें इससे अम्लपित्त रोग में लाभ होता है। 18. धूप से झुलसना: 1 भाग ग्लिसरीन, आधा भाग नींबू का रस और आधा भाग सेब का रस तथा 2 भाग गुलाबजल इन सब को मिलाकर फ्रिज में रख दें। इस लेप को धूप से झुलसी हुई त्वचा पर लगाएं इससे लाभ मिलेगा। 19. घमौरियां, पसीना: गर्मी के मौसम में शरीर में अलाइयां तथा घमौरियां अधिक निकलती है तथा शरीर से पसीना भी बहुत अधिक निकलता है। इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए नहाते समय 1 बाल्टी पानी में 20 बूंद गुलाबजल डालकर स्नान करें। रात को 4 चम्मच गुलाब का गुलकंद खाकर ऊपर से गर्म दूध पी लें इससे भी लाभ मिलेगा। 20. त्वचा के रोग: पानी में गुलाबजल डालकर प्रतिदिन स्नान करें इससे त्वचा के सभी रोग ठीक हो जाते हैं तथा शारीरिक सौन्दर्य बढ़ता है और इसकी सुगंध से दिमाग को ताजगी मिलती है। 21. बदबूदार पसीना आना: बदबूदार पसीना आने पर गुलाब के फूलों को पीसकर शरीर में लेप करना चाहिए तथा थोड़ी देर बाद स्नान कर लेना चाहिए इससे लाभ मिलेगा। एक बाल्टी पानी में 10 ग्राम गुलाबजल व एक नींबू का रस निचोड़कर स्नान करें इससे शरीर की बदबू दूर होती है। गुलाब की लाल या सफेद पंखुड़ियों के चूर्ण को शरीर पर मलने से पसीना निकलना कम हो जाता है और शरीर की बदबू भी मिट जाती है। 22. स्तनों में दर्द: अगर स्तनों में सूजन हो तो गुलाबजल में रुई भिगोंकर स्तनों पर रखें तथा आधे घंटे तक इसी अवस्था में आराम करें इससे स्तनों का दर्द ठीक हो जाता है तथा सूजन भी दूर हो जाती है। 23. नींद: अच्छी गहरी नींद लेने के लिए पानी में गुलाबजल मिलाकर स्नान करें तथा सोते समय तकिये के किनारे पर 2 बूंद गुलाब का इत्र (प्रफ्यूम) छिड़क दें इससे नींद अच्छी आती है। 24. थकावट: थकान को दूर करने के लिए 4 चम्मच गुलाबजल में 1 बूंद चंदन का तेल मिलाकर इससे शरीर की मालिश करें लाभ मिलेगा। 25. हाथ-पैरों की जलन: गर्मी के कारण हाथ-पैरों में जलन, पेट में गड़बड़ी, एसीडिटी आदि समस्यां हो तो गुलाब का शर्बत बनाकर पीएं इससे लाभ मिलेगा। हथेली और तलुवों में जलन हो तो चंदन पावडर और गुलाबजल मिलाकर इससे हथेली और तलुवों पर लेप करें। 26. पायरिया: गुलाबी रंग का गुलाब फूल खाने से मसूढ़े मजबूत होते हैं। मसूढ़ों से खून और मवाद आना भी बंद हो जाता है तथा पायरिया भी ठीक हो जाता है। गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां चबाकर खाते रहने से मसूड़े और दांत मजबूत होते हैं। इसके सेवन करने से मुंह की बदबू दूर होकर पायरिया की बीमारी ठीक हो जाती है। 27. लू (गर्मी): 1 गिलास ठंडे पानी में 1 चम्मच गुलाबजल मिलाकर उसमें कपड़ा भिगों दें और इसे निचोड़कर सिर पर रखें इससे लू का प्रकोप शांत हो जाता है। गुलाब के गुलकंद का सेवन करने से पूरे शरीर में ठंडक आ जाती है और लू का प्रकोप भी इससे शांत हो जाता है। लू लगने पर गुलकंद और गुलाब का शर्बत पीना चाहिए इससे लाभ मिलेगा। गर्मी से बचने के लिए एक 1 गुलाब के शर्बत में 2 चम्मच गुलकंद मिलाकर सुबह भूखे पेट और शाम को सोते समय पीएं इससे लाभ मिलेगा। 28. चेहरे के कील-मुंहासें: गुलाब के गुलकंद का सेवन प्रतिदिन दो बार करने से कील-मुंहासें ठीक हो जाते हैं तथा इसके साथ ही सिर दर्द, यकृत रोग, कोलाइटिस, चिकन पोक्स व अन्य छूत के रोग, गर्भावस्था के समय में कब्ज की समस्यां तथा स्तनों में दूध की कमी आदि प्रकार के कष्ट भी दूर हो जाते हैं। 29. खूनी बवासीर: खूनी बवासीर में गुलाब के 3 ताजा फूलों को मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है। 30. मासिकधर्म में अधिक खून बहना: अगर मासिकधर्म में खून ज्यादा मात्रा में आ रहा हो तो मासिकधर्म शुरू होने से 20 दिन पहले से ही सुबह-शाम 1-1 चम्मच गुलाब का गुलकंद खाने से लाभ मिलता है। 31. अधिक प्यास लगना:- अगर प्यास बहुत लगती हो तो दिन में 2 बार गुलाब का शर्बत पीना चाहिए। 32. हृदय की कमजोरी: हृदय की कमजोरी को दूर करने के लिए गुलाब का सेवन करना लाभकारी होता है। 33. यकृत के रोग: यकृत (जिगर) बढ़ा हुआ हो और इसमें सूजन तथा दर्द हो रहा हो तो गुलाब के 4 ताजे फूलों को पीसकर यकृत (जिगर) वाले स्थान पर लेप करें इससे लाभ मिलेगा। 34. यौवनशक्तिवर्द्धक: रोजाना 2 गुलाब के ताजे फूलों का सेवन करने से यौवन शक्ति में वृद्धि होती है। 35. स्मरणशक्ति: गुलाब का गुलकंद रोजाना 2-3 बार 3 चम्मच की मात्रा में खाने से स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है। गुलाब का इत्र माथे पर लगाने से मन प्रसन्न होता है। गुलाब का तेल बालों में लगाने से दिमाग ठण्डा रहता है। 36. दर्द: गुलाब के उपयोग से किसी भी प्रकार का दर्द ठीक हो जाता है जैसे- हृदय में दर्द, सिर दर्द तथा आमाशय का दर्द आदि। 37. चेहरे की सुन्दरता: गुलाब की ताजा पंखुड़ियों को पानी में उबाल लें और जब भी चेहरा साफ करना हो तब इस पानी से चेहरे को धोएं इससे चेहरे की चमक में वृद्धि होती है तथा ताजगी महसूस होता है। गुलाब की कुछ पंखुड़ियों को पीस लें और चेहरे को साफ करके लेप लगाएं और बीस मिनट बाद चेहरे को धो लें इससे चेहरे पर रोनक आ जाएगी। 38. पुत्रोत्पत्ति: लड़की को अपना मासिकधर्म शुरू होने पर 3 दिन तक लगातार सुबह और शाम सफेद गुलाब के फूलों का गुलकंद बनाकर 125-ग्राम की मात्रा में खाना चाहिए और ऐसे ही लगातार 3 दिन में 750 ग्राम गुलकंद खाने से अधिक लाभ मिलता है। 39. नेत्रज्योति वर्द्धक (आंखों की रोशनी बढ़ने के लिए): गुलाबजल आंखों में डालने से आंखों की रोशनी में वृद्धि होती है तथा आंखों के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। आंखों पर गुलाबजल के छीटें मारने या रुई का फोया गुलाबजल में भिगोंकर आंखों पर रखने से आंखों का दर्द ठीक होता है। इसके उपयोग से आंखों की लाली और सूजन भी कम हो जाती है। काले सुरमे के साथ ताजा गुलाब के फूलों के रस को आंखों में डालने से आंखों की जलन कम हो जाती है और आंखों की रोशनी भी बढ़ जाती है। 40. कब्ज: गुलाब का रस पीने से कब्ज दूर होती है। यह आंतों में छिपे हुए मल को बाहर निकाल देता है। 2-2 चम्मच गुलकंद सुबह-शाम को सोते समय गुनगुने दूध या पानी के साथ सेवन करने से कब्ज पूरी तरह से नष्ट हो जाती है। इससे पेट व आंतों की गर्मी भी शांत होती है। गुलकंद तथा अमलतास के गूदे को 1-1 चम्मच की मात्रा में या गुलकंद को सनाय की पत्ती के साथ सेवन करने से कब्ज दूर होती है। गुलाब की पत्ती, सनाय तथा हर्रे को 3 : 2 : 1 के अनुपात में लेकर 50 मिलीलीटर पानी में उबालें। उबलने पर जब चौथाई हिस्सा पानी बाकी रह जाए तो रात के समय में हल्का गर्म करके पी जाएं इससे कब्ज शिकायत दूर हो जाती है। 2 बड़े चम्मच गुलकंद, 4 मुनक्का व आधा चम्मच सौंफ को साथ-साथ एक साथ लेकर उबालें, जब आधा पानी बच जाये तो रात में सोते समय पी लें इससे पुरानी कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। सनाय 10 ग्राम, सौंफ 10 ग्राम, गुलाब के फूल 10 ग्राम और मुनक्का 20 ग्राम को 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें, जब पानी 50 ग्राम की मात्रा में बच जाएं तब इस काढ़े को छानकर पी लें इससे कब्ज़ (कोष्ठबद्धता) पुरी तरह से समाप्त हो जाएगी। गुलाब की पत्तियां 10 ग्राम, सनाय का 1 चम्मच पीसा हुआ चूर्ण, 2 छोटी हरड़ को लेकर दो कप पानी में डालकर उबाल लें। पानी जब एक कप बच जायें, तब इस बनें काढ़े का सेवन करें इससे लाभ मिलेगा। गुलाब 10 ग्राम, मजीठ 10 ग्राम, निसोत की छाल 10 ग्राम, हरड़ 10 ग्राम और सोनामाखी 10 ग्राम आदि को 80 ग्राम चीनी में मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में से साढ़े तीन ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सेवन करें इससे लाभ मिलता है। 41. सांप का जहर: गुलाबजल में चंदन को घिसकर कपूर मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को सांप के डंक लगे स्थान पर लगाएं इससे लाभ मिलेगा। 42. आंखों के चारों ओर कालापन छा जाना: 1 चम्मच देशी गुलाब के फूलों का गुलकंद शाम के समय लें इससे आंखों के चारों ओर का कालापन दूर हो जाता है। 43. योनि रोग: गुलाब का रस लगभग 10 मिलीलीटर और रोगन गुल 10 ग्राम को मिलाकर खाने से योनि की खुजली मिट जाती है। 44. नंपुसकता: 3 बोतल गुलाबजल में 10 ग्राम सोने का बुरादा डालकर मिला लें जब सब गुलाबजल में अच्छी तरह से मिल जाए तब इसके बाद बुरादे को निकाल कर रख लें। इसमें से 0.12 ग्राम या 0.24 ग्राम मलाई को मिलाकर खाने से सहवास करने की शक्ति में वृद्धि होती है। 45. मुंह की दुर्गंध: गुलाब की ताजी पंखड़ियां चबाने से एवं मसूढ़ों पर मलने से मसूढ़ें तथा अन्य करणों से आने वाली मुंह की दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है। 46. घाव: घाव पर गुलाब के पंखुड़ियों का चूर्ण डालने और सूजन पर गुलाब की पंखुड़ियों को पीसकर लेप लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है। 47. अरूंषिका (वराही): ताजे गुलाब के फूलों को पीसकर सिर में लेप करने से अरूंषिका रोग ठीक हो जाता है। 48. नकसीर: गुलाब जल में किशमिश के 20 दानों को मिलाकर सेवन करने से नकसीर (नाक से खून बहना) के रोग में आराम मिलता है। 49. मुर्च्छा (बेहोशी): गुलाबजल को रोगी को पिलाने और पंखे से हवा करने से बेहोशी दूर हो जाती है। गुलाब जल के छींटे आंखों पर मारने से गर्मी के कारण होने वाली बेहोशी दूर हो जाती है। 50. हृदय की धड़कन: सफेद गुलाब की पंखड़ियों का रस 10 से 20 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से हृदय की धड़कन में लाभ मिलता है। एक गुलाब के फूल को बासी मुंह चबाकर खा जाएं इससे हृदय की अनियमित धड़कन ठीक हो जाती है। 50 ग्राम गुलाब के सूखे फल, 100 ग्राम मिश्री को एकसाथ मिलाकर पीस लें। इस चूर्ण के 2-2 चम्मच सुबह-शाम गर्म दूध के साथ सेवन करने से दिल का धड़कना सही हो जाता है। यदि दिल बहुत धड़कता हो तो गुलाब के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें। इस चूर्ण में से 1-1 चम्मच गाय के दूध के साथ दिन में 2 बार सेवन करने इससे लाभ मिलेगा। 51. नहरूआ: 3 ग्राम भुने चने और 3 ग्राम हींग को गुलाब के साथ पीसकर चूर्ण बनाकर लें। यह चूर्ण सुबह-शाम 7 दिन तक सेवन करने से नहरूआ रोग ठीक हो जाता है। 10 ग्राम शुद्ध सुहागा को गुलाब के तेल में मिलाकर तीन दिन तक खाने से नहरूआ रोग नष्ट हो जाता है तथा सूजन मिट जाती है। 52. मिर्गी (अपस्मार): गुलाबजल में लगभग 0.48 ग्राम गोरोचन दिन में 3 बार मिलाकर रोगी को पिलाने से मिर्गी के कारण आने वाले दौरे दूर हो जाते हैं। 53. बच्चों की आंखों के लिए हितकर: अगर आंखों में जलन हो तो गुलाब-जल के छींटे आंखों में मारे अथवा केसर को घोटकर शहद में मिलाकर आंख में लगाएं इससे लाभ मिलेगा। 54. शरीर में सूजन: शरीर में सूजन आने पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों को पीसकर पानी में डालकर पतला करके सारे शरीर पर लेप करें या इससे मालिश करें तथा इसके एक घंटे बाद रोगी को स्नान कराएं इससे फायदा मिलेगा। 55. गुलकंद बनाने की विधि: गुलाब के फूल की पंखुड़ियों में बराबर की मात्रा में चीनी मिलाकर 2 सप्ताह धूप में रखने से गुलकंद बनता है। यदि गुलाब के फूल की ताजी पंखुड़ियां न मिले तो सूखी पंखुड़ियों को साफ करके थोड़ी देर पानी में भिगोकर इसे बना सकते हैं। 56. शरीर की रक्षा करने के लिए: गुलाब के फूल और पत्तियों में विटामिन सी, ई, कैरोटीन, फ्रूट, एसिड वसायुक्त तेल तथा निकोटिनेमाइड पाया जाता है जो हमारे शरीर के लिए लाभकारी होता है। गुलाब शरीर की रोगप्रतिरोधक (रोगों से लड़ने की ताकत) शक्ति को बढ़ाता है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग नहीं होते हैं। 57. गुलाब का अन्य उपयोग: गुलाब का फूल सौन्दर्य, स्नेह और प्रेम का प्रतीक है। गुलाब के फूलों से ठंडक मिलती है। शरीर के रंग-रूप में निखार आ जाता है। यह हृदय के लिए लाभकारी और त्रिदोषनाशक होता है। गुलाब का इत्र उत्तेजक होता है। गुलाबजल को गुलाब के रस के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। गुलाबजल मिठाइयों पर छिड़का जाता है या पानी में खुशबू के लिए डाला जाता है। गुलाबी गुलाब सौन्दर्य, चाहत, खुशी, आवेग, सादगी तथा प्रेम का प्रतीक माना जाता है। लाल और सफेद गुलाब जब एक साथ रखा जाता है तो यह मिलन का प्रतिक होता है। मासिकधर्म के रोग, रजोनिवृत्ति (मेनोपाज) तथा मासिकस्राव आने से पूर्व की समस्याओं (पीएमएस) के समय होने वाले कष्टप्रद लक्षणों को दूर करने के लिए गुलाब का तेल का उपयोग किया जाता है। 25 ग्राम गुलकंद में 5 ग्राम पिसी हुई सौंफ मिलाकर खाने से शरीर की जलन शांत हो जाती है। नकसीर, मासिकधर्म में अधिक रक्तस्राव होना, पेट और आंखों में जलन आदि रोग को ठीक करने के लिए गुलाब का उपयोग किया जा सकता है। गुलाब आंतों के रुखेपन और कब्ज को दूर करने में उपयोगी है। गर्मी में दिनों में जिन लोगों की त्वचा पर घमौरियां या फुंसियां होती हैं उनके इन कष्टों को दूर करने के लिए गुलाब का उपयोग करना लाभकारी हो सकता है। सफेद गुलाब को रोशनी का फूल, कोमलता, पवित्रता, सौम्यता, आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है। सफेद गुलाब की कली लड़कपन का प्रतीक होता है। गुलाब के फूलों का गुलदस्ता तोहफे के रूप में भेंट किया जाता है। आज कल प्रेमियों के बीच गुलाब के फूलों का लेन-देन करने का प्रचलन अधिक है क्योंकि यह प्रेम का प्रतिक होता है।

बुधवार, 31 मार्च 2021

Neem health benefits


Neem benefits 








 परिचय : नीम का पेड़ बहुत बड़ा होता है। नीम का पेड़ वातावरण को शुद्ध बनाने में विशेष भूमिका निभाता है, क्योंकि नीम की पत्तियों में गुणकारी तत्व पाये जाते हैं जो जीवाणुओं को नष्ट करते रहते हैं। नीम की इन रोग प्रतिरोधक शक्तियों के कारण इससे `एंटीसेप्टिक´ औषधियां बनाई जाती हैं। प्राचीन आर्य ऋषियों ने नीम को अलौकिक गुणों से युक्त बताया है कि नीम अनेक प्रकार की बीमारियों को मानव शरीर से दूर करता है। नीम के पत्ते खाकर कई लोग कई दिनों तक जीवित रहे हैं, साथ ही साथ शक्तिशाली भी रहकर अपना सामान्य जीवन व्यतीत किया है। गर्मी के दिनों में नीम के वृक्ष की छाया काफी आनन्दायक होती है। नीम के वृक्ष से गोंद प्राप्त की जाती है, जिससे औषधियां बनाई जाती है। इसका पेड़ देवालयों, धर्मशालाओं, सड़क आदि पर ठण्डी और ताजी हवाओं के लिए लगाया जाता है। गांव में जिस घर के आंगन में नीम का पेड़ होता हैं उस घर के लोग बीमार नहीं रहते हैं क्योंकि वे नीम का प्रयोग करते रहते हैं। जब नीम का पेड़ बहुत पुराना हो जाता है तो इसकी लकड़ी से शुद्ध चंदन की सी सुगन्ध आने लगती हैं। नीम की लकड़ी इमारत आदि बनाने के काम में लाई जाती है। कड़वा होने के कारण इसमें कीड़े नहीं लगते हैं। नीम का पेड़ कई सालों तक जीवित रहता है। नीम के बारे में एक अच्छी कहावत है कि नीम खाने में कड़वा होता है परन्तु काफी गुणकारी होता है। इसलिए इसका प्रयोग करना चाहिए। नीम का वृक्ष बबूल के वृक्ष से काफी अच्छा होता है, क्योंकि खेत के किनारे बबूल का वृक्ष सभी जरूरी पौष्टिक खनिज लवणों को चूस लेते हैं। लेकिन नीम का वृक्ष फसलों के लिए लाभकारी होता है। इसलिए किसानों को इसे अपने खेतों के किनारे अवश्य लगाना चाहिए। विभिन्न भाषाओं में नाम : भाषा नाम हिन्दी नीम संस्कृत निम्ब, अरिष्ट, पिचुमर्द, प्रभद्र गुजराती लीमड़ो बंगाली निममाछ, नीम मराठी कडूनिंब या बालन्तलिम्ब कर्नाटकी बेंबुं तैलिंगी वेप्या मलयलम वेत्पु पंजाबी नीम फारसी आज़ाद -दरख्ते -हिन्दी, नेनबनीम या दरख्तहक अरबी आज़ाद -दरख्तुल -हिन्द कुलनाम मिलएसीज अंग्रेजी मरगोवज ट्री, नीम ट्री वैज्ञानिक नाम अजादिरचता इडिका लैटिन एजोडिरेक्टा इण्डिको रंग : नीम का रंग हरा होता है। स्वाद : इसका पेड़ कड़वा, कषैला और हल्का होता है। स्वरूप : नीम के पेड़ बड़े और ऊंचे होते हैं। नीम के पत्ते नुकीले होते हैं। नीम के फूल मार्च से मई तक आते हैं। फूल सफेद छोटे व विशेष गंधयुक्त के होते हैं। फल खिन्नी के बराबर छोटे-छोटे होते हैं जो कच्चे हरे और पकने पर पीले तथा सूखने पर लाली लिए हुए काले रंग के हो जाते हैं। नीम का पेड़ भारी मोटा और लम्बा होता है। पत्ते आधे से डेढ़ इंच लम्बे दो नोकदार और किनारे पर आरे के समान दांत वाले होते हैं। नीम का वृक्ष 12 से 15 मीटर तक ऊंचा होता है। इसके तने की त्वक (छाल) खुरदरी भूरे रंग की होती है। इसके पेड़ में बसन्त ऋतु में तांबे के समान नए पत्ते आते हैं, जबकि गर्मी ऋतु में पत्तियां झड़ जाती हैं। वृक्ष के तने से गोंद भी प्राप्त की जाती है, जो पानी में घुलनशील होती है। स्वभाव : यह खाने में शीतल (ठंड़ा) होता है। हानिकारक : नीम उन व्यक्तियों के लिए हानिकारक होता है जिनकी प्रवृति सूखी (रूक्ष) होती है। जिनकी कामशक्ति कमजोर हो उन्हें भी नीम अधिक उपयोग करने से बचना चाहिए। दोषों को दूर करने वाला : सेंधानमक, घी और गाय का दूध नीम के दोषों को दूर करने में मदद करता है। तुलना : नीम की तुलना बकायन से की जा सकती है। मात्रा : नीम के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, छाल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम, तेल 5 से 10 बूंदों तक सेवन कर सकते हैं। गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार नीम कडुवी होती है। यह वात, पित्त, कफ, रक्तविकार (खून को साफ करने वाला), त्वचा के रोग और कीटाणुनाशक होती है। नीम मलेरिया, दांतों के रोग, कब्ज, पीलिया, बालों के रोग, कुष्ठ, दाह (जलन), रक्तपित्त (खूनी पित्त), सिर में दर्द, वमन (उल्टी), प्रमेह (वीर्य विकार), हृदयदाह (दिल की जलन), वायु (गैस), श्रम (थकावट), अरुचि (भूख को बढ़ाने वाला), बुखार, पेट के कीड़ें, विष (जहर), नेत्र (आंखों) के रोग, प्रदर आदि रोगों को नष्ट करती है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार नीम गर्म और खुश्क होती है। नीम का गोंद खून की गति को बढ़ाने वाला और रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला) होता है। उपदंश (गर्मी) और चर्म (त्वचा) रोग के लिए यह एक अच्छी औषधि है। होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली के अनुसार नीम पुराने से पुराने रोगों की दवा रखता है जैसे-त्वचा रोग, कुष्ठ, कुनैन आदि। वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार नीम में विभिन्न प्रकार के तत्व पाये जाते हैं जैसे-मार्गोसीन, सोडियम मार्गोसेट, निम्बिडिन, निम्बोस्टेरोल, निम्बिनिन, स्टियरिक एसिड, ओलिव एसिड, पामिटिक एसिड, उड़नशील तेल और टैनिन आदि। बीजों से प्राप्त स्थिर तेल 45 प्रतिशत निकलता है, जिसमें गंधक, राल, एल्केलाइड, ग्लूकोसाइड और वसा अम्ल पाए जाते हैं। इसके साथ ही थोड़ी-सी मात्रा में लौहा, कैल्शियम और पोटैशियम आदि के लवण भी थोड़ी बहुत मात्रा में पाये जाते हैं। नीम की गोंद में 26 प्रतिशत पेन्टोसन्स, 12 प्रतिशत गेलेक्टीन व अल्प मात्रा में अल्बयूमिन्स और ऑक्साइडस भी होते हैं। नीम के पेड़ के विभिन्न अंगों का अलग-अलग प्रयोग होता है जो इस प्रकार से हैं- नीम के पत्ते : नीम के पत्ते कड़वे, कृमिघ्न (कीड़ों के नाशक), पित्त, अरुचि तथा विष विकार में लाभ देते हैं। नीम की कोपले : इसकी कोपले संकोचक, वातकारक, रक्तपित्त (खूनी पित्त), आंखों के रोग और कुष्ठ रोग नाशक होती हैं। नीम की सींक (डंडी) : यह रक्त (खून), खांसी, श्वास (दमा), बवासीर (अर्श), गांठे, पेट के कीड़े और प्रमेह आदि रोगों में लाभकारी है। नीम के फूल : नीम के फूल पित्तनाशक तथा कड़वे होते हैं। ये पेट के कीड़े और कफ को समाप्त करने वाले होते हैं। कच्ची निंबौली : कच्ची निंबौली रस में कड़वी, तीखी, स्निग्ध (चिकनी), लघु, गर्म होती है तथा यह फोड़े-फुंसियां और प्रमेह को दूर करती है। नीम की छाल : नीम की छाल संकोचक, कफघ्न (कफ को मिटाने वाली), अरुचि, उल्टी, कब्ज, पेट के कीडे़ तथा यकृत (लीवर) विकारों में लाभकारी होती है। नीम की छाल में निम्बीन, निम्बोनीन, निम्बीडीन, एक उड़नशील तेल, टैनिन और मार्नोसेन नामक एक तिक्त घटक होता है। नीम में एक जैव रासायनिक तत्व प्राप्त होता है जिसे लिमानायड कहते हैं। लगभग 200 प्रकार के हानिकारक कीटाणुओं पर नीम का असर होता है। नीम का पंचांग (फल, फूल, पत्ती, तना और जड़ का चूर्ण) : रुधिर (खून की बीमारी) विकार, खुजली, व्रण (जख्म), दाह (जलन) और कुष्ठघ्न (कोढ़ को नष्ट करने वाला) में पहुंचाता है। नीम के बीज : नीम के बीज दस्तावर और कीटाणुनाशक हैं। पुरानी गठिया, पुराने जहर और खुजली पर इसका लेप करने से आराम मिलता है। नीम का तेल : नीम के तेल की मालिश करने से लाभ होता है। विभिन्न रोगों में सहायक : 1. रक्तार्बुद (फोड़ा) : नीम की लकड़ी को पानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें। इससे फोड़ा समाप्त हो जाता है। 2. नकसीर (नाक में से खून का आना) : नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबर मात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने से नकसीर का चलना बन्द हो जाता है। 3. बालों का असमय में सफेद होना (पालित्य रोग) : नीम के बीजों के तेल को 2-2 बूंद नाक से लेने से और केवल गाय के दूध का सेवन करने से पालित्य रोग में लाभ होता है। नीम के तेल को सूंघने से बाल काले हो जाते हैं। नीम के बीजों को भांगरा और विजयसार के रस की कई भावनाएं देकर बीजों का तेल निकाल लें, फिर इसकी 2-2 बूंदों को नाक से लेने से तथा आहार में केवल दूध और भात खाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं। 4. बालों की रूसी : एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर नहाने से 1 घंटे पहले सिर पर मलने से रूसी मिट जाती है। नीम की निबौलियों को सुखाकर अरीठा के साथ मिलाकर बारीक पीसकर रख लें। इसे 2 चम्मच भर एक गिलास गर्म पानी में घोलकर सिर को धो लेने से सिर की जूंएं, लीखें, सिर की दुर्गन्ध खत्म हो जाती है तथा बाल काले और मुलायम होते हैं। नीम के पत्तों को पीसकर पानी में उबालकर ठंड़ा होने दें। इसके बाद इसे छानकर इससे सिर को धो लें और बालों को सही तरह से मालिश करें। बालों के सूख जाने पर स्वच्छ एरण्ड का तेल और नारियल का तेल बराबर मात्रा में लेकर इसे मिला लें और इससे सिर की अच्छी तरह से मालिश करें। इससे सिर की रूसी मिट जाएगी। 5. खसरा : खसरा के मरीज के बिस्तर पर रोजाना नीम की पत्तियां रखने से अन्दर की गर्मी शान्त हो जाती है। नीम के ताजे और मुलायम पत्तों को पानी में उबालकर छान लें, फिर उसमें साफ कपड़े की पट्टी को भिगोकर खसरे के रोगी की आंखों पर रखने से आंखों का लाल होना दूर हो जाता है। रोगी को नीम के पानी से नहलाने से खसरे के रोग में जलन दूर होती है। 6. शरीर के आधे अंग में लकवा (अर्धांगवात) : नीम के तेल की 3 सप्ताह तक मालिश करने से लाभ होता है। 7. गंजापन और बालों की वृद्धि : नीम के पत्ते 10 ग्राम, बेर के पत्ते 10 ग्राम दोनों को अच्छी तरह पीसकर इसका उबटन (लेप) बना लें। इस लेप को गंजे सिर पर मालिश करके 1 से 2 घंटे बाद धोने से बाल उग आते हैं। इसका प्रयोग 1 महीने तक करने से लाभ होता है। नीम का तेल 2-3 महीने रोजाना बालों के उड़कर बने हुए चकते पर लगाने से बाल उग आते हैं। 100 ग्राम नीम के पत्तों को 1 लीटर पानी में उबालने के बाद बालों को धोकर नीम का तेल लगाएं। इससे बाल उगने लगते हैं। नीम के तेल को सूंघने से गंजेपन का रोग दूर हो जाता है। 8. बालों को मजबूत बनाना और गिरने से रोकना : नीम के पत्तों को पानी में खूब उबालें। इसके बाद इसे उतारकर ठंड़ा कर लें। इस पानी से सिर को धोते रहने से बाल मजबूत, काले होते हैं और बालों का गिरना या झड़ना बन्द हो जाता है। नीम का तेल रात को सोने से पहले बालों में लगा लें और सुबह नीम वाले साबुन से सिर को धो लें। कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करने से सिर की जुंए और लीख दूर होती हैं। इसके साथ बाल मजबूत होते हैं। नीम का तेल लगाने से बाल फिर से जम जाते हैं। नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालकर बालों को धोकर बालों को सुखा लें। अब नीम के तेल को बालों की जड़ों में लगाकर मसलने से बालों का गिरना बन्द हो जाता है। सिर के बाल गिरने की शुरूआत ही हुई हो तो इसके लिए आप को नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबाल लेना चाहिए। इससे बालों को धोने से बालों का झड़ना कम हो जाता है। इस तरह बाल काले भी होगें और लंबे भी। इसके प्रयोग से जुएं भी मर जाते हैं। सिर धोते समय इस बात का ध्यान रखें कि यह पानी आंखों में प्रवेश हो। इसके लिए आंखों को बन्द रखें। 9. सिर में खुजली होने पर : नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर सिर को धो लें। सिर को धोने के बाद नीम के तेल को लगाने से सिर की जूएं और लीखों के कारण होने वाली खुजली बन्द हो जाती है। नीम के बीजों को पीसकर लगाने से भी लाभ होता है। 10. कील-मुंहासे : नीम के पत्ते, अनार का छिलका, लोध्र और हरड़ को बराबर लेकर दूध के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें। इस लेप को रोजाना मुंह पर लगाने से मुंह और चेहरा निखर उठता है। नीम की छाल के बिना नीम की लकड़ी को पानी के साथ चंदन की तरह घिसकर मुंहासों पर 7 दिनों तक लगातार लगाने से मुंहासे पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं। नीम की जड़ को पानी में घिसकर लगाने से कील-मुंहासे मिट जाते हैं और चेहरा सुंदर बन जाता है। 11. दांतों के रोग : नीम की दातुन करने से दांतों के रोगों में लाभ मिलता है। नीम के फूलों से बने काढ़े से दिन में 3 बार गरारे करें और पतली टहनी को दांतों से चबा-चबाकर सुबह-शाम दातुन करते रहने से दांतों और मसूढ़ों के रोगों से छुटकारा मिलता है। नीम की पत्तियों का रस मलने से दांतों के जीवाणु मिट जाते हैं। नीम की निंबौली की गुठली से प्राप्त किये तेल को दांतों में लगाने से दांतों के कीड़े खत्म होते है और दांतों में दर्द कम होता है। नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर साफ कपड़े से छानकर कुल्ला करने से दांतों के जीवाणु नष्ट होते हैं और पायरिया में भी लाभ मिलता है। नीम की जड़ की छाल का 50 ग्राम चूर्ण, सोनागेरू 50 ग्राम, सेंधानमक 10 ग्राम को पीसकर, नीम के पत्तों का रस मिलाकर सुखाकर शीशी में रख दें। इसका मंजन करने से दांतो में से खून का गिरना, पीव का आना, मुंह में छाले पड़ना, मुंह से दुर्गन्ध का आना, जी मिचलाना आदि रोगों से छुटकारा मिलता है। 100 ग्राम नीम की जड़ को कूटकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब पानी 250 मिलीलीटर शेष रह जाये तो इस पानी से कुल्ला करते रहने से दांतों के रोग दूर होते हैं। सुबह उठते ही नीम की दातुन करने से और फूलों के काढ़े से कुल्ला करने से दांत और मसूढ़ों के रोग से मुक्त मिलती है और दांत मजबूत होते हैं। 12. दंतमंजन बनना : नीम की टहनी और पत्तियों को छाया में सुखाने के बाद जलाकर राख बना लें। इसे पीसकर मंजन बना लें। सुगन्ध और स्वाद के लिए इसमें लौंग, पिपरमेंट और नमक को मिला लें। इससे पायरिया ठीक हो जाता है और दांत मजबूत होते हैं। नीम की कोपलों को पानी में उबालकर कुल्ला करने से दांतों का दर्द मिटता है। नीम के सूखे फूलों का 3 ग्राम कपड़े में छना हुआ चूर्ण रोजाना रात को गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। 13. आंखों की पलकों के बालों का झड़ना : नीम के ताजे पत्तों को पीसकर, निचोड़कर इसे पलकों पर लगाने से पलकों के बाल झड़ना बन्द हो जाते हैं। 14. आंखों की सूजन : नीम की 10 से 15 हरी पत्तियों को 1 गिलास पानी में उबालें। इसके बाद इसमें आधा चम्मच फिटकरी को मिलाकर पानी को छान लें। इस पानी से आंखों को 3 बार सेंकने से आंखों की सूजन और खुजली ठीक हो जाती है। 15. आंखों के रोगों में : जिस आंख में दर्द हो उसके दूसरी ओर के कान में नीम के कोमल पत्तों का रस गर्म करके 2-2 बूंद टपकाने से आंख और कान का दर्द कम हो जाता है। नीम के पत्तों और लोध्र को बराबर लेकर पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इस चूर्ण की पोटली बनाकर पानी में भीगने दें। बाद में इस पानी को आंखों में डालने से आंखों की सूजन कम होती है। नीम के पत्तों और सौंठ को पीसकर उसमें थोड़ा सेंधानमक मिलाकर गर्म कर लें और रात के समय एक कपडे़ की पट्टी रखकर आंखों पर बांधे। इससे आंखों के ऊपर की सूजन के साथ दर्द और भीतरी खुजली समाप्त हो जाती है। ध्यान रहे कि रोगी को शीतल पानी और शीतवायु से आंखों को बचाना चाहिए। 500 ग्राम नीम के पत्तों को 2 मिट्टी के बर्तनों के बीच कण्डों की आग में रख दें। शीतल होने पर अन्दर की राख का 100 मिलीलीटर नींबू के रस में कुटकर सूखा लें। इसका अंजन (काजल) लगाने से आंखों के रोगों में लाभ मिलता है। 50 ग्राम नीम के पत्तों को पानी के साथ बारीक पीसकर टिकिया बनाकर सरसों के तेल में पका लें। जब यह जलकर काली हो जाए तब उसे उसी तेल में घोटकर उसमें 500 ग्राम कपूर तथा 500 ग्राम कलमीशोरा मिलाकर खूब घोटकर कांच की शीशी में भर लें। इसे रात को आंखों में काजल के समान लगाने तथा सुबह त्रिफला को पानी के साथ सेवन करने से आंखों की जलन, लालिमा, जाला, धुन्ध आदि दूर हो जाती है तथा आंखों की रोशनी बढ़ जाती है। नीम की कोपलें 20 पीस, जस्ता भस्म 20 ग्राम, लौंग के 6 पीस, छोटी इलायची के 6 पीस और मिश्री 20 ग्राम को एकत्रित करके खूब बारीक करके सुर्मा बना लें। इसे थोड़ा-थोड़ा सुबह-शाम आंखों में लगाने से धुंध ठीक होता है। 10 ग्राम साफ रूई पर 20 नीम के सूखे पत्तों को बिछा दें, फिर नीम के पत्तों पर 1 ग्राम कपूर का चूर्ण रखकर रूई को लपेटकर बत्ती बना लें। इस बत्ती को 10 ग्राम गाय के घी में भिगोकर इसका काजल बना लें। इस बने हुए काजल को रात को लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ जाती है। नीम के पत्तों के रस को गाढ़ा कर अंजन (काजल) के रूप में लगाते रहने से आंखों की खुजली, बरौनी (आंखों की पलकों के बाल) के झड़ने में लाभ होता है। 16. मोतियाबिन्द : नीम की बीज की गुठली के बारीक चूर्ण को रोजाना थोड़ी-सी मात्रा में आंखों में काजल के समान लगाना हितकारी होता है। नीम के तने की छाल (खाल) की राख को सुरमे की तरह आंखों में लगाने से आंखों का धुंधलापन दूर होता है। नीम या कमल के फूल के बारीक चूर्ण को शहद के साथ रात को सोते समय आंखों में काजल के समान लगाने से मोतियाबिन्द ठीक हो जाता है। 18. आंव (दस्त के साथ एक प्रकार का सफेद चिकना पदार्थ का आना) : नीम की हरी पत्तियों को धोकर सुखाकर पीस लें, इसे आधा चम्मच सुबह-शाम खाने के बाद 2 बार ठंड़े पानी से फंकी लें। कुछ दिनों तक लेने से आंव का आना बन्द हो जाता है। नीम की हरी पत्तियों को छाया में सुखाकर अच्छी तरह चूर्ण बना लें, यह चूर्ण आधा चम्मच सुबह-शाम ठंड़े पानी के साथ फंकी के रूप में सेवन करने से आंव रुक जाती है। 19. आंखों का फूलना, धुंध जाला : नीम के सूखे फूल, कलमी शोरा को बारीक पीसकर कपड़े में छानकर आंखों में काजल के रूप में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। रतौंधी (शाम को दिखाई देना बन्द होना) में कच्चे फलों का दूध आंखों में लगा सकते हैं। 20. सिर में दर्द का होना : सूखे नीम के पत्ते, कालीमिर्च और चावल को बराबर लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, सुबह उठकर जिस ओर पीड़ा हो, उसी ओर के नाक में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक नस्य लेने से पुराने आधे सिर का दर्द तुरन्त नष्ट हो जाता है। नीम के ताजे पत्तों का रस 2 से 3 बूंद की मात्रा में नाक में टपकाने से लाभ मिलता है। नीम के तेल की मालिश करने से सिर के दर्द में आराम आता है। नीम की छाल और आंवला के काढ़े को पिलाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है। सिर में दर्द होने पर नीम की छाल, झाड़ की छाल और चंदन को घिसकर सिर या माथे पर लेप की तरह लगाने से सिर का दर्द खत्म हो जाता है। 21. बुखार : नीम के पत्ते, गिलोय, तुलसी के पत्ते, हुरहुर के पत्ते 20-20 ग्राम और कालीमिर्च 6 ग्राम को बारीक पीसकर पानी के साथ मिलाकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोली बना लें तथा 2-2 घंटे के अंतर के बाद 1-1 गोली गर्म पानी के साथ लेने से इन्फ्लुएंजा में लाभ होता है। नीम की छाल 5 ग्राम, लौंग लगभग आधा ग्राम या दालचीनी लगभग आधा ग्राम को पीसकर चूर्ण बना लें, 2 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ लेने से सामान्य बुखार में राहत मिलती है। नीम की कोमल पत्तियों को पीसकर, किसी कपड़े में बांधकर रस निकाल लें, इस रस में शहद को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से बुखार कम होता है। सोंठ, गिलोय, नीम की छाल, धनिया, लाल चंदन, पदमकाष्ठ आदि को पीसकर सेवन करने से बुखार समाप्त होता है। नीम की छाल का काढ़ा पीने से लगातार आने वाले बुखार दूर होता है। नीम की छाल, कुटकी, चिरायता, गिलोय और अतीस का अष्टमांश काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पिलाने से आराम मिलता है। 22. पुराना बुखार : नीम के पत्ते 20 से 25 और 25 कालीमिर्च को लेकर मलमल के कपड़े में पोटली बांधकर आधा लीटर पानी में उबाल लें, बचे चौथाई पानी को ठंड़ा होने पर सुबह-शाम पीने से पुराने बुखार में लाभ होता है। नीम की छाल, मुनक्का और गिलोय को बराबर लेकर 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 20 मिलीलीटर की मात्रा में कुछ दिनों तक सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करना चाहिए। 23. कान बहना, कान में दर्द : नीम का तेल और शहद बराबर लेकर मिला लें, फिर इसकी 2-2 बूंदे रोजाना 1 से 2 महीने तक कान में डालने से कान के बहने में लाभ मिलता है। नीम के तेल को शहद में मिलाकर रूई की बत्ती को भिगो लें, फिर इस बत्ती को कान में रखने से कान के बहने में आराम मिलता है। नीम के तेल की बूंदे कान में डालने से कान में दर्द कम होता है और कान की फुंसियां खत्म हो जाती हैं। नीम के पत्तों का रस 40 मिलीलीटर और 40 मिलीलीटर तिल के तेल को मिलाकर गर्म कर लें, फिर इस तेल को छानकर 3-4 बूंद कान में डालने से लाभ होता है। कान में दर्द होने पर चंदन या नीम के तेल को गर्म करके बूंद-बूंद की मात्रा में लेकर कान में डालने से लाभ होता है। नीम के पत्तों को उबालते समय इसकी भाप से कान को सेंकने से लाभ मिलता है। 24. यक्ष्मा (टी.बी.) : नीम का तेल 4-4 बूंद कैप्सूल में भरकर टी.बी. के रोग में प्रतिदिन 3 बार प्रयोग करने से लाभ मिलता है। 25. दमा (श्वास) : 10 बूंदे नीम का तेल पान पर लगाकर खाने से दमा व खांसी में लाभ होता है। 26. पित्त ज्वर (पित्त के कारण उत्पन्न बुखार) : नीम के पत्तों का फेन-युक्त रस शरीर पर मलने से पित्त ज्वर की जलन शान्त हो जाती है। नीम की छाल, हल्दी, गिलोय, धनिया और सोंठ इन पांचों को बराबर सेवन से पित्त के बुखार में फायदा होता है। नीम के कोमल पत्तों को नींबू के रस में पीसकर माथे पर लगाने से जलन और बुखार ठीक हो जाता है। नीम और गिलोय का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर खाने से पित्त ज्वर मिट जाता है। नीम की कोंपल और चिरायते का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी-सी मात्रा में शहद को मिलाकर देना चाहिए। 27. हिक्का (हिचकी) : 2 पीस नीम की सींक को 10 मिलीलीटर पानी में पीस लें, फिर मोरपंख के चांद की राख लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर सेवन करें। नीम की पत्तियों को इकठ्ठा करके उसे जला दें, फिर उसमें कालीमिर्च का चूर्ण डालें। इसका धुआं लेने से हिचकियां आनी बन्द हो जाती हैं। 28. गलकर कटने वाला कुष्ठ (गलित कुष्ठ) : नीम की छाल और हल्दी 1-1 किलो और 2 किलो गुड़ को बडे़ मिट्टी के मटके में भरकर उसमें 5 लीटर पानी डालकर मुंह बन्द कर घोड़े की लीद से मटके को ढ़क दें, 15 दिन बाद निकालकर रस (अर्क) निकाल लें। इस रस को 100 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम सेवन कराने से गलित कुष्ठ में लाभ होता है। इसके सेवन के बाद बेसन की रोटी घी के साथ सेवन कर सकते हैं। 29. पेट के कीड़े (उदर कृमि) : सब्जी या बैंगन के साथ नीम के 8-10 पत्तों को छौंककर खाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर 20 मिलीलीटर की मात्रा में खाली पेट 3 दिन तक पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। नीम के पेड़ की छाल को उतारकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें, इस बने चूर्ण की 2 ग्राम को खुराक के रूप में हींग और शहद के साथ सेवन करने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। नीम के पेड़ के ताजे पत्तों की कोपलों को पीसकर प्राप्त हुए रस को शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीड़े और खून की खराबियां मिट जाती हैं। नीम के पत्तों को तिल के तेल में पकाकर छानकर रख लें, फिर इसी तेल की मालिश करने से सिर की जूं, लीख और बाहरी कीड़े समाप्त हो जाते हैं। नीम की पत्तियों को सुखाकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2 चुटकी की मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। नीम के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। 30. अम्लपित्त (एसिडिटिज, खटटी डकारे) : धनिया, सौंठ, नीम की सींक और शक्कर (चीनी) को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को सुबह-शाम पीने से खट्टी डकारे, अपचन (भोजन का न पचना) और अधिक प्यास का लगना दूर होता है। नीम की जड़ का बारीक चूर्ण 10 ग्राम, विधारा चूर्ण 20 ग्राम, सत्तू को 100 ग्राम लेकर अच्छी तरह से मिला लें। इसे थोड़ी-सी मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन करने से अम्ल पित्त समाप्त होती है। नीम के पत्ते और आंवलों का काढ़ा पीने से अम्लपित्त नष्ट होता है। 31. पेट में दर्द : नीम के पेड़ के तने की मोटी छाल 40-50 ग्राम को जौ के साथ कूटकर 400 मिलीलीटर पानी में पका लें और 10 ग्राम नमक को ऊपर से डाल दें, जब पानी आधा शेष बचे तो इसे गर्म-गर्म ही छानकर पीने से लाभ होता है। 32. दस्त (अतिसार): नीम की 50 ग्राम छाल को जौ के साथ कूटकर पानी में आधा घंटे उबालकर छान लें, फिर इसी छनी हुई छाल को पुन: 300 मिलीलीटर पानी में पकायें, 200 मिलीलीटर शेष रहने पर छानकर शीशी में भर लें और इसमें पहले छाने हुए पानी को मिला दें, इसे 50-50 मिलीलीटर दिन में 3 बार पिलाने से पतले दस्त आने बन्द हो जाते हैं। नीम की 1 ग्राम बीज की गिरी थोड़ी-सी चीनी मिलाकर पीसकर पानी से फंकी लें। ध्यान रहें कि रोगी चावल का सेवन न करें। गर्मी में दस्त होने पर नीम के 10 पत्ते और 25 ग्राम मिश्री पीसकर पानी में मिलाकर पी लें। 5 नीम के हरे पत्तों को पीसकर आधा चम्मच शक्कर (चीनी) मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से दस्त ठीक हो जायेंगे। नीम के पत्तों और हल्दी को मिलाकर अच्छी तरह से पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर रख लें, फिर इन्हीं गोलियों में से 1-1 गोली को सुबह-शाम सेवन करने से दस्त का आना बन्द हो जाता है। नीम के 10 पत्तों को पीसकर थोड़ी-सी मात्रा में मिश्री को मिलाकर 1 कप पानी में डालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से लाभ होता है। 1 ग्राम निबौली की गिरी यानी गुठली के बीच के भाग और थोड़ी-सी चीनी को मिलाकर खाकर ऊपर से गुनगुना पानी पीने से लाभ मिलता है। नीम के बीज यानी निबौली की गिरी 10 ग्राम, बड़ी हरड़ की छाल 20 ग्राम को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, इस चूर्ण को 2 से 5 ग्राम की मात्रा में ताजे दूध में मिश्री या चीनी डालकर एक दिन में 2 से 3 बार खुराक के रूप में पीने से खूनी दस्त और पेट के दर्द से छुटकारा मिलता है। 1 ग्राम नीम के बीज (निबौली) की गिरी और थोड़ी-सी चीनी को डालकर अच्छी तरह पीसकर रख लें, फिर इसे फंकी के रूप में खाने से लाभ मिलता है। ध्यान रहे कि खाने में केवल चावल का प्रयोग करें। 33. पुराने दस्त : 1 ग्राम नीम के पेड़ के बीज की गिरी, थोड़ी-सी चीनी मिलाकर पीस लें। इस चूर्ण को पानी के साथ लें। गर्मी के दिनों में दस्त होने पर नीम के 10 पत्ते और 25 ग्राम मिश्री पीसकर पानी में मिलाकर पीयें। ध्यान रहे कि खाने में केवल चावल का ही प्रयोग करें। नीम के 5 हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को मिलाकर पीस लें और 125 मिलीलीटर पानी में मिलाकर, छान पीने से लाभ होता है। 34. पेचिश: 1 चम्मच नीम की पत्तियों के रस में 2 चम्मच मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है। 35. जूते के कारण घाव बनने पर : नीम के तेल और नीम की पत्तियों की बारीक राख को घावों पर लगाने से आराम मिलता है। 36. यकृत (लीवर): 30 ग्राम नीम के पत्ते 1 गिलास पानी में तेज उबालकर रोजाना पीने से लाभ होता है। मदिरा (शराब) पीने से लीवर जल्दी ठीक होता है। 10 ग्राम नीम की छाल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं। उस काढ़े को कपडे़ द्वारा छानकर, उसमें शहद मिलाकर सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से यकृत वृद्धि मिट जाती है। 37. आमातिसार: नीम की छाल की राख 10 ग्राम को दही के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आमातिसार में लाभ होता है। 38. रक्तातिसार (खूनी दस्त का आना): नीम की 3 से 4 पकी निबौलियां खाने से लाभ मिलता है। 39. सांप के काटने पर: नीम के पत्ते सुबह खाने से सांप का जहर नहीं चढ़ता है। 40. पीलिया (पाण्डु, कामला): नीम की जड़ का बारीक चूर्ण 1 ग्राम सुबह-शाम 5 ग्राम घी और 10 ग्राम शहद के साथ मिलाकर खाने से पीलिया के रोग में आराम मिलता है। ध्यान रहे यदि घी और शहद अनुकूल न हो तो नीम की जड़ 1 ग्राम चूर्ण गाय के पेशाब या जल या दूध में किसी एक के साथ लेना चाहिए। नीम की सींक 6 ग्राम और सफेद पुनर्नवा की जड़ 6 ग्राम को पीसकर पानी के साथ कुछ दिनों तक पिलाते रहने से पीलिया में आराम मिलता है। नीम के पत्तों का रस 3 चम्मच, सोंठ का पाउडर आधा चम्मच और शहद चार चम्मच को मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से 5 दिन में ही पीलिया ठीक होता है। गिलोय के पत्ते, नीम के पत्ते, गूमा के पत्ते और छोटी हरड़ को 6-6 ग्राम की मात्रा में कूटकर 200 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब 50 मिलीलीटर पानी शेष बचे तो पानी को छानकर 10 ग्राम गुड़ के साथ सुबह-शाम सेवन करें। ध्यान रहे कि इसके सेवन से पहले लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग शिलाजीत 6 ग्राम शहद के साथ अवश्य चाट लें। इससे पीलिया का रोग ठीक हो जाता है। नीम के पेड़ की छाल के रस में शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर देना चाहिए। पानी में पिसे हुए नीम के पत्तों के 250 मिलीलीटर रस में शक्कर (चीनी) मिलाकर गर्म-गर्म पीने से आराम मिलता है। पित्तनलिका में मार्गावरोध होने के कारण पीलिया रोग हो तो 100 मिलीलीटर नीम के पत्ते रस में 3 ग्राम सौंठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद के साथ मिलाकर 3 दिन तक सुबह पिलाने से लाभ पहुंचता है। ध्यान रहे की इसके सेवन के दौरान घी, तेल, शक्कर (चीनी) व गुड़ आदि का प्रयोग न करें। 10 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस में 10 मिलीलीटर अडूसा के पत्तों के रस व 10 ग्राम शहद को मिलाकर सुबह लें। 10 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस में 10 ग्राम शहद को मिलाकर 5 से 6 दिन तक पीने से आराम मिलता है। नीम के पत्ते के 200 मिलीलीटर रस में थोड़ी शक्कर (चीनी) मिलाकर गर्म करें। इसे 3 दिन तक दिन में एक बार खाने से लाभ होता है। नीम के 5-6 कोमल पत्तों को पीसकर, शहद मिलाकर सेवन करने से मूत्रविकार (पेशाब के रोग) और पेट की बीमारियों में लाभ होता है। कड़वे नीम के पत्तों को पानी में पीसकर एक पाव रस निकाल लें। फिर उसमें मिश्री मिलाकर गर्म करें और ठंड़ा होने पर पी जायें। इससे पाण्डु या पीलिया रोग दूर होता है। नीम की छाल, त्रिफला, गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता और नीम की छाल बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसमें शहद मिलाकर पीने से पाण्डु, कामला या पीलिया जैसे रोग मिट जाते हैं। नीम के पत्तों का आधा चम्मच रस, सोंठ 2 चुटकी और शहद 2 चम्मच। तीनों को मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करें। 41. प्रमेह (वीर्य विकार), सुजाक (गिनोरिया की बीमारी) : नीम के पत्तों को पीसकर टिकिया बना लें। फिर उसे गाय के घी में तलकर रख लें। जब टिकिया जल जाए तो घी को छानकर रोटी के साथ लगाकर सेवन करें। इससे दोनों रोगों में लाभ मिलता है। नीम के पत्ते के 10 मिलीलीटर रस को शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। 20 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को 1 ग्राम नीला थोथा घोटकर सुखा लें, फिर इसे कौड़ियों में रखकर भस्म करें। इसके बाद इसे लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग लेकर गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसे दिन में 2 बार लेने से आराम मिलता है। 42. मलेरिया का बुखार: 20 ग्राम नीम की जड़ की छाल को कूटकर 160 मिलीलीटर पानी में रात को भिगो दें। इसे सुबह के समय उबालकर काढ़ा बना लें। यह काढ़ा दिन में तीन बार मलेरिया के रोगी को देने से लाभ मिलता है। नीम की जड़ की बीच की छाल 50 ग्राम को कूटकर 600 मिलीलीटर पानी में लगभग 20 मिनट तक उबालकर छान लें। जब रोगी को मलेरिया का बुखार चढ़ रहा हो तो बुखार चढ़ने से पहले 40 से 60 मिलीलीटर 2 से 3 बार पिलाने से बुखार (मलेरिया) रुक जायेगा। नीम के तेल की 5-10 बूंद दिन में 1 या 2 बार सेवन करना चाहिए। 60 ग्राम नीम के हरे पत्ते, 4 कालीमिर्च को पीसकर 125 मिलीलीटर पानी में छानकर पीने से मलेरिया ठीक होता है। नीम के पत्ते, निबौली, कालीमिर्च, तुलसी, सोंठ, चिरचिटा को समान मात्रा में मिलाकर 1 गिलास पानी में इतना उबाल लें कि आधा पानी उड़ जाए। इसके बाद इसे छानकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है। नीम के कोमल पत्तों में उसकी आधी मात्रा में फिटकरी भस्म मिलाकर कूट लें, फिर लगभग आधा ग्राम की गोलियां बना लें। इसकी 1-1 गोली मिश्री के शर्बत के साथ लेने से मलेरिया में लाभ मिलता है। नीम के थोडे़-से पत्ते और 8 से 10 कालीमिर्च लेकर 1 कप पानी में उबाल लें। पानी जब आधा कप शेष बचे तो सुबह-शाम देने से लाभ होता है। 60 ग्राम नीम के हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को मिलाकर पीस लें। इसे रोगी को पिलाने से मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है। नीम की 5 पत्तियां, तुलसी के 5 पत्ते और 1 चम्मच नींबू के रस की चटनी बनाकर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है। नीम की छाल 10 ग्राम, सूखा धनिया 10 ग्राम, सोंठ का चूर्ण 10 ग्राम तथा तुलसी के 5 पत्ते को पीसकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को दिन में 4 बार लेने से बुखार में लाभ होता है। नीम की छाल के काढ़े में धनिया और सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता है। नीम की आन्तरिक छाल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम, धनिया, सोंठ, लौंग, दालचीनी या मिर्च, चिरायता और कुटकी के साथ सुबह-शाम लेने से मलेरिया, विषम, सविराम बुखार में लाभ होता है। 43. खून की बीमारी (रक्त विकार): नीम की जड़ की छाल का काढ़ा 5-10 मिलीलीटर रोजाना पीने से खून की बीमारी मिटती है। नीम के पत्तों के रस को 5 से 10 मिलीलीटर रोजाना पीने से खून साफ होता है और खून बढ़ता है। नीम के फूलों को पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण को आधा-आधा चम्मच सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करें और दोपहर को 2 चम्मच नीम के पत्तों का रस 1 बार प्रयोग करें। 44. खून के बहने और स्त्री प्रदर होने पर:- नीम के वृक्ष के रस मे जीरा डालकर 7 दिन तक सेवन करें। 45. खूनी पित्त (रक्तपित्त): नीम के पत्तों की लुगदी बनाकर 10 मिलीलीटर सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ मिलता है। नीम के पत्तों के रस और अडूसा के पत्तों के रस को 20-20 मिलीलीटर लेकर थोड़े शहद के साथ सुबह-शाम सेवन से लाभ मिलता है। 46. चूहे के काटने से (प्लेग): नीम की आन्तरिक छाल 20 ग्राम को पानी के साथ पीसकर छान लें, इस पानी को 50 मिलीलीटर सुबह-शाम पिलाने से तथा पत्तों को बारीक पीसकर पुल्टिश बांधने से प्लेग की गांठें टूटकर बिखर जाती हैं। नीम के पेड़ की जड़ को पानी में कूट-छानकर 10-10 मिलीलीटर की मात्रा में 15-15 मिनट के अंतर से पिलाने से और गांठों पर इसके पत्तों की पोटली को बांधने से तथा आसपास इसकी धूनी (धुनी) करते रहने से लाभ मिलता है। नीम का सेवन करने से प्लेग के जीवाणु मर जाते हैं। नीम की ताड़ी में कपास या कपडे़ को खूब गीला करके प्लेग की गांठों पर बांधते रहने से लाभ होता है। 47. अधिक दस्त का आना (संग्रहणी) : नीम की ताड़ी को सुबह-शाम को 7-7 बूंद ताजे रस में मिलाकर 21 दिन तक सेवन करें। 48. लू (गर्मी) लगने पर : नीम की जड़ों का चूर्ण 10 ग्राम, मिश्री 10 ग्राम को पानी के साथ पीसकर छानकर पिलाने से लू लगना शान्त हो जाती है। नीम के पत्तों के रस में शक्कर (चीनी) मिलाकर लगातार 8 दिनों तक सुबह के समय सभी प्रकार की गर्मी शान्त हो जाती हैं। 49. चेचक: नीम की लाल रंग की कोमल पत्तियों की 7 पीस और कालीमिर्च के 7 पीस, 1 महीने तक नियमित रूप से कुछ दिनों तक सेवन करने से निश्चित ही लाभ होता है। नीम के बीज, बहेड़े और हल्दी को बराबर मात्रा में लेकर ठंड़े पानी में पीसकर छान लें। इसे कुछ दिनों तक चेचक के रोग में पीते रहें। नीम के पेड़ की 3 ग्राम कोपलों को 15 दिन तक लगातार खाने से 6 महीने तक चेचक नहीं निकलती है। नीम की हरी पत्तियों को पीसकर रात को सोते समय चेहरे पर लेप करें और सुबह ठंड़े पानी से चेहरे को लगातार 50 दिनों तक धोयें। इससे चेचक के दाग मिट जाते हैं। नीम की 10 ग्राम कोमल पत्तियों को पीसकर उसका रस बहुत पतलाकर लेप करना चाहिए। चेचक के दानों पर कभी भी मोटा लेप नहीं चाहिए। नीम के बीजों की 5-10 गिरी को पानी में पीसकर लेप करने से चेचक की जलन शान्त हो जाती है। चेचक के रोगी को अधिक प्यास लगती हो तो नीम की छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में डालकर बुझा लें और इस पानी को छानकर रोगी को पिलाने से प्यास शान्त हो जाती है। अगर इससे भी प्यास शान्त न हो तो 1 लीटर पानी में 10 ग्राम कोमल पत्तियों को उबालें, जब यह पानी आधा शेष रह जाये तो इसे छानकर पिला दें। इससे प्यास के साथ-साथ चेचक के दाने भी सूख जाते हैं। जब चेचक ठीक हो जाये तो नीम के पत्तों के काढ़े से नहाना चाहिए। नीम के तेल या नीम के बीजों की मगज पानी में घिसकर लगाया जाये तो दाग मिट जाते हैं। चिरायता, नीम, मुलहठी, नागरमोथा, अडूसा, पित्तपापड़ा, कड़वे परवल, हरड़, बहेड़ा, आंवला, खस और इन्द्रजौ को एक साथ बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें और रोजाना पियें। इसको पीने से हर तरह के विस्फोटक (फोड़े) समाप्त हो जाते हैं। नीम की हरी पत्तियों को पीसकर रात को सोते समय लेप कर लें। सुबह उठने पर ठंड़े पानी से चेहरा धो लें। ऐसा लगातार 50 दिन तक करने से चेहरे के चेचक (माता) के दाग (निशान) दूर हो जाते हैं। 50. खाज-खुजली : नीम के बीजों के तेल में आक (मदार) की जड़ को पीस लें। इसके लेप से पुरानी से पुरानी खाज-खुजली मिट जाती है। नीम का तेल या निंबोली को पानी में पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाने से आराम होता है। रोजाना सुबह 25 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को पानी के साथ पीने से खून साफ होता है और खुजली भी दूर होती है। 

Marigold health benefits

 

Marigold or genda phool








परिचय : गेंदे की खूबसूरती और सुगंध सभी को आकर्षित करती है तथा इसके फूलों की मालाओं का अधिक मात्रा में प्रयोग आम जीवन में किया जाता है। इसका पौधा बरसात के मौसम में लगाया जाता है और इसकी खेती पूरे भारत में की जाती है। गेंदे के पौधे की ऊंचाई 80 से 120 सेमी तक होती है। गेंदे के पत्ते से 2 से 5 सेमी लंबे और कंगूरेदार होते हैं इन पत्तों को मसलने पर अच्छी खुशबू आती है। इसके फूल पीले तथा नारंगी रंग के होते हैं जो अक्टूबर-नवम्बर महीने में लगते हैं। ये आकार में अन्य के फूलों के मुकाबले बड़े और घने होते हैं। गेंदे अनेक जातियां होती है, जिनमें मखमली, जाफरे, हवशी, सुरनाई और हजार अधिक प्रचलित हैं। विभिन्न भाषाओं में नाम : हिन्दी गेंदा संस्कृत झण्डू, स्थूल, पुष्पा मराठी झेण्डू गुजराती गलगोटे बंगाली गेंदा तेलगू बांटिचेट्टु मलयालम चेण्डमल्ली फारसी गुलहजारा अंग्रेजी मैरी गोल्ड रंग : गेंदे का फूल लाल, पीला तथा इसके पत्ते हरे रंग के होते हैं। स्वाद : गेंदे का फूल स्वाद में हल्का तीखा होता है। स्वरूप : यह एक फूल का पेड़ है जो बरसाती मौसम में होता है।इसका फूल हृदय को प्रसन्न कर देता है। प्रकृति : गेदें के फूल की प्रकृति गर्म होती है। हानिकारक : गेंदे के फूल का अधिक मात्रा में सेवन करना गर्म प्रकृति के लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है। यह कामशक्ति को घटाता है। गेंदे के फूलों का रस में गंधक मिलाकर सूर्य के प्रकाश रखने पर यह जहरीला पदार्थ बन जाता है। गुण : गेंदे के पत्तों का रस कान में डालने से कान का दर्द बंद हो जाता है। इसके पत्तों का रस औरतों के स्तनों की सूजन को बढ़ाता है। गेंदे के रस से कुल्ला करने पर दांत दर्द ठीक होता है। गेंदे के पत्ते का रस कालीमिर्च और नमक के साथ मिलाकर पीना बवासीर के रोगी के लिए लाभकारी होता है। गेंदे के फूल की डौण्डी का चूर्ण 10 ग्राम दही के साथ सेवन करने से दमें और खांसी में लाभ होता है। आयुर्वेदिक मतानुसार गेंदा कसैला स्वाद में कडु़वा, बुखार को ठीक करने वाला, संक्रमण को नष्ट करने वाला होता है। इसमें रक्तस्राव को रोकने की विशेष क्षमता होती है। यह रक्तप्रदर, बवासीर तथा रक्तस्राव में विशेष उपयोगी माना जाता है। इसे सामान्य चोट और सूजन पर बांधने से बहुत लाभ होता है। वैज्ञानिक मतानुसार गेंदे के फूलों में हानिकारक कीड़ों, कीटाणुओं को दूर भगाने, उन्हें नष्ट करने का विशेष गुण पाया जाता है। गेंदे का फूल मलेरिया फैलाने वाले एनाफिलीज जाति के मच्छरों को दूर भगाने में काफी प्रभावशाली है। अत: गेंदा मलेरिया जैसी बीमारी की रोकथाम के लिए औषधि है। गेंदे के पौधे के आसपास हानिकारक कीड़े और मच्छर दिखाई नहीं देते हैं। विभिन्न रोगों में सहायक औषधि : 1. कान में दर्द: गेंदे की पत्ती का रस कान में डालने से कान का दर्द दूर हो जाता है। गेंदे के पत्तों का रस गर्म करके सहनीय (हल्का गर्म) अवस्था में पीड़ित कान में 2-3 बूंद की मात्रा में डालने से दर्द में तुरन्त आराम मिलता है। 2. आंखों के दर्द: गेंदे के पत्तों को पीसकर टिकियां बना लें फिर आंखों की पलकों को बंद करके इसे पलको के ऊपर रखे इससे आंखों का दर्द दूर हो जाएगा। 3. शरीर में शक्ति तथा वीर्य की मात्रा बढ़ाना: 1 चम्मच गेंदे के बीज और इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर 1 कप दूध के साथ सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से वीर्य की मात्रा में वृद्धि तथा शरीर की शक्ति बढ़ती है। 4. गुदाभ्रंश (कांच निकलना): गेंदे के पत्तों का काढ़ा तैयार करके उससे 2-3 बार गरारे करके कुल्ला करने से यह कष्ट दूर हो जाता है। 5. स्तनों की सूजन: अगर किसी औरत के स्तनों में अचानक सूजन हो जाए तो गेंदे की पत्ती के रस से स्तनों पर मालिश करें इससे सूजन दूर हो जाती है। गेंदे के पत्तों को पीसकर उसका लेप स्तन पर लगायें और उस पर ब्रा पहनकर गर्म सिंकाई करें इससे सूजन कम हो जाती है। 6. दाद: दाद से प्रभावित अंग पर गेंदे के फूलों का रस निकालकर 2-3 बार रोजाना लगाना चाहिए। 7. चोट, मोच, सूजन: गेंदे के पंचाग (जड़, पत्ता, तना, फूल और फल) का रस निकालकर चोट, मोच, सूजन पर लगाएं व मालिश करें। इससे लाभ मिलता है। गेंदा के फूल के पत्तों को पीसकर लेप की तरह शरीर के सूजन वाले भाग पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। 8. दमा तथा खांसी: गेंदे के बीजों को बराबर मिश्री के साथ पीसकर एक चम्मच की मात्रा में एक कप पानी के साथ 2-3 बार सेवन करने से दमा और खांसी में लाभ मिलता है। 9. फोड़े-फुन्सी, घाव: गेदें के पत्तों को पीसकर 2-3 बार लगाने से फोड़े, फुंसियों तथा घाव में लाभ मिलता है। गेंदा के फूलों को पीसकर घाव पर लगाने से फायदा मिलता है। 10. खूनी बवासीर: गेंदे के फूल की पंखुड़ियों को 10 ग्राम की मात्रा में थोड़े से घी के साथ पकाकर दिन में 3 बार रोजाना सेवन करने से लाभ मिलता है। 10 ग्राम गेंदे के पत्ते, 2 ग्राम कालीमिर्च को एक साथ पीसकर पीने से बवासीर के रोग में लाभ होता है। 5 से 10 ग्राम गेंदे के फूलों की पंखुड़ियों को घी में भूनकर रोजाना 3 बार रोगी को देने से बवासीर से बहने वाला खून बंद हो जाता है। गेंदे के पत्तों का रस निकालकर पीने से बवासीर में बहने वाला रक्त तुरन्त बंद हो जाता है। रात के समय में 250 ग्राम गेंदे के पत्ते और केले की जड़ को 2 लीटर पानी में भिगों दें और सुबह इसका रस निकाल लें इस रस को 15 से 20 ग्राम की मात्रा में सेवन करें इससे बवासीर रोग में आराम मिलेगा। खूनी बवासीर में गेंदे के फूलों का 5-10 ग्राम रस दिन में 2-3 बार सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है। गेंदे के फुल की पंखुड़ियों को पीसकर इसका 10 ग्राम रस निकाल लें। इस रस को गाय के 30 ग्राम घी के साथ मिलाकर प्रतिदिन सूबह-शाम पीने से खूनी बवासीर ठीक होती है। गेंदे के फूला या पत्तों का रस निकाल कर पीयें। इससे बादी बवासीर के सूजन ठीक होती है। 11. मूत्रविकार (पेशाब के रोग): 10 ग्राम गेंदे के पत्तों को पीसकर उसके रस में मिश्री मिलाकर दिन में 3 बार पीने से रुका हुआ पेशाब खुलकर आ जाता है। 12. हाथ-पैर फटने पर: गेंदे के पत्तों का रस वैसलीन में मिलाकर 2-3 बार लगाने से फटे-हाथ पैरों में लाभ मिलता है। 13. दातों का दर्द: गेंदे के पत्ते के काढ़े से कुल्ला करें इससे दांतों के दर्द में तुरन्त आराम मिलेगा। 14. रक्तप्रदर: रक्तप्रदर में गेंदे के फूलों का रस 5-10 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके फूलों के 20 ग्राम चूर्ण को 10 ग्राम घी में भूनकर सेवन करने से लाभ होता है। 15. पथरी: गेंदे के पत्तों के 20-30 मिलीलीटर काढ़े को कुछ दिनों तक दिन में दो बार सेवन करने से पथरी गलकर निकल जाती है। 16. कामशक्ति दूर करना: गेंदे के 10 ग्राम बीजों को कूटकर खाने से कामशक्ति समाप्त हो जाती है। 17. मूत्रघात (पेशाब से धातु का आना): गेंदे का रस पीने से पेशाब के संग आने वाला धातु रुक जाता है। 18. नंपुसकता (नामर्दी): गेंदे के बीज 4 ग्राम, मिसरी 4 ग्राम दोनों को पीसकर कुछ दिनों तक खाने से वीर्य स्तंभन शक्ति का विकास होता है। 19. बुखार: गेंदे के फूलों का रस 1 से 2 ग्राम की मात्रा में प्रयोग करने से बुखार में लाभ मिलता है। 20. कान का दर्द: कान में से मवाद निकलने पर और कान में दर्द होने पर गेंदे के पत्तों का रस निकालकर थोड़ा सा गर्म करके कान में बूंद-बूंद करके डालने से कान में दर्द से आराम आता है। हजारा गेंदे के रस को निकालकर गर्म कर लें। इसे कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है। कान में दर्द होने पर गेंदे के फूल के पत्तों को मसलकर उसका रस निकालकर कान में डालने से कान के दर्द में लाभ होता है। 21. योनि का आकार छोटा करना: गेंदे को जलाकर उसकी राख को योनि में रखकर मलना चाहिए लेकिन ध्यान रखें कि उसे कपड़े से छान लें ताकि कोई हानिकारक पदार्थ न रह जाए। ऐसा न करने से मालिश करने से होने वाले लाभ के बजाय योनि के छिल जाने से हानि भी हो सकती है। 22. सिर के फोड़े: गेंदे के पत्तों को मैदा या सूजी के साथ मिलाकर पीठ के फोड़े, विशाक्त फोड़े, सिर के फोड़े और गांठ पर लगाने से फोड़ा ठीक हो जाता है।

Lemon/Nimbu health benefits

 नींबू (Lemon)








विवरण

नींबू यानि लेमन (Lemon) को वैज्ञानिक भाषा में साइट्रस लेमन (Citrus Lemon) कहा जाता है। नींबू एक खट्टा फल है जो सबसे ज्यादा एशिया में खासतौर पर उत्तरी भारत, नॉर्थ बर्मा और चीन में पाया जाता है। नींबू पीले रंग का होता है और छोटे से पौधे पर उगता है।

नींबू का पौधा सदाबहार होता है यानि इस पर नींबू की फसल पूरे साल उगती है। नींबू के पेड़ की पत्तियां भी फायदेमंद होती हैं और इन्हें चाय की पत्ती व मांसाहारी खाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। नींबू को चकोतरा और खट्टे नारंगी की प्रजाति का माना जाता है।

नींबू बहुत गुणकारी होता है और कई तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। नींबू में साइट्रिक एसिड, कैल्शियम, मैग्नीशियम, विटामिन सी, पेक्टिन और लाइमीन जैसे कई पदार्थ पाए जाते हैं जो शरीर को रोधक्षमता और संक्रमण से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। नींबू स्वास्थय के लिए बहुत लाभकारी होता है। नींबू में बायोफ्लैवोनौइड्स (Bio-flavonoids) नामक एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है जो नींबू को इतनी खासियत देता है।

फायदे

नींबू को कई प्रकार से इस्तेमाल किया जा सकता है जैसे कि इसे सौंदर्य उत्पादों में मिलाया जा सकता है, खाने के लिए व खाने के पदार्थ में ज़ायके के लिए, बेकिंग पाउडर आदि में भी मिलाया जा सकता है। आइए जानें नींबू के कुछ फायदे-

मुहांसों से छुटकारा (Get Rid of Acne)- नींबू में साइट्रिक एसिड मौजूद होता है जो मुहांसों से लड़ने में कारगर साबित होता है। नींबू में पाए जाने वाले विटामिन सी से शरीर की त्वचा स्वच्छ व कोमल बनती है। नींबू के खार के गुणों से शरीर के जीवाणु भी मरते हैं।

डायटिंग में फायदेमंद (Reduces Weight)- कोई व्यक्ति अपना वज़न कम करना चाहता है तो उसे रोज़ सुबह नींबू पानी पीना चाहिए। गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर पीने से शरीर में जमी वसा कटती है।

बदहजमी और कब्ज (Indigestion and constipation)- नींबू पानी पीने से बदहजमी और कब्ज जैसी शिकायतें दूर होती हैं। अपने खाने की डिश में नींबू की दो-चार बूंदे मिला लें, इससे खाना सही से पच जाएगा। नींबू रक्त शोधक (blood purifier) की तरह काम करता है इसलिए खाने के बाद नींबू सोडा पीना अच्छा रहता है।

दंत चिकित्सा (Dental Care)- दांतों में दर्द हो रहा है तो दर्द की जगह पर नींबू का रस लगाने से दर्द से निजात मिलेगा। यदि मसूढ़ों से खून निकल रहा हो तो मसूढ़ों पर नींबू के रस को लगाने से खून बहना रूक जाएगा। साथ ही नींबू मुंह की दुर्गंध से और गले के संक्रमण से भी निजात दिलाता है।

सौंदर्य बढ़ाए (Body Care)- नींबू का रस शरीर की त्वचा से गंदगी दूर करता है, शरीर पर हुई टैनिंग को कम करता है, चेहरे पर झुर्रियों को कम करता है, बालों में चमक लाता है और डैंड्रफ के अलावा बाल झड़ने की समस्या से भी निजात दिलाता है।

हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure)- दिल के मरीज़ों के लिए नींबू बेहद फायदेमंद होता है। इसमें मौजूदा पोटैशियम के कारण हाई ब्लड प्रेशर, चक्कर और उबकाई से राहत मिलती है।मानसिक तनाव और अवसाद से बचने के लिए भी नींबू का इस्तेमाल किया जाता है।

अन्य फायदे (Other Benefits)- नींबू के सेवन से थकावट, चक्कर आना, चिंता, घबराहट और तनाव जैसी समस्याएं दूर होती हैं। इससे सूजन, फोड़े कम होते हैं और हैजा और मलेरिया जैसी बीमारियों को नींबू के रस से ठीक किया जा सकता है। मसाज लेने के पानी में नींबू की कुछ बूंदे मिलाने से लाभ मिलता है।

सावधानी

1. नींबू पानी में कई तरह के पोषक तत्व होते हैं जैसे कि विटामिन सी, पोटैशियम और फाइबर। डायटिंग के दौरान यह सब बेहद फायदेमंद होते हैं लेकिन इनके ज्यादा सेवन से शरीर में कई तरह के दुष्प्रभाव भी पैदा हो सकते हैं। आइए नींबू के कुछ साइड-इफेक्ट्स जानें-

2. अस्थमा के मरीज़ों को नींबू के ज्यादा सेवन से परहेज करना चाहिए। खट्टे फलों को अक्सर माइग्रेन की बीमारी से जोड़ कर देखा जाता है जिसमें खट्टी चीजों से एलर्जी भी उत्पन्न हो सकती है।

3. नींबू के ज्यादा सेवन से दांतों को नुकसान पहुंच सकता है। नींबू में भारी मात्रा में तीखापन पाया जाता है जिसके कारण दांतों की चमकीली परत फीकी पड़ सकती है और दांत भी कमज़ोर हो सकते हैं।

4. नींबू में मौजूदा खट्टेपन के स्तर के कारण पेट संबंधी समस्याएं भी उजागर हो सकती हैं। नींबू खाना पचाने में मदद करता है लेकिन आवश्यकता से ज्यादा नींबू के सेवन से पेट में दर्द व सीने में जलन जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

5. शरीर पर नींबू लगाने के तुरंत बाद घर से निकल जाने से सनबर्न का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इसलिए जब भी शरीर पर नींबू का प्रयोग करें तो शरीर के उन हिस्सों को ढक कर ही घर से बाहर निकलें।

 

 

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