बुधवार, 31 मार्च 2021

Hara dhaniya benefits

 

Hara dhaniya








परिचय : धनिया के हरे पत्तों और उनके बीजों को सुखाकर 2 रूपों में इस्तेमाल किया जाता है। हरे धनिये में जीरा, पोदीना, नींबू का रस आदि मिलाकर स्वादिष्ट बनाकर सेवन करने से अरुचि बंद हो जाती है। इससे भूख खुलकर लगती है और पाचन क्रिया (भोजन पचाने की क्रिया) तेज हो जाती है। हरे धनिये की पत्तियों को सब्जी में डालकर सेवन करने से रक्त विकार नष्ट होते हैं। आंखों के लिए हरा धनिया बहुत ही गुणकारी होता है। हरे धनिये को दही और रायते में डालकर सेवन करने से भीनी-भीनी सुगंध महसूस होती है और दही, रायते व सब्जी का स्वाद अधिक बढ़ जाता है। हरे धनिए के सेवन से पित्त की गर्मी बंद हो जाती है। सब्जियों को पकाने के बाद हरे धनिये को बारीक काटकर सब्जी में मिलाकर सेवन करने से उसके विटामिन पर्याप्त रूप में मिलते हैं। सब्जी में पकाने से हरे धनिये के विटामिन कम हो जाते हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों के अनुसार धनिया कषैला, चिकना, हल्का, कड़वा, तीक्ष्ण और गर्म होता है तथा यह वीर्य और पाचन शक्ति को विकसित करता है। धनिये के सेवन से पेशाब खुलकर आता है। धनिया, वात, पित्त और कफ विकारों में लाभ पहुंचाता है। दमा, खांसी में धनिया बहुत ही गुणकारी होता है। यह शरीर की कमजोरी को नष्ट करने के साथ ही आंतों के कीड़ों को भी दूर करता है। विभिन्न भाषाओं में नाम : हिन्दी धनिया अंग्रेजी कोरियेन्डर संस्कृत धान्यक, कुस्मुम्बरू गुजराती कोथमीर धाणा मराठी धणों, कोथिब्या बंगाली धने पंजाबी धनिया तेलगू धनियालु तमिल कोतामिल्ल फारसी कश्नीज अरबी कुज्वर रंग : धनिये के पत्ते का रंग हरा और दाना भूरा होता है। स्वाद : इसका स्वाद फीका होता है और इसके अंदर सुगन्ध होती है। स्वरूप : धनिया खेतों में बोया जाता है। इसके दाने गुच्छों में लगे होते हैं। स्वभाव : यह ठण्डे स्वभाव का होता है। हानिकारक : यह याददाश्त को कमजोर करता है। दोषों को दूर करने वाला : धनिये के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए शहद का उपयोग किया जाता है। तुलना : धनिये की तुलना पोस्तादाना और काहू के बीजों से की जाती है। मात्रा : 9 से 10 ग्राम। गुण : यह मन को खुश करता है, दिमाग की गर्मी को कम करता है, पागलपन के लिए लाभदायक है, धातु वीर्य दोषों को खत्म करती है, नींद ज्यादा आती है, इसके काढ़े से कुल्ला करने से मुंह में दाने नहीं होते हैं। हरे धनिये में पाये जाने वाले विभिन्न तत्व: तत्व मात्रा तत्व मात्रा प्रोटीन 3.3 प्रतिशत विटामिन-सी लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग /100 ग्राम वसा 0.6 प्रतिशत लौह लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग /100 ग्राम कार्बोहाइड्रेट 6.5 प्रतिशत फास्फोरस 0.06 प्रतिशत पानी 87.9 प्रतिशत कैल्शियम 0.14 प्रतिशत विटामिन-ए 10460 से 12600 I.U.100ग्राम विभिन्न रोगों में उपयोग : 1. दस्त व कब्ज : हरा धनिया, काला नमक, कालीमिर्च को मिलाकर चटनी बनाकर चाटने से लाभ मिलता है। यह चटनी सुपाच्य रहती है। उल्टी में धनिये को मिश्री के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। पिसे हुए धनिये को सेंककर 1-1 चम्मच पानी से फंकी लेने से दस्त आना बंद हो जाता है। दस्तों में आंव, मरोड़, उल्टी, गर्भवती की उल्टी आदि आना बंद हो जाती है। 2. शरीर में जलन : रात को 4 चम्मच धनिया और इतने ही चावल पानी में भिगों दें। इन्हें सुबह गर्म करके पीयें अथवा रात को धनिया भिगों दें और सुबह के समय मिश्री डालकर पीसकर छानकर पियें। इससे शरीर की गर्मी और पेट की जलन नष्ट हो जाती है। रात को धनिये को पानी में भिगों दें और सुबह उठने पर उसे छानकर उसमें मिश्री डालकर पी जायें। इससे शरीर की गर्मी और पेट की जलन दूर हो जाती है। 3. मूत्र में जलन : यदि तेज प्यास, पेट, शरीर या मूत्र में कहीं जलन हो तो 15 ग्राम धनिये को रात को भिगो दें। सुबह के समय उसे ठंडाई की तरह पीसकर मिश्री डालकर सेवन करें। इस प्रयोग से दिल की तेज धड़कन सामान्य हो जाती है। धनिया और आंवला रात में भिगोकर सुबह के समय मसलकर पीने से मूत्र की जलन दूर हो जाती है। 4. दमा-खांसी : धनिया और मिश्री को पीसकर चावलों के पानी के साथ सेवन करने से दमा और खांसी के रोग में लाभ मिलता है। 5. चेचक की गर्मी : चेचक की गर्मी निकालने के लिए धनिया और जीरा पानी में डालकर रात को मिट्टी के बर्तन में भिगो दें। सुबह उस पानी में चीनी मिलाकर पियें। इससे मल साफ आता है तथा चेचक की गर्मी शान्त होती है। 6. गर्मी के रोग : रात के समय मिट्टी के बर्तन में 2 गिलास पानी 5 चम्मच सूखा धनिया भिगो देते हैं। सुबह के समय इसमें स्वाद के अनुसार मिश्री मिलाकर पियें। इससे गर्मी के रोग समाप्त हो जाते हैं। 7. अनिद्रा : चीनी और पानी के साथ हरे धनिये को पीसकर रोगी को पिलाने से सिर दर्द दूर होने के साथ ही अच्छी नींद आती है। 8. मासिक-धर्म अधिक मात्रा में आना : लगभग 20 ग्राम धनिया को 200 ग्राम पानी में डालकर उबालें जब 50 ग्राम पानी शेष रह जाए तो इसे छानकर इसमें मिश्री मिलाकर रोगिणी को सेवन करा दें। इस प्रयोग से मासिक-धर्म में अधिक खून का आना बंद हो जाता है। 10 ग्राम सूखा धनिया लेकर लगभग 200 ग्राम पानी में उबालते हैं। जब यह एक चौथाई की मात्रा में रह जाए तो इसे छानकर इसमें खाण्ड (चीनी) मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ सुबह के समय 3-4 बार रोगी को पिलाने से मासिक-धर्म का ज्यादा आना कम हो जाता है। 9. स्वप्नदोष : धनिये को पीसकर मिश्री में मिलाकर ठण्डे पानी से सेवन करने से स्वप्नदोष, मूत्रजलन, सूजाक और उपदंश में लाभ होता है जो लोग चाहते हैं कि काम वासना अधिक न सताएं वे लोग 2 ग्राम सूखा धनिया पीसकर पानी मिलाकर कुछ दिनों तक पीयें अथवा सूखा धनिया पीसकर छान लेते हैं। इसमें बराबर मात्रा में पिसी हुई चीनी मिलाएं सुबह के समय खाली पेट बासी पानी से 1 चम्मच भर की मात्रा में फांक लेते हैं तथा 1 घंटे बाद कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं। इससे स्वप्नदोष से छुटकारा मिल जाता है। सूखा धनिया तथा मिश्री को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लेते हैं और किसी ढक्कनदार बर्तन में भरकर रख देते हैं। इस चूर्ण को 5-6 ग्राम के लगभग, ताजा पानी के साथ सुबह-शाम कुछ दिनों तक लेने से अनैच्छिक वीर्यपात, स्वप्नदोष आदि रोगों से मुक्ति मिल जाती है। 10. मुंह से दुर्गंध आना : हरा धनिया खाने से मुंह में सुगंध रहती है। प्याज, लहसुन आदि गंध वाली चीजें खाने के बाद हरा धनियां चबाने से मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाती है। हरा धनिये को खाने से मुंह की दुर्गंध खत्म होती है और मुंह में से सुगंध आती है। 11. रक्तातिसार (खूनी दस्त) : 15 ग्राम धनिये को पीसकर उसमें 12 ग्राम मिश्री मिलाकर पानी में घोलकर पीने से दस्त में खून आना बंद हो जाता है। 12. खाने के तुरंत बाद दस्त होना : धनिये में कालानमक मिलाकर भोजन के बाद 1 चम्मच भरकर सेवन करने से खाना खाने के बाद होने वाले दस्त बंद हो जाते हैं। 13. ऑव व बदहजमी के कारण बालकों का पेट दर्द : आंव व बदहजमी हो तो धनिया और सोंठ का काढ़ा पिलाएं। इससे बच्चों का पेट दर्द बंद हो जाता है। 14. छींके अधिक आना : छींके अधिक आने पर धनिये की पत्तियां सूंघनी चाहिए। हरे धनिये की पत्ती और सफेद चंदन को पीसकर नाक से सूंघने से बार-बार छींक आना बंद हो जाती है। 15. वमन होना (उल्टी) : उल्टी होने पर सूखा या हरा धनिया को पीसकर उसका पानी निचोड़कर 5 चम्मच बार-बार रोगी को पिलाने से उल्टी आना बंद हो जाती है। इस प्रयोग से गर्भवती स्त्री की उल्टी भी बंद हो जाती है। उल्टी होने में रोगी का खाया पिया सब कुछ मुंह से निकल जाता है। यह दो रूपों में पायी जाती है। कभी तो जो कुछ खाया जाता है, वह उसी रूप में निकल जाता है और कभी अधपचा भोजन निकल जाता है। उस हालत में डकारें आती हैं, जी मिचलाता है। सिर में बहुत तेज दर्द होने लगता है और बेहोशी के दौर पड़ने लगते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे अंदर से आंतों में जलन है और सब कुछ बाहर आने के लिए पलटने लगता है। आंख, कान और नाक में भी दर्द होने लगता है। उल्टी के समय व्यक्ति को लगता है कि वह अब बचेगा नहीं। ऐसी दशा में रोगी को धीरज बंधाना चाहिए उससे कहना चाहिए कि साधारण उल्टी है। कुछ ही देर में ठीक हो जाएगी। इलाज के लिए रोगी को उल्टियां बंद करने की दवा तुरन्त ही देनी चाहिए। इसके लिए धनिये के थोड़े से दाने, हरा पुदीना तथा हींग का घोल मलना चाहिए। पुदीना का रस भी लाभदायक होता है। घबराहट अधिक होने पर धनिये का पानी पिलाना चाहिए। धनिये का लेप माथे पर लगाने से रोगी की बेचैनी दूर हो जाती है। ऐसे में अमृतधारा या कृष्णामिक्चर भी काम कर जाता है। असल में उल्टी का कारण अपच (भोजन का न पचना) या अजीर्ण (पुरानी कब्ज) ही होता है। यह भयंकर रोग नहीं है। प्याज का रस तथा धनिये का रस भी पानी में मिलाकर देने से उल्टी बंद हो जाती है। यदि पेट में जलन हो रही तो धनिया और सोंठ दोनों को उबालकर उसका पानी ठंडा करके देना चाहिए। आधा चम्मच हरे धनिये का रस, चुटकी भर सेंधानमक और 1 चम्मच कागजी नींबू के रस को मिलाकर रोगी को पिलाने से उल्टी होने के रोग में लाभ होता है। हरे धनिये को पीसकर निचोड़ लें और इसका रस निकालकर उस रस में से लगभग 33 ग्राम रस रोगी को पिलाने से उल्टियां होना बंद हो जाती हैं। इसको लगातार कई बार पिलाने से गर्भवती स्त्री की उल्टियां होना भी बंद हो जाती हैं। धनिये को पानी में उबालकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है। हरे धनिये और पोदीने में सेंधानमक मिलाकर चटनी बना लें। इस चटनी में नींबू का रस मिलाकर खाने से उल्टी नहीं आती है। 3 ग्राम धनिया और 3 ग्राम सौंफ को पीसकर छान लें। इसे 250 ग्राम पानी में मिलाकर इसमें शक्कर डालकर 2-3 बार पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है। हरे धनिये और पुदीने को मिलाकर, इसकी चटनी बनाकर खाने से उल्टी होना बंद हो जाती है। 16. लू : गर्मी के मौसम में चलने वाली गर्म हवा (लू) से बचने के लिए धनिए के पानी में चीनी मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है। पानी में धनिये को पीसकर और मिश्री में मिलाकर पिलाने से बच्चे को लगी हुई लू को दूर किया जा सकता है। धनियां, बनफ्सा, मकोय, मुलेठी और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से लू लगने का रोग ठीक हो जाता है। 17. गर्मी के कारण सिर दर्द : सूखा धनियां 10 ग्राम, गुठली रहित सूखा आंवला 5 ग्राम लेकर रात के समय मिट्टी के एक बर्तन में भिगो दें। प्रात:काल इसमें मिश्री मिलाकर छानकर सेवन करते हैं। इससे गर्मी के कारण हुआ सिर दर्द बंद हो जाता है। यदि सर्दी के कारण सिर दर्द हुआ हो तो सूखे धनिये के साथ सोंठ, चाय की पत्ती, तुलसी के पत्तों के साथ पीस लेनी चाहिए। फिर इसमें थोड़ा सा पानी मिलाकर लेप बना लेना चाहिए। इस लेप को चमचे में गर्म कर लेना चाहिए। यह गर्म लेप माथे पर लगाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है। यदि गर्मी के कारण सिर दर्द हुआ हो तो लेप में सोंठ न डाली जाए, धनिया और तुलसी का लेप बनाकर माथे पर लगाना चाहिए। थोड़ी देर में दर्द दूर हो जाता है। यदि इस क्रिया के बाद भी सिर दर्द नहीं जाता है तो समझना चाहिए कि दर्द साधारण नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें अच्छे डॉक्टरों से सलाह लेनी चाहिए। सिर दर्द में चक्कर, उल्टी व गर्भवती की उल्टी होने पर धनिया उबालकर मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है। 18. गंजापन : हरे धनिये का पानी निकालकर (पत्ते का रस) सिर पर मालिश करने से गंजेपन का रोग मिट जाता है और सिर पर नये बाल आना शुरू हो जाते हैं। 19. मस्तिष्क की कमजोरी : 125 ग्राम धनिये को पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब यह चौथाई बाकी रह जाए तो इसे छानकर 125 ग्राम मिश्री मिलाकर फिर गर्म करें। जब यह गाढ़ा हो जाए तो इसे उतार लेते हैं। इसे रोजाना सेवन करने से दिमाग की कमजोरी से आने वाला आंखों के सामने अंधेरा तथा जुकाम आदि सभी रोग दूर हो जाते हैं। 20. नकसीर (नाक से खून आना) : हरे धनिये का रस सूंघने और हरे धनिये की पत्तियों को पीसकर सिर पर लेप करने से गर्मी के कारण से नाक से बहने वाला खून बंद हो जाता है अथवा धनिया रात को भिगो दें। धनिये को सुबह के समय पीसकर मिश्री मिलाकर पीने से लाभ मिलता है। गर्मी की वजह से नाक से खून बहने पर हरे धनिये के रस को सूंघने से और उसकी पत्तियों को पीसकर सिर पर लगाने से नकसीर (नाक से खून बहना) बंद हो जाती है। 10 ग्राम धनिया, 75 ग्राम सौंफ, 100 ग्राम मिश्री और 8-10 कालीमिर्च के दानों को पानी के साथ पीसकर शर्बत बना ले। इस शर्बत को रोजाना सुबह और शाम पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) के रोग में लाभ होता है। 5 ग्राम सूखा धनिया, 5 ग्राम गोरखमुण्डी के फूल और 8 मुनक्का लेकर 125 ग्राम पानी में 3 घंटे के लिये भिगोकर रख दें। सुबह उठकर इस पानी को छानकर पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) का रोग ठीक हो जाता है। 2 चम्मच धनिये के दाने, थोड़ी सी किशमिश और थोड़ी सी मिश्री को पानी में डालकर और पीसकर पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) में आराम आता है। 21. गैस : 2 चम्मच सूखा धनियां 1 गिलास पानी में उबालकर छानकर उस पानी को 3 बार पीने से पेट की गैस दूर हो जाती है। हरे धनिये की चटनी में कालानमक मिलाकर सेवन करने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है। 2 चम्मच सूखे धनिए के दानों को 1 गिलास पानी में उबाल लें। फिर इस पानी को छानकर पीने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है। 22. अरुचि : धनिया, छोटी इलायची और कालीमिर्च बराबर मात्रा में पीसकर चौथाई चम्मच घी और चीनी में मिलाकर सेवन करने से अरुचि (भोजन करने का मन न करना) दूर हो जाती है। 23. भूख न लगना : यदि भूख कम लगे तो 30 मिलीलीटर धनिये का रस रोजाना पीने से भूख लगना शुरू हो जाती है। 24. अपच : जिसे भोजन न पचता हो, जल्दी ही पैखाना (शौच) जाना पड़ता हो उसे 60 गाम सूखा धनिया, 25-25 ग्राम कालीमिर्च और नमक लेकर पीसकर भोजन के बाद आधा चम्मच ताजे पानी से सेवन करने से लाभ मिलता है। 25. मलेरिया बुखार : धनिया और सोंठ दोनों पिसे हुए आधा-आधा चम्मच मिलाकर रोजाना 3 बार खाने से ठण्ड देकर आने वाला बुखार मिट जाता है। आधा चम्मच पिसा हुआ धनिया, आधा चम्मच सोंठ, आधा चम्मच अजवाइन और चुटकी भर सेंधानमक को मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को दिन में 3 बार लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है। धनिया और सोंठ को बराबर मात्रा में पीसकर रोजाना दिन में 3 बार पानी से फंकी लेने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है। 26. पेट में दर्द : पेट दर्द में धनिये का शर्बत लाभप्रद होता है। 2 चम्मच धनियां 1 कप पानी में गर्म करके पीना चाहिए। 1 चम्मच धनिया और थोड़ी मात्रा में सौंठ को 1 कप पानी में उबालकर पीने से पेट के दर्द, आंव (एक प्रकार का चिकना सफेद पदार्थ जो मल के द्वारा बाहर निकलता हैं) और बदहजमी ठीक हो जाती है। पेट के दर्द में रोगी बुरी तरह से चीखता और चिल्लाता है। यह पेट में गैस के रुकने या आंतों में सूजन हो जाने से होता है। इसके लिए 10 ग्राम सूखा धनिया, 5 ग्राम सोंठ, 5 ग्राम अजवायन, 5 ग्राम भूना हुआ जीरा और 2 ग्राम कालानमक को पीसकर चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को 1 चम्मच गर्म पानी से दिन में 3 बार लेना चाहिए। यह चूर्ण गैस को तोड़कर बाहर निकालता है और रोगी को स्थायी रूप से लाभ पहुंचाता है। अदरक के रस में सूखे धनिये का चूर्ण भी पेट दर्द के लिए लाभदायक होता है। जब दर्द रुक जाए तो हल्का भोजन करना चाहिए। अधिक ठण्डी और अधिक गर्म चीजें नहीं खानी चाहिए। सर्दियों में हल्की चाय और गर्मी में कालानमक डालकर छाछ पीना लाभकारी होता है। 27. खूनी बवासीर : 4 चम्मच धनिये को 250 ग्राम दूध में उबालकर व छानकर पिसी हुई मिश्री मिलाकर पीने अथवा मिश्री मिलाकर धनिये का रस पीने से खूनी बवासीर दूर हो जाती है। 28. रोशनीवर्द्धक : हरे धनिये को चावल के साथ पीसकर खाने से आंखों की कमजोरी दूर होकर आंखों की रोशनी तेज हो जाती है। हरे धनिये और त्रिफला की चटनी बनाकर खाने से आंखों की रोशनी तेज होती है। 29. मोतियाबिन्द : धनिये को पीसकर बारीक कर लेते है। थोड़ा सा धनिया पानी में उबालते हैं। फिर ठंडा करके कपड़े में छानकर आंखों में डालने से लाभ मिलता है। 30. बच्चों के आंखों का दर्द : थोड़ा सा साबुत धनिया पानी में उबालते हैं फिर ठंडा करके कपडे़ में पोटली बांधकर ठण्डे पानी में डुबो देते हैं। 10 मिनट बाद निकालकर उसे बच्चे की आंखों पर फेरने से दर्द में लाभ मिलता है। 31. मुंह के छाले : धनिये का बारीक चूर्ण, बोरेक्स अथवा खाने वाले सोडे में मिलाकर मुंह के छालों पर लगाने से लाभ होता है एवं लार भी ठीक निकलती है। हरे धनिये की पत्तियों को चबाने से मुंह के छाले नष्ट हो जाते हैं। सूखे धनिये तथा शहतूत दोनों को पानी में उबालकर इससे कुल्ला करने से छाले ठीक होते हैं। 32. गर्मी दूर करना : धनिये के लगभग 200 दानों को 1 गिलास पानी में लगभग 4 घंटे तक भिगोयें रखें और फिर उसे छानकर पानी में एक चुटकी नमक डालकर पी लें तो यह गर्मी के मौसम में पूरे दिन प्यास को कम करता रहेगा। प्यास की खराश दूर करने तथा प्यासे को राहत देने में यह पानी बहुत ही उपयोगी होता है। 33. शक्तिवर्द्धक : शक्ति को ऊर्जा भी कहते हैं। यह ऊर्जा मनुष्य को भोजन से मिलती है। परन्तु धनिया इस ऊर्जा को और बढ़ा देता है। इसके लिए आपको खाना खाने के बाद 10 दाने धनिये के मुंह में डालने होंगे। इन दानों को दाढ़ों से कुचलकर इसका रस कंठ (गले) के नीचे उतार लीजिए और दानों को थूक देते हैं। ठीक आधा घंटे बाद आप देखेंगे कि आपके शरीर में गर्मी बढ़ गई। यह गर्मी पसीना लाने वाली गर्मी नहीं होगी वरन यह पाचन क्रिया को सही करने वाली गर्मी होगी जब पाचन क्रिया में वृद्धि होगी तब भोजन समय से तथा ठीक प्रकार से पच जाएगा। इसके बाद उस खून में जो ऊर्जा पैदा होगी। वह पूरे शरीर में फूर्तीलापन लाती है। 34. सौन्दर्यवर्द्धक : यदि साग-सब्जी तथा मसालों के रूप में धनिये का प्रयोग करते हैं तो हमारा रंग निखर जाता है। धनिया का पानी भी त्वचा को निखारता है। इसके लिए धनिये को ताजे पानी में भिगो देना चाहिए। इसे कम से कम 2 घंटे भीगना जरूरी होता है। धनिया के दाने निकालकर पानी से मुंह को धोना चाहिए। ऐसा करने से त्वचा का रंग निखरता है। इस बात का ध्यान रहे कि इसका पानी आंखों में नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह पानी शीतल तत्व का होता है जो आंखों की पुतलियों को हानि पहुंचा सकता है। इस क्रिया को लगातार 30 दिनों तक करना चाहिए। 35. शरीर के भीतरी रोगों का अवरोधक : धनिया शरीर के भीतर धीरे-धीरे पनपने वाले रोगों को रोकता है। कोई नहीं जानता है कि कब और कौन-सा रोग शरीर के भीतर उत्पन्न हो जाए। कभी-कभी कोई सूक्ष्म जीवाणु भोजन के द्वारा शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है तब उससे अन्य हजारों कीटाणु और जीवाणु पैदा हो जाते हैं। उस हालत में व्यक्ति विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है। धनिये का सेवन किसी न रूप में अवश्य ही करना चाहिए जो लोग सूखा धनिया पसन्द नहीं करते हैं, उनको हरे धनिये का प्रयोग करना चाहिए। हरा धनिया चटनी, साग-सब्जी में ऊपर से डालकर तथा पीसकर प्रयोग किया जा सकता है। धनिये में रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। चटनी खाते ही शरीर में बनने वाली गैस भी अपान वायु के रूप में छूटने लगती है। इससे मन स्वच्छ तथा शरीर हल्का हो जाता है। धनिया हैजा के कीटाणुओं को भी पनपने नहीं देता है। 36. चोट : धनिये का प्रयोग बाहरी चोट पर किया जाता है जैसे यदि कभी बंद चोट लग जाए, स्याह नीले रंग के धब्बे पड़ जाए या चोट कसक रही हो तो धनिये की पोटली तैयार करके चोटिल स्थान पर बांधना चाहिए। इसके लिए थोड़े से दाने धनिया और 2 गांठे हल्दी इन दोनों को लेकर खूब बारीक पीस लेना चाहिए। इसको टिकिया बनाकर चोट पर रखकर पट्टी बांध देना चाहिए। इससे चोट की सूजन कम होकर दर्द कम हो जाता है। रोगी को इतना अधिक आराम मिलता है कि वह 3-4 दिन में काम करने लायक हो जाता है। 37. अफारा (पेट का फूलना) : धनिये का शर्बत अफारा में बहुत लाभकारी होता है। इसके लिए 50 ग्राम धनिया को 2 लीटर में उबाल लेते हैं। इसके बाद उबले हुए पानी को ठंडा करके 1 बोतल में भर लेते हैं। धनिये के काढ़े को छान लेते हैं। यह पानी दिन में 3-4 बार लेना चाहिए। यदि पानी मीठा लगे तो एक प्याला पीते समय उसमें थोड़ा-सा कालानमक डाल लेते हैं। इससे स्वाद बढ़ जाता है और काला नमक शरीर को लाभ पहुंचाएगा। धनिये के पानी से हाथ-मुंह भी धोना चाहिए। इससे पसीने की दुर्गंध काफी समय के लिए दूर हो जाती है। 38. कब्जनाशक : धनिया कब्ज तोड़ने में भी सहायता करता है। धनिये के चूर्ण से पुराने से पुराने कब्ज भी दूर हो जाता है। इसके लिए 50 ग्राम धनिया, 10 ग्राम सोंठ, 2 चुटकी कालानमक तथा 3 ग्राम हरड़ लेकर पीसकर कपड़े में छान लेना चाहिए। इस चूर्ण को थोड़ी-सी मात्रा में भोजन करने के बाद गुनगुने पानी से लेते हैं। इससे कब्ज नष्ट होता है और मल भी खुलकर आने लगता है। इससे पेट का दर्द भी कम हो जाता है और आंतों की खुश्की भी दूर हो जाती है। इससे भूख खुलकर आती है। मलावरोध समाप्त हो जाता है। यदि पुराना कब्ज हो तो इस चूर्ण को लगातार 40 दिनों तक लेना चाहिए। कब्ज न रहने पर भी यह चूर्ण लिया जा सकता है। इससे किसी भी प्रकार की हानि की संभावना नहीं होती है। 20 ग्राम धनिया और 20 ग्राम सनाय को रात में 250 मिलीलीटर पानी में भिगो दें। सुबह इसे छानकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से कब्ज दूर हो जाती है। 39. अजीर्ण (पुरानी कब्ज) : अजीर्ण एक ऐसा रोग होता है, जिसके रहते मनुष्य का मन किसी काम में नहीं लगता है। अजीर्ण नियमों को तोड़ने, समय-असमय खाने, बासी या गरिष्ठ भोजन से भी हो जाता है। कुछ लोगों को हर समय काम रहता है। इसके चलते वे कभी दोपहर को खा लेते हैं या कभी चाट-पकौड़ी खाकर ही दिन गुजार लेते हैं। सच बात तो यह है कि इनको इसका पता भी नहीं रहता कि हमारी आंतें लोहे की नहीं बनी हैं। वे मुलायम होती हैं, उनके दांत नहीं होते हैं। तब भी लोग जल्दी-जल्दी खाना खाकर उठ जाते हैं या फिर खाने के बाद अधिक मात्रा में पानी पी लेते हैं या फिर जो लोग प्यास को मार लेते हैं जो लोग पाखाने या पेशाब को रोके रहते हैं क्योंकि उनके कथनानुसार उन्हें फुर्सत नहीं होती है। ऐसे लोगों को भी अजीर्ण हो जाता है। अजीर्ण के कारण शरीर विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है। इससे गला सूखता है। सीने में जलन होती है। आंतों में खुश्की होती है। काम-धंधे में आलस्य आता रहता है। सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि जैसे सारा उत्साह ठंडा पड़ गया है। कभी सारा शरीर पसीने से लथपथ हो जाता है। ऐसी हालत में रोगी चारपाई पर पड़ जाता है। उपरोक्त कारणों से ही अजीर्ण रोग होता है। ऐसी दशा में यह प्रयोग करना चाहिए- 10 ग्राम धनिये के दाने, 3 ग्राम हरड़, 3 ग्राम सोंठ, 1 ग्राम सेंधानमक इन सभी चीजों को पीसकर चूर्ण बना लेते हैं। फिर इसे सुबह-शाम गर्म पानी से लगभग 2 ग्राम की मात्रा में लेते हैं। इससे अजीर्ण रोग दूर हो जाता है। इसके बाद की अन्य शिकायतें भी दूर हो जाती हैं। 40. सावधानी : याद रहे कि इस चूर्ण के बाद रसदार फल या प्याज नहीं लेना चाहिए। इससे शरीर में तेजाब बनने का डर बना रहता है। धनिया, नमक और अदरक की चटनी भी लाभदायक होती है। इस चटनी को भोजन के साथ लेना चाहिए। अदरक स्वयं एक औषधि है। परन्तु जब यह हरे या सूखे धनिये के साथ मिल जाती है तो इसके गुण और भी अधिक बढ़ जाते हैं। 41. ऐंठन : ऐंठन में रोगी का सम्पूर्ण शरीर कमजोरी या व्याकुलता के कारण ऐंठने लगता है। कभी-कभी गर्दन और मांसपेशियों में भी दर्द होने लगता है। उस समय रोगी अत्यधिक बेचैनी का अनुभव करता है। ऐसी स्थिति आ जाने पर रोगी को धीरज बंधाना चाहिए। इसके बाद धनिया, नमक और हल्दी को थोड़ी-थोड़ी सी मात्रा में लेकर पीस लेना चाहिए। पिसी हुई चीजों से गुनगुने तेल में टिकिया बना लेनी चाहिए। यह टिकिया रोगी के गर्दन और तलुओं पर बांधनी चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है। रोगी को गुनगुना पानी पीने के लिए देना चाहिए। उसे तुलसी की चाय या डबलरोटी का एक पीस गर्म करके देना चाहिए। अधिक बेचैनी होने पर डॉक्टर या वैद्य को दिखाना आवश्यक होता है क्योंकि ऐंठन के साथ अन्य रोग भी रोगी को हो जाते हैं और रोगी चारपाई पर पड़ जाता है। 42. खट्टी फीकी डकारे आना : यह कोई रोग नहीं है परन्तु यदि कभी लगातार खट्टी डकारे आने लगती हैं तो रोगी को बेचैनी होने लगती है और वह शीघ्र ही घबरा जाता है। पेट में जलन होती है और जबान सूखने लगती है। बार-बार डकार आने से खुश्की दूर हो जाती है और गैस के कारण पेट में गर्मी सी महसूस होने लगती है। सीने में जलन, अकड़न और मीठा दर्द होने लगता है। ऐसी दशा में पाचक औषधि काम करती है। इसके लिए थोड़ा सा पुदीना और थोड़ा सा सूखा धनियां, बड़ी इलायची, अजवायन और कालानमक को पीसकर या तो टिकिया बना लेते हैं या चूर्ण बना लेते हैं फिर इसे 2 घंटे बाद गर्म पानी से लेना चाहिए। थोड़ी देर में डकारे बंद हो जाएंगी। यदि डकारें खट्टी या तेजाबियत की हैं तो धनिया के 4 दाने और 10 दाने सौंफ के मुंह में डालकर उसका रस गले के नीचे उतारना चाहिए। इससे कुछ ही देर में डकारें आना बंद हो जाता है और रोगी को शांति मिलती है। 43. रक्त विकार : खून में विकार या खराबी कई कारणों से होती है जैसे नमक का अधिक सेवन करना, खट्टी वस्तुओं का अधिक लेना, बासी भोजन करना। खून की खराबी से दिल तथा प्लीहा रोग हो सकता है। इस हालत में रोगी का मन किसी काम में नहीं लगता है। उसे हर समय सुस्ती घेरे रहती है। कभी-कभी शरीर में फोड़े-फुंसी भी निकल आते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी को सबसे पहले खट्टी मीठी तथा गरिष्ठ चीजें खाने से परहेज करना चाहिए। खाने में रोटी, दलियां, तोरई, लौकी, टिण्डा, परवल आदि की सब्जियां तथा ताजा पानी लेना चाहिए। सभी खाद्य पदार्थों में नमक की मात्रा घटा देनी चाहिए। इसके बाद 4 कोपलें नीम, 4 कालीमिर्च, 5 ग्राम धनिये को लेकर पीस लेते हैं। इस चूर्ण को दिन में 3 बार पानी के साथ लेना चाहिए। इससे खून की खराबी धीरे-धीरे दूर हो जाती है। कुछ ही दिनों जब शरीर में शुद्ध खून प्रवाहित होने लगता है तो रोगी को खुद ही आराम आ जाता है। 44. गर्मी की घमौरियां : शरीर में अत्यधिक गर्मी में घूमने पर या पसीने के मरने पर घमौरियां होती हैं। तेज गर्मी में धूप में काम करने पर भी घमौरियां हो जाती हैं। शरीर पर छोटे-छोटे दानों का निकलना ही घमौरियां है। घमौरियां होने पर शरीर में खुजली होती है और कांटे जैसे चुभने लगते हैं। कपड़े पहनना अच्छा नहीं लगता है। इसके लिए साधारण सा इलाज है। बर्फ के पानी में 50 ग्राम धनिये के पानी को भिगो देना चाहिए। लगभग 5 घंटे बाद इस पानी को छानकर घमौरियों वाले स्थान पर लगाना चाहिए। यदि किसी छोटी तौलिया को इस पानी में भिगोकर घमौरियों पर रखा जाए तो बहुत आराम मिलता है। इस प्रक्रिया को 2 दिन तक सुबह-शाम करने से घमौरियां नष्ट हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त नींबू के रस में धनिये को डालकर पीना चाहिए। ध्यान रहे कि घमौरियों के कारण शरीर में नमक की मात्रा कम होने लगती है। इसलिए नमक का सेवन अवश्य ही करना चाहिए। यदि रोटी में नमक और अजवायन को मिला लिया जाए तो बहुत लाभ मिलता है। 45. सीने में जलन : सीने में जलन, गर्मी के प्रभाव, बासी भोजन करने, खट्टी डकारें आने, अम्लपित्त बनने आदि के कारण होती है। उस समय रोगी को बड़ी बेचैनी होने लगती है। रोगी शीघ्र ही घबरा जाता है। उसे लगता है कि जैसे उसका दिल बैठा जा रहा है। ऐसी हालत में रोगी को 5 ग्राम सूखा धनिया, 2 ग्राम कालानमक, 1 ग्राम हींग, 5 ग्राम अजवायन का चूर्ण बनाकर दिन में 3-4 बार देना चाहिए। जलन अपने आप बंद हो जाती है। इसके बाद चावल, खुश्क चीजें, तली हुई वस्तुएं आदि भोजन के साथ नहीं लेनी चाहिए। दूध ठंडा करके दिन में कई बार लेना चाहिए। हरा धनिया और हरा पुदीना इन दोनों की चटनी खाने से भी लाभ होता है। जहां तक हो सके खट्टी चीजों को नहीं लेना चाहिए। क्योंकि खट्टी चीजें सीने की जलन को बढ़ा देती हैं। भोजन के बाद टहलना भी चाहिए तथा शरीर में कब्ज नहीं बनने देना चाहिए। 46. जीभ पर छाले होना : जब पेट के अंदर गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है तो जीभ की ऊपरी परत पर छाले उभर आते हैं। ऐसा उस दशा में होता है। जब हम खाद्य-पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं। गर्म पदार्थों में आलू, चाट, पकौड़े और अदरक, खट्टी मीठी चीजें, अरहर या मसूर की दाल, बाजरे का आटा आते हैं। कभी-कभी शरीर भोजन को ठीक से नहीं पचा पाता है। तब आंतों में अपच का प्रदाह उत्पन्न हो जाता है। यदि हम किसी कारणवश मल-मूत्र को रोंके रहते हैं। तब मल सड़ने लगता है और आंतों में सड़न क्रिया आरम्भ हो जाती है। इन सभी कारणों से जीभ पर छाले पड़ जाते हैं। इन छालों में असहनीय दर्द होता है जैसे कांटे चुभ रहे हों। नमक, मिर्च मसाले आदि खाने पर बहुत दर्द होने लगता है। भोजन करना मुश्किल हो जाता है। साधारण भाषा में इसे मुंह का आना कहते हैं। इसके लिए धनिये का मिश्रण बहुत ही लाभकारी इलाज होता है। धनिये के 50 दाने पीसकर सरसों के तेल में पका लेना चाहिए। फिर कपड़े में छानकर रूई की फुरेरी से इस तेल को जीभ पर लगाना जरूरी होता है। इसे लगाने के तुरन्त बाद मुंह खोलकर लार नाली में टपका देना जरूरी होता है। दिन में 4 बार यह क्रिया करने से छालों में आराम मिलता है। 47. अंगों की टूटन : शरीर के अंग अक्सर शक्ति से बाहर कार्य करने के कारण टूटने लगते हैं। कभी-कभी थकावट के कारण भी अंगों में टूटने की क्रिया पैदा होती है। होता यह है कि जब शारीरिक ऊर्जा अपने सामर्थ्य से अधिक खर्च हो जाती है तो अंगों में टॉक्सिन (एक प्रकार का विकार) पैदा हो जाता है। ऐसी अवस्था में शरीर के अंग-अंग में दर्द हो जाता है। इस दशा में व्यक्ति का काम करने में मन नहीं लगता है। शरीर को मालिश करने की जरूरत महसूस होने लगती है। हर समय समय आराम करने का मन करता है। इसके लिए रोगी को नमक और धनिये के घोल में थोड़ी देर तक बैठना चाहिए। अंगों को इस घोल से धीरे-धीरे धोना चाहिए। इसके अतिरिक्त 100 ग्राम धनिया, 10 ग्राम नमक और 5 ग्राम हींग पानी में डालकर उस पानी को अच्छी तरह से खौला लेना चाहिए। फिर उस पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे अंगों की जलन को आराम मिलता है। यह पानी घूंट-घूंट करके भी पिया जा सकता है। इसे पीने से मांसपेशियों को बल मिलता है। 48. फ्लू का रोग : फ्लू या इन्फ्लूएंजा में पहले जुकाम होता है। नाक बहनी शुरू हो जाती है। फिर शरीर अलसाने लगता है। धीरे-धीरे व्यक्ति को बुखार हो जाता है। शरीर में बेहद दर्द होने लगता है। रोगी का माथा और पेट दुखने लगता है। कमर तथा पिण्डलियां जैसे टूटने लगती हैं। कभी-कभी तो रोगी को 104 या 105 डिग्री बुखार हो जाता है। अत्यधिक थकावट के कारण भी ज्वर का रोग हो जाता है। इसमें रोगी को कभी ठण्ड लगने लगती है तो कभी-कभी पसीना आने लगता है। यह छूत का रोग है। यदि यह घर में किसी एक को होता है तो पूरे परिवार में फैल जाता है। अत: रोगी को निराशा के संसार से निकलकर घरेलू उपचार शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए 4 दाने कालीमिर्च, 5 तुलसी की पत्तियां और 20 दाने धनिये की चाय बनाकर रोगी को दिन में 4 बार देना चाहिए। चाय में थोड़ी सी अदरक भी डाली जा सकती है। 49. पेट में कीडे़ : पेट में कीड़े उस हालत में पड़ते हैं जब किसी कारणवश मल साफ नहीं होता है। इस दशा को इस रूप में समझना चाहिए कि प्राय: ऊपरी मल तो बाहर निकलता रहता है। परन्तु आंतों में भीतरी रूप में जमा रहता है जैसे किसी नाली की तली में रेत जमा होती रहे और पानी के साथ ऊपर का कूड़ा बहता रहे। इस दशा में सुधार न होने पर कीड़े पैदा हो जाते हैं जो मनुष्य को कमजोर करते रहते हैं। अक्सर नथुनों और जीभ में खुजली सी मची रहती है। शरीर में प्रमाद हो जाता है। काम करने में मन नहीं लगता है। भूख भी घट जाती है। इसके लिए सबसे पहले इच्छाभेदी रस की 2 गोलियां खाना खाने के बाद रात को लेनी चाहिए। सुबह जब खुलकर दस्त हो जाए धनिया के योग से तैयार की गई औषधि को देना चाहिए। 1 पका केला लेकर उसमें धनिये का चूर्ण थोड़ा-सा सेंधानमक और हींग को पीसकर हलुवे की तरह मिला लेना चाहिए। इससे पेट के कीड़े नष्ट हो जाएंगे। इसमें हमें अधिक मल बनाने वाली गरिष्ठ चीजें नहीं खाना चाहिए। कीड़ों के निकलते ही मुंह की खश्की दूर हो जाती है और रोगी को नींद भी अच्छी आती है। मूली का रस भी लाभकारी होता है परन्तु जाड़े के मौसम में मूली का रस गर्म करके लेना चाहिए। 50. कील-मुंहासे निकलना : कील-मुंहासे वैसे तो उम्र के अनुसार निकलते हैं। ये शरीर के अंदर की गर्मी के कारण अधिक निकलते हैं। कभी-कभी उनमें पस भी पड़ जाती है। अत: मुंहासों को फोड़ना नहीं चाहिए। वरना मुंह पर दाग बनने का डर रहता है। इसके लिए एक लेप बना लेना चाहिए। थोडे़ से अदरक का रस, उसमें खीरे का थोड़ा सा रस और धनिया का पानी मिला लेना चाहिए। फिर 2 घंटे बाद साफ पानी से मुंह को धो डालना चाहिए। इससे कील-मुंहासें निकलना बंद हो जाते हैं। 51. त्वचा की खुजली : त्वचा की खुजली अक्सर गंदे रहने, पसीने, या फिर छूत के कारण होती है। इसमें पहले छोटे-2 दाने निकलते हैं फिर उन दानों में खुजली मचने लगती है। खुजलाने से त्वचा छिल जाती है और कभी-कभी बड़ा कष्ट होता है। इस दशा से बचने के लिए वैसलीन में, गंधक और धनिये को पीसकर तथा कपडे़ में छानकर मिला लें। इस मलहम को खुजली वाले स्थान पर दिन भर में 3-4 बार लगायें। इससे काफी आराम मिलेगा। नीम को पानी में उबालकर उसके पानी से नहायें। नीम `एंटीसेप्टिक` है। यह त्वचा को धोकर उसमें कीटाणु पनपने नहीं देती है। शरीर को साफ रखें। अधिक गर्म या अधिक ठण्डी चीजें न खाएं। अपने कपड़ों को घर के अन्य लोगों से अलग रखें। जहां तक हो सके हल्का या पचने वाला भोजन लें। चोकर की रोटी खुजली में अधिक लाभदायक होती है। 52. शरीर में सूजन आ जाना : शरीर में सूजन या तो रक्त विकार उत्पन्न होने से हो जाता है या फिर आंतों की खराबी से होता है। कभी-कभी खून के बनने में धीमापन आ जाता है तो ऐसी हालत में पहले चेहरे पर सूजन आती है। फिर धीरे-धीरे सारे शरीर में सूजन का आक्रमण होता है। ऐसी हालत में रोगी को घबराना नहीं चाहिए। वैसे तो इसके लिए ताकत और खून को साफ करने के इंजेक्शन लगाये जाते हैं, परन्तु हमारा मसलेदानी भी सहायता कर सकती है। हमें 50 दाने धनिये के पीस लेने चाहिए। इसमें नमक बिल्कुल न मिलाएं। इस चूर्ण को फंकी बनाकर ऊपर से पपीता खाना चाहिए। यदि पपीता न मिले तो सेब, चीकू या अन्य कोई भी फल दिया जा सकता है। धनिया खून को साफ करता है और फलों का रस पाचन क्रिया को सुधार कर खून को सही रूप में प्रवाहित करता है। धीरे-धीरे शरीर की सूजन घटने लगती है और रोगी पहले की तरह स्वस्थ हो जाता है। सावधानी : याद रखना चाहिए कि गर्म व ठण्डी वस्तुओं का सेवन न करें। नमक कम से कम खाएं चाय भी बहुत हल्की ली जाए। 53. जिगर में गर्मी का प्रकोप : जिगर में कभी-कभी ठण्डी और कभी गर्म चीजें खाने के कारण हल्की गर्मी का प्रकोप हो जाता है। इसमें रोगी को विशेष कष्ट तो नहीं होता परन्तु खून में खराबी उत्पन्न हो जाने के कारण रोगी का शरीर निस्तेज होता है। ऐसी दशा में रोगी को हल्की और पचने वाली वस्तुओं का सेवन करना चाहिए। इसके लिए मसालेदानी की औषधि भी हमारी सहायता कर सकती है। थोड़ा-सा सूखा धनिया लेकर उसे भून लेते हैं। फिर उसे चूर्ण के रूप में तैयार कर लेते हैं। इस चूर्ण को शहद के साथ लेते हैं। इससे जिगर की गर्मी दूर हो जाती है। सावधानी : स्मरण रहे कि चाय, काफी या गर्म चीजें न लें। हां छाछ का सेवन किया जा सकता है। 54. जिगर में सूजन : जिगर में सूजन पेट की खराबी या कब्ज से होती है। इसमें भूख कम लगती है। खून भी अधिक मात्रा में नहीं बनता है। रोगी के शरीर में पीलापन रहता है। प्रमोद, सुस्ती, काम में मन न लगना आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसी दशा में पहले पथ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। रोगी अधिक कमजोर न हो पाये इसके लिए सबसे पहले उसके पेट को ठीक करना चाहिए। कब्ज को दूर करने के लिए पपीता खिलाना चाहिए क्योंकि पपीता दस्तावर होता है। शहद चाटने से भी लाभ मिलता है। रोटी बनाने के लिए आटे में चोकर की मात्रा अधिक होनी चाहिए। मूंग की दाल की खिचड़ी भी लाभदायक होती है। सावधानी : दिल की सूजन वाले रोगी को धुली हुई दाल नहीं देनी चाहिए। इसके लिए घरेलू दवाई के लिए सबसे पहले 50 ग्राम धनिया बारीक कर लें।उसमें मिश्री और 10 ग्राम भुना हुआ जीरा मिला लेते हैं। तीनों चीजों को पीसकर कपड़छन कर लेते हैं। इस चूर्ण को दिन में तीन-चार लेना चाहिए। इससे हृदय की बीमारी जल्दी ही ठीक हो जाती है जब तक रोग रहे, मनुष्य को चाय, काफी, नशीले पदार्थ नहीं लेने चाहिए। हल्का भोजन और आराम आवश्यक होता है। 55. जोड़ों में दर्द : जोड़ों में दर्द अक्सर शरीर में गैस के बढ़ जाने के कारण होता है। कभी-कभी बलगम की प्रकृति भी अधिक बढ़ जाती है। खून में रोग भी पैदा हो जाता है। ऐसी दशा में धनिया का चूर्ण तथा सोंठ के चूर्ण को शहद के चूर्ण के साथ मिलाकर चटाना चाहिए। 56. गर्मी के कारण होने वाली खांसी : खांसी गले में छोटे-छोटे दाने निकल आने के कारण बनती है या फिर बलगम अधिक बढ़ जाता है। शरीर में गर्मी के अधिक बढ़ जाने से भी खांसी आने लगती है। इसके लिए साबुत धनिये को पानी में उबालकर ठंडा कर लेना चाहिए फिर उसमें थोड़ा सा शहद और पिसी हुई सोंठ मिलाकर पीना चाहिए। इससे बलगम ढीला पड़ता है और जब यह बाहर निकल जाता है तो खांसी कम हो जाती है। अदरक का रस और शहद भी खांसी दूर करने की उपयोगी औषधि है। गले के दाने भी नष्ट हो जाते हैं। 57. तलुओं में छाले निकलना : मुंह के तालु में छाले आंतों की गर्मी से निकल आते हैं। ऐसी दशा में रोगी को भोजन लेना कठिन हो जाता है। इसके लिए धनिये के पानी से कुल्ले करने चाहिए। 50 ग्राम धनिये को 2 लीटर पानी में पका लेना चाहिए। इसके बाद पानी को छान लेते हैं फिर इस पानी से कुल्ले करने चाहिए। दिन में 3 बार कुल्ला करने से रोगी को काफी आराम मिलता है। भोजन में मीठा दलिया, मूंग की दाल से रोटी, दूध चाय आदि लेना चाहिए। छालों की जितनी अधिक सिंकाई होगी, उतना ही आराम मिलेगा। धनिये के पानी में ग्लिसरीन मिलाकर फुरेरी से तालु पर लगाना चाहिए। कुछ देर के बाद लार टपका देनी चाहिए। रोगी के छाले तीसरे दिन से सूखना प्रारंभ हो जाएंगे। रात में पूरी नींद लेनी चाहिए। 58. चेहरे पर झाईयां पड़ जाना : चेहरे पर झाईयां गर्मी के कारण पड़ जाती हैं। कभी-कभी खून में रोग उत्पन्न हो जाने के कारण भी ऐसा होता है। इससे चेहरे की सुन्दरता को काफी नुकसान पहुंचता है। इसके लिए धनिये के पानी में खीरे का रस मिलाकर झाईयों को धोना चाहिए। इसके अलावा सुबह-शाम धनिये के कुछ दाने मुंह में डालकर चबाने चाहिए। रस को गले के नीचे उतारकर छूंछ को थूक देना चाहिए। यह काफी गुणकारी औषधि होती है। इसके अलावा, ककड़ी, खीरा, सेब, नाशपाती का रस लेना चाहिए। खीरे, ककड़ी और हरे धनिये में पोटाश तथा लवण की मात्रा होती है, जो झाईयों को दूर करते हैं। रात को धनिये के पानी में अदरक का रस मिलाकर मुंह पर लगाना चाहिए। सुबह साफ पानी से मुंह को धो डालना चाहिए। धीरे-धीरे त्वचा के सारे रोग नष्ट हो जाते हैं। 59. थकान और शरीर का टूटना : हम सभी जानते हैं कि थकान अधिक काम करने से होती है। कभी-कभी अधिक सर्दी या गर्मी में रहने, जमीन पर सोने या फिर कडे़ स्थान पर सोने से भी शरीर टूटने लगता है। इसके लिए एक बाल्टी पानी में 100 ग्राम धनिया, 2 चम्मच नमक और 4 चम्मच कड़वा तेल मिलाकर शरीर के निचले अंगों को सहते गर्म पानी में डुबोना चाहिए। थोड़ी देर में थकान और टूटन दोनों दूर हो जाते हैं। नसों में खिंचाव, मांसपेशियों में सूजन और जोड़ों में एसिड उत्पन्न हो जाने के कारण भी थकान व शरीर टूटने की शिकायत हो जाती है। विश्राम से भी रोगी को काफी लाभ मिलता है। तेज हवा में नहीं सोना चाहिए वरना और भी अधिक हानि हो सकती है। शरीर को चादर से ढककर सोने से भी शरीर का टूटना कम हो जाता है। 60. स्नायु की दुर्बलता : इस बीमारी को अंग्रेजी में नर्वस ब्रेकडाउन भी कहते हैं। इस रोग में रोगी को लगता है कि जैसे उसके शरीर की प्राणशक्ति किसी ने निचोड़ ली है। हाथ-पांव भी फूल जाते हैं। रोगी का दिल घबराने लगता है कि उसकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाएगी। कभी-कभी जी मिचलाने लगता है। इसके लिए रोगी को 4 पत्तियां तुलसी, 10 दाने धनियां और 2 कालीमिर्च, 2 कप पानी में उबालकर चाय बनी लेनी चाहिए। फिर उसमें से थोड़ी-सी शक्कर डालकर रोगी को पिलानी चाहिए। इससे रोगी की घबराहट दूर हो जाती है और उसकी दशा प्राकृतिक हो जाती है। इसमें हल्का भोजन और आराम आवश्यक होता है। तुलसी और धनिये का रस पानी की तरह नाक में टपकाना चाहिए। 61. नींद न आने की शिकायत : नींद न आने की शिकायत लगातार कुछ सोचने, मानसिक अशांति, पेट में कब्ज, अत्यधिक थकावट, असामान्य बीमारी आदि के कारण होती है। कुछ लोग इस अवस्था में नींद की गोलियां ले लेते हैं। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रारम्भ में नींद तो आ जाती है। परन्तु कुछ दिनों बाद नींद की गोलियां मन को सहज हो जाती है। अत: ये अपना प्रभाव डालना बंद कर देती हैं। तब मनुष्य और अधिक परेशानी में पड़ जाता है। इसके लिए दाल-सब्जी आदि में नमक की मात्रा कम कर देनी चाहिए। हल्का भोजन लेना चाहिए यदि कब्ज हो तो उसे दूर करना चाहिए। स्वादिष्ट व सुगंध खाने वाली चीजों को छोड़ देना चाहिए। तेज-मिर्च मसाले आदि नहीं खाने चाहिए। धनिया के 25 दाने, 1 लाल इलायची, 2 कालीमिर्च को पीसकर चूर्ण बना लेना चाहिये। फिर इस चूर्ण को दो चुटकी लेकर ऊपर से गुनगुना पानी ले लेना चाहिए। पांव के तलुवें में देशी घी या सरसों का तेल मलना चाहिए। इससे तनाव कम होकर नींद आ जाती है। 62. अधिक पसीना आना : जब शरीर अधिक पसीने से भीग जाए तो समझ लेना चाहिए कि जिगर में कोई खराबी है। इसमें भूख कम हो जाती है। शरीर पसीने के बाद शिथिल (ढीला) पड़ जाता है। काम में मन नहीं लगता है। हाथ और पैर फूल जाते हैं। रोगी घबराहट का अनुभव करने लगता है। भोजन में अरुचि हो जाती है। जीभ सूखी सी और कड़वी हो जाती है। अत: व्यक्ति को 5 दाने धनिये के पपीते के साथ लेना चाहिए। अदरक और शहद को साथ लेने से भूख खुलकर लगती है। अदरक के रस को शहद के रस में मिलाकर उंगली से चाटना चाहिए। मुंह की लार जितनी अधिक पेट के अंदर जाएगी, उतना ही अधिक पेट का भारीपन घटेगा। नमक की मात्रा कम कर देने से भी अधिक पसीना आने की शिकायत दूर हो जाती है। 2 ग्राम पिसे हुये धनिये को दिन में 3 बार पानी के साथ लेने से पसीना आना कम हो जाता है। 63. पथरी : पथरी के हो जाने पर साधारण पीड़ा बहुत ही भयानक हो जाती है। यह मूत्राशय या गुर्दे में होती है। इसके प्रभाव से पेशाब करते समय दर्द, पेट में अफारा (गैस), हल्का बुखार, गुर्दे में पीड़ा आदि होने लगती है। पथरी के बनने के कई कारण बताये जाते हैं। खाने-पीने में अनियमितता, वीर्यस्राव का रुक जाना आदि कारणों से पथरी का रोग हो जाता है। इसके लिए विभिन्न दवाएं दी जाती हैं। यदि उससे लाभ नहीं होता है तो ऑपरेशन कराना पड़ता है। पथरी की शिकायत होने पर 20 ग्राम धनिये को 1 लीटर पानी में उबालते हैं। फिर इसे छानकर मूली को पीसकर उसका रस इसमें मिला लेते हैं। फिर इसमें सेंधानमक मिलाकर एक बोतल में भर लेते हैं। इस बोतल को 8 दिन तक धूप में रखते हैं। इसे 4 चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ पीने से पथरी गलकर पेशाब के साथ निकल जाती है। 50 ग्राम सूखा धनिया, 50 ग्राम सौंफ तथा 50 ग्राम मिश्री को डेढ़ किलो पानी में सुबह भिगो दें तथा शाम को छानकर पीस लें और उसी पानी में घोलकर छानकर पीयें। इस तरह सुबह को भिगोकर शाम को तथा शाम को भिगोकर सुबह को रोजाना पीयें। इससे पेशाब खुलकर आता है तथा पथरी गलकर बाहर निकल जाती है। 64. पागलपन का हल्का दौरा: जब कभी दिमाग पर भीतरी गर्मी प्रभाव छोड़ती है तो पागलपन का हल्का दौरा पड़ने लगता है। उस व्यक्ति को होश नहीं रहता है कि वह क्या कर रहा है। उसकी मुंह से उल्टी सीधी बातें निकल जाती हैं। चेतना क्षीण होने लगती है। ऐसी दशा में धनिया को शहद के साथ चाटना चाहिए। रोगी के सामने ऐसी वैसी बातें नहीं करनी चाहिए। उनको यही आभास दिलाते रहना चाहिए कि वह जो कुछ कह रहा है ठीक ही कह रहा है। 10 ग्राम से 20 ग्राम की मात्रा में धनिये के चूर्ण को सुबह और शाम के समय देने से संभोग की वजह से हुआ पागलपन ठीक हो जाता है। 65. पुट्ठों में दर्द : पुट्ठों में दर्द सर्दी-गर्मी के द्वारा विकार उत्पन्न होने से हो जाता है। इसमें रोगी को बहुत दर्द होता है। इसलिए सबसे पहले खान-पान में संयम बरतना चाहिए। इसके बाद इलाज शुरू करना चाहिए। 20 ग्राम सरसों के तेल में 50 दाने धनियां, 1 पोटी लहसुन और 1 चुटकी नमक डालकर भूनना चाहिए। बाद में इस तेल को छान लेना चाहिए। इसके बाद तेल की धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिए। इस क्रिया से पुट्ठों में तनाव और खिंचाव कम हो जाता है। इस क्रिया के दौरान ठण्डी वस्तुएं खाना वर्जित होता है। 66. बवासीर (अर्श) : बवासीर दो प्रकार की होती है वादी बवासीर और दूसरी खूनी बवासीर। खूनी बवासीर में मस्सों से खून आता है। परन्तु बादी में गुदा के भीतर-बाहर मस्से निकल आते हैं, जिनमें खुजली मचती है। ये मस्से कांटे की तरह चुभते हैं। बवासीर अक्सर कब्ज के कारण होती है। यह बड़ा भयंकर रोग है। इससे बचने के विभिन्न उपाय हैं। जैसे भोजन सुपाच्य लेना चाहिए, पेट में कब्ज न बनने दिया जाए अधिक खाने या खाने के बाद मैथुन से बचा जाए। बादी की चीजें जैसे अमरूद, भिण्डी, अरुई, बैंगन, उड़द, अरहर की दाल तथा अधिक वसायुक्त पदार्थ नहीं खाने चाहिए। चावल और बैंगन का प्रयोग भूलकर भी न करें क्योंकि ये दोनों भोज्य पदार्थ वादी और बवासीर वाले व्यक्ति को बहुत हानिकारक होते हैं। इसके उपचार के लिए वैसलीन में पिसा हुआ कत्था, 100 दाने धनिया, 10 बूंद मिट्टी का तेल, सत्यानाशी पौधे की जड़ ये सभी चीजें पीसकर और कपडे़ में छानकर वैसलीन में मिला लेते हैं। इस मरहम को गुदा में लगाने से बवासीर के मस्से ठीक हो जाते हैं। यदि खून निकलता है तो वह भी बंद हो जाएगा। धनिये के काढ़े में मिश्री मिलाकर रोजाना 2-3 बार पीने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है। हरे धनिया का 1 चम्मच रस निकालकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रोजाना सुबह के समय पीने से खूनी बवासीर मिट जाती है। धनिये को मिश्री के साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। 1 कप गर्म पानी में 1 चम्मच चूर्ण डालकर रोजाना सुबह-शाम पीने से मलद्वार की जलन तथा खूनी बवासीर ठीक हो जाती है। सूखे धनिये को दूध और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक होती है। 67. हर समय जम्हाइयां आना : यदि हम कुछ लोगों के सामने बैठे हों और उस समय जम्हाई के कारण मुंह को बार-बार फाड़ना पडे़ तो बहुत ही खराब लगता है। इसका आना भी एक रोग है। यह शरीर को आलस्य की पीड़ा में घेरे रहता है। काम में मन नहीं लगता है। यदि काम करना पडे़ तो शीघ्र ही मन ऊब जाता है। जम्हाइयां या तो शरीर में थकावट बनी रहने के कारण आती है या फिर नींद ठीक से न आने के कारण। इसके लिए धनिये का चूर्ण गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। यदि यह बीमारी सी बन गई हो तो 20 दाने धनिये को एक लीटर पानी में उबालकर इस पानी से मुंह धोना चाहिए, जम्हाइयां आनी अपने आप ही बंद हो जाएगी। 68. मिर्गी का रोग : इस रोग में व्यक्ति को बेहोशी के दौरे पड़ने लगते हैं। मुंह से झाग भी आने लगती है। मिर्गी के दौरे अक्सर दिमाग की नाड़ियों में विकार आने से होने लगता है। मिर्गी के दौरे पड़ने के बाद लोग रोगी को जूता सुंघाते हैं, उसके सिर के बालों को पकड़कर खींचते हैं जो गलत काम है। ऐसे व्यवहार रोगी के साथ भूलकर भी नहीं करना चाहिए। दौरा पड़ने की हालत में रोगी को खाट पर लिटा देना चाहिए। इसके बाद रोगी के मुंह पर पानी के छींटे मारें, जब रोगी को होश आ जाए तो उसे धनिये के पानी में लाहौरी नमक मिलाकर पिलायें। इससे कुछ दिनों बाद रोगी को दौरे पड़ने बंद हो जाते हैं। रोगी से ऐसी बात कभी नहीं कहनी चाहिए जिससे कि उसे कुछ सोचने का अवसर मिले। चिन्ता से रोगी को बचाये रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होता है। 69. मुंह का पक जाना : इस रोग में जीभ, तालु, गलपटों आदि सभी जगहों पर छाले निकल आते हैं। इन छालों में कांटे से चुभते हैं और रोगी को दर्द भी होता है। इसके लिए देशी घी में 5 ग्राम धनियां और 5 ग्राम पिसा कत्था, दोनों चीजों को पीसकर मिला लेना चाहिए। फिर इस मरहम को छालों पर लगाकर लार टपका देनी चाहिए। 2 दिन में छाले सूखने शुरू हो जाते हैं। छालों का इलाज करने से पहले यदि पेट को साफ कर लिया जाए तो काफी लाभ होता है। कभी-2 ये छाले आंतों में होने वाली गर्मी से भी हो जाते हैं। छालों में कम नमक का फीका भोजन लेना चाहिए। दूध, नींबू की गर्म शिकंजी, दलिया, साबूदाना आदि छालों के समय काफी लाभकारी रहते हैं। 70. मूर्च्छा आना : बेहोशी आने की हालत में रोगी को अपने शरीर का होश नहीं रहता है। वह अधिक कमजोरी अनुभव करता है और आंखों के सामने अंधेरा छा जाने के कारण गिर जाता है या फिर खाट पर लेटने के साथ ही बेहोश हो जाता है। इसके लिए 1 कप पानी में 10 ग्राम धनियां और 4 पत्ते तुलसी के डालकर उबालना चाहिए जब पानी आधा शेष रह जाए तब इसे उतारकर ठंडा कर लेना चाहिए। इसके पानी को चम्मच से रोगी के मुंह में डालना चाहिए। 4-5 बूंदे पानी नथुने में भी डालने चाहिए। ऐसा करने से कुछ ही क्षणों बाद बेहोशी दूर हो जाती है। होश आ जाने पर 10 दाने धनिये के, 4 बूंद अदरक का रस और 4 बूंद तुलसी का रस शहद के साथ चटाना चाहिए और रोगी से कोई भारी काम नहीं लेना चाहिए। 71. मोटापा दूर करना : शरीर में चर्बी बढ़ जाने के कारण मोटापा पैदा हो जाता है। मोटे पुरुष या स्त्री का रक्तचाप बढ़ जाता है। इसका मुख्य लक्षण यह है कि वायु संचरण में बाधा पड़ती है। त्वचा फूल जाती है जिसके कारण शरीर पूर्णरूप से वायु ग्रहण नहीं कर पाता है। अधिक चर्बी के कारण दिल पर भी प्रभाव पड़ता है। दिल धीमी गति से कार्य करना शुरू कर देता है। इसके लिए मोटे व्यक्ति को सर्वप्रथम हल्का व्यायाम करना चाहिए। इसके अन्तर्गत सुबह-शाम टहलना, योगासन करना, चिकनाई वाले पदार्थ त्याग देना आदि क्रियाएं काफी लाभदायक होती हैं। सुबह 2 चम्मच अदरक का रस शहद के साथ लेना चाहिए। कभी भरपेट भोजन नहीं करना चाहिए। चावल, राबड़ी अधिक दूध, स्नेहयुक्त पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए। अनन्नास का प्रयोग नियमित रूप से करना चाहिए। तेल की मालिश करना भी आवश्यक होता है। औषधि के रूप में 10 ग्राम सूखा धनिया, 20 ग्राम गुलाब के सूखे फूल और मिश्री को मिलाकर 2 चुटकी सुबह और 2 चुटकी शाम को दूध के साथ लेना चाहिए। इससे चर्बी कम हो जायेगी और मोटापा दूर हो जाएगा। 72. सिर में असहनीय पीड़ा : सर्दी, जुकाम के कारण यदि सिर में दर्द हो रहा तो घबराना नहीं चाहिए। सबसे पहले तो रूई के फोहे से गला, माथा तथा सीना सेकना चाहिए। सिंकाई कम से कम 10 मिनट तक करनी चाहिए। इसके बाद पिसा हुआ धनिया पानी के साथ गर्म करके माथे पर लेप करना चाहिए। यदि सिर में झनझनाहट हो रही हो तो सबसे पहले कुछ देर के लिए आराम करना चाहिए। इसके बाद तुलसी की 2 पत्तियों को 2 कालीमिर्च के दानों के साथ पीसकर चबाना चाहिए। धनिया और तुलसी का रस मिलाकर माथे पर लगाने से आराम मिलता है। 73. मनोविकारों से मुक्ति के लिए : मन में अश्लील विचार आने, क्रोधी स्वभाव, घमंड तथा गालीगलौज, पूर्ण वार्तालाप से मन को मुक्त करने में तथा स्वप्नदोष में धनिया बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसके लिए धनिया 25 ग्राम, 5 ग्राम देशी बबूल का गोंद तथा 5 ग्राम कपूर को बारीक पीसकर व थोड़े से ताजा पानी में मिलाकर मटर के दाने के बराबर गोलियां बनाकर रख लेते हैं। ये 4-4 गोली सुबह-शाम ठंडाई के साथ कुछ ही दिनों तक लेने से उपरोक्त मनोविकारों से मुक्ति मिलती है। 74. आंखों की सुरक्षा : हरे धनिये के पत्तों का रस निकालकर रोजाना 3-4 बार आंखों में डालते रहने से उनकी गर्मी शांत हो जाती है तथा आंखों की जलन, धुंध, लाली, दर्द आदि रोगों में फायदा होता है। 75. सूजाक : 250 ग्राम हरे धनिये का रस, 50 ग्राम ब्रांडी तथा 15 ग्राम चन्दन के तेल को अच्छी तरह से मिलाकर किसी कार्क वाली बोतल में भरकर 1 सप्ताह के लिए बंद रखी रहने देते हैं। इसके बाद 10-12 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से मूत्रमार्ग की जलन, मवाद आना, पीव निकलना या रुधिर टपकना आदि रुक जाता है। यह सूजाक जैसे भयंकर रोग की सबसे सरल और सबसे उपयोगी दवा है। इस रोग से ग्रसित रोगियों को इसका लाभ अवश्य उठाना चाहिए। 76. खटमल, मच्छर आदि : यदि खाट में खटमल हो गये हैं और वे रात दिन मनुष्य का खून चूसते हैं तो नौसादर, पिसा धनिया और अजवायन को तीनों को मिलाकर खाट पर बुरक दीजिए खटमल खाट को छोड़कर भाग जाएंगे। यहीं चूर्ण दीमकों को भी नष्ट करने के लिए उपयोगी होता है। इसी प्रकार धनिया स्वास्थ्य के छींटे अपने अन्य उपायों से भी लाता है। यदि हम धनिये को उपले की आग पर डाल दें घर के कोनों में बसेरा कर रहे मच्छर भाग जाएंगे। धनिये द्वारा बनाया गया धुंआ वातावरण को शुद्ध करता है। 77. विषमारक : बारिश के मौसम में घर में परदार चींटे काकरोच, घेंसे, मक्खियां आदि अपना अड्डा बना लेती हैं। उस दशा में तरह-तरह के रोग फैलने का डर बना रहता है। उस समय धनिया और नीम की पत्तियों की धूनी घर में देनी चाहिए। नीम की पत्तियों को सुखाकर धनिये के साथ पीस लेनी चाहिए। फिर इस चूर्ण को काकरोच और घेंसों पर डालना चाहिए। दोनों या तो नष्ट हो जाएंगे या फिर अपना घर छोड़ देंगे। साधारण धनियां विषनाशक (जहर को समाप्त करने वाला) भी होता है। प्रकृति ने इसमें रोगरोधक शक्ति भरी है। प्रत्येक घर के मसालेदानी में धनिये का होना आवश्यक होता है। धनिया में पेशाब के रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है। इसलिए जिसे हम जितनी मात्रा में लेते हैं। उससे अधिक यह हमारे शरीर की सफाई करता है। यह शरीर में अमृत रस बढ़ाती है तथा विषैले पदार्थों को मल या पेशाब के जरिये बाहर निकाल देती है। कुछ लोगों का कहना है कि धनिया जहर को बढ़ाता है। यदि हम उसकी बात का विश्वास कर लें तो भी धनिये से बहुत ही अधिक लाभ होते हैं। 78. धनिया दाल व सब्जी को स्वादिष्ट बनाता है : जिस साग-सब्जी में मसाले के साथ धनिये का प्रयोग किया जाता है। वह साग-सब्जी स्वादिष्ट हो जाती है। उसका मटमैला रूप निखर जाता है। खाने में स्वाद बढ़ जाता है। इसके प्रयोग से सब्जी के खराब तत्व अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं जब साग-सब्जी ठीक प्रकार से बनती है तो इससे पेट की आग शान्त हो जाती है। मानव उसका प्रयोग रुचि के साथ करता है जोकि अनजाने में ही दवा का काम करता है। यदि हम साग-सब्जी में धनिये का प्रयोग बंद कर देते हैं तो दिनों-दिन निखार से दूर होते जाएंगे और शीघ्र ही हमें कोई न कोई बीमारी घेर लेगी। 79. धनिया वृद्धावस्था को दूर करता है : सूखा धनिया दाल तथा साग-भाजी में जरूर डालना चाहिए क्योंकि यह चेहरे की झुर्रियों को दूर करता है। इसमें ऐसे रोगों को दूर करने की शक्ति होती है जो बुढ़ापे में अक्सर हो जाया करते हैं। बूढ़ों को गर्म पानी में 10 ग्राम धनिये के दाने डालकर कुछ देर तक स्नान करना चाहिए। इस पानी में त्वचा को सुरक्षित करने की शक्ति होती है जब कभी त्वचा ढीली पड़ जाए या फिर सिर के बाल झड़ने लगे तो धनिया डालकर उबाले हुए पानी का सेवन करना चाहिए। यह शरीर में जहर को बनने नहीं देता है। इस प्रकार धनियां रोग नाशक, वृद्धावस्था को भगाने वाला तथा शरीर की शक्ति को संचित करने वाला होता है। 80. धनियां शरीर के रंग को निखारता है : धनिये में एक प्रकार का क्षारीय तत्व होता है जो त्वचा को धो देता है। इस तत्व के कारण ही शरीर में गोरापन आ जाता है। यदि हम उबले या कच्चे चनों पर धनिया को बुरक लेते हैं तो यह सोने में सुहागा का कार्य करता है। यह शरीर के भीतर पहुंचकर आंतों की गर्मी को बढ़ा देता है। फिर यह धीरे-धीरे कमजोर अंगों को सबल बना देता है। यदि किसी मनुष्य की टांगों में कमजोरी हो तो यह चलने फिरने की शक्ति को बढ़ाता है। गर्मी या सर्दी के प्रभाव को रोकता है। वरना व्यक्ति मौसम के प्रभाव से शीघ्र ही रोगी हो सकता है। 81. धनिये का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक नहीं होता : घरों में कचौड़ी बनाने के लिए पिट्ठी तैयार की जाती है परन्तु उस पिट्ठी में जब तक धनिया नहीं मिलाया जाता है तब तक पिट्ठी ठीक नहीं बन पाती है। इससे एक ओर तो कचौड़ी का स्वाद बढ़ जाता है और दूसरी ओर कचौड़ी की गर्मी दूर हो जाती है जो पेट में पहुंचकर अपनी गर्मी से आंतों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाती है। आंतों के दांत नहीं होते हैं। परन्तु धनियां आंतों के दांतों का काम करता है। इससे शरीर को विनाश की ओर ले जाने वाले तत्व नष्ट हो जाते हैं। शरीर में रोगाणु पनपने नहीं पाते हैं। पानी के दूषित तत्वों को नष्ट करने की भी इसमें शक्ति है। असल में धनिया ऊर्जा को स्थायी करते हुए चलने फिरने की शक्ति को बनाएं रखता है। यदि शरीर में फोड़े-फुन्सी निकल आये तो इसके प्रयोग से वे शीघ्र ही सूख जाते हैं। यदि धनिये का पानी इस्तेमाल किया जाता है तो यह एक प्रकार का जीवन रस बनकर खून को शुद्ध करता है। 82. आग से जलना : यदि शरीर का कोई अंग आग से जल गया हो तो उस समय बडे़ धैर्य से काम लेना चाहिए। सबसे पहले उस अंग को पानी से धो लेना चाहिए या फिर उसे कुछ देर तक पानी में डाले रहना चाहिए। ऐसा करने से जलन कम होती है और आराम भी मिलता है। कुछ न हो तो कपड़े को पानी से तर करके जले हुए भाग पर रखना चाहिए। इससे जलन पर एक तरह का मलहम लग जाता है। इसके बाद घरेलू चिकित्सा करनी चाहिए। इसके लिए 50 दाने धनिया, एक टिकिया कपूर, थोड़ा सा गोले का तेल इन चीजों को खरल या किसी बर्तन में घोंटकर मलहम बना लेना चाहिए फिर इसको दिन में कई बार जले हुए अंगों पर लगाना चाहिए। कुछ ही दिनों में जले का घाव ठीक होने लगेगा और दाग भी नहीं पडे़गा। 83. कट जाना : चाकू, कैंची, छूरी आदि किसी भी शस्त्र से शरीर का कोई भी भाग किसी भी समय कट सकता है। इसलिये सबसे पहले उस स्थान का खून बंद करना चाहिए। इसके लिए उस स्थान को कसकर दबा लेना चाहिए, फिर ठण्डे पानी से कपड़े को भिगोकर उस स्थान पर रख देना चाहिए। इसके बाद कटे हुए घाव पर 10 ग्राम धनिया बारीक पीसकर घी में मिलाकर लगाना चाहिए। कुछ ही दिनों में घाव भरना या कटा हुआ स्थान जुड़ना शुरू हो जाएगा। 84. आघात की दशा : शरीर का कोई अंग कुचल जाए, चिर जाए, बिंध जाए तो इस घटना को आघात कहते हैं या फिर शरीर का कोई भाग दब जाए तो वह भी आघात की सीमा में आता है। इसके लिए यदि गुप्त चोट लगी हो तब तो दूसरा उपाय करना चाहिए परन्तु यदि खून बहने लगा हो तो सबसे पहले उसे बंद करना चाहिए। जख्म के ऊपर पानी में भीगी पट्टी बांध देनी चाहिए। यदि चोट के कारण जख्म हो गया हो तो पिसी हल्दी और पिसे धनिये को देशी घी में मिलाकर लगाना चाहिए। यह उपचार बिना धार वाले हथियार जैसे लाठी आदि के लग जाने पर भी लाभदायक होता है। यदि तेज धार वाली चीज लग गई हो सर्वप्रथम घाव को स्प्रिट से साफ करना चाहिए। इसके बाद घाव पर केवल धनिये का मलहम लगाना चाहिए। 85. मसूढ़ों से खून आना : यदि मसूढ़ों से खून आता हो तो धनिये को पानी में उबालकर धीरे-धीरे उस पानी से कुल्ले करने चाहिए। यदि शरीर में कमजोरी अधिक हो तो कपड़े को धनिये के पानी में तर करके खून निकलने वाले स्थान पर रखना चाहिए। इससे खून निकलना बंद हो जाता है। 86. सिर में चोट लगना : यदि सिर में गुम चोट लगी हो तो सरसों के तेल में पिसा हुआ धनिया डालकर उस तेल में कपड़े के फाहे को भिगोकर चोट वाले स्थान पर धीरे-धीरे सेंक करना चाहिए। चोट वाले स्थान पर धनिया की पोटली भी रखी जा सकती है। 87. स्याह (नीला) पड़ जाना : नीला दाग शरीर में खून जमा हो जाने के कारण पड़ता है। अक्सर गिर पड़ने, चोट खाने, मार-पीट आदि के कारण ऐसा होता है। उस स्थान पर रह-रहकर दर्द तथा टीस उठती है। रोगी को किसी भी दशा में चैन नहीं पड़ता है। ऐसी दशा में 10 ग्राम धनिया, 5 ग्राम हल्दी, 2 पुती लहसुन और ग्वार का पत्ता- इन चारों चीजों को सरसों के तेल में अच्छी तरह से पकाना चाहिए। फिर तेल को छानकर साफ शीशी में भर लेना चाहिए। इस तेल को रूई के फाहे पर डालकर चोट वाले स्थान पर लगाकर पट्टी बांध देने से चोट में आराम आ जाता है। 88. मोच आ जाना : ऊंची नीची जगहों पर पैर पड़ जाने या शक्ति से अधिक सामान उठाने के कारण मोच आ जाती है। उस समय नस अकड़ जाती है। इसमें एक प्रकार का खिंचाव आ जाता है। इससे रोगी को बड़ा कष्ट होता है। उसे किसी भी करवट चैन नहीं पड़ता है। ऐसी दशा में 10 ग्राम पिसा हुआ धनिया, 5 ग्राम हल्दी और 5 ग्राम जीरा को तिल्ली के तेल में अच्छी तरह से पका लेना चाहिए। कुछ देर तक मोच वाली जगह पर धीरे-धीरे मालिश करने से लाभ मिलता है। 89. बच्चों की हड्डी उतर जाना : बच्चों को इधर-उधर तथा उल्टा-सीधा घुमाने से हड्डी उतर जाती है। जिससे बच्चा बहुत तेज रोने लगता है। इसकी सीधी सी पहचान है कि बच्चे के सभी अंगों को बारी-बारी से परखना चाहिए। जब लक्षण स्पष्ट हो जाएं तो पहले धीरे-धीरे खींचकर हड्डी को यथा स्थान पर बैठाना चाहिए। हड्डी को ठीक स्थान पर बैठाने का सबसे सरल उपाय यह है कि हड्डी उतरे हुए स्थान पर एक कपड़ा बांध देना चाहिए। फिर धीरे-धीरे बांह, टांग आदि को खींचकर सही कर लेना चाहिए। हड्डी के यथा स्थान पर बैठ जाने के कारण भी दर्द होता रहता है। इसके लिए हल्दी व धनिये का तेल हड्डी उतरे हुए स्थान पर धीरे-धीरे मलना चाहिए। आधा आराम तो उसी क्षण हो जाता है। शेष दर्द 2-3 दिनों में ही रफूचक्कर हो जाता है। हड्डी के जोड़ में भी मजबूती आ जाती है। 90. डंक लगना या मारना : डंक, बिच्छू, बर्र, मधुमक्खी, आदि किसी का भी हो सकता है। इसके लिए बारीक सुई या चिमटी से सबसे पहले डंक निकालना चाहिए। इसके बाद हरा धनिया पीसकर डंक वाले स्थान पर पट्टी बांध देनी चाहिए। 20 मिनट में डंक का जहर उतरने लगता है और रोगी को आराम मिलने लगता है। डंक वाले स्थान पर सूखा धनिया पानी में पीसकर रगड़ने से भी जहर का असर कम हो जाता है। 91. कुत्ते के काटने पर :कुत्ते के काटे हुए स्थान पर थोड़ा सा धनिया, 2 चुटकी सोडा, 2 चुटकी हल्दी और 2 कली लहसुन आदि की पोटली बनाकर बांधनी चाहिए। यदि घाव अधिक गहरा हो तो इंजेक्शन भी लगवाना चाहिए। 92. चक्कर आना : आंवले और हरे धनिये के रस को पानी में मिलाकर पीने से चक्कर आना बंद हो जाता है। 93. पीलिया : पीलिया का रोग होने पर धनिये का रस पीने से लाभ पहुंचता है। 94. बच्चों के मुंह के सफेद छाले : लगभग 5 ग्राम धनिये को 100 ग्राम पानी में रात में भिगोकर सुबह मसलकर छानकर तैयार हिम, फांट या काढे़ से कुल्ले कराने से बच्चों के मुंह के सफेद छाले मिट जाते हैं। 95. थायराइड ग्रन्थि का बढ़ना : थायराइड ग्रन्थि बढ़ जाए, क्रिया उच्च या निम्न हो जाए तो 5 चम्मच सूखा साबुत धनिया 1 गिलास पानी में तेज उबालकर छानकर रोजाना सुबह और शाम रोगी को पिलाएं। 96. आंख आना : धनिये का काढ़ा तैयार करके अच्छी तरह से छान लें। अब इस काढ़े को बूंद-बूंद करके हर 2-3 घण्टों में आंखों में डालने से आंखों में आराम आता है। इस काढ़े को आंखों में डालने की शुरुआत करने से पहले आंखों में एक बूंद एरण्ड तेल (कैस्टर आयल) डाल लें। यह आंख आने और आंखों के दर्द की बहुत लाभकारी दवा है। 97. हस्तमैथुन : धनिये का काढ़ा के सेवन से हस्तमैथुन में लाभ होता है। 98. वात-कफ ज्वर : धनिया, देवदारू, कटेली और सोंठ को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर प्रयोग करने से वात का बुखार समाप्त हो जाता है। इससे भोजन ठीक से पचता है और भूख भी तेज हो जाती है। 6-6 ग्राम धनिया, लाल चन्दन, नीम की छाल, गिलोय और पद्याख को लेकर लगभग 350 मिलीमीटर पानी में डालकर अच्छी तरह से पकाकर काढ़ा बना लें, जब काढ़ा आधा बच जाये, तब इसे उतारकर छान लें, फिर इस काढ़े में शहद को मिलाकर रोजाना सुबह और शाम खुराक के रूप में पीने से वात और पित्त के बुखार समाप्त हो जाते हैं। 99. दमा : धनिया और मिश्री को चावल के पानी के साथ पीसें, फिर उसी पानी को छानकर पिलाने से बालकों का खांसी और दमे का रोग नष्ट हो जाता है। दमे के रोगी को धनिये की पत्तियों के रस में सेंधानमक मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। 100. वात-पित्त का बुखार : सूखा धनिया, यव, इन्द्र, पित पापड़ा, पटोल (परवल) के पत्ते और नीम की छाल को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को बनाकर 4-4 घण्टे के बाद रोगी को देने से वात-पित्त का बुखार उतर जाता है।

Dhatura plant and flower benefits

 



Dhatura




परिचय : धतूरे का पौधा सारे भारत में सर्वत्र सुगमता के साथ मिलता है। आमतौर पर यह खेतों के किनारे, जंगलों में, गांवों में और शहरों में यहां-वहां उगा हुआ दिख जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए लोग इसके फूल और फलों का उपयोग करते हैं। धतूरा सफेद, काला, नीला, पीला तथा लाल फूल वाला 5 जातियों का मिलता है। इसका पौधा 170 सेमी तक ऊंचा तथा झाड़ीदार होता है। इसकी तना और शाखाएं बैंगनी या हल्के काले रंग की होती हैं। इसके पत्ते दिल के आकार के, अण्डे के समान, चिकने दन्तुर या मुड़े-मुडे़ 3 से 7 इंच तक लम्बे होते हैं। इसके फूल घंटाकार तुरही के आकार के एक साथ 2-2 या 3-3 सफेद बैंगनी चमक लिए हुए 5 से 7 इंच तक लम्बे हो जाते हैं। इसके फल हरे रंग के कांटेदार, गोल-गोल नीचे की ओर लटके 4 खण्डों से युक्त होते हैं। धतूरा के फल पकने पर अपने आप अनियमित ढंग से फट जाते हैं जिनमें से चटपटे, मटमैले भूरे, वृक्काकार, अनेक बीज निकलकर बाहर निकल जाते हैं। विभिन्न भाषाओं में नाम : हिन्दी धतूरा संस्कृत धत्तूर, कनक मराठी धोत्रा गुजराती धान्तूरे बंगाली धतूरा तेलगू उम्मत्त तमिल उम्मत्त फारसी तातूर अरबी दातूर अंग्रेजी थोरन ऐपल रंग : धतूरा के पत्ते काले व सफेद रंग के होते हैं। स्वाद : इसका स्वाद कड़वा होता है। स्वरूप : धतूरा के फूल काले, पीले, नीले और सफेद होते हैं, परन्तु धतूरे को सफेद और काला 2 ही प्रकार माना जाता है। यह अक्सर जंगलों में पाया जाता है। इसके पत्ते मीडियम आकार के और फूल घंटे के आकार के होते हैं। फूल का रंग ऊपर और बीच में सफेद परन्तु ऊपरी हिस्सा काला, नीला और बैंगनी रंग का होता है। इसके 5 भाग होते हैं और उसकी बाहरी पांचों पंखुड़ियां नीले रंग की होती हैं। इसका फल गोल कांटों से युक्त और अत्यन्त अधिक बीजों से भरा हुआ रहता है। जिस धतूरे की डाल, पत्ती, फूल, फल सब काले होते हैं, उन्हें काला धतूरा कहा जाता है और इसमें जहर की मात्रा अधिक होती है। यह ज्यादा गुणकारी है। धतूरे के फल सूखने पर फट जाते हैं, यह नींबू के बीजों के समान अत्यन्त कठोर बाहर निकल आते हैं, इन्हीं फलों में जहर होता है। स्वभाव : धतूरा गर्म प्रकृति का होता है। हानिकारक : धतूरा नशा अधिक लाता है और प्राणों का भी नाश कर देता है। धतूरे के पत्ते और बीज काफी विषैले होते हैं। धतूरे की निर्धारित मात्रा से अधिक सेवन करने पर मुंह, गले, आमाशय में तेज जलन और सूजन पैदा होती है। व्यक्ति को तेज प्यास लगती हैं। त्वचा सूख जाती है। आंखे व चेहरा लाल हो जाता है। शरीर का तापमान बढ़ जाता है। चक्कर आने लगता है। आंखों के तारे फैल जाते हैं और व्यक्ति को एक वस्तु देखने पर एक से दिखाई पड़ने लगती है। रोगी रोने लगता है। नाड़ी कमजोर होकर अनियमित चलने लगती है। यहां तक की श्वासावरोध होकर या हृदयावरोध होकर मृत्यु तक हो सकती है। धतूरे के विषाक्तता के लक्षण मालुम पड़ते ही तुरन्त ही चिकित्सक की सेवाएं लेनी चाहिए। दोषों को दूर करने वाला : शहद, मिर्च, सौंफ धतूरा के दोषों को नष्ट करते हैं। तुलना : धतूरा की तुलना भांग के बीज से की जाती है। मात्रा : धतूरा के सेवन की मात्रा लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग तक होती है। गुण : धतूरा नशा, गर्मी, गैस को बढ़ाता है, बुखार और कोढ़ को नष्ट करता है तथा सिर की लीखों व जुओं को खत्म करता है। विभिन्न रोगों में सहायक : 1. सिर दर्द : धतूरे के 2-3 बीज रोजाना निगलने से पुराने सिर का दर्द दूर हो जाता है। 2. सिर की जुएं व लीख: सरसों का तेल 4 किलो, धतूरे के पत्तों का रस 16 किलो को लेकर हल्की आग पर पकाते हैं जब तेल मात्र शेष रह जाए तो बोतल में भरकर रख लें। इस तेल को बालों में लगाने से सिर की जूं मर जाती है। धतूरे के पत्तियों के रस को सिर के बालों की जड़ों में लगाने से जुएं व लीखे नष्ट हो जाती हैं। रस में कपूर को मिलाकर लगाने से अधिक प्रभावशाली असर होता है। 3. उन्माद (पागलपन): काले धतूरे के शुद्ध बीजों को पित्त पापड़ा के रस में घोंटकर पीने से उन्माद (पागलपन) शान्त हो जाता है। शुद्ध धतूरे के बीज और कालीमिर्च को बराबर मात्रा में लेकर बारीक करके पानी के साथ उबाल करके लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बना लेते हैं। यह 1-2 गोली सुबह व रात को मक्खन के साथ देने से नया उन्माद रोग (पागलपन) समाप्त हो जाता है। नया उन्माद रोग मस्तिक आघात, शराब या गांजा के सेवन या धूप में घूमने से या प्रसूतावस्था में हुआ हो जिसमें नींद न आती हो उस अवस्था में इस उन्मत्त वटी का सेवन कराने से थोड़े ही दिनों में मन स्वस्थ होकर शान्त हो जाता है। 4. आंखों की जलन और सूजन: धतूरे के ताजे पत्तों का रस आंख पर लेप करने से आंखों का लालपन दूर हो जाता है तथा सूजन और जलन समाप्त हो जाती है। 5. स्तनों की सूजन : स्त्री के स्तनों की सूजन में धतूरे के पत्तों को गर्म करके बांधने से आराम मिलता है। जिस स्त्री के दूध अधिक होने से स्तन में गांठे हो जाने का डर हो उसके दूध को रोकने के लिए स्तन पर धतूरे के पत्ते बांधने से लाभ होता है। 6. हैजा (कालरा) : हैजे में केवल धतूरा की केसर बताशे में रखकर निगल जाने से हैजा नष्ट हो जाता है। हैजा रोग में धतूरे के पत्ते रस 5 से 6 चम्मच दही में मिलाकर रोगी को पिलाने से लाभ होता है। 7. गर्भधारण : धतूरे के फलों का चूर्ण घी और शहद में मिलाकर चाटने से गर्भ ठहर जाता है। 8. गठिया : धतूरा के पंचांग का रस निकालकर उसको तिल के तेल में पकाकर, जब तेल शेष रह जाए तो इस तेल की मालिश करके ऊपर धतूरा के पत्ते बांध देने से गठिया तथा बाई का दर्द नष्ट हो जाता है। इस तेल का लेप करने से सूखी खुजली और गठिया में लाभ होता है। जोड़ों के दर्द में धतूरा के सत का लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में 3 बार रोगी को देने से लाभ मिलता है। धतूरा के पत्तों के लेप से या इसके पत्तों की पोटली से गठिया और हड्डी के दर्द में लाभ होता है। गठिया के दर्द के रोगी को धतूरे के पत्तों को पीसकर लेप करने से गठिया दर्द और सूजन कम हो जाती है। गठिया के रोगी को धतूरे के पत्तों के तेल से मालिश करने से रोग दूर होता है। 9. जोड़ों की सूजन : धतूरे के पिसे हुए पत्तों में शिलाजीत मिश्रित कर लेप करने से अण्डकोष की सूजन, पेट के अन्दर की सूजन, संधियों (जोड़ों) की सूजन और हडि्डयों की सूजन में बड़ा लाभ मिलता है। 10. योनि में दर्द : धतूरे के पत्तों को पीसकर उसमें थोड़ा-सा सेंधानमक और घी मिलाकर कपडे़ की पोटली बना लें। रात में सोने से पहले पोटली योनि में रखने और सुबह निकाल लेने से दर्द में आराम मिलता है। 11. शीघ्रपतन : लौंग, अकरकरा और शुद्ध धतूरे के बीज बराबर मात्रा में पीस लेते हैं। 1 ग्राम की मात्रा में 1 कप दूध के साथ दिन में 3 बार सेवन करते रहने से कुछ ही दिनों में स्तम्भन बढ़कर शीघ्रपतन दूर हो जाता है। 12. कामशक्ति : धतूरा के बीज, अकरकरा और लौंग इन तीनों चीजों की गोलियां बनाकर खाने से कामशक्ति बढ़ जाती है। धतूरा के बीजों के तेल की पैरों के तलुवे पर मालिश करने के बाद स्त्री सहवास करने से बहुस्तम्भन होता है। धतूरा के 15 फलों को बीज सहित लेकर पीसकर बारीक चूर्ण को 20 किलोग्राम दूध में डालकर दही जमा देते हैं। अगले दिन दही को मथकर घी निकाल लेते हैं। इस घी की 125 ग्राम की मात्रा पान में रखकर खाने से बाजीकरण होता है तथा लिंग पर घी की मालिश करने से उसकी शिथिलता (ढीलापन) दूर हो जाती है। 13. नारू, बाला : नारू की बीमारी में धतूरे के पत्तों की पोटली बांधने से बहुत ही लाभ मिलता है। 14. बुखार : धतूरा के बीजों की राख लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में मलेरिया ज्वर (बुखार) के रोगियों को सुबह, दोपहर और शाम को देने से लाभ मिलता है। धतूरा के बीजों के चूर्ण को लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में ज्वर (बुखार) आने से पहले रोगी को खिलाने से लाभ मिलता है। धतूरा के पत्ते, नागरबेल के पान और कालीमिर्च बराबर मात्रा में गिनकर, पीस लेते हैं और उड़द के बराबर की गोलियां बना लेते हैं। दिन में 2 बार 1-1 गोली देने से ज्वर (बुखार) छूट जाता है। इसको सौंफ के रस के साथ सेवन करने से पुराना प्रमेह मिट जाता है। 15. तिजारी : धतूरे के पत्तों का 5-6 बूंद रस में लगभग 25 ग्राम दही मिलाकर पिलाने से 1 या दो बार में तिजारी चली जाती है। 16. बिच्छूदंश : धतूरा के पत्तों की लुगदी, बिच्छू दंश पर लगाने से आराम मिलता है। 17. घाव : जिस घाव पर गहरा पीप या पपड़ी जम गया हो उसको गुनगुने पानी की धार से धोकर दिन में 3-4 बार धतूरा के पत्तों की पोटली बांधनी चाहिए। 18. कान की सूजन, दर्द : धतूरे के पत्तों के रस को आग पर गाढ़ा करके, कान के पीछे की सूजन पर लगाने से आराम मिलता है। कान में यदि मवाद बहता हो तो 8 भाग सरसों का तेल, 1 भाग गंधक, 32 भाग धतूरा के पत्तों का रस मिलाकर गर्म कर लें, फिर इस तेल की एक बूंद कान में सुबह-शाम डालने से कान के दर्द में आराम आता है। धतूरे के पत्तों को गर्म करके 2-3 बूंदों को कान में टपकाने से कान दर्द से छुटकारा मिलता है। 400 ग्राम धतूरा का रस, धतूरा के रस में चटनी की तरह पिसी हुई हल्दी 25 ग्राम और तिल का तेल 100 ग्राम लेकर हल्की आग पर पका लेते हैं। तेल शेष रहने पर छान लेते हैं। यह कान के और नाड़ी के घाव के लिए लाभकारी होता है। जिस कान में दर्द हो उसके अन्दर धतूरे के ताजे पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस की 2 बूंदे कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है। 19. दर्पनाशक (विषनाशक) : कपास के फूल और पत्ते इनका शीत निर्यास देने से धतूरे का जहर समाप्त हो जाता है। 20. दोष : धतूरे का अधिक मात्रा में उपयोग करना जहर के समान है। यह अपनी खुश्की की वजह से शरीर को सुन्न कर देता है। सिर में दर्द पैदा करता है तथा पागलपन और बेहोशी पैदा करके मनुष्य को मार देता है। इसका वाहृय प्रयोग करना ही अच्छा होता है। अत: प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। 21. धतूरे के विष को शान्त करना : धतूरे के बीज या फल को खा लेने पर शरीर में बड़ी गर्मी पैदा हो जाती है और जलन के साथ खुश्की होने लगती है। धीरे-धीरे बेहोशी भी आने लगती है। धतूरे के जहर की सबसे उत्तम औषधि पलाश (ढाक) है। अगर धतूरे का फल किसी ने खा लिया हो तो ढाक का फूल खिलाइये। पत्तों के जहर में ढाक के पत्तों का रस पिलाइये। धतूरे के जहर में पलाश (ढाक) के बीज खिलाना चाहिए। इससे बढ़कर कोई अन्य उपयोग नहीं है। कपास का पंचांग मिल जाए तो पानी में घोटकर रोगी को पिला दीजिए इससे धतूरे का जहर शान्त हो जाता है। सहजना की जड़ को पानी में पीसकर छान लें। इस दवा को थोड़े शहद के साथ मिलाकर पीने से शरीर के भीतरी भाग के फोड़े, जिगर तिल्ली आदि के रोगों में जरूर फायदा होता है। यह आरोग्यवर्द्धिनी वटी पुनर्नवादि काढे़ के साथ देनी चाहिए। 22. खालित्य (गंजापन) : धतूरे के पत्तों के रस का लेप करने से खालित्य (गंजेपन का रोग) नष्ट हो जाता है। 23. पिटका : धतूरा की जड़ों के चूर्ण को पानी में पीसकर बाधंने से पिटका नष्ट हो जाती है। 24. हाथ-पैरों में पसीने की अधिकता : धतूरे के बीजों की राख बनाते हैं। फिर इसे 1-1 ग्राम की मात्रा में 8-10 दिन रोजाना एक बार सेवन करने से हाथ-पैरों में अधिक पसीना आने का रोग दूर हो जाता है। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग धतूरे के बीजों को खाने से हाथ-पैरों में पसीना आने वाले रोगी को लाभ मिलता है। 25. सूजन : धतूरे की जड़ को गोमूत्र (गाय के पेशाब में) में पीसकर बने लेप को गर्म कर गर्म ही गर्म सूजन पर मालिश करने से सूजन नष्ट हो जाती है। 26. दांत का दर्द : इसके बीजों को पानी में पीसकर बनी लुग्दी को थोड़ी-सी मात्रा में दाढ़ की खाली जगह में भर देने से दांत के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं। 27. कुत्ते के काटने पर : धतूरे के पत्तों के रस में लाल मिर्च को पीसकर काटे हुए स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है। 28. दमा या श्वास रोग : धतूरे के पंचांग को पीसकर सुखा लेते हैं और चिलम में रखकर धूम्रपान की तरह उपयोग करते हैं। इससे श्वास रोग (दमा) नष्ट हो जाता है। धतूरे के पत्ते का भी धूम्रपान करने से खांसी खत्म हो जाती है। धतूरे के दूध को छाती पर लगाने से श्वास (दमा) और पुराना दिल का रोग मिट जाता है। धतूरे के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीने से तीव्र वेग का श्वास (दमा) भी सामान्य हो जाता है। 6 ग्राम धतूरे के बीज और 2 ग्राम अफीम को पानी में पीसकर 33 गोलियां कालीमिर्च के समान आकार की बना लेते हैं और इसे छाया में सुखा लेते हैं। दिन में 3 बार 1-1 गोली चूसने से दमा रोग ठीक हो जाता है। धतूरे के फलों की राख लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन करने से दमा खत्म हो जाता है। धतूरे के फूल पर फल आते हैं। 1 फल को तोड़कर ले आएं और इसे 2 बराबर हिस्सों में काट लेते हैं। आधे भाग के बीज निकालकर फेंक देते हैं और उसमें छोटी इलायची का चूर्ण अच्छी तरह से भर लेते हैं। दूसरे भाग के बीज नहीं निकालने हैं। अब दोनों हिस्सों को मिलाकर धागे से लपेटकर पहले की तरह जोड़ देते हैं। इसके ऊपर बारीक कपड़ा लगाकर ऊपर गीली मिट्टी से पूरे फल पर लेप कर कण्डे (उपले) को जलाकर उसके बीच अच्छी तरह से रख देते हैं, जब कण्डे अच्छी तरह जल जाएं तथा ठण्डी राख शेष रहे तब इस कपड़े में मिट्टी में लिपटे धतूरे के फल को निकालकर सावधानी से साफ करके मिट्टी आदि हटाकर फल को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लेते हैं। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक की गोलियां बनाकर सुखाकर रख लेते हैं। अब 2-3 गोली श्वास या दमे के रोगी को शहद में मिलाकर दें। इस दवा के उपयोग से रोगी शीघ्र लाभ महसूस करने लगेगा। कुछ दिनों तक लगातार प्रयोग करने से दमा रोग नष्ट हो जाता है। धतूरा के आधे सूखे हुए पत्तों के चूर्ण को लगभग आधा ग्राम की मात्रा में लेकर बीड़ी पिलानी चाहिए। यदि 10 मिनट तक दमें का दौरा शान्त न हो तो अधिक से अधिक 15 दिनों बाद दूसरी बीड़ी पिलानी चाहिए। तब भी आराम न हो तो तीसरी बीड़ी नहीं पिलानी चाहिए। जिन्हें धतूरा अनुकूल न हो उन्हें इसे नहीं देना चाहिए। धतूरा, अपामार्ग और जवांसा को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर पीस लेना चाहिए। इसमें से 2 चुटकी चूर्ण चिलम में रखकर पीने से दमे का दौरा बंद हो जाता है। 29. अण्डकोष की सूजन : धतूरे के पत्ते पर तेल लगाकर अण्डकोषों पर बांधने से अण्डवृद्धि जल्द मिट जाती है। 30. पुनरावर्तक ज्वर : धतूरे के बीज का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लेकर 1 ग्राम तक दही के साथ बुखार आने से पहले खिला दें तो बुखार दुबारा नहीं चढ़ता है। इस प्रयोग से पहले बीजों को लगभग 12 घंटे तक गाय के पेशाब में भिगोकर रख दें। 31. अण्डकोष के एक सिरे का बढ़ना : धतूरे के ताजे पत्ते पर सरसों के तेल के लेप को आग में सेंक दें। फिर उसे अण्डकोष पर बांध दें। रोजाना रात में सोते समय इस उपचार को करें। इससे लाभ होता है। 32. फेफड़ों की सूजन : फेफड़ों की सूजन में धतूरे के पत्तों का लेप छाती और पीठ पर या पत्तों के काढ़े से मालिश करने से लाभ होता है। 33. आंखों का दर्द : अगर आंखों में दर्द हो रहा हो तो पके धतूरे के पत्ते का रस अथवा नीम के कोमल पत्तों का रस या दोनों के पत्तों का रस एक साथ मिलाकर दोनों कानों में डालने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। 34. खांसी : धतूरे के पत्ते, भांग के पत्ते और कलमी शोरा को बराबर मात्रा में लेकर पीस लेते हैं। श्वास (सांस) का दौरा उठने पर इस 2-3 चुटकी चूर्ण को कटोरी में डालकर जला लेते हैं जब कटोरी में से धुंआ निकलने लगे तो तो धुंए को मुंह के द्वारा खींचने से खांसी ठीक हो जाती है। 35. अफारा (गैस का बनना) : धतूरे के पत्तों का लेप या पत्तों के काढ़े से सेंकने या पत्तों के तेल से मालिश करने से पेट की गैस दूर होती है। 36. गर्भनिरोध : पुष्य नक्षत्र में काले धतूरे की जड़ लाकर यदि स्त्री अपनी कमर में बांध ले तो इससे गर्भ नहीं ठहरेगा। 37. नपुंसकता : धतूरे के बीज, अकरकरा और लौंग को बराबर मात्रा में पीसकर चने के बराबर 1-1 गोलियां बनाकर रोज सुबह-शाम लेने से नपुंसकता के रोग में लाभ होता है। 38. कान से कम सुनाई देना : धतूरे का पीला पत्ता (बिना छेद वाला) को गर्म करके उसका रस निकाल लें। इस रस को लगातार 15 दिन तक कान में डालने से बहरापन ठीक हो जाता है। 39. गर्भपात रोकना : यदि बार-बार गर्भ गिर जाता है तो धतूरे की जड़ चार अंगुल के बराबर लेकर कमर में बांधने से गर्भ स्थिर हो जाता है। काले धतूरे की जड़ अथवा अनार की जड़ को रविवार को सफेद कपड़े में बांधकर कमर में धारण करने से गर्भपात का डर समाप्त हो जाता है। 40. कमरदर्द : 200 मिलीमीटर धतूरे के फल का रस, 200 मिलीमीटर आक के पत्तों का रस, 200 मिलीमीटर एरण्ड के पत्तों का रस, 800 मिलीमीटर तिल्ली का तेल। सबको मिलाकर अच्छी तरह से पकाएं। फिर इसे छानकर शीशी में भर लें। इस तेल के कमर पर मालिश से कमर का दर्द सही हो जाता है। 41. बहरापन : धतूरे के पीले पत्तों को हल्का सा गर्म करके उसका रस निकालकर 2-2 बूंदे करके कान में डालने से बहरेपन का रोग दूर हो जाता है। 42. स्तनों का दर्द और सूजन : धतूरे के पत्तों को हरिद्रा के साथ मिलाकर छोटी-सी पोटली बनाकर स्तनों पर बांधने से दर्द और सूजन कम हो जाती है, परन्तु ध्यान रहे कि इसके प्रयोग करने से दूध कम हो जाता है, और नवजात, छोटे बच्चों के होने पर इसका प्रयोग न होने दें। धतूरा और नीम के पत्तों को मिलाकर हल्दी के साथ पीसकर रख लें, फिर इसी लेप को पट्टी की मदद से स्तनों पर बांधने से स्तनों की सूजन और दर्द समाप्त हो जाती है। ध्यान रहें कि इसके प्रयोग से मां का दूध कम हो जाता है और बच्चों को दूध पिलाने वाली माता को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। 43. दर्द : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग धतूरे के बीज को दही के साथ खाने से वेदना (दर्द) कम होती है और उल्टी भी नहीं होती है। प्रयोग से पहले धतूरे के बीज को 12 घंटे तक गाय के मूत्र में या दूध में उबालकर शोधन कर लें। 44. स्तनों का कठोर होना : धतूरे के पत्तों पर एरण्ड का तेल गर्म-गर्म करके स्तनों के उस भाग पर बांधना चाहिए जहां दर्द हो इससे स्तन कठोर हो जाते हैं। 45. कील, कांटा चुभना : जब कोई कील, कांटा आदि चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, शरीर के अन्दर कहीं चुभ जाये तो धतूरे को गुड़ के साथ खिलाने से कांटा पानी की तरह गल जायेगा। 46. पेट के कीड़े : धतूरे के पत्तों को पीसकर बने रस को सरसों के तेल में मिलाकर सिर की मालिश करने से सिर में मौजूद जुंए समाप्त हो जाते हैं। धतूरे के पत्तों का पेस्ट (लुगदी) या धतूरे के पत्तों के रस के साथ पकाये हुए तेल की मालिश करने से सिर की जुएं तुरन्त समाप्त हो जाती हैं। 3-4 बूंद धतूरे के पत्तों का रस, आधा-आधा चम्मच अजवायन और शहद में मिलाकर सोते समय रोगी को पिलाने से कुछ ही दिनों में पेट के सारे कीडे़ मल के साथ निकल जाते हैं। 47. टेटनस : 3 से 5 बूंद धतूरा का टिंचर (टिंचर स्ट्रामोनियम) टेटनस के रोगी को उग्रता के अनुसार 3-4 दिन दूध में मिलाकर लेने से रोगी ठीक हो जाता है। 48. स्तनों में दूध का अधिक मात्रा में होना : धतूरा के पत्तों को हरिद्रा में मिलाकर स्तनों पर बांधने से स्तन में आने वाली सूजन मिट जाती हैं। धतूरे के पत्तों को गर्म करके दिन में 2-3 बार सूजन से पीड़ित स्तन पर बांधने से दूध कम हो जाता है। 49. अरुंषिका (वराही) : धतूरे या नागरबेल के पत्तों के रस में थोड़ा-सा कपूर मिलाकर उसमें कपड़े या रूई को भिगोकर सिर पर बांधने से अरुंषिका (सिर की छोटी-छोटी फुंसियों) में लाभ मिलता है। इससे सिर की जूं और कीड़े भी मर जाते हैं। धतूरे के पत्तों को सरसों के तेल में पकाकर तेल को छान लें, और इस तेल को सिर में लगाने से अरुंशिका रोग (सिर की छोटी-छोटी फुंसियां) ठीक हो जाती है। 50. स्तनों की पीड़ा : हल्दी और धतूरे के पत्तों का लेप करने से स्तनों की पीड़ा नष्ट हो जाती है। 51. अंगुलबेल (डिठौन) : धतूरे के पत्तों को पीसकर, उसमें ‘शहद मिलाकर लेप करने से मवाद वाली अंगुली में छेद हो पीव निकल जाता है। इससे रोगी की अंगुली जल्द ठीक हो जाती है। 52. पेट में दर्द होने पर : धतूरे के बीज को दूध में अच्छी तरह से उबालकर शुद्ध करे या गाय के पेशाब मे लगभग 12 घण्टें तक भिगो कर रख लें, फिर इसे 6 मिलीग्राम की मात्रा में दही को मिलाकर खाने से पेट के दर्द में आराम होकर दर्द ठीक हो जाता हैं। 53. उपदंश : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग धतूरे की जड़ को पान में रखकर खाने से उपदंश से सम्बन्धी रोग मिट जाते हैं। 54. फोड़ा : पीला धतूरा (सत्यानाशी) के बीजों को ठण्डे पानी में पीसकर फोड़े और फुन्सियों पर लेप की तरह से लगाने से सिर का फोड़ा ठीक हो जाता है। 55. हाथ-पैरों की अकड़न : हाथ व पैरों की अकड़न व दर्द में धतूरे के 2 फल काटकर 125 ग्राम सरसों के तेल में जलाकर फिर ठण्डा करके छान लें। इस तेल की मालिश करने से हाथ-पैरों की अकड़न ठीक हो जाती है। 56. हाथ-पैरों की ऐंठन (सायटिका) : आक, पीलवान, काला धतूरा और लाल एरण्ड के 5-5 पत्ते गर्म आग में जलाकर तिल के तेल में मिलाकर उसकी मालिश करके धूप में बैठने से सायटिका मिट जाती है। 57. नहरूआ (स्यानु) : धतूरे के पत्ते को सिल पर पीसकर लगाने से नहरूआ का रोग ठीक होता है। 58. मिर्गी (अपस्मार) : धतूरे के पत्तों का रस रोगी को मिर्गी की तीव्रता के अनुसार देने से मिर्गी दूर हो जाती है। 59. फेवस और फंगस के रूप में : धतूरे के पत्तों से बने तेल का लेप करने से ऐसे चमड़ी के रोगों में बहुत लाभकारी होता है। 60. फीलपांव (गजचर्म) : फीलपांव के रोगी को धतूरे की जड़, एरण्डी की जड़, सम्भालू की जड़, सांठी की जड़, सहजना की जड़ तथा सरसों सबको बारीक पीसकर लेप करने से फीलपांव रोग दूर हो जाता है। 61. साइटिका : धतूरे के पत्तों का काढ़ा बनाकर पैरों की सिंकाई करने तथा पत्तों से बने तेल की मालिश करने से रोगी का रोग दूर हो जाता है। 62. लिंग दोष : 5-5 ग्राम धतूरे के बीज और अकरकरा, 3 ग्राम अफीम और 20 ग्राम काली मिर्च को पीसकर छानकर उसमें 40 ग्राम चीनी मिलाकर पानी डालकर उसकी मटर के बराबर गोलियां बनाकर रखें। 1 गोली सुबह-शाम पानी से लेने से लिंग की इिन्द्रयों के दोष दूर होते हैं। 63. सिर का दर्द : 3-4 बीज धतूरे के बिना चबाये निगलने से पुराने से पुराना सिर का दर्द ठीक हो जाता है। 64. नाड़ी का दर्द : नाड़ी के दर्द में धतूरे के पत्तों का लेप बनाकर या पत्तों का काढ़ा बनाकर सिंकाई करने से या पत्तों से बने तेल की मालिश करने से लाभ होता है। 65. बच्चों के आंखों में दर्द : जिस दिन आंखों में दर्द हो, उसी दिन धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर और थोड़ा गर्म करके कान में डालें। अगर बांई आंख में दर्द हो तो दाहिने कान में डाले और अगर दाहिनी आंख में दर्द हो तो बायें कान में डालें।

Chhuaara or khajur health benefits

 

Chhuaara 






परिचय छुहारा का लैटिन नाम फीनिक्स डेक्टाइलीफेरा है। यह प्रसिद्ध मेवाओं में से एक है। छुहारे एक बार में चार से अधिक नहीं खाने चाहिए, वरना इससे गर्मी होती हैं। दूध में भिगोकर छुहारा खाने से इसके पौष्टिक गुण बढ़ जाते हैं। रंग : छुहारा स्याही लिए हुए लाल रंग का होता है। स्वाद : यह मीठा होता है। स्वरूप : इसका पेड़ खजूर के पेड़ के समान होता है। स्वभाव : छुहारे शीतल, रूखे और गर्म प्रकृति के होते हैं। हानिकारक : इसका अधिक मात्रा में सेवन मलस्तंभकारक होता है। दोषों को दूर करने वाला : दूध छुहारा के दोषों को दूर करता है। तुलना : इसकी तुलना बादाम और मुनक्का से की जा सकती है। गुण : छुहारा रुचिकारक, हृदय के लिए लाभकारी, तृप्तकारी, पुष्टकारक, वीर्य-बलवर्द्धक, क्षय (टी.बी.), रक्तपित्त, वातज्वर, अभिघात वमन, वात और कफरोगों को दूर करता है। यह खून को शुद्ध करता है तथा शरीर को मोटा करता है। छुहारे का अचार : अचार तो बहुत सी चीजों का बनता है, परन्तु छुहारे का अचार काफी गुणकारी अचार होता है। बनाने की विधि : लगभग 1 किलो छुहारे लेकर पहले नींबू के रस में इन्हें 5 दिन तक भिगोकर रखें। बाद में जब छुहारे फूल जाए तो अन्दर के बीजों को निकालकर निम्न मिश्रण को भरते हैं। कालीमिर्च, पीपल, तज तीनों की 100 ग्राम मात्रा, सोंठ, जीरा, शाहजीरा तीनों की 50 ग्राम मात्रा कालानमक 300 ग्राम, चीनी 2 किलो सभी को कूट-पीसकर मिश्रण को तैयार कर लेते हैं। छुहारे के उक्त मिश्रण को भरकर एक बर्नी में डाल देते हैं तथा ऊपर से नींबू का रस निचोड़ देते हैं। इस बर्तन को 4-5 दिन धूप में खुला रख देते हैं। बस अचार तैयार है। इस अचार को भोजन के समय या बाद में खा सकते हैं। यह अचार पाचक व रुचिवर्द्धक होता है तथा अपचन को दूर करता है। विभिन्न रोगों में उपयोग : 1. शीघ्रपतन: 2 छुहारे रोजाना खाने से शीघ्रपतन के रोग में लाभ मिलता है और जिन लोगों का वीर्य पतला निकलता है वह गाढ़ा हो जाता है। 2. बिस्तर में पेशाब होना: यदि बच्चे बिस्तर में पेशाब करते हो तो रोजाना रात को सोते समय 2 छुहारे खिलाने से लाभ होता है। 250 मिलीलीटर दूध में 1 छुहारा डालकर उबाल लें। जब दूध अच्छी तरह से उबल जाये और उसके अन्दर का छुआरा फूल जाये तो इस दूध को ठण्डा करके छुआरे को चबाकर खिलाने के बाद ऊपर से बच्चे को दूध पिला दें। ऐसा रोजाना करने से कुछ दिनों में ही बच्चों का बिस्तर पर पेशाब करना बंद हो जाता है। 3. बुजुर्गों का बार-बार पेशाब आना: बूढे़ आदमी बार-बार पेशाब जाते हो तो उन्हें रोजाना 2 छुहारे खिलाना चाहिए तथा रात को 2 छुहारे खिलाकर दूध पिलाना चाहिए। 4. स्वर भंग (आवाज साफ करना): सोते समय 1 छुहारा दूध में उबालकर खा लेते हैं और दूध को पी लेते हैं इसके सेवन के 2 घंटे बाद पानी न पिये। ऐसा करने से आवाज साफ हो जाएगी। 5. कब्ज: सुबह-शाम 3 छुहारे खाकर गर्म पानी पियें। छुहारे सख्त होने से खाना सम्भव न हो तो दूध में उबालकर ले सकते हैं। छुहारे रोजाना खाते रहने से बवासीर, स्नायुविक दुर्बलता, तथा रक्तसंचरण ठीक होता है। सुबह के समय 2 छुहारे पानी में भिगोकर रात को इन्हें चबा-चबाकर खाएं। भोजन कम मात्रा में करें या रात को 2 छुहारे उबालकर भी ले सकते हैं। इससे कब्ज दूर हो जाती है। 6. मोटापा: छुहारा शरीर में खून को बनाता है। शरीर को बलवान व मोटा बनाता है। दूध में 2 छुहारे उबालकर खाने से मांस, बल और वीर्य बढ़ता है। बच्चे के लिए छुहारा दूध में भिगो देते हैं। जब दूध में रखा छुहारा फूल जाता है तो इसे छानकर, पीसकर बच्चों को पिलाना चाहिए। पथरी, लकवा, पीठदर्द: पथरी, लकवा, पीठदर्द में छुहारा सेवन करना लाभदायक होता है। यह मासिक-धर्म को शुरू करता है। छुहारा अवरोधक अर्थात बाहर निकालने वाली चीजों को रोकता है। जैसे दस्त, आंसू, लार, वीर्य और पसीना आदि सभी को रोकता है। छुहारे में कैल्शियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। कैल्शियम की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग जैसे हडि्डयों की कमजोरी, दांतों का गलना आदि छुहारा खाने से ठीक हो जाते हैं। 7. नपुंसकता: छुहारे को दूध में देर तक उबालकर खाने से और दूध पीने से नपुंसकता खत्म हो जाती है। बराबर मात्रा में मिश्री मिले दूध में छुहारों को उबालकर गुठली हटाकर खाने से नपुंसकता दूर हो जाती है और इससे वीर्य, बल, बुद्धि भी बढ़ती है। रात को पानी में 2 छुहारे और 5 ग्राम किशमिश भिगो दें। सुबह को पानी से निकालकर दोनों मेवे दूध के साथ खाने से नपुंसकता दूर हो जाती है। 8. दमा या श्वास का रोग: रोजाना 2 से 4 छुहारा मिश्री मिले हुए दूध में उबालकर गुठली हटाकर छुहारा खाने के बाद वहीं दूध पीने से बहुत लाभ होता है। इससे शरीर में ताकत आती है तथा बलगम निकल जाता है जिससे श्वास रोग (दमा) में राहत मिलती है। छुहारा गर्म होता है। यह फेफड़ों और सीने को बल देता है। कफ व सदी में इसका सेवन लाभकारी होता है। पान में छुहारा और सोंठ रखकर कुछ दिनों तक चूसने से श्वास रोग (दमा) दूर हो जाता है। 9. अंजनहारी, गुहेरी: छुहारे के बीज को पानी के साथ पीसकर गुहेरी पर दिन में 2 से 3 बार लेप करने से अंजनहारी में बहुत लाभ होता है। 10. गैस: एक छुहारा बिना गुठली का और 30 ग्राम जयपाल खोपरा, 2 ग्राम सेंधानमक को पीसकर और छानकर 3 खुराक बना लें। 3 दिन तक इस खुराक को 1-1 करके गर्म पानी के साथ सुबह लेने से गैस के रोग समाप्त हो जाते हैं। 11. मसूढ़ों से खून आना: 2 से 4 छुहारों को गाय के दूध में उबाल लें। उबल जाने पर छुहारे निकालकर खायें तथा बचे हुए दूध में मिश्री मिलाकर पीयें। रोजाना सुबह-शाम इसका सेवन करने से मसूढ़ों से खून व पीव का निकलना बंद हो जाता है। 12. दस्त: छुहारे के पेड़ से प्राप्त गोंद को 3 ग्राम से लेकर 6 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम चाटने से अतिसार (दस्त) में आराम मिलता है। 13. हकलाना, तुतलाना: रोजाना रात को सोते समय छुहारों को दूध में उबालकर पीयें। इसको पीने के 2 घण्टे बाद तक पानी न पीयें। इसके रोजाना प्रयोग से तीखी, भोंड़ी, आवाज साफ हो जाती है। 14. कमरदर्द: छुहारे से गुठली निकालकर उसमें गुग्गुल भर दें। इसके बाद छुहारे को तवे पर सेंककर दूध के साथ सेवन करें। सुबह-शाम 1-1 छुहारा खाने से कमर दर्द मिट जाता है। सुबह-शाम 2 छुहारों को खाने से कमर दर्द में लाभ होता है। बिना बीज वाले छुहारे को पीसकर इसके साथ पिस्ता, बादाम, चिरौंजी और मिश्री मिलाकर, इसमें शुद्ध घी मिलाकर रख दें। 1 सप्ताह बाद इसे 20-20 ग्राम तक की मात्रा में सेवन करने से कमजोरी दूर हो जाती है। 2-3 छुहारों को स्टील या चीनी मिट्टी के बर्तन में रात-भर पानी में भिगोए रखने के बाद सुबह गुठली अलग कर दें और छुहारे को दूध में पकाकर सेवन करें। इससे कमजोरी मिट जाती है। 250 ग्राम गुठलीरहित छुहारे, 250 ग्राम भुने चने, 250 ग्राम गेहूं का आटा, 60-60 ग्राम चिलगोजा, बादाम की गिरी, 500 ग्राम गाय का घी, 500 ग्राम शक्कर और 2 लीटर गाय का दूध। दूध में छुहारों को कोमल होने तक उबालें, फिर निकालकर बारीक पीस लें और फिर उसी दूध में हल्की आग पर खोवा बनने तक तक पकाएं। अब घी को आग पर गर्म करके गेहूं का आटा डालकर गुलाबी होने तक धीमी आग में सेंक लें, इसके बाद उसमें चने का चूर्ण और खोवा डालकर फिर धीमी आग पर गुलाबी होने तक भूने। जब सुगंध आने लगे तो इसमें शक्कर डालकर खूब अच्छी तरह मिलाएं। हलवा तैयार हो गया। इसमें और सारी चीजों को डालकर रखें। इसे 50-60 मिलीलीटर की मात्रा में गाय के गर्म दूध के साथ रोजाना 1 बार सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है। 15. पक्षाघात-लकवा-फालिस फेसियल परालिसिस: दूध में भिगोकर छुहारा खाने से लकवे के रोग में लाभ प्राप्त होता है। एक बार में 4 से अधिक छुहारे नहीं खाने चाहिए। 16. अग्निमान्द्यता (अपच): छुहारे की गुठली और ऊंटकटोरे की जड़ की छाल का चूर्ण खाने से अग्निमान्द्यता (भूख का न लगना) में आराम मिलता है। 17. मधुमेह के रोग: गुठली निकालकर छुहारे के टुकड़े दिन में 8-10 बार चूसें। कम से कम 6 महीने तक इसका सेवन करने से मधुमेह में लाभ होता है। 18. सोते समय पेशाब निकलना: एक छुहारे के 4 हिस्से करके उसको दो बार सुबह और शाम रोगी को देने से सोते समय पेशाब का निकलना बंद हो जाता है। 19. रक्तपित्त: 2-4 छुहारों को दूध में डालकर ऊपर से मिश्री मिलाकर दूध को उबाल दें गुठली हटाकर खाने से और दूध को पी लेने से रक्तपित्त में लाभ होता है। 20. वीर्य की कमी में: छुहारा बराबर रूप से दूध में उबालकर खाने से वीर्य बढ़ता है। 21. बुद्धिवैकल्प, बुद्धि का विकास कम होना: 2 छुहारों और मिश्री को दूध में डालकर उबालें और गर्म हो जाने पर उसकी गुठली को निकालकर छुहारे को हल्के गर्म दूध के साथ लेने से बुद्धि का विकास होता है। 22. उपदंश: छुहारे को जलाकर राख बनाकर मक्खन के साथ मिलाकर घाव पर लगाने से बहुत लाभ मिलता है। 23. पेशाब का बार-बार आना: 2 छुहारे 300 मिलीलीटर दूध में उबालकर, छुहारे खाकर दूध पीने से बार-बार पेशाब आने की तकलीफ दूर हो जाती है। 24. दिल की कमजोरी: दूध में 2 छुहारे उबालकर, छुहारे खाकर दूध पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ने से दिल की कमजोरी दूर हो जाती है। 25. सिर चकराना: 2 या 3 छुहारे रोजाना दूध में उबालकर खाने और दूध पीने से वीर्य की कमी से होने वाला सिर का चकराना ठीक हो जाता है। 26. त्वचा के रोग: छुहारा खाने से खून साफ हो जाता है और त्वचा के रोग दूर हो जाते हैं। 27. निम्नरक्तचाप: 2 छुहारे रात को 300 मिलीलीटर दूध में उबालकर खाने और दूध पीने से निम्न रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर) सामान्य हो जाता है। 28. सिर का दर्द: सिर दर्द होने पर छुहारे की गुठली को पानी में घिसकर माथे पर लेप की तरह लगाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है। 29. बच्चों के विभिन्न रोगों में लाभकारी: अगर बालक को दस्त कराना हो तो रात को छुहारों को पानी में भिगो दें। सबेरे छुहारों को पानी में मसलकर निचोड़ लें और छुहारे को फेंक दें। उसके बाद वही पानी बच्चे को पिलायें। इससे दस्त साफ होगा। अथवा थोड़े से गुलाब के फूल और चीनी खिलाकर ऊपर से पानी पिला दें। इससे भी दस्त साफ होगा। अगर बच्चा कमजोर हो तो उसे उम्र के अनुसार 6 ग्राम से 30 ग्राम तक छुहारे लेकर पानी में धोकर साफ कर लें और गुठली निकालकर दूध में भिगो दें। थोड़ी देर बाद छुहारों को निकालकर सिल पर पीस लें और कपड़े में रस निचोड़ लें। इस तरह दिन में तीन बार हर बार ताजा रस निकालकर बच्चे को पिलायें। बच्चे के शरीर में खूब ताकत आ जायेगी। 1 महीने से कम उम्र के बच्चे को यह रस नहीं पिलाना चाहिए। 30. शरीर को ताकतवर व शक्तिशाली बनाना: लगभग 10 ग्राम छुहारे लेकर पीस लें। रोजाना कम से कम 2 ग्राम की मात्रा में इस छुहारे के चूर्ण को 250 मिलीलीटर हल्के गर्म दूध के साथ सोते समय लेने से शरीर मजबूत होता है। इसका सेवन केवल सर्दियों के दिनों में ही करना चाहिए। छुहारा शरीर को मजबूत व शक्तिशाली बनाता है। दूध को गर्म करते समय यदि उसमें छुहारा या खजूर डाल दिया जाए और फिर उस दूध को पियें तो वह शरीर को बहुत ही शक्तिशाली बनाता है। छुहारों को दूध में उबालकर खाने से खून बनता है और शरीर में ताकत बढ़ती है। 4 या 5 छुहारों की गुठलियों को निकालकर इसमें लगभग 260 मिलीग्राम गुग्गुल भर दें और इन छुहारों को दूध में पकायें। सुबह और शाम को रोजाना 1 छुहारा दूध के साथ खाने से वातरोग दूर हो जाते हैं और शरीर शक्तिशाली बनता है। लगभग 500 मिलीलीटर की मात्रा में दूध लेकर उसमें 2 छुहारे डाल दें। अब दूध के आधा रह जाने तक गर्म करें, फिर इस दूध में 2 चम्मच मिश्री या चीनी लेकर मिलाकर पीयें और छुहारे को खा जायें। इसको खाने से शरीर में मांस बढ़ता है, शरीर की ताकत बढ़ती है और मनुष्य का वीर्य बल भी बढ़ता है। छुहारा खून बढ़ाता है। इसका प्रयोग केवल सर्दी के दिनों में ही करना चाहिए। इसका सेवन करने के 2 घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। एक बार में चार से ज्यादा छुहारों का सेवन नहीं करना चाहिए। किसी मिट्टी या कांच के बर्तन में पानी लेकर इसमें 2 छुहारे शाम को भिगोकर रख दें। सुबह उठकर इन छुहारों की गुठली को निकालकर इन्हें लगभग 500 मिलीलीटर दूध में गर्म करें और 250 मिलीलीटर दूध रह जाने तक गर्म करें। अब बचे हुए दूध को पीने से शरीर की कमजोरी खत्म हो जाती है और शरीर को भरपूर मात्रा में ताकत मिलती है। 31. गले के रोग: छुहारा खाने से कंठ (गला) सूखना दूर हो जाता है। भोजन करने के बाद रात को सोते समय दूध में उबाले हुए छुहारों को खाने से आवाज साफ हो जाती है। इसको खाने के बाद डेढ़ से 2 घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। गला सूखने पर छुहारे की गुठली मुंह में रखकर चूसना चाहिए।

Benefits of bel , bilva patra

 

Bel








परिचय : बेल का पेड़ बहुत प्राचीन है। इस पेड़ में पुराने पीले लगे हुए फल दुबारा हरे हो जाते हैं तथा इसको तोड़कर सुरक्षित रखे हुए पत्तों को 6 महीने तक ज्यों के त्यों बने रहते हैं और गुणहीन नहीं होते। इस पेड़ की छाया शीतल और आरोग्य कारक होती हैं। इसलिए इसे पवित्र माना जाता है। विभिन्न भाषाओं में नाम : हिंदी बेल, विली, श्रीफल संस्कृत बिल्य, श्रीफल, पूतिवात, शैलपत्र, लक्ष्मीपुत्र, शिवेष्ट गुजराती बेल, बीली मराठी बेल बंगाली बेल तैलगु बिल्वयु, मोरेडु अरबी सफरजले उर्दू बेल तमिल बिलूबम वैज्ञानिक नाम (ऐगल मारमेलॉस (1) कोरिया कुलनाम रूटेसी अंग्रेजी बेल फ्रूट बेल स्वरूप : बेल का पेड़ 25-30 फुट ऊंचा, 3-4 फुट मोटा, पत्ते जुड़े हुए, त्रिफाक और गन्धयुक्त होता है। फल 2-4 इंच व्यास का गोलाकार धूसर और पीले रंग का होता है। इसके बीज छोटे कड़े तथा अनेक होते हैं। स्वभाव : बेल की तासीर गर्म होती हैं। बेल के अंदर टैनिक एसिड़, एक उड़नशील तेल, एक कड़वा तत्व और एक चिकना लुआबदार पदार्थ पाया जाता हैं। बेल की जड़, तत्त्वों और छाल में चीनी को कम करने वाले तत्व और टैनिन पाये जाते हैं। बेल के फल के गूदे में मांरशेलीनिस तथा बीजों में पीले रंग का तेल होता है जोकि बहुत ही उत्तम विरेचन (पेट साफ करने वाला) का कार्य करता है। गुण-धर्म : बेल कफ वात को शांत करने वाला, रुचिकारक, दीपन (उत्तेजक), पाचन, दिल, रक्त (खून को गाढ़ा करना), बलगम को समाप्त करने वाला, मूत्र (पेशाब) और शर्करा को कम करने वाला, कटुपौष्टिक तथा अतिसार (दस्त), रक्त अतिसार (खूनी दस्त), प्रवाहिका (पेचिश), मधुमेह (डायबिटीज), श्वेतप्रदर, अतिरज:स्राव (मासिक-धर्म में खून अधिक आना), रक्तार्श (खूनी बवासीर) को नष्ट करता है। बेल का फल-लघु (छोटा), तीखा, कषैला, उत्तेजक, पाचन, स्निग्ध (चिकना), गर्म तथा शूल (दर्द), आमवात (गठिया), संग्रहणी (पेचिश), कफातिसार, वात, कफनाशक होता है तथा यह आंतों को ताकत देती है। अर्धपक्व फल (आधा पका फल)- यह लघु (छोटा), कडुवा, कषैला, गर्म (उष्ण), स्निग्ध (चिकना), संकोचक, पाचन, हृदय और कफवात को नष्ट करता है। बेल की मज्जा और बीज के तेल अधिक गर्म और तेज वात को समाप्त करते हैं। बेल के पके फल भारी, कड़ुवा, तीखा रस युक्त मधुर (मीठा) होता है। यह गर्म दाहकारक (जलन पैदा करने वाला), मृदुरेचक (पेट साफ करने वाला) वातनुलोमक, वायु को उत्पन्न करने वाला और हृदय को ताकत देता है। पत्र (पत्ता) : बेल का पत्ता संकोचक, पाचक, त्रिदोष (वात, पित और कफ) विकार को नष्ट करने वाला, कफ नि:सारक, व्रणशोथहर (घाव की सूजन को दूर करने वाला), शोथ (सूजन) को कम करने वाला, स्थावर (विष) तथा मधुमेह (डायबिटीज), जलोदर (पेट में पानी का भरना), कामला (पीलिया), ज्वर (बुखार) आंखों से तिरछा दिखाई देना आदि में लाभ पहुंचाता है। जड़ और छाल : जड़ और छाल लघु, मीठा, वमन (उल्टी), शूल (दर्द), त्रिदोष (वात, पित्त और कफ), नाड़ी तंतुओं के लिये शामक, कुछ नशा पैदा करने वाली, बुखार, अग्निमांघ (भूख को बढ़ाने वाला), अतिसार (दस्त) ग्रहणी (पेचिश), , मूत्रकृच्छ् (पेशाब करने में कष्ट होना), हृदय की कमजोरी आदि में प्रयोग होता है। विभिन्न रोगों में सहायक : 1. सिर में दर्द : बेल की सूखी हुई जड़ को थोडे़ से पानी के साथ पीसकर माथे पर गाढ़ा लेप करने से सिर दर्द में लाभ मिलता है। लगभग 6 ग्राम बेल को पानी में या बकरी के दूध में घोंटकर 10 दिन तक पीने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है। बेल के रस में एक कपड़े को अच्छी तरह से भिगोकर उसकी पट्टी सिर पर रखने से भी सिर दर्द ठीक हो जाता है। 2. बालों या सिर में जूं : बेल के पके हुए फल के आधे कटोरी जैसे छिलके को साफकर उसमें तिल का तेल और कपूर मिलाकर दूसरे भाग से ढककर रखने से तेल को सिर में लगाने से सिर में जूं नहीं रहती हैं। 3. आंखों का मोतियाबिंद : बेल के पत्तों पर घी लगाकर तथा सेंककर आंखों पर बांधने से, पत्तों का रस आंखों में टपकाने से, साथ ही पत्तों को पीसकर मिश्रण बनाकर उसका लेप पलकों पर करने से आंखों के कई रोग मिट जाते हैं। 4. रतौंधी : 10 ग्राम ताजे बेल के पत्तों को 7 कालीमिर्च के साथ पीसकर, 100 मिलीलीटर पानी में छानकर उसमें 25 ग्राम मिश्री या चीनी मिलाकर सुबह और शाम पीयें तथा रात में बेल के पत्तों को भिगोये हुए पानी से सुबह आंखों को धोयें। इससे रतौंधी के रोग में लाभ मिलता है। 10 ग्राम बेल के पत्ते, 6 ग्राम गाय का घी और 1 ग्राम कपूर को तांबे की कटोरी में इतना रगड़ें की काला सुरमा बन जाये। इस सुरमे को आंखों में लगाने से लाभ होता है और सुबह गाय के पेशाब से आंख को धोने से भी आराम मिलता है। 5. बहरापन : बेल के कोमल पत्तों को अच्छी गाय के पेशाब में पीसकर तथा 4 गुना तिल का तेल तथा 16 गुना बकरी का दूध मिलाकर धीमी आग द्वारा तेल को गर्म करके रख लें। इस तेल को रोजाना कानों में डालने से बहरापन, सनसनाहट (कान की आवाज), कानों की खुश्की और कानों की खुजली के रोगों में आराम मिलता है। बेल के पत्तों का तेल, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, कूट, पीपलामूल, बेल की जड़ का रस और गाय का पेशाब को बराबर मात्रा में लेकर हल्की आग पर पकाने के लिये रख दें। फिर इसे छानकर किसी शीशी में भर लें। इस तेल को `बधिरता हर तेल´ कहते है। इस तेल को कान में डालने से कान के सभी रोग दूर हो जाते हैं। बेल के पत्तों को गाय के पेशाब के साथ पीसकर बकरी के दूध मिले हुए तेल में पकाकर बने तेल को कान में बूंद-बूंद करके डालने से बहरेपन के रोग में लाभ होता है। बेल के पके हुए बीजों का तेल निकालकर बूंद-बूंद करके कान में डालने से बहरापन समाप्त हो जाता है। 6. क्षय (टी.बी) : 4-4 भाग बेल की जड़, अडूसा तथा नागफनी थूहर के के सूखे हुए फल और 1-1 भाग सोंठ, कालीमिर्च व पिप्पली लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 20 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो पानी में पकाकर चौथाई हिस्सा बचने पर सुबह और शाम शहद के साथ रोगी को सेवन कराने से क्षय (टी.बी), श्वास (दमा), वमन (उल्टी) आदि रोगों में जल्दी लाभ मिलता है। 7. दिल का दर्द : 1 ग्राम बेल के पत्तों के रस में 5 ग्राम गाय का घी मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से दिल के दर्द में जल्दी आराम मिलता है। 8. पेट का दर्द : 10 ग्राम बेल के पत्तों को कालीमिर्च के साथ पीसकर उसमें 10 ग्राम मिश्री को मिलाकर शर्बत बनाकर दिन में तीन बार सेवन करने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। बेल की जड़, एरण्ड की जड़, चित्रक की जड़ और सोंठ को एक साथ पीसकर अष्टमांश काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी सी भुनी हुई हींग तथा 1 ग्राम सेंधानमक छिड़ककर, 20-25 ग्राम की मात्रा में रोगी को पिलाने से वात (गैस) तथा कफजन्य के कारण हुआ पेट का दर्द दूर हो जाता है। 9. जलन (दाह), तृष्णा (प्यास), अजीर्ण (भूख का कम होना), अम्लपित्त्त (डायबिटीज) होने पर : 20 ग्राम बेल के पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में तीन घंटे तक भिगोकर रख लें। इस पानी को रोजाना 2-2 घंटे के बाद 20-20 ग्राम की मात्रा में रोगी को पिलाने से आन्तरिक जलन शांत होती है। छाती में जलन हो तो 20 ग्राम बेल के पत्तों को पानी के साथ पीसकर और छानकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर दिन में 3-4 बार रोगी को पिलाने से जलन में लाभ होता है। 10 ग्राम बेल के पत्तों के रस में 1-1 ग्राम कालीमिर्च और सेंधानमक मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने पेट की जलन में लाभ होता है। 10. भूख का कम लगना : 2-2 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण, छोटी पिप्पली, बंशलोचन व मिश्री को मिलाकर इसमें 10 ग्राम तक अदरक का रस मिलाकर तथा थोड़े से पानी में मिलाकर हल्की आग पर पकायें। पकने पर गाढ़ा हो जाने पर दिन में 4 बार चाटने से भूख का कम लगने का रोग दूर हो जाता है। 100 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण और 20 ग्राम अदरक को पीसकर इसमें 50 ग्राम चीनी और 20 ग्राम इलायची के चूर्ण को मिलाकर रख लें। खाना खाने के बाद यह आधा चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी से सुबह और शाम लेने से भोजन पचाने की क्रिया ठीक होती है और भूख भी खुलकर लगती है। बेल की गिरी का पका हुआ फल खाने से मंदाग्नि (भूख कम लगना) और ज्वर (बुखार) में लाभ मिलता हैं। 11. संग्रहणी (दस्त, पेचिश) : 10 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण, 6-6 ग्राम सौंठ का चूर्ण और पुराने गुड़ को पीसकर दिन में 3-4 बार छाछ के साथ 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से पेचिश के रोग में लाभ मिलता है। खाने में केवल छाछ का ही प्रयोग करें। 10 से 20 ग्राम बेल की गिरी और कुड़ाछाल का चूर्ण बनाकर रात के समय 150 मिलीलीटर पानी में भिगोकर, सुबह पानी में पीसकर छानकर रोगी को पिलाने से पेचिश का रोग ठीक हो जाता है। 10 से 20 ग्राम कच्ची बेल को आग में सेंककर उसके गूदे में थोड़ी चीनी और शहद मिलाकर पिलाने से पेचिश के रोग में आराम आता है। कच्चे बेल का गूदा तथा सोंठ के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर मिला लें। इस चूर्ण में दुगुना पुराना गुड़ डालकर लुगदी बना लें। इसके सेवन करने के बाद ऊपर से मट्ठा (लस्सी) पी लें। इससे संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है। बेलगिरी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सुगंधबाला तथा मोचरस इन सभी को बकरी के दूध में डालकर पका लें। इसको छानकर पीने से संग्रहणी (दस्त) मिट जाता है। पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है। इसके सेवन से बहुत जल्द ही संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है। बेल (बेलपत्थर) का शर्बत बनाकर सेवन करने से संग्रहणी (दस्त) रोग ठीक हो जाता है। बेलगिरी, गोचरस, नेत्रबाला, नागरमोथा, इन्द्रयव, कूट की छाल सभी को लेकर पीसकर कपड़े में छान लें। इसको खाने से संग्रहणी (दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है। 12. प्रवाहिका (पेचिश, संग्रहणी) : कच्ची बेल का गूदा, गुड़, तिल, तेल, पिप्पली, सौंठ आदि को बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्रण तैयार करें। प्रवाहिका में जब पेट में गैस का दर्द हो और बार-बार मलत्याग की इच्छा हो और मल पूरा न होकर थोड़ा-थोड़ा आंव सहित आये तब 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम इस मिश्रण का प्रयोग करें। इससे लाभ होता है। बेल की गिरी और तिल को बराबर मात्रा में लेकर मिश्रण बनाकर, दही की मलाई या घी के साथ सेवन करने से प्रवाहिका रोग में लाभ होता है। 3 ग्राम कच्चे फल की मज्जा का चूर्ण तथा 2 ग्राम तिल को दिन में 2 बार पानी के साथ लेने से प्रवाहिका रोग में लाभ मिलता है। 13. बाल रोग : 5 से 10 मिलीलीटर कच्चे फलों की मज्जा तथा आंवले की गुठली के काढ़े को दिन में 3 बार सेवन करने से बालरोगों में लाभ मिलता है। 14. आमातिसार : बेल के कच्चे और साबूत के फल को गर्म राख में भूनकर, उसको छिलके सहित पीसकर इसके रस को निकालकर इसमें मिश्री मिलाकर दिन में एक या दो बार लगातार 10-15 दिन तक सेवन सेवन करने से पुराना अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है। बेल की गिरी, कत्था, आम की गुठली की मींगी, ईसबगोल की भूसी और बादाम की मींगी को बराबर मात्रा में मिलाकर चीनी या मिश्री के साथ रोजाना 3-4 चम्मच सेवन करने से पुराने दस्त, आमातिसार तथा प्रवाहिका के रोग में लाभ मिलता है। बेल की गिरी और आम की गुठली की मींगी को बराबर मात्रा में पीसकर 2 से 4 ग्राम तक चावल के पानी के साथ या ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है। बेल (बेलपत्थर) का शर्बत रोजाना सुबह-शाम पीने से आमातिसार के रोग में लाभ मिलता है। बेल पत्थर के शर्बत में चीनी मिलाकर भी पीने से भी यह रोग दूर होता है। आमातिसार (आंवदस्त) के रोगी को बेल पत्थर के रस में, दही की मलाई, तिल का तेल और घी मिलाकर रोजाना सेवन कराने से जल्द आराम मिलता है। 15. खूनी दस्त : 50 ग्राम बेल की गिरी के गूदे को 20 ग्राम गुड़ के साथ दिन में 3 बार खाने से खूनी अतिसार (दस्त) कम होता जाता है। चावल के 20 ग्राम पानी में 2 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण और 1 ग्राम मुलेठी के चूर्ण को पीसकर उसमें 3-3 ग्राम तिल, चीनी, और शहद को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन कराने से पित्त रक्तातिसार मिट जाता है। 1-1 भाग बेल की गिरी और धनियां, 2 भाग मिश्री को एक साथ पीसकर चूर्ण बनाकर 2 से 6 ग्राम तक ताजे पानी से सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है। कच्चे बेल को कंड़े की आग में भूनें, जब छिलका बिल्कुल काला हो जाये तब भीतर का गूदा निकालकर 10-20 ग्राम तक दिन में 3 बार मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से खूनी अतिसार ठीक हो जाता है। बेल के कच्चे फल को भूनकर या कच्चे फल को सुखाकर रोजाना सेवन करने से धीरे-धीरे खून कम होकर रक्तातिसार (खूनी दस्त) दूर हो जाता है। बेल के गूदे को गुड़ को मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है। बेलगिरी में गुड़ मिलाकर गोली बनाकर खाने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) बंद हो जाते हैं। 16. अतिसार (दस्त) : बेल के कच्चे फल को आग में सेंक लें, इसके 10-20 ग्राम गूदे को मिश्री के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करने से अतिसार और आमातिसार कम होता है। 50 ग्राम सूखी बेल की गिरी और 20 ग्राम श्वेत कत्था के बारीक चूर्ण में 100 ग्राम मिश्री को मिलाकर लगभग डेढ़ ग्राम की मात्रा में दिन में 3-4 बार सेवन करने से सभी प्रकार के अतिसारों में लाभ मिलता है। 200 ग्राम बेल की गिरी को 4 लीटर पानी में पका लें। पकने पर जब एक लीटर के लगभग पानी बाकी रह जाए तब इस पानी को छान लें। फिर इसमें लगभग 100 ग्राम मिश्री मिलाकर बोतल में भरकर रख लें। इसको 10 से 20 ग्राम की मात्रा में 500 मिलीग्राम भुनी हुई सोंठ, अत्यधिक तेज अतिसार हो तो मूंग बराबर अफीम मिलाकर सेवन करने से 2-3 बार में लाभ होता है। 10 ग्राम बेल की गिरी के पाउडर को चावल के पानी के साथ पीसकर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर दिन में 2-3 बार देने से गर्भवती स्त्री का अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है। 5 ग्राम बेल की गिरी को सौंफ के रस में घिसकर दिन में 3-4 बार बच्चे को देने से बच्चे के हरे पीले दस्त ठीक हो जाते हैं। 1-1 ग्राम बेल की गिरी व पलाश का गोंद और 2 ग्राम मिश्री को मिलाकर थोड़े पानी के साथ पीसकर कम आग पर गाढ़ा करके चटाने से भी अतिसार में लाभ होता है। 17. पित्त अतिसार : बेल का मुरब्बा खिलाने से पित्त का अतिसार मिट जाता हैं। पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है। 18. तृषा (प्यास), वमन (उल्टी), दाह (जलन), कोष्ठबद्धता, मंदाग्नि (भूख का कम होना) : बेल के पके फल के गूदे को ठंडे पानी में मसलकर और छानकर, उसमें मिश्री, इलायची, लौंग, कालीमिर्च तथा कपूर मिलाकर शर्बत बनाकर पीने से प्यास, उल्टी, जलन, कब्ज, भूख का कम होना आदि रोगों में लाभ मिलता है। जिन व्यक्तियों को कब्ज की परेशानी हो वे इसे भोजन के साथ लें, इससे आराम मिलता है। 100 ग्राम बेल के गूदे को मसलकर और छानकर उसमें थोड़ी-सी चीनी मिलाकर या दही के साथ चीनी मिलाकर पीने से पेट की कब्ज तथा जलन दूर होती है। 19. वायुगोला (वातगुल्म): 10-20 ग्राम बेल की गिरी या कोमल फल के गूदे को गुड़ के साथ सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी अतिसार), आम शूल, स्निग्ध (चिकना), वातगुल्म तथा पेट के रोग समाप्त हो जाते हैं। 20. खूनी बवासीर : बेल की गिरी के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री को मिलाकर 4 ग्राम तक ठंडे पानी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर में लाभ मिलता है। रोगी को बवासीर के मस्सों में खास दर्द हो तो बेल की जड़ का काढ़ा बनाकर गुनगुने काढ़े में रोगी को बैठाने से जल्दी ही दर्द दूर हो जाता है। 2 ग्राम बेल के कच्चे फल की मज्जा का चूर्ण तथा 1 ग्राम सोंठ के चूर्ण को दिन में 3 बार सेवन करने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है। 21. प्रमेह (वीर्य विकार) : 14 से 28 मिलीलीटर बेल के पत्तों के रस को दिन में 3 बार शहद के साथ सेवन करने से वीर्य के रोग ठीक हो जाते हैं। 22. हैजा व उल्टी : 10-10 ग्राम आम की मींगी और बेल की गिरी को लेकर पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में पकायें। पकने पर 100 मिलीलीटर शेष रहने पर इसमें शहद और मिश्री को मिलाकर 5 से 20 मिलीलीटर तक इच्छानुसार रोगी को पिलाने से हैजा और उल्टी में आराम मिलता है। 1 से 4 ग्राम तक बेल की गिरी और गिलोय को पीसकर आधा लीटर पानी में पकायें। पकने पर 250 मिलीलीटर शेष रहने पर इसे छानकर थोड़ा-थोड़ा रोगी को पिलायें। यदि हैजा तेज हो तो इस काढ़े में जायफल, कपूर और छुहारा मिलाकर काढ़ा तैयार करें तथा बार-बार थोड़ा-थोड़ा सा रोगी को पिलाते रहें इससे हैजे और उल्टी में जल्द ही आराम आ जायेगा। 23. मधुमेह (डायबिटीज) : बेल के ताजे पत्तों को 10 से 20 ग्राम तक पीसकर उसमें 5-7 कालीमिर्च मिलाकर पानी के साथ सुबह खाली पेट सेवन करने से मधुमेह (डायबिटीज) के रोग में लाभ मिलता है। रोजाना सुबह 10 मिलीलीटर बेल के पत्तों के रस को सेवन करना मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी के लिये हितकारी होता है। 6-6 ग्राम बेल के पत्ते, हल्दी, गिलोय, हरड़, बहेड़ा और आंवला, को 250 मिलीलीटर पानी में रात को कांच या मिट्टी के बर्तन में भिगों दें। सुबह इसे खूब मसलकर और छानकर आधी मात्रा में सुबह-शाम 2-महीने तक रोगी को सेवन कराने से मधुमेह (डायबिटीज) के रोग में आराम आता है। 10 पत्ते बेल के, 10 पत्ते नीम के और 5 पत्ते तुलसी एक साथ पीसकर गोली बनाकर सुबह रोजाना पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह (डायबिटीज) के रोग में लाभ मिलता है। बेल के 10-11 ताजे पत्तों को पानी के साथ पीसकर पीने से कब्जयुक्त मधुमेह में आराम मिलता है। बेल के पत्तों को पीसकर किसी कपड़े में बांधकर रस निकाल लें, इस 10 मिलीलीटर रस को रोजाना पीने से मधुमेह रोग में शर्करा आना कम हो जाता है। बेल के पत्ते का रस पीने से मधुमेह मिट जाता है। ताजे बेल के 5 पत्ते और 10 कालीमिर्च को लेकर पीसकर छान लें, इसे शर्बत की तरह रोजाना सुबह पीने से मधुमेह का रोग मिट जाता है। बेल की जड़ को सुखाकर और पीसकर चूर्ण बना लें। 1 चम्मच चूर्ण में बेल की पत्तियों का आधा चम्मच रस मिलाकर सेवन करने से मधुमेह रोग से राहत मिलती है। 100 मिलीलीटर बेल के पत्ते का रस शहद के साथ सेवन करने से मधुमेह रोग मिट जाता है। 50-50 ग्राम की मात्रा में बेल की सूखी पत्तियां, घी, ग्वार, गुड़मार, जामुन की गुठली, करेले की पत्तियों को पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 ग्राम चूर्ण को रोजाना पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह रोग मिट जाता है। 24. पाण्डु (पीलिया) : 10 से 30 मिलीलीटर बेल के कोमल पत्तों के रस में आधा ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से पीलिया के रोग में लाभ मिलता है। पीलिया रोग की सूजन में बेल के पत्तों के रस को गर्मकर लेप दें या पत्तों का काढ़ा बफारा देने से आराम मिलता है। बेल के पत्तों के रस में कालीमिर्च का चूर्ण डालकर पीने से पाण्डु रोग (पीलिया) शांत हो जाता है। 25. पेट में पानी का भरना (जलोदर) : 25 से 50 मिलीलीटर ताजे बेल के पत्तों के रस में 1 से डेढ़ ग्राम छोटी पिप्पली का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से जलोदर (पेट में पानी का भरना) के रोग में लाभ होता है। 26. पेशाब का अधिक आना (बहूमूत्र) : 10 ग्राम बेल की गिरी, 5 ग्राम सोंठ को जौकूटकर 400 मिलीलीटर पानी में अष्टमांश काढ़े को शुद्धकर सुबह-शाम सेवन करते रहने से 5 दिन में लाभ मिलता है। 27. पेशाब करने में कष्ट होना (मूत्रकृच्छ) : बेल के ताजे फल के गूदे को पीसकर दूध के साथ छानकर उसमें शीतल चीनी का चूर्ण छिड़ककर पिलाने से पुराना मूत्रकृच्छ्र (पेशाब में जलन) कम हो जाता है। 6 ग्राम बेल के कोमल ताजे पत्ते, 3 ग्राम सफेद जीरा और 6 ग्राम मिश्री को एक साथ पीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करके ऊपर से पानी पीने से 6 दिन में ही पेशाब के सारे रोग दूर हो जाते हैं। 20-25 ग्राम बेल की जड़ को रात में पीसकर, 500 मिलीलीटर पानी में भिगोकर सुबह मसलकर और छानकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से मूत्रजलन (पेशाब में जलन) ठीक हो जाती है। 25-25 ग्राम बेल की जड़, अमलतास की जड़ को पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में पकायें। पकने पर 125 मिलीलीटर शेष रहने पर रोजाना सुबह सेवन करने से 3 में दिन में पूरा लाभ होता है। 28. कमजोरी : बेल की गिरी के चूर्ण को मिश्री मिले हुए दूध के साथ सेवन करने से खून की कमी, शारीरिक दुर्बलता तथा वीर्य की कमजोरी दूर होती है। धातु की कमजोरी में 3 ग्राम बेल के पत्तों के चूर्ण में थोड़ा शहद मिलाकर सुबह-शाम रोजाना चटाने से लाभ होता है। बेल के पत्तों के रस में या पत्तों की चाय में जीरा चूर्ण और दूध मिलाकर पीने से कमजोरी दूर होती है। मात्रा : 20 से 50 मिलीलीटर बेल के पत्तों का रस, 6 ग्राम जीरा का चूर्ण, मिश्री 20 ग्राम और दूध। बेल की गिरी, असगंध और मिश्री को बराबर मात्रा में चूर्ण कर उसमें चौथाई उत्तम केसर का चूर्ण मिलाकर, 4 ग्राम तक सुबह-शाम खाकर ऊपर से गर्म दूध पीने से कमजोरी के रोग में लाभ मिलता है। सुखाये हुए पके फलों के गूदे के बारीक चूर्ण को थोड़ी मात्रा में रोजाना सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी दूर होती है और आराम मिलता है। 29. दुर्गन्ध के लिए : शरीर की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए बेल के पत्तों के रस का लेप करना चाहिए। 30. कांटा लगने पर : बेल के पत्तों की पुल्टिश (पोटली) बांधने से, धंसे कांटे को जल्द ही गलाकर नष्ट करता है तथा कोई बीमारी नहीं होती है। 31. दर्द : यकृत (जिगर) के दर्द में बेल के 10 मिलीलीटर पत्तों के रस में 1 ग्राम सेंधानमक मिलाकर दिन में 3 बार पिलाने से लाभ मिलता है। 32. रक्त विकार से उत्पन्न फोड़े-फुंसी : खून की खराबी से उत्पन्न फोड़े-फुंसियों पर बेल के पेड़ की जड़ या लकड़ी को पानी में पीसकर लगाने से लाभ पहुंचता है। 33. आग से जलने पर : बेल के ताजे पत्तों के रस को जले भाग पर लगाने से आराम मिलता है। चेचक की बीमारी में जब शरीर में बहुत जलन हो और बेचैनी हो तो बेल के रस में मिश्री मिलाकर पिलाने से तथा बेल के पत्तों का पंखा बनाकर हवा करने से लाभ मिलता है। 34. व्रण (जख्म), गलगंड (घेघा), नारू (गंदे पानी के पीने से होने वाला रोग) पर : बेल के पत्तों को बिना पानी के पीसकर टिकिया बनाकर जख्मों पर बांधने से लाभ मिलता है। बेल के पत्तों को पीसकर, पोटली बनाकर फोड़ों पर बांधने से तुरंत लाभ मिलता है। कैंसर या कार्बन्कल नामक भंयकर जहरीले व्रणों (जख्मों) में बेल के पत्तों की पोटली, पत्तों के रस से या काढ़े से छानकर, तथा साथ ही रोजाना 25 मिलीलीटर तक बेल के पत्तों का रस दिन में तीन बार सेवन कराने से जख्मों में लाभ मिलता है। 35. बुखार : बेल का अष्टमांश काढ़ा बनाकर, उसमें शहद मिलाकर सुबह-शाम 20 मिलीलीटर मात्रा में पिलाने से बुखार कम हो जाता है। बेल के पत्तों के काढ़े का सेवन करने से बुखार और सूखी खांसी मिट जाती है। 5 मिलीलीटर बेल के पत्तों के रस को शहद में मिलाकर चटाने से बच्चों का बुखार समाप्त हो जाता है। बेल के पत्तों का रस 7 मिलीलीटर रोगी को देने से बुखार और ठंड के बुखार में आराम आता है। 36. ग्रहणी, अतिसार होने पर : बेल के 3 से 6 कच्चे फलों की मज्जा का चूर्ण मट्ठे के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से अतिसार में आराम मिलता है। 37. स्त्री रोग (सूतिका ज्वर) : बेल के कच्चे फलों के रस को पीने से स्त्री के सूतिका ज्वर में आराम आता है। 38. सन्तत ज्वर : पटोल के पत्ते, नागरमोथा, बड़ी-दन्ती, कुटकी और सारिवा को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से सन्तत ज्वर समाप्त होता है। 39. अन्येद्यु : बेल के पत्ते, नीम की छाल, अंगूर, अमलतास, त्रिफला और अडूसा को मिलाकर काढ़ा बना लें, इस काढ़े में मिश्री और शहद मिलाकर पीने से `एककिहृक ज्वर´ समाप्त हो जाता है। 40. विषम बुखार : बेल के पत्ते, हरड़, नागरमोथा, कुटकी, चिरायता, मुलहठी और गिलोय को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से सभी प्रकार के विषम बुखार मिटते हैं इसके साथ ही खांसी और अरुचि (भूख का न लगना) भी समाप्त हो जाता है। 41. नपुंसकता : 20 मिलीलीटर बेल के पत्ते का रस निकालकर उसमें 5 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर रोजाना 10 ग्राम मिश्री के चूर्ण के साथ खाने से उसके ऊपर से दूध पीने से नपुंसकता की कमजोरी दूर होती है। बेल के पत्ते का रस लेकर उसमें थोड़ा-सा शहद मिला लें। इसको शिश्न (लिंग) पर 40 दिन तक लेप करने से नपुंसकता का रोग दूर होता है। 42. वात-कफ ज्वर : बेल की गिरी, कुम्भेर, श्योनाक, अरणी (अरनी), पाढ़ल, खिरेंटी, कुलथी, पोहरमूल और रास्ना को लेकर पकाकर काढ़ा बना लें, इस काढ़े को पीने से वात ज्वर (बुखार), जोड़ों का दर्द और सिर के कम्पन में लाभ मिलता है। बेल, श्योनाक, कुंभेर, पाढ़र और अरणी को मिलाकर काढ़ा बनाकर सेवन करने से वात के बुखार दूर हो जाते हैं। 10 ग्राम बेल के पत्ते, 10 ग्राम सोंठ, 10 ग्राम इन्द्रजौ और 10 ग्राम पीपल को लेकर 50 मिलीलीटर पानी में पकायें जब पानी आधा बच जाये, तब इसमें चीनी या मिश्री को थोड़ी-सी मात्रा में डालकर सेवन करने से वात-कफ ज्वर मे आराम आता है। बेल, पाढ़ल, कुम्भेर सोनापाठा, अरणी, कटेरली, कटाई, गोखुरू, सरिवन, पिठवन, पीपल, पीपरामूल, रास्ना, मीठा कूठ, सोंठ, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, सुगंधबाला, खिरेंटी, मुनक्का, जवासा और शतावर आदि को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह पकाकर काढ़ा बनाकर पीने से वात के बुखार के साथ-साथ सभी रोग समाप्त हो जाते हैं। 43. शीतला (मसूरिका) का ज्वर : बेल के पत्ते, सारिया, नागरमोथा, पाढ़, कुटकी, खैर, नीम, खिरेंटी, आंवला तथा कटाई को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से वातज शीतला (माता) दूर हो जाती है। बेल की जड़ या पटोल के पत्ते का काढ़ा ईख की जड़ के रस के साथ पीने से पित्त की शीतला (माता) में लाभ होता है। बेल के पत्ते, गिलोय, नागरमोथा, अडूसा, धनिया, जवासा, चिरायता, नीम, कुटकी और पित्तपापड़ा को मिलाकर पीसकर काढ़ा बना लें। इस मिश्रण को पीने से बिना पकी शीतला (माता) नष्ट हो जाती है और पकी हुई शीतला (माता) शुद्ध हो जाती हैं। बेल के पत्ते, गिलोय, नागरमोथा, अडूसा, धनिया, जवासा, चिरायता, नीम, कुटकी और पित्तपापड़ा को मिलाकर काढ़ा बनाकर खिलाने से (शीतला) माता पक जाती है और पकी हुई माता जल्दी ही सूख जाती है। 44. सन्निपात (त्रिदोष) का ज्वर : बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गोखुरू आदि को मिलाकर पीस लें। इस काढ़े में गिलोय को मिलाकर सेवन करने से सन्निपात (त्रिदोष) बुखार में लाभ मिलता है। 45. पुनरावर्तक ज्वर : बेल की जड़ की छाल का काढ़ा सुबह और शाम रोगी को देने से पुनरावर्तक ज्वर में लाभ होता है। 46. श्वास या दमे का रोग : 6-6 मिलीलीटर बेल के पत्तों का रस, अडूसे के पत्तों का रस तथा सरसों के तेल को मिलाकर लगातार 7 दिनों तक पीने से श्वास रोग (दमा) ठीक हो जाता है। 10 मिलीलीटर बेल के पत्तों का रस या 10 मिलीलीटर अड़ूसे की छाल का रस अथवा 4-5 बहेड़े की गिरी का चूर्ण या 125 ग्राम पीपल और बड़ी इलायची का चूर्ण और शहद के साथ या 120 मिलीग्राम मकरध्वज के साथ रोजाना 2 बार सेवन करने से श्वास रोग (दमा) दूर हो जाता है। 250 ग्राम छोटे बेल की गिरी और 125 ग्राम हरड़ को लेकर पानी में 100 मिलीलीटर पानी के बचने तक उबालें, बाद में इसे मसलकर छान लेते हैं। इस काढ़े में 1 किलो गाय का ताजा घी मिलाकर दुबारा आग पर आधा पानी रहने तक पकाते हैं, फिर उसमें कालानमक डालकर पकाते हैं जब सारा पानी जल जाए और घी की मात्रा शेष रहे, तब साफ सूखे बर्तन में इसे भर लेते हैं। इसे 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा में सेवन करने से श्वास (दमा) व पतले दस्त के रोगी को बहुत लाभ मिलता है। 47. मलेरिया का बुखार : 7 मिलीलीटर बेल के पत्ते का रस सुबह और शाम लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है। 48. ज्वर अतिसार (बुखार के दस्त का आना) : बिल्व (बेल) फल का मज्जा, शुण्ठी (सोंक), धान्यक (धनिया) के फल, मुस्तक (मोथा) की जड़, सुगंध बाला (तगर) के फल को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर 14 से 28 मिलीलीटर की खुराक के रूप में सेवन करने से ज्वर अतिसार ठीक हो जाता है। 49. खांसी : बेलगिरी को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लेते हैं। इस 50 ग्राम चूर्ण में 50 ग्राम मिश्री का चूर्ण और 10 ग्राम वंशलोचन मिलाकर रख देते हैं। इसके 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर चाटकर खाने से खांसी के रोग में बहुत लाभ होता है। 1 चम्मच बेलगिरी का चूर्ण, एक चौथाई चम्मच वंशलोचन का चूर्ण और 10 ग्राम मिश्री को मिलाकर गर्म पानी के साथ सेवन करने से खांसी आना बंद हो जाती है। 1 चम्मच बेल के पत्तों का रस लेकर शहद के साथ सेवन करने से खांसी दूर हो जाती है। 50. इन्फ्लुन्जा के लिए : बेल के पत्ते, नागरमोथा, अडूसा, सोंठ, धनिया और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें, फिर ठंडा होने पर शहद मिलाकर पीने से बुखार में लाभ मिलता है। 51. चतुर्थक ज्वर : बेल के पत्ते, यष्टिमधु की जड़, मुस्तक, कटुकी प्रकन्द और हरीतकी फल आदि का बराबर मात्रा में मिश्रण बनाकर काढ़ा बनाकर 14 से 28 मिलीलीटर दिन में तीन बार लेने से लाभ होता है। बेल के पत्ते, निम्बछाल, द्राक्षा (मुनक्का), त्रिफला, रास्नामूल और वासा (अड़ूसा) को बराबर मात्रा में लेकर बने काढ़े को 14 से 28 मिलीलीटर की मात्रा में 5 से 10 ग्राम शर्करा और 5 से 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 3 बार लें। बेल के पत्ते, निम्बछाल, द्राक्षा (मुनक्का), त्रिफला, करेलाफल और इन्द्रयव के काढ़े को 14 से 28 मिलीलीटर की मात्रा में 5 से 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 3 बार लेने से आराम मिलता है। 52. पेट का जख्म : बेल के 50 ग्राम बीजों को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से आमाशय के जख्मों का दर्द मिट जाता है। 53. मसूढ़ों का रोग : मसूढ़ों में सूजन, खुश्की एवं दर्द में बेल का शर्बत 50 मिलीलीटर में 50 मिलीलीटर दूध मिलाकर पीने से रोग ठीक होता है। 54. गर्भाशय के विकार : बेलगिरी 20 ग्राम को चावलों के पानी में पीसकर उसमें थोड़ी सी चीनी मिलाकर दिन में 2-3 बार पीने से गर्भवती स्त्री की उल्टी, पतले दस्त, मंद-मंद बुखार चढ़ना, हाथ-पैरों की थकावट होना आदि सभी रोग दूर हो जाते हैं। 55. वमन (उल्टी) : बेल के हरे पत्तों को सोंठ के साथ पानी में उबालकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं। वैसे भी कई अनुभवी लोगों ने बेल के फूलों को प्यास, उल्टी और दस्त को खत्म करने वाला बताया है। 3 ग्राम बेल के शुष्क फूलों को 100 मिलीलीटर पानी में डालकर रख दें। 2 घंटे के बाद फूलों को थोड़ा सा पीसकर पानी में छान लें। उस छने हुए पानी में 20 ग्राम मिश्री मिलाकर दिन में कई बार पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है। 56. कब्ज : बेल का शर्बत पानी में बनाकर कुछ दिनों तक लगातार बनाकर पीने से लम्बी कब्ज की शिकायत से छुटकारा मिलता है। बेल का गूदा और गुड़ मिलाकर रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से मल का रुकना (अवरोध) ठीक हो जाता है। 7 मिलीलीटर बेल के पत्तों के रस में कालीमिर्च को मिलकार सुबह और शाम पीने से पेट की गैस में राहत मिलती है। 20 से 40 मिलीलीटर बेल के शर्बत में इच्छानुसार पानी मिलाकर रोजाना 2-3 बार देने से पुरानी से पुरानी कब्ज़ में लाभ होता है। यह अतिसार और खूनी अतिसार में भी फायदेमंद है। 57. पेट की गैस बनना : बेल के पत्ते के 4 पीस, हरसिंगार की 4 पत्तियों को एक कप पानी में चाय की तरह उबालकर रख लें। इस काढ़े में काला नमक मिलाकर पीने से लाभ होता है। 58. दस्त : 20 ग्राम बेल का गूदा और 10 ग्राम गुड को मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से दस्त लगना (अतिसार) ठीक हो जाता है। बेल की गिरी, मोचरस, धाय के फूल, लोध्र, आम की गुठली के बीच के भाग (मींगी) और अतीस को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, इस बने चूर्ण को लगभग 6 ग्राम की मात्रा में लेकर थोड़ी-सी मिश्री को मिलाकर पानी के साथ खाने से दस्त का आना बंद हो जाता है। कच्ची बेल की गिरी को पानी में अच्छी तरह पकाकर, शहद के साथ पीने से अतिसार यानी दस्त और अधिक दस्त आना (प्रवाहिका) समाप्त हो जाता है। बेल की गिरी, कत्था और अनार के छिलको को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इसी में से बहुत ही थोड़ी-सी मात्रा में बच्चों को चटाने से दांत के निकलते समय बच्चों को आने वाले दस्तों में लाभ मिलता है। बेल की गिरी और आम की गुठली के अंदर के भाग यानी गिरी को पीसकर रख लें, फिर इसी को 3-3 ग्राम की मात्रा में शहद और मिश्री के साथ एक दिन में 3 (सुबह, दोपहर और शाम) बार प्रयोग करने से अतिसार में लाभ मिलता है। पकी हुई बेल के फल के गूदे को दही के साथ खाने से लाभ मिलता है। आधी पकी बेल को आग में भूनकर भर्ता बनाकर मिश्री और गुलाब के रस में मिलाकर खाली पेट खाने से सभी प्रकार के दस्तों में लाभ होता है। 10 ग्राम बेल की गिरी को सौंफ के रस में घिसकर पिलाने से बच्चों को आने वाले हरे और पीले दस्त बंद हो जाते हैं। बेल की गिरी का पिसा हुआ बारीक चूर्ण और अलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से दस्त समाप्त हो जाता है। बेल की जड़ को पकाकर काढ़ा बनाकर थोड़ी-सी मात्रा में मिश्री को डालकर बच्चों को पिलाने से आंव (एक प्रकार का सफेद चिकना पदार्थ जो मल के द्वारा बाहर निकलता है) का बाहर आना रुक जाता है। बेल के फल के 5 ग्राम गूदे को पानी में थोड़ी-सी मात्रा में चीनी मिलाकर मीठा शर्बत बनाकर पीने से अतिसार (दस्त) में लाभ मिलता है। बेल को सूखाकर पीसकर चूर्ण बनाकर छाछ के साथ मिलाकर पीने से दस्त का आना रुक जाता है। 10 ग्राम बेल की गिरी, 10 ग्राम कत्था और 10 ग्राम मिश्री को पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इसी बने चूर्ण में से 4 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह और शाम ताजे पानी के साथ पीने से लाभ मिलता है। बेल की सूखी गिरी, सौंफ, ईसबगोल और चीनी को बराबर मात्रा में अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, इस बने चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पानी के साथ रोगी को पिलाने से आमातिसार (आंवयुक्त दस्त) और पेट में होने वाली ऐंठन में लाभ पहुंचता है। 59. संग्रहणी (दस्त): बिल्वफल का 1 चुटकी भर चूर्ण और 1 चुटकी भर सोंठ के चूर्ण को गुड़ के साथ मिलाकर रोगी को देने से सब प्रकार का संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है। 60. चोट लगने से सूजन व दर्द : सूजन से भरे दर्द में बेल के पत्ते की पट्टी बांधने से दर्द और सूजन कम होती है। 61. गर्भवती स्त्री की उल्टी : बेलगिरी का चूर्ण चावलों के पानी के साथ पीने से उल्टी बंद हो जाती है। 62. आवंयुक्त पेचिश (दस्त के साथ आंव और खून आना) : बेल के अंदर के गूदों को दही तथा गुड़ के साथ खाने से पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है। पके हुए बेलपत्थर के गूदे को छाछ में मिलाकर खाने से खूनी पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है। 6 ग्राम गुड़, 25 ग्राम बेल की गिरी को मिलाकर दिन में 4 बार सेवन करने से पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है। पका हुआ बेल पुराने पेचिश के रोगी को लाभ पहुंचाता है। कच्चा बेल के टुकड़े कर दें। फिर उसे आग में पकायें। गुदे के बीजों को फेंक दें। इस गुदे को दही के साथ खाने से पेचिश का रोग दूर हो जाता है। बेल का कच्चा गूदा, मिश्री और 2 ग्राम नागकेसर को मिलाकर सेवन करने से पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है। पेचिश के दर्द को दूर करने के लिए बेल के अंदर के गूदे को बड़ी सौंफ एवं घोड़बच के साथ मिलाकर काढ़ा तैयार करें। यह 40 से 80 मिलीलीटर काढ़ा सेवन करने से रोगी को लाभ मिलता है। इसके अलावा पेचिश में खून आना बंद हो जाता है। बेलपत्थर को कच्चा भूनकर रख लें। 1 ग्राम बेल पत्थर के गूदे में शक्कर मिलाकर खाने से पेचिश के रोगी का रोग दूर हो जाता है। बेलपत्थर के गूदे में सोंठ का चूर्ण और लस्सी (मट्ठा) मिलाकर पीने से पेचिश का रोग ठीक हो जाता है। 63. अग्निमान्द्यता (अपच) : पके बेल का शर्बत रोजाना सुबह पीने से भोजन आसानी से पच जाता है। बेल की पत्तियों को जरा-सा सेंधानमक और जरा-सी कालीमिर्च मिलाकर सेवन करने से अपच (भोजन का न पचना) का रोग दूर हो जाता है। 5 ग्राम बेल की गिरी, 7 दाने कालीमिर्च के, 10 दाने सफेद इलायची के और थोड़ी-सी मिश्री को मिलाकर पानी के साथ लेने से अपच (भोजन का न पचना) नष्ट हो जाती है। बेल की जड़ के काढ़े में छोटी पीपल का चूर्ण डालकर पीने से अपच का रोग ठीक हो जाता है। 64. प्रदर रोग : 10 ग्राम बेलगिरी, 10 ग्राम रसौत और 10 ग्राम नागकेसर को लेकर बारीक पीस लें। इसमें से 5-6 ग्राम चूर्ण को चावल के पानी के साथ खाने से प्रदर रोग में लाभ होता है। बेलगिरी, दारूहल्दी, रसौत, वासा (अड़ूसा), नागरमोथा, चिरायता, शुद्ध भल्लातक और कुमुद को बराबर मात्रा में शहद के साथ मिलाकर पीने से सभी प्रकार के पीले, काले, नीले, लाल, और सफेद प्रवाह वाले प्रदर रोग मिट जाते हैं।10-10 ग्राम की मात्रा में बेलगिरी, दारूहल्दी और रसौत को लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 3 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करने से प्रदर रोग में फायदा होता है। बेल के पत्तों को सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करने से मासिक धर्म में लाभ होता है। 65. घावों के दर्द व सूजन में : घावों पर बेल के पत्तों की पट्टी बांधना लाभदायक होता है। यह दर्द और सूजन को कम करती है। 66. बौनापन : किसी पेड़ से अमर बेल उतारकर, छाया में सुखाकर और चूर्ण बनाकर रखें। इस 1 से 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर रोजाना लेने से बौने की भी लम्बाई बढ़ती है। 67. लू का लगना : बेल का शर्बत गर्मी में पीने से लू लगने का खतरा नहीं रहता है। बेल की पत्तियों को पीसकर माथे पर लेप की तरह लगाने से शरीर की जलन से राहत मिलती है। 68. शीतपित्त : पटोल, नीम की छाल, अडूसा, त्रिफला, गुग्गुल, पीपल को 4-4 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर खाने से शीतपित्त के रोग में लाभ होता है। 69. मोटापा दूर करना : बेल के पत्ते, हरड़ को बारीक पीसकर बगलों में लगाने से भी मोटापे के रोग में लाभ होता हैं। 70. शरीर की बदबू: बेल के पत्तों को निचोड़कर निकाले रस में शंख का चूर्ण मिलाकर लेप लगाने से शरीर के अंदर आने वाली बदबू कम हो जाती है। बेल के पत्ते, काली अगर, खस, सुगन्धवाला और चंदन को मिलाकर पीसकर शरीर पर लेप करने से शरीर की बदबू मिट जाती है। 71. नींद न आना (अनिद्रा) : लगभग 10 ग्राम बेल की जड़ को पीसकर तथा घोटकर सुबह और शाम रोगी को देने से नींद ना आना (अनिद्रा) दूर हो जाती है। 72. सभी प्रकार के दर्द : बेल के पत्ते, एरण्ड के पत्ते और तिल को कांजी में अच्छी तरह पीसकर गर्म-गर्म लेप को पोटली बनाकर सेंकने से `वातज शूल´ में लाभ होता है। बेल की जड़, एरण्ड की जड़, चीते की जड़, सोंठ, हींग और सेंधानमक को बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर ठंडा करके पेट पर लेप करने से `वातज शूल´ यानी वात के कारण होने वाला दर्द समाप्त हो जाता है। 73. वीर्य रोग में : बेल के जड़ की छाल को जीरे के साथ पीसकर घी में मिलाकर सुबह-शाम पीने से वीर्य का पतलापन दूर होता है। 74. नकसीर : बेल के पत्तों के रस को पानी में मिलाकर पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) रूक जाती है। 75. अवसाद, उदासीनता, सुस्ती : लगभग 10 ग्राम बेल की जड़ को पीसकर और घोंटकर सुबह और शाम लेने से आलस्य या उदासीनता और पागलपन खत्म हो जाता है। 76. योनि का संकोचन : बेल के पत्ते, कुल्थी, गोरोचन और मैनसिल को बराबर मात्रा में लेकर तांबे के बर्तन में 7 दिनों तक रखकर तेल में पका लें, फिर 8 वें दिन इसे भग (योनि) पर लेप करने से योनि संकुचित होती है। 77. मूत्ररोग : बेल के 8-10 पत्तों की पानी के साथ चटनी बनायें। फिर उसमें 4-5 काली मिर्च का चूर्ण तथा 2 चम्मच शहद डालकर खाने से मूत्ररोग मे लाभ होता है। 78. एलर्जी होने पर : 5-5 ग्राम बेल की जड़, त्रिकुटा, पीपल और चित्रक को लेकर दूध में उबालकर दूध को हल्का ठंडा रह जाने पर पीने से एलर्जी के रोग में लाभ होता है। 79. दिल की ध़ड़कन : बेल की जड़ का काढ़ा सुबह शाम सेवन करने से हृदय की धड़कन सामान्य हो जाती है। पके हुए बेल का गूदा लगभग 100 ग्राम रोजाना सुबह के समय मलाई के साथ खाना चाहिए। 10 ग्राम बेल के पत्तों का रस लेकर गाय या भैंस के शुद्ध घी में मिलाकर सेवन करने से दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है। 80. फोड़ा (सिर का फोड़ा) : बेल के पत्ते की पोटली फोड़ों पर बांधने से सूजन व फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है। 81. हैजा : बेल का गूदा, सोंठ तथा जायफल को बराबर मात्रा में लेंकर, काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाने से हैजा में लाभ होता है। 82. दिल का रोग : बेल की जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है। 10 मिलीलीटर बेल के पत्तों का रस, 5 ग्राम देशी घी तथा 10 ग्राम शहद को मिलाकर उंगली से चाटने से दिल के रोग में लाभ होता है। 83. कुकुणक : बराबर मात्रा में लिए गए 7 से 14 मिलीलीटर हरीतकी फल, द्राक्षा (मुनक्का) और पिप्पली फल के काढ़े को बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को दिन में 2 बार देने से कुकुणक रोग में लाभ होता है। 84. शरीर का सुन्न हो जाना : बेल की जड़, त्रिकुटा तथा चित्रक बराबर मात्रा में लेकर 500 मिलीलीटर दूध के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर का सुन्न होना दूर होता है। 85. मानसिक उन्माद (पागलपन) : पागलपन के रोगी को बेल की जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर पिलाने से हृदय की धड़कन सामान्य होती है और पागलपन दूर हो जाता है। 86. खून की कमी : बेल के पत्तों के 5 मिलीलीटर रस में कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर पीने से पाचन शाक्ति ठीक हो जाती है और खून में वृद्धि होती है। 87. शरीर में सूजन : बेल की जड़, पीपल, चित्रक और त्रिकुटा को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर दूध में उबालकर पीने से शरीर की सूजन तुरंत ही दूर हो जाती है। 7 से 14 मिलीलीटर बेल के पत्तों के रस को 1 ग्राम मिर्च के चूर्ण के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से सूजन दूर हो जाती है। 88. बालरोगों पर औषधि (बच्चों के विभिन्न रोग) : बेल की जड़ के काढ़े में धान की खील और शर्करा मिलाकर मिलाकर और बच्चे को पिला दें। इससे हर प्रकार के अतिसार (दस्त) और वमन (उल्टी) में जल्दी लाभ होता है। बेलगिरी, इन्द्रायण, सुगन्धबाला, मोचरस और नागरमोथा के मिश्रण के साथ बकरी का दूध गर्म करके बच्चे को पिलाना चाहिए। इससे आमातिसार (खूनी दस्त) और संग्रहणी (बार-बार दस्त का आना) आदि रोग शीघ्र ही दूर हो जाते हैं। भुने हुए बेलगिरी के गूदे को गुड़ के साथ मिलाकर सेवन करें। इससे बच्चों का पेट दर्द, कब्ज, रक्तातिसार (खूनी दस्त) आदि रोग दूर होते हैं। 20 ग्राम बेलगिरी के बीज, 160 मिलीलीटर बकरी का दूध और 640 मिलीलीटर पानी को मिलाकर कम आग पर पकायें, जब दूध थोड़ा बाकी रह जाये तब इन्द्रायव, मोचरस और शर्करा का चूर्ण डालकर रोगी को पिलायें। इससे खूनी दस्त में आराम आता है। कच्चे बेल की गिरी, पिप्पली और सोंठ का चूर्ण शहद के साथ सही मात्रा में बच्चे को चटाने से वायु का अवरोध (गैस का बनना) तथा शूलयुक्त प्रवाहिका (पेचिश) का जल्दी अन्त होता है। आमातिसार (आंवयुक्तदस्त), रक्तातिसार (खूनी दस्त) आदि रोगों में उचित मात्रा में बेलगिरी का मुरब्बा अथवा मुरब्बे का शर्बत बच्चों को पिलाने से लाभ होता है। बेलगिरी, मोथा, इन्द्रायव, पठानी लोध्र, मोचरस और धाय के फूल के बराबर भाग का चूर्ण सेवन करने से पेचिश और दर्द में जल्दी आराम आता है।

Saffron health benefits

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